मंगलवार, 4 जनवरी 2011

नए सफ़र में ...

पत्रकारिता  को  लेकर  हमेशा  से  ही  मेरी  अपनी   सोच  रही  है  शायद  यही   वजह  है  की  मै  एक  संस्थान  में  कभी  भी  टिक  कर  नहीं  रह  सका .

ऐसा  एक  बार  फिर  हो  गया  और  इस  बार  बुलंद -छत्तीसगढ़    छुट  गया  .लक्ष  बड़ा  है  या  फिर  सफ़र  बड़ा  है  यह  मै  नहीं  जानता   लेकिन  ‘बुलंद ’ छुटने  पर  दुखी  भी  हूँ .सोचा  था  ‘बुलंद ’   के  माध्यम  से  नई  आज़ादी  की  लड़ाई  पूरी   कर  लूँगा  पर  इश्वर  को  शायद  कुछ  और   मंजूर  है .हालाँकि  न  तो  मैंने  कभी  कोई  काम  किसी  के  भोरेसे  पर  किया  और  न   उन  लोगों  में  से  हूँ  जो  भाग्य  के  भरोसे  सब  कुछ  छोड़   देते  है  .

अपने  काम  पर  जरुर  मुझे  भरोसा  रहा  है   और  आज  भी  भरोसा  है  की  सुचारू  व्यवस्था  बनाने  के  लिए  गलत  पर  प्रहार  करना  ही  होगो  , गलत  के  खिलाफ  खड़ा  होना  ही  होगा  , गलत  के  खिलाफ  खुलकर  बोलना  ही  होगा   भले  इसके  एवज  me  अपने  कुछ  लोगों  की  नाराजगी  मोल  क्यों  न  लेनी  पड़े  .

‘बुलंद ’के  लगभग  दो  साल  का  साफ आर  झंझावातों  से  गुजरा  खबरे  रोकने  का  दबाव  के  साथ  हार  बार  अखबार  छाप  सकने  के  अलावा  खबरों  पर  कारवाई  की  चिंता  भी  काम  नहीं  थी  लेकिन  कहा  जाता  है  की  अच्छा  सोचोगे  तो  अच्छा  होगा  शायद  इसकिये  सब  कुछ  अच्छा  हुआ 

नए  साल  के  सफ़र  में  अब  कौन  माध्यम  होगा  नहीं  कह  सकता  लेकिन  धर  और  पैनी  हो  और  जिस  तरह  से  मुझे  सबका  प्यार  ‘बुलंद ’में  लड़ाई  के  दौरान  मिला  और  नए  लोग  भी  जुड़े  वैसा  ही  आगे  भी  चले  नई  आज़ादी  की  इस  लड़ाई  में  और  भी  लोग  jude aur जो  जुड़े   है  उनके  प्यार  के  भरोसे  फिर  कुछ  कर  सकूँ  इसी  आशा  के  साथ  नए  माध्यम  की  तलाश  है .  ..

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2010

नव-वर्ष की शुभकामनाए

  आज संकल्प लेना ही होगा की हम चुप नहीं रहेंगे चाहे इसके लिए हमें कोई सी भी क़ुरबानी देनी पड़े क्योकि हमारी ख़ामोशी से गलत प्रोत्साहित होता है और सही हतोत्साहित होता है . हमारी चुप्पी तोड़ने का मतलब हमारी और हमरी आने वाली पीडी को सुख दिलाना है जरा सोचिये यदि हमारे सेनानी चुप होते तो?

बुधवार, 29 दिसंबर 2010

बैकुंठ पुर के सी एम् ओ के ७ ठिकानो पर छापा

इ ओ डब्ल्यू ने आज बैकुंठपुर के सी ऍम ओ डॉ गंभीर सिंह ठाकुर के सात ठिकानो पर छापे की कारवाई में ४ करोड़ से अधिक की अनुपातहीन संम्पत्ति का खुलासा हुआ है.

मंगलवार, 28 दिसंबर 2010

स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान

स्थापना दिवस पर कांग्रसियों ने स्वतंत्रता सेनानियों का सम्मान किया






स्वदेशी मेला

रायपुर के शंकर नगर स्थित बी टी आई मैदान में स्वदेशी मेला चल रहा है यह ३१ दिसम्बर तक चलेगा  

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2010

आजीवन कारावास

रायपुर   कोर्ट   नेनारायण  सान्याल  , विनायक  सेन  व्  पियूष  गुहा  को  नक्सालियों   के  साथ  सम्दंध  रखने  के  आरोप   में  देशद्रोह  करार  देते  हुए  आजीवन  कारावास  की  सजा  सुनाई  है   






बुधवार, 22 दिसंबर 2010

बाजारवाद से मंडी बनता मीडिया

क  2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में जिस तरह से मीडिया जगत पर कालिख पुती है वह मालिकों के लिए नया सबक हो लेकिन पत्रकारों के लिए किसी शर्मिन्दगी से कम नहीं है। विज्ञापन के नाम पर खबरें बेचे जाने की सोच ने इस चौथे स्तंभ पर बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव को खतरनाक स्थिति पर लाने लगा है। खासकर अब तक अछूते रहे प्रिंट मीडिया पर जिस तरह से बाजारवाद हावी होने लगा है वह पत्रकारिता गरिमा को खंडित करने वाला है। कभी अखबार निकालना एक मिशन हुआ करता था लेकिन मालिकों के पैसे की भूख ने मीडिया को मंडी और रंडी तक कहने मजबूर कर दिया है। क्या मीडिया सिर्फ अपने ग्राहकों के लिए है जो मोटी रकम दी जाती है।
इस सवाल को यदि नहीं रोका गया तो आने वाले दिनों में उनकी गिनती भी नेता और अधिकारियों के साथ होने लगेगी। यह सच है कि इस अर्थ युग में हर संस्थानों का क्षरण हुआ है लेकिन आज भी लोगों का विश्वास अखबार जगत के प्रति बना हुआ है। आज भी लोग व्यवस्था बनाए रखने में अखबार की भूमिका पर विश्वास करते हैं लोग नेता अधिकारियों के निरंकुशता के खिलाफ अखबार को ही प्रमुख हथियार मान कर अपनी बात कहने में संकोच नहीं करते हैं। लेकिन जिस तरह से 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में भास्कर ग्रुप का नाम सामने आया है वह दुर्भाग्यपूर्ण ही नहीं शर्मनाक भी है। इसे यहीं रोक देना चाहिए अन्यथा पत्रकारों के पास कुछ भी नहीं बचेगा। सिर्फ नौकरी और जीवन चलाने की मंशा रखने वालों के लिए किसी को कुछ नहीं कहना है लेकिन जो लोग सामाजिक जिम्मेदारी के तहत इस मिशन से जुड़े हैं वे जरुर सोचे कि वे किस तरह से किनके लिए काम कर रहे हैं।
भटनागर की माया
वैसे तो छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद आए दिन नए-नए अखबारों का प्रकाशन होने लगा है कभी अजीत जोगी के खास रहे अशोक भटनागर ने भी लोकमाया के नाम से दैनिक अखबार शुरु कर दिया है। कभी मीडियेटर के रुप में ख्याति प्राप्त अशोक भटनागर को पत्रकार नहीं मिल रहा है तो इसकी वजह उनकी अपनी ईमेज ही है।
रोजी रोटी जरूरी है...
इन दिनों राजधानी के ख्यातिनाम पत्रकार से लेकर फोटोग्राफर एक मंत्री की सेवा बजा रहे हैं। इस दौड़ में सबसे अच्छी बात यह है कि खबरों को लेकर मन मारना नहीं पड़ेगा और वेतन तो अच्छा खासा है ही साथ ही मंत्री जी के साथ रहने से खाने पीने की भी दिक्कत नहीं होगी।
रे की छुट्टी
अंग्रेजी पत्रिका सम-अप से पत्रकारिता करने की सोचने वाले आईएएस अधिकारी बी.के.एस. रे की छुट्टी हो गई है। कहा जाता है कि मंत्रालय में बैठे अफसरों के पंगे से त्रस्त कटारिया को यह फैसला करना पड़ा।
और अंत में...
आज की जनधारा के बिकने की खबर इतनी बार उड़ चुकी है कि अब इस खबर पर कोई ध्यान नहीं देता।