बुधवार, 26 दिसंबर 2012

गुस्से की वजह

गुस्से की वजह
दिल्ली में हुए बलात्कार के बाद दिल्लीवासियों का गुस्सा जिस तरह से फट पड़ा । वह हैरान कर देने वाला रहा । इतना गुस्सा ।
इसके उलट राजधानी में हफ्ते भर में बलात्कार की तीन घटनाएं हुई । चार साल के मासूम तक को नहीं छोड़ा । तब भी लोग सड़क पर नहीं आये और सड़क पर आये तो दिल्ली के लिए । छत्तीसगढ़ में शिक्षा  कर्मियों का आन्दोलन भी उतना उग्र नहीं हुआ । भाजपा ने एक नहीं दो बार अपने घोषणा पत्र बनाम संकल्प पत्र में शिक्षा कर्मियों के संविलियन की बात कहीं है लेकिन अपने संकल्प को वह सत्ता में आते ही भूल गई । पहले संकल्प के दौरान तो मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह स्वयं प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष थे ।
संकल्प तो किसानों को 270 रूपये बोनस देने का भी था लेकिन उसे भी भूल गई । किसानों ने भी आन्दोलन किया लेकिन न सरकार झूकी और न ही किसानों को इतना गुस्सा आया । गुस्सा तो तब भी नहीं दिखा जब नई राजधानी से लेकर उद्योगों के लिए खेती की जमीन कौडिय़ों के मोल किसानों से ले ली गई और न ही गुस्सा तब भी आ रहा है जब भ्रष्टाचार के किस्से गली चौराहे पर हो रही है ।
कृषि उपज मंडी की जमीन डाक्टरों को कौडिय़ों के मोल दे दी गई । तब भी गुस्सा नहीं आया ।
छत्तीसगढ़ राÓय आन्दोलन के दौरान भी कभी आन्दोलन में हिंसा ने अपना स्थान नहीं लिया और अब भी किसी भी आन्दोलन में हिंसा का कोई स्थान नहीं है । और न ही हम किसी भी आन्दोलन के हिंसा का समर्थन ही करते हैं । लेकिन हम सरकार से एक बात जरूर कहते हैं कि वह छत्तीसगढ़ की स्थिति को ऐसा न होने दे ।
सत्ता के लिए राजनीति जरूर करें लेकिन ऐसे वादे न करे जिसे पूरा करने में दिक्कत हो । कांग्रेस सरकार के लाठी चार्च से नाराज शिक्षा कर्मियों के वोट के लिए संविलियन का संकल्प जब पूरा नहीं करना था तब ऐसा संकल्प लिया ही क्यों गया ? ऐसे में आज जब शिक्षा कर्मी इसी संकल्प को पूरा करने सड़क पर उतर आये हैं तो गलती किसकी है । उनके सड़क पर उतरने से नौनिहालों की पढ़ाई का क्या होगा । इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा ।
उपर से आन्दोलन को कुचलने का सरकारी प्रयास क्या गुस्से को भड़काने वाला नहीं है । क्या भाजपा को इस झूठे वादे के लिए माफी मांगकर शिक्षाकर्मियों को समझाना नहीं चाहिए । हमारी तो सभी राजनैतिक दलों से गुजारिश है कि सिर्फ सत्ता के लिए ऐसा आश्वासन या वादे न करे जिसे पूरा नहीं किया जा सकता । क्योंकि ऐसे वादों से ही आन्दोलन में हिंसा को बल मिलता है और जिसकी सजा ईमानदार या आम लोगों को भुगतना पड़ता है । अब लोगों को सिर्फ झूठे वादों से Óयादा दिन नहीं बहलाया जा सकता । लोगों में जागरूकता आई है और वे अपना अधिकार भी समझने लगे हैं । अब पहले सा जमाना नहीं रहा कि लोग वादे भूल जाते थे या अपने जनप्रतिनिधियों के भ्रष्टाचार को नजर अंदाज कर देते थे ।
अब लोग अपने हक के लिए सड़कों तक आने लगे है और उन्हें समय रहते नहीं समझाया गया तो सरकार के लिए दिक्कत हो सकती है ।

सोमवार, 24 दिसंबर 2012

दबाव पर भारी पड़ते प्रतिस्पर्धा...


इन दिनों राजधानी के बड़े मीडिया समूह में प्रसार संख्या बढ़ाने की होड़ मची हुई है कोई प्रदेश में स्वयं को नम्बर वन बताने लगा है तो कोई राजधानी में अपने को नंबर वन बता रहा है । नबंर वन बनने की इस प्रतिस्पर्धा में उपहार तो बांटे ही जा रहे हैं विज्ञापन दरों पर भी समझौते हो रहे हैं । ऐसे कार्यक्रमों में मीडिया पार्टनर बने जा रहे हैं जिनके आयोजकों पर उंगली उठ रही है ।
यह प्रतिस्पर्धा खबरों पर भी दिखने लगी है । लेकिन कुछ खबरों पर विज्ञापन की मजबूरी भी झलकने लगी है । खबरों से संस्थान के नाम गायब हो जाते है या फिर खबरें छायावाद पर बन जाती है  ।
इस सार्धा से पत्रकार बिरादरी खुश है कम से कम उन्हें रूटीन की खबर पर दबाव नहीं फेलना पड़ रहा है । यह अलग बात है कि राज बनने के बाद ग्रामीण रिर्पोटिंग व खोजी पत्रकारिता को सर्वाधिक नुकसान पहुंचा है ।
कभी- सर्वाधिक ग्रामीण रिपोटिंग प्रकाशित करने वाला देशबंधु प्रसार में पीछे छूट गया है तो इसकी वजह कहीं न कहीं विज्ञापनदाताओं का दबाव ही है ।
सरकार केविज्ञापन का दबाव तो अब भी कम नहीं हुआ है अब तो पत्रकार बिरादरी भी सरकार के कई किस्से सुनाते नहीं थकते । पत्रिका को पास जारी नहीं करना भी सरकारी दबाव का एक हिस्सा है । वैसे भी कौडिय़ों के मोल सरकारी जमीन लेकर कार्मशियल उपयोग की गलती हो तो दबाव तो झेलने ही पड़ेंगे । लेकिन कई अखबार वाले तो केवल सरकारी विज्ञापन के लालच में ही दबाव झेल रहे है ।
मजे में ब्यूरों
छत्तीगढ़ से निकलने वाले पत्र पत्रिकाओं से Óयादा मजे में दूसरे प्रदेश से निकलने वाले पत्र-पत्रिकाओं के पत्रकारों के मजे है । विज्ञापन भी इन्हें खूब मिल रहा है और घूमने-फिरने के लिए जनसंपर्क से वाहन भी उपलब्ध हो जाते हैं ।
अब यह अलग बात है कि पत्रकारों के सत्कार में जितने पैसे खर्च नहीं होते उससे अधिक का बिल बन जाता है ।
रिश्तेदारी पर प्रहार...
भले ही इसे प्रतिस्पर्धा का नाम दिया जाये पर सच तो यह है कि अपने को मालिक का रिश्तेदार बताकर धौंस जमाना एक पुलिस अधिकारी को भारी पडऩे लगा हैं अब इसी अखबार के रिपोर्टर नाराज हैं और ढूंढ-ढूंढ कर खबरें बनाई जा रही है । आखिर थाने में रोज की करतूत कम नहीं है । यानी रिपोर्टर की जय हो ।
और अंत में ...
छत्तीसगढ़ में स्थापित होने छल-प्रपंच करने वाले एक अखबार को अब विज्ञापन वाला अखबार कहा जाने लगा है । आखिर इतना बड़ा काम्प्लेक्स कोई यूं ही खड़ा नहीं करता ।

रविवार, 23 दिसंबर 2012

गरीबों का आशियाना ढहा दिया..

.इधर  जब सरकार उद्योग लगाने उद्योगपतियों को पुचकार रही है तब दूसरी तरफ औद्योगिक दादागिरी को नजर अंदाज किया जा रहा है । वंदना हो या जिन्दल, एस के एस हो या लक्ष्मी सीमेंट इनकी दादागिरी पर भाजपाई नाराज है लेकिन सरकार को इससे कोई मतलब नहीं है । वन्दना समूह के इशारे पर तो 25 साल से रह रहे 8 परिवार के घर उजाड़ देने से भाजपा नेता और विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष बनवारी लाल अग्रवाल के तक निंदा कर दी लेकिन रमन सरकार को इससे कोई मतलब नहीं है ।
रमन सरकार के उद्योग प्रेम की वजह से इन दिनों छत्तीसगढ़ में जगह-जगह लोगों की नाराजगी खुलकर सामने आने लगी हैं बावजूद सरकार को आम लोगों से Óयादा उद्योग लगाने की चिंता है । और इस उद्योग प्रेम की वजह से आम लोगों पर हो रहे औद्योगिक अत्याचार पर भी कार्रवाई नहीं हो रही है । उल्टा उन्हें पुरस्कार तक दे दिया जाता है ।
वंदना समूह द्वारा कोटवा जिले में स्थापित किये जा रहे पावर प्लांट की करतूत थमने का नाम ही नहीं ले रहा है । जमीनों पर कब्जे, तालाबों पर कब्जे के बाद अब गरीबों के आशियाना ढहाने को लेकर वंदना समूह एक बार फिर सुर्खियों में है ।
जानकारी के अनुसार ग्राम सलोरा व छुरीखुर्द की जमीन पर वंदना विद्युत लिमिटेड प्रबंधन द्वारा संयंत्र का निर्माण कराया गया है । इस संयंत्र के लिए राखड़ बांध का निर्माण ग्राम झोरा में कराया जा रहा है । संयंत्र से राखड़ बांध तक पाईप लाइन बिछाने का कार्य प्रबंधन करा रहा है, जिसके लिए भूमि का अधिग्रहण वह कर चुका है । यह पाईप लाइन गंगापुर से होकर गुजरनी है । पाईप लाइन के रास्ते में गंगापुर निवासी 7 कृषकों व एक महिला के आवास आ रहे थे । इन आवासों को वंदना प्रबंधन ने शुक्रवार की सुबह एकाएक गांव में पहुंचकर कटघोरा तहसीलदार आर के मार्बल की उपस्थिति में लगभग ढाई सौ पुलिस जवानों के साये में गिरवा दिया ।
बताया गया कि शासकीय भूमि पर लगभग &0 वर्षो से काबिज एवं मकान बनाकर खेती-बाड़ी करते हुए हरिराम रिर्मलकर, भोजराम निर्मलकर, लखनलाल, छतराम, यशवंत यादव, मुखीराम, छत्रपाल यादव व रसियानों बाई सपरिवार निवासरत थे । मुखीराम द्वारा किराना दुकान का संचालन भी किया जा रहा था  जबकि भोजराम ने बाड़ी लगाया था । इन परिवारों का आशियाना वंदना प्रबंधन के इशारे पर उजाडऩे की कार्रवाई करने के साथ ही सरकारी जमीन पर संचालित होटल को भी तहस-नहस कर दिया गया । वहीं किराना व्यवसायी मुखीराम यादव ने महिला पटवारी पर आरोप लगाया है कि उसने कार्रवाई के दौरान गल्ले से 5 सौ रूपये निकाल लिए और वापस नहीं किया ।
सूत्रों के मुताबिक वंदना विद्युत लिमिटेड के अधिकारियों द्वारा उपरोक्त  ग्रामीणों के पास पिछले दिनों पहुंचकर मकान खाली करने कहा गया था । ग्रामीणों ने तहसील कार्यालय पहुंचकर तहसीलदार से शिकायत कर मदद की गुहार लगाई थी । तहसीलदार ने पूरी तरह सहयोग का आश्वासन किसानों को दिया ।
इसके कुछ दिन बाद वंदना प्रबंधन के अधिकारी दोबारा ग्रामीणों के पास गए तब ग्रामीणों ने उनसे बसाहट की सुविधा मांगी । & दिन पहले तहसीलदार ने ग्रामीणों को कार्यालय बुलाकर समझाईश दी थी, जिस पर ग्रामीण जमीन छोडऩे तैयार हो गए थे । इस सहमति के बाद  जिस तरह का रवैया वंदना प्रबंधन ने अपनाया उसे क्षेत्रवासी अनुचित और गुण्डागर्दी पूर्ण कार्रवाई बता रहे हैं ।

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

गृहमंत्री साहब ! अपराध तो बढ़ेंगे ही ...


जब प्रदेश के गृह मंत्री शराब ठेकेदारों के हाथों थाने बिकने की सिर्फ बात करता हो, पुलिस कप्तान को निकम्मा तो कहता हो लेकिन कार्रवाई नहीं कर पाता हो तब अपराध तो बढ़ेगे ही । अब  तो लोगों को सोच लेना चाहिए कि उनकी सुरक्षा उन्हें स्वयं करना है
क्योंकि वर्दी का सारा रौब तो यातायात सुधारने के बहाने की जाने वाली वसूली में निकल जाती है और थोड़ी बहुत ताकत बचती है वह वीआईपी ड्यूटी की भेंट चढ़ जाती है ।
भाजपा के इस दूसरे शासन काल में बढ़ते अपराध पर बेवजह कांग्रेसी हल्ला मचा रहे हैं । जब गृह मंत्री की बेबसी उनके शब्दों में बाहर आ रही हो तब भला पुलिस की मनमर्जी तो चलेगी ही । फिर कोई सरकार को कैसे दोष दिया जा सकता है ।
अब राजधानी की पुलिस को ही देख लीजीए ।  जो आई जी बने हंै उन पर एक आईपीएस राहूल शर्मा को लेकर गंभीर आरोप है लेकिन सरकार मुक्त में तनख्वाह देगी नहीं और काम लेना है तो भेज दिया रायपुर । फिर ऐसे अफसर की शायद सरकार को भी जरूरत है जो बेहद चालाक हो ।
इसके बाद पुलिस कप्तान दीपांशु काबरा को समझ ले । कहने को तो किसी भी आईपीएस को एक स्थान पर तीन साल से Óयादा नहीं रहना चाहिए लेकिन वे चार साल से कप्तानी संभाल रहे है । इस बीच कई गंभीर अपराध हुए । मन्नू नत्थानी से लेकर राजेश शर्मा जैसे अपराधी नहीं पकड़े जा सके । हत्या के कितने ही मामलों का पता नहीं चला । इस बीच कई थानेदार बदल गये । उनके नीचे के कई अधिकारी बदल गये । अपराधियों में दहशत पैदा करने वाले रत्नेश सिंह - शशिमोहन सिंह हो या मुकेश गुप्ता जैसे आई जी हो सब चले गए लेकिन काबरा साहब चार साल से जमें हुए हैं ।
राजधानी के थानों और यहां की थानेदारी के किस्से भी कम नहीं है । हर थाने के अपने किस्से है । मोटे तौर पर पीडि़तों को परेशान करने का आरोप के अलावा सटोरियों-जुआडिय़ों और अवैध शराब बेचने वालों से महिना वसूलने का आरोप साबित होने पर भी कुछ नहीं होता । खासकर पंडरी मोवा और टिकरापारा में तो थानेदारों के कारनामों से आम आदमी तक परेशान है । शिकायतें दर्ज करने की बजाय पीडि़तों को भगाकर थाने का आर सी सुधारने में ये माहिर है और यहि धोखे से मामला कप्तान तक चल दे तब भी कोइ्र फिक्र नहीं क्योंकि ऐसी शिकायतों को रद्दी की टोकरी में कैसे फेंकना हैे यह कप्तान साहब भी जानते हैं । और Óयादा हल्ला हुआ तो कुछ नहीं करना है बस एक आई आर लिख दो ।
भले ही राजधानी की पुलिस अपने यहां अपराध रोकने में फेल हो गई हो लेकिन पड़ोसी जिले में कुछ हुआ नहीं कि भरपूर नाकेबंदी की जाती है । अरे नाके बंदी करनी हो तो चौक चौराहों की बजाय प्रवेश स्थल पर कर लो लेकिन नहीं वहां जाने का झंझट कौन पाले । शहर में ही पकड़ लेंगे ।
ऐसा नहीं है कि दीपांशु काबरा जी चार साल से जमें है इसलिए रायपुर का यह हाल है । दूसरी जगह भी स्थिति अ'छी नहीं है ।
चांपा-जांजगीर, रायगढ़ में तो पुलिस अद्योग पतियों के इशारे पर काम कर रही है । जबकि अंबिकापुर सरगुजा में तो अब भी माफिया गिरी हो रही है । कोयला चोर हो या जंगल तस्कर सबसे पैसा मिल रहा है । जबकि बस्तर क्षेत्र में तो नक्सली दहशत उन्हें रोक रखी है । लेकिन वहां के पुलिस वालों के घरों के फर्नीचर किसी से छिपे नहीं है ।
पुलिस के दुश्मन मीडिया वाले है । नेता तो सेट हो जाते है । मामला बना दो नेता चुप । लेकिन मीडिया का तोड़ ढूंढना मुश्किल है ।
चलते - चलते ...
डाल्फिन स्कूल के संचालक राजेश शर्मा, वायदा कारोबारी मन्नू नत्थानी के अलावा शहर में ही दर्जन भर से Óयादा ईनामी अपराधी को पुलिस नहीं ढूढ़ पा रही है लेकिन सीबीआई जांच  की सिफारिश नहीं होगी ? आखिर पुलिस भी जानती है कि .इनके पीछे किसका हाथ है ?

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

पार्षदों की चाहत, शहर वासी आहत...


राजधानी का नगर निगम इन दिनों राÓय सरकार के लिए राजनीति का अखाड़ा बना हुआ है । सत्ता में बैठी राÓय सरकार के दो मंत्री अभी भी यह बात हजम नहीं कर पा रहे हैं कि जनता ने भाजपा को नकार दिया है । वे यह बात देखना ही नहीं चाहते कि उनकी पैसे की भूख को लोगों ने देख लिया है । निगम के अधिकारी भी सरकार के इशारे पर काम कर रहे हैं ।
 आयुक्त के सामने सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि वे हर हाल में राजधानी में ही रहना चाहते हैं । ऐसे में ठुकुर -सुहाती तो करनी ही पड़ेगी । फिर तहसील के पाप भी तो कम नहीं है ।
महापौर किरणमयी नायक तो अभी से विधानसभा चुनाव की तैयारी में है । विदेश यात्रा भी कम नहीं हो रहा है । छत्तीसगढिय़ा वाद को लेकर स्वाभिमान यात्रा अब पद के साथ गुम होने लगा है तभी तो प्रभारी महापौर मनोज कंदोई के हिस्से में चला जाता है । अब शहर कांग्रेस अध्यक्ष इंदर चंद धाड़ीवाल पर भी तो दबाव बनाना है और भाजपा तो राजनैतिक बैरी है ही ।
पहले इस राजनैतिक बैरी को साधने की कोशिश हुई । स्वयं सेवकों पर फूल बरसाये गये लेकिन जल्द ही यह बात समझ में आ गई कि इससे कोई फायदा नहीं है । इसलिए यह गलती दोहराई नहीं गई ।
अब व्यवस्था व नियम को लेकर सभापति संजय श्रीवास्तव और महापौर में ठन गई है । यानी शहर विकास से Óयादा राजनीति जरूरी है । और ऐसे में जब बैजनाथ पारा वार्ड में चुनाव हो तो राजनीति जोरदार होनी तय है ।
कांग्रेस को अब भी यहां मुस्लिम वोटों पर भरोसा है । जबकि भाजपा समझने लगी है कि वोट कहां से हासिल होंगे । लेकिन जनता भी समझ गई है कि जो लोग खड़े हैं उनमें वार्ड की चिंता किसे Óयादा है । पहले भी देश में कई चुनावों में किन्नरों की जीत हुई है । यहां भी एक किन्नर प्रत्याशी है ?
वैसे भी राजधानी के 70 पार्षदों का हाल जनता अ'छे से जान रही है । कौन पार्षद कहां से पैसे कमा रहा है  किसी से छिपा नहीं है । गुमटी और पानठेला लगाने के एवज में कहां-कहां वसूली चल रही है । बगैर नक्शा स्वीकृत कैसे मकान बन रहे है और पार्षद को कितना मिल रहा है । यह भी छिपा नहीं है ।
हद तो यह है कि सफाई कर्मियों की उपस्थिति को लेकर भी पैसा कमाया जा रहा है। कई पार्षद के रिश्तेदार तो निगम के ठेकेदार तक बन गये है । और महिला पार्षदों से Óयादा तो उनके पति लगे रहते है भले ही पार्षद पति को लोग शार्ट कट में पाप कह रहे हो लेकिन इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता आखिर राजनीति तो मोटी चमड़ी वाले ही करते है ।

बंद आंख से ...
शंकर नगर क्षेत्र के एक पार्षद की दादागिरी चरम पर है । कार्यक्रम के लिए पैसा नहीं देने वाले गुमटी वाले को दूकान बंद कर भागना पड़ा । जब कब्जा ही अवैध हो तो पार्षद की दादागिरी ऐसी ही चलती है ।  दूसरा मामला स्टेशन क्षेत्र का है । भतीजे की ठेकेदारी की करतूत सड़क पर दिखने लगी है और पाप बाहर आने से रोका जा रहा है ।

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

गर्भाशय कांड के डाक्टरों से भी करोड़ों वसूली !

गर्भाशय कांड के डाक्टरों से भी करोड़ों वसूली !
रमन राज में चल रहा राम नाम की लूट !
छत्तीसगढ़ सरकार में मची राम नाम की लूट का एक और चौकाने वाला मामला उÓाागर हुआ है । पैसों की लालच में गर्भाशय निकालने के आरोपी डाक्टरों को बचाने करोड़ों रूपये वसूलने जाने का आरोप सामने आया है । लोगों की जान के एवज में चल रहे इस गोरख धंधे में प्रदेश सरकार के मंत्री से लेकर सचिव स्तर के अधिकारियों की मिलीभगत की खबर है । छत्तीसगढ़ में सत्ता में बैठे लोगों की पैसे की हवस समाप्त होने का नाम ही नहीं ले रहा है । ऐसा कोई विभाग नहीं है जहां भ्रष्टाचार की नदियां नहीं बह रही हो । स्वयं मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह कोल ब्लाक मामले में आरोपी है ओपन एक्सेस घोटाले से खनिज घोटाले, रतनजोत घोटाले में सीधे मुख्यमंत्री पर आरोप लग रहा है जबकि रोगदाबांध से लेकर सरकारी जमीनों के मामले भी गर्म है ।
स्वास्थ्य विभाग में घोटाला चरम पर है । हालत यह है कि सरकार गरीबों की जान की कीमत लगाने लगी है और गरीबों की जान से खिलवाड करने वाले डाक्टरों को बचाने तक पैसा वसूले जाने की चर्चा है ।
नेत्र कांड में अब तक करीब सौ लोगों की आंखे फोड़ दी गई और स्मार्ट कार्ड घोटाले के आरोपी को पकडऩे में भी प्रशासन असफल रहा है ।
ताजा सनसनीखेज मामला गर्भाशय कांड के डाक्टरों को बचाने का है । हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों की माने तो इस कांड में फंसे डाक्टरों को बचाने के एवज में करोड़ों रूपये वसूले गए है । ज्ञात हो कि ईलाज के नाम पर छत्तीसगढ़ के करीब दर्जनभर डाक्टरों ने बेवजह गर्भाशय निकालकर गरीबों से आपरेशन के एवज में पैसे वसूले थे । कम उम्र की इन महिलाओं का पैसे के लिए गर्भाशय निकालने का मामला जब प्रकाश में आया तो डाक्टरों की करतूत से अ'छे-अ'छे के रोंगटे खड़े हो गए ।
जांच में ऐसे सैकड़ों मामले सामने आये जिनमें डाक्टरों की करतूत सामने आई और जांच में दोष्शी पाये जाने वाले करीब 9 डाक्टरों का पंजीयन रद्द कर दिया गया ।
सूत्रों का क हना है कि पंजीयन रद्द होने से क्षेत्र के बाकी डाक्टरों में हड़कम्प मच गया और वे सरकार से आरपार की लड़ाई पर उतर आये ।
डाक्टरों की धमकी से घबराकर सरकार ने गर्भाशय कांड की एक और जांच शुरू करने की घोषणा कर दी और निलंबन समाप्त कर दिया ।
सूत्रों का कहना है कि डाक्टरों का निलंबन समाप्त करने प्रत्येक डाक्टरों से 50 लाख से लेकर एक करोड़ तक लिये गये । सूत्रों की माने तो यह रकम सचिव से लेकर डाक्टरों की जेब में पहुंच चुका है ।
स्लाटर हाऊस में तब्दिल होतते नर्सिंग होम के खिलाफ कार्रवाई की बजाय उनके प्रति सरकार का रवैया आश्चर्यजनक है । दूसरी तरफ निलंबित डाक्टरों ने बहाली के बाद फिर जोरशोर से अपना पुराना खेल शुरू कर देने की चर्चा है ।
रमन राज में भ्रष्टाचार के इस तरह के शर्मनाक खेल की चर्चा तो अब चौक चौराहों में होने लगी है ।
इधर गर्भाशय कांड के मामले की जांच की घोषणा तो कर दी गई है लेकिन सूत्रों का दावा है कि यह केवल विषय से ध्यान भटकाने के लिए किया गया है । जबकि वास्तविकता यह है कि लेनदेन का सारा मामला रफा दफा कर दिया गया है ।

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

स्वास्थ और नैतिकता ...

स्वास्थ और नैतिकता ...
 अब राजनीति में नैतिकता नहीं रह गई है । रेल दुर्धटना में रेल मंत्री का इस्तीफा इतिहास बन गया है । अब नैतिकता कहीं बची है तो सिर्फ विरोधियों को नैतिकता का पाठ पढ़ाने के लिए ही बच गया है ।
छत्तीसगढ़ की राजनीति से तो यह पूरी तरह से गायब हो चुका है । सरकार में बैठे जो लोग कल तक नैतिकता की दुहाई देते नहीं थकते थे आज सत्ता  में बैठते ही केवल पैसे कमाने में लग गये हैं ।
बालोद नेत्र कांड से लेकर बागबाहरा  नेत्र कांड में करीब सौ लोगों की आंखे फोड़ दी गई । लेकिन कुछ नहीं हुआ । न स्वास्थ मंत्री का इस्तीफा आया और न ही किसी डाक्टर पर ही कार्रवाई की गई । आखिर गरिबों की जान की कीमत ही क्या है । Óयादा हल्ला मचेगा तो मुआवजा दे दो । कौन सा अपनी जेब से देना है ।
छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सुविधाओं का बुरा हाल है । सरकारी अस्पतालों में घोर लापरवाही चल रही है । और निजी अस्पताल तो किसी स्लाटर हाऊस से कम नहीं रह गया है । और सरकार में बैठे लोगों ने तो अपनी आंखे बंद कर ली है । ऐसे में आम आदमी के सामने क्या स्थिति है यह सोच कर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं ।
छत्तीसगढ़ सरकार भले ही लाख दावा करे लेकिन वह आम लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रही है । स्मार्ट कार्ड घोटाला हो या गर्भीशय कांड का मामला हो । सरकार डाक्टरों के सामने असहाय साबित हो  चुकी है ।
अब तो आम लोगों में यह चर्चा साफ सुनी जा सकती है कि सरकार में बैठे लोगों का ध्येय सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाना रह गया है उन्हें आम लोगों की जिंदगी से कोई लेना देना नहीं है ।
एक तरफ मुख्यमंत्री हर व्यक्ति के लिए &0 हजार रूपये तक का मुफ्त ईलाज करने के लिए योजना बना रहे है तो दूसरी तरफ ईलाज के अभाव में या डाक्टरों की लापरवाही से लोगों की जान पर बन आई है । एक तरफ जब सरकारी अस्पतालों में लापरवाह डाक्टर मौजूद हो, दवाई न हो तथा दूसरी तरफ निजी अस्पताल केवल पैसे कमाने की मशीन बन कर स्लाटर हाऊस में तब्दिल हो रहे हो तब &0 हजार नहीं &0 लाख रूपये के मुफ्त ईलाज की योजना बना दिया जाए । आम लोगों को क्या लाभ होगा । 
जब तक सरकार में बैठे लोगों की पैसों भूख समाप्त नहीं होगी किसी भी योजना का कोई मतलब नहीं रह जाता । ऐ वहीं भाजपा है जो सोते जागते राजनैतिक सुचिता और नैतिकता की बात करते नहीं थकते थे लेकिन सत्ता में आते ही सब भूल बैठे । ये वहीं मुख्यमंत्री है जिनकी छवि को लेकर भाजपा ने पिछला चुनाव जीता था लेकिन इस बार वे स्वयं कोयले की कालिख से पूते हुए है ।
ऐसे में मंत्रियों या अधिकारियों से नैतिकता की उम्मीद कैसे की जा सकती है ।
हद तो यह है कि चर्चा यहां तक आ पहुंची है कि आंख फोड़वा कांड के डाक्टरों को बचाने पैसे लिये जाते है । गर्भाशय कांड के दोषी आधा दर्जन डाक्टरों से उन्हें बचाने करोड़ो लिये गये । हद तो यह भी है कि सोची समझी इस गर्भाशय कांड के दोषियों के द्वारा आज भी उन्ही क्लीनिक में मजे से प्रेक्टिस चल रहा है ।
यह कैसी सरकार है जो आंख फोडऩे या गर्भाशय हजम करने या गरीबों के ईलाज वाले स्मार्ट कार्ड का पैसा हजम करने वालों पर कार्रवाई नहीं करती  । हद तो यह भी है कि ऐसे मामले में प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस भी हल्ला मचाने के अलावा Óयादा कुछ नहीं करती । चोर-चोर मौसेरे भाई की तर्ज पर आम लोगों के जीवन से खिलवाड़ करने वालों को बख्शने की यह कोशिश नैतिकता का कौन सा परिभाषा गढ़ रही है यह तो राजनैतिक दल ही जाने लेकिन यह ठीक नहीं है और यह बात राजनैतिक दलों को समझ लेना चाहिए कि एक और सर्वो"ा सत्ता है जिसकी लाठी बेआवाज होती है