गुरुवार, 30 अप्रैल 2020

बच्चे नहीं है न साहेब!


हाँ मैं मज़दूर हूँ साहेब
जो काँधे में बच्चों को 
और सिर में पोटली उठाये 
पाँच-सात सौ कोस चल सकता हूँ
लेकिन आप क्या हो ! साहेब
इन बरसों मे किसने सोचा है हमारे लिए 
आप भी क्यों सोचते?
जान का डर किसे नहीं होता 
लेकिन कोरोना का डर हमसे पहले 
आपको था साहेब 
अपनी जान के डर से होली नहीं मनाई 
होली हमने मनाई 
ताकि ख़ुशियों का रंग 
पूरी कायनात में बिखर जाये
आप तो ख़ुशियाँ लुट रहे है साहेब 
जब इतना भयावह का पता था 
तब ही हमारे लिये निर्णय 
क्यों नहीं लिया साहेब 
ख़ाली जेब दान के दो समय के 
खाने के सहारे कोई कैसे 
रह सकता था साहेब 
पत्नी रह भी ले लेकिन 
बच्चे कैसे रहेंगे साहेब 
आपके बच्चे नहीं है न साहेब !!!!
-कौशल तिवारी 
( मज़दूर दिवस - २०२० )

बुधवार, 22 अप्रैल 2020

यादों के झरोखों से ...

आफ़त की चाहत क्या एक आँखो देखी और महसूस किया गया भारतीय राजनीति का वह कुरूप चेहरा है जिसे लिखने जब बैठा तो सोचा नहीं था कि इसका इतना प्रतिसाद मिलेगा
सिर्फ़ कवर पेज और भूमिका पर  तारीफ़ मिली तो गाली देने वालों की भी कमी नहीं थी
लेकिन लिखना जारी रखा
आज जब इसका चौदहवाँ किश्त प्रकाशित हुआ
इसके पहले पाठकों की जो प्रतिक्रिया है उसे सहेज रहा हूँ
अच्छा है चाहे बुरा है
संतोष यह है कि ये मेरा है



















रविवार, 12 अप्रैल 2020

कट्टरता और श्रेष्ठता - 2


मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं कैसे उन लोगों के मन में बैठे डर को दूर करूं जो यह तय कर चुके है कि मोदी सरकार आई तो उनका नुकसान होगा या नहीं आई तो यह देश एक और मुस्लिम राष्ट्र की तरफ कदम बढ़ायेगा।
राकेश विनय ही नहीं शहर में कितने ही लोग थे जो इस डर को हवा दे रहे थे और इस पूरी कहानी में हर उस घटना को ज्यादा प्रचारित किया जा रहा था जिसमें दोनों ही धर्म के लोग जुड़े थे।
मसलन राकेश को कश्मीर से भगाये कश्मीरी पंडित तो दिखाई देता था लेकिन उड़ीसा में चले मारवाड़ी भगाओं आंदोलन या आमचीं मुंबई के तहत गैर महाराष्ट्रियनो पर अत्याचार का सलवा जुडुम में खाली हुए पांच सौ गांव इसलिए राकेश को नहीं दिखलाई देता था क्योंकि उसमें मुसलमान या ईसाई नहीं होते थे।
हिन्दू लड़के के हिन्दू लड़की को प्यार या शादी के नाम पर धोखे का मामला उस ढंग से कभी नहीं उभारा गया जिस ढंग से लव जेहाद के नाम पर अभियान चलाया गया। बलात्कार के मामले मे भी घटना में राजनैतिक फायदे देखे जाने लगे तो लगने लगा था कि हम किस तरह का भारत निर्माण कर रहे हैं।
ऐसा लगता कि लोगों के दिलों दिमाग में इसे न केवल बैठा दिया गया है बल्कि उसे किसी बीज की तरह बो दिया गया है और इस बीज ने अपनी जड़े उनकी रगो में खून के साथ बढ़ता चला जा रहा है और अपनी पकड़ रगो के शिराओं पर मजबूत कर ली है।
मैं अपने शहर मे ही इस डर को महसूस करने लगा था। टूटे हुए आईनों में उभरा हर शख्स कुछ अधूरा सा लगने लगा था। सामाजिक सौहाद्र्र और अमन शांति के लिए पूरे देश में अपनी अलग पहचान बना चुके इस शहर की दिवारे कई बार दरकती हुई दिखाई देने लगता था। सोचता था यह डर हकीकत न हो।
कोई भी शख्स किसी दूसरे धर्म के बेतुकापन पर बात करने को तैयार नहीं था जबकि अमल में लाना न लाना उनकी मर्जी है लेकिन बात तो की ही जानी चाहिए।
सूरज कुमार या संतोष जी ही कुछ गंभीर थे जिन्हें मैं पूछ सकता था इसलिए राजनीति के इस हिन्दूकरण के हिंसक होते प्रहार पर मैं अक्सर सवाल छोड़ देता था। वे एक सीमा तक ही जवाब देते फिर श्रेष्ठता की परिभाषा गढऩा शुरू कर देते।
राफेल के मुद्दे को भी संतोष जी ने बड़ी सफाई से जब हिन्दू-मुस्लिम की तरफ मोड़ दिया तो मैं हतप्रभ रहने के सिवाय क्या कर सकता था। नक्सली हमले से मर रहे आदिवासियों की मौत पर वे चिंता तो जाहिर करते लेकिन उनकी चिंतन आतंकवाद की चिंता से ईतर हो जाती। अखलाक या रोहित वेमुला के मुद्दे भी इनके लिए बेमानी हो जाते लेकिन उत्तप्रदेश के किसी सुदूर गांव में कुछ मुसलमान गुण्डों द्वारा घर में घुसकर तोडफ़ोड़ और मारपीट देश की अस्मिता पर आघात हो जाता था।
ऐसा ही कुछ उलट अकील या हासीम के साथ होता। 84 के सिख विरोधी दंगे उन्हें मामूली लगते लेकिन गुजरात में हुए कत्लेआम उनके लिए आज भी बड़ा हादसा था। जबकि दोनों ही मामले पर सरकार द्वारा कत्लेआम कराये जाने या कत्लेआम को बढ़ावा देने का आरोप लगता रहा है।
यह बाते जो दोनों ही धर्म के लिए लोग हर घटना को अपने नजरिये से देखने की वजह से ही दिक्कतें हुई थी और सामाजिक ताना बाना न केवल छिन्न भिन्न हुआ था बल्कि दिलों में प्यार की जगह नफरत या डर ने स्थान बना लिया था।
मैं और मेरा , सारी लड़ाई की जड़ यहीं से शुरू हो रहा था। स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने के फेर में आदमी किस तरह एक-दूसरे के प्रति कठोर होता जा रहा था कि वह टस से मस होना नहीं चाह रहा था। हर ऐसे व्यक्ति में जड़े उग आया था जो मजबूती से गहराई में लगातार समाता जा रहा था।
आप अंदाजा नहीं लगा सकते कि मौजूदा हालात को लेकर मैं कितना उदास हूं। मेरी जितनी चिंता पहले के माहौल को पुर्नस्थापना की होती उतनी ही तेजी से कोई न कोई ऐसा वाक्या देश में हो जाता था कि हिन्दू या मुस्लिम के झंडाबरदार फिर खड़े हो जाते और उसका असर यहां साफ दिखाई पड़ता।
मैने कितने ही बार धर्म के इस्तेमाल कर सत्ता हासिल करने की राजनैतिक शैली का उदाहरण दिया ताकि माहौल हल्का हो सके। सब जानते थे कि मैं झूठ नहीं बोलता हूं लेकिन इसे वे महज अपवाद करार देते थे।
मेरे शहर में पहले भी माहौल खराब कर राजनातिक फायदे की कोशिश हो चुकी है। एक बार एक फैंसी स्टोर चलाने वाले मुस्लिम युवक ने एक सिंघी परिवार की युवती को लेकर भाग गया। मैं जानता था कि ये दोनों एक दूसरे से बेहतंहा मोहब्बत करते थे। मेरा एक दोस्त था विरेन्द्र वह उस मुस्लिम युवक का दोस्त था इसलिए गाहे बगाहे पूरे मामले को मैं जानता था लेकिन इस मामले को राजनैतिक ढंग देकर हिन्दू मुस्लिम तक ले जाया गया और शहर में जुलूस निकाले गये जुलूस में तमाम तरह के हिन्दू संगठनों के लोग शामिल ते। सिंघी समाज से जुड़े एक प्यापारी नेता ने इस मामले का नेतृत्वकर्ता हो चुका था और बाद में वह विधायक भी बना।
पुलिस  दबाव में प्रेमी जोड़ा लौट आया। दोनों को अलग कर दिया गया। प्रशासन के दबाव में युवक भी अपना अलग रास्ता अख्तियार कर लिया.
हैरान तो मैं तब हुआ जब इस घटना के कुछ ही महीने बाद एक जुलूस कौमी एकता जिन्दाबाद के नारे के साथ पहुंचा और इस बार भी जुलूस का नेतृत्व सिंघी समाज का वहीं व्यापारी नेता कर रहा था और उसके साथ वह जुगल जोड़ी के नाम से चर्चित मुस्लिम समाज का व्यापारी नेता भी जुलुस के सामने था। कुछ ही महीने पहले हिन्दू एकता का नारा लगाने वाले को कौमी एकता का नारा लगाते कलेक्टोरेट परिसर में दाखिल होते देख जब इसकी वजह ढूंढी तो पता चला कि इस बार ब्राम्हण समाज के किसी युवक ने सिंधी समाज के युवती को ले भागा था।
यानी जिसे राजनीति करनी है वह हर हाल में धर्म का इस्तेमाल अपनी सुविधा अनुसार कर ही लेता है और अब लोग इनके नारे में कट्टरता या उन्माद के स्तर तक जा पहुंचते है।
ऐसी कितनो ही जानकारी मेरे पास थी और मै गाहे बगाहे इन घटनाओं का जिक्र कर राजनीति में धर्म के इस्तेमाल से होने वाले खतरे से आगाह करता रहा हूं। लेकिन राजनीति की हवा उस लू की तरह शैतानी हवा है जो जान ले लेने का डर पैदा करती है। वह किसी भी साक्ष्य या तर्क को नहीं मानती है उसके भीतर का डर इस कदर भयावह हो जाती है कि उसकी अपनी धार्मिक श्रेष्ठता खतरे में दिखाई देने लगता है और मौजूदा हालात को उसी तरह बना दिया गया था। राकेश तो साफ कहता था कि यदि मोदी हार गया तो यह देश का हिन्दु खतरे में पड़ जायेगा। कश्मीर की तरह दूसरे राज्यों की हालत खराब हो जायेगी। हिन्दू अपने ही देश में मारे जायेंगे। अपने कथन को सही साबित करने वह इस तरह का कुतर्क का सहारा लेता था कि समझदार व्यक्ति हंसे बिना नहीं रह सकता था। लेकिन इस तरह की बात करने वाला राकेश अकेला नहीं था। निक्की भी अमूमन यही बात करता था लेकिन निक्की यह बात करने में थोड़ी समझदारी दिखाता था। क्योंकि वह जानता कि वह गलत कह रहा है। निक्की की समझदारी के पीछे उसका भीरुपन भी था वह सीधे टकराहट से बचता था।
राकेश उज्जड़ किसम् का था इसलिए वह धर्मान्तरण से राष्ट्रान्तरण की सावरकर थ्योरी को ही मानता था। उसे तो जहां चार मुसलमान वहां एक पाकिस्तान कहने से भी गुरेज नहीं था।
दरअसल हम सब एक दूसरे को इतना कम जानते है मौजूदा परिस्थितियों के बाद ही इसका पता चला था इसलिए तकलीफ ज्यादा हुई थी
और गुस्सा भी ज्यादा था। 

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

दो युवा व्यापारियों की गोली मार कर हत्या….. पड़ोसी ने लाश घर के पीछे गाड़ कर छिपाई…… मामले में दो आरोपी गिरफ्तार


अंबिकापुर। दो दिनों पहले 10 अप्रैल की रात से लापता दो भाईयों की गोली मारकर हत्या कर दी गई है। साक्ष्य छिपाने के लिए दोनों भाइ्रयों की लाश को हत्यारे ने अपने घर के पीछे ही गाड़ दिया था। जिस इनोवा क्रिस्टा से दोनों भाई सौरभ अग्रवाल और सुनील अग्रवाल निकले थे, उसे आकाशवाणी के पास संदिग्ध परिस्थितियों में बरामद किया गया था। परिजनों की शिकायत पर अज्ञात के खिलाफ दर्ज अपराध के तहत मामले की तफ्तीश शुरू हुई। एसपी सरगुजा ने इस मामले में लापता दोनों भाईयों की तलाश के लिए तीन टीम गठित किया था। 
संदेह के आधार पर पड़ोसी आकाश गुप्ता को जब हिरासत में लेकर सख्ती से पूछताछ की गई तो उसने हत्या करना स्वीकार किया। इस दोहरे हत्याकांड में दूसरे आरोपी सिद्धार्थ यादव को भी हिरासत में लिया गया है। हत्या के पीछे वजह का खुलासा फिलहाल नहीं किया गया है, लेकिन सूत्रों के मुताबिक इनके बीच लेन-देन को लेकर विवाद चल रहा था। इसी बीच 10 अपै्रल को आकाश को मौका मिला और दोनों भाईयों की उसने हत्या कर दी।

लाँकडाउन से छत्तीसगढ़ सरकार को लगभग 11 हजार करोड़ का नुकसान!




 कोरोना के कहर से छत्तीसगढ़ के व्यपार में ग्रहण लग गया है। कोयला, लोहा, सीमेंट और बिजली छत्तीसगढ़ के लिए धन कुबेर कहे जा सकते हैं। दरअसल राज्य को कुल राजस्व का करीब 50 फीसदी से अधिक हिस्सा इन्हीं चारों सेक्टरों से आता है। लेकिन इस वक्त कोरोना वायरस के चलते प्रदेश में भी लॉक डाउन है। जिस वजह से प्रदेश की अर्थव्यवस्था डगमगा जाएगी।

आपको बता दें कि लॉकडाउन के चलते सभी क्षेत्रों में उत्पादन बंद है। लॉकडाउन के चलते ट्रांसपोर्ट की सुविधा भी पूरी तरह से ठप्प है जिसके कारण फैक्ट्रियों में बना हुआ माल भी डिस्पैच नहीं हो पा रहा है।

छत्तीसगढ़ के प्रमुख व्यापार स्तंभ
कोयला : राज्य के राजस्व का एक बहुत बड़ा हिस्सा कोयला से आता है। यहां देश का 16 फीसद कोयला भंडार है। देश के पूरे उत्पाद में 18 फीसदी योगदान छत्तीसगढ़ का है।इस मामले में राज्य देश में दूसरे स्थान पर है।

लोहा : राज्य का 26 फीसद से अधिक खजाना लोहा ही भरता है। देश का करीब 20 फीसद लौह अयस्क भंडार यहीं है। देश का 15फीसद लोहे का उत्पादन छत्तीसगढ़ में होता है। लोहा उत्पादन के मामले में भी राज्य देश में दूसरे स्थान पर है।



सीमेंट : देश का करीब पांच फीसद चूनापत्थर का भंडार छत्तीसगढ़ में हैं। राज्य में फिलहाल एक दर्जन से अधिक बड़े सीमेंट संयंत्र हैं जो देश की करीब 20 फीसदी जरूरत पूरी करते हैं। सीमेंट उद्योगों से भी राज्य को बड़ा राजस्व प्राप्त होता है।

बिजली : छत्तीसगढ़ को देश का पॉवर हब कहा जाता है। यहां सरकारी और निजी सेक्टर मिलाकर करीब 23 हजार मेगावॉट बिजली का उत्पादन होता है। राज्य की सरकारी बिजली कंपनी देश की उन चुनिंदा बिजली कंपनियों में शामिल है जो मुनाफे में रहती हैं।

कम से कम 3 माह का लगेगा समय
इसके अलावा प्रदेश में ट्रेडिंग का व्यवसाय भी किया जाता है। जिसमें अनाज, किराना, कपड़ा, इलेक्ट्रानिक के सामान शामिल हैं। पड़ोसी राज्य ओड़िशा, झारखंड, महाराष्ट्र व मध्यप्रदेश में भी छत्तीसगढ़ से ही व्यापार किया जाता है। लॉकडाउन खुलने के बाद भी कम से कम 3 माह व्यापार को सुचारू रूप से चलाने में समय लगेगा। इस दौरान 10-11 हजार करोड़ के कर व आर्थिक सेवाओं का नुकसान सरकार को उठाना पड़ सकता है।

लॉकडाउन का असर
स्टील, सीमेंट, पॉवर, कोल उद्योग लगातार चलने वाले उद्योग हैं। जो एकबार बंद होते हैं तो बगैर मेंटेनेंस के उन्हें शुरू करने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है। इसके अलावा इन उद्योगों में काम करने वाले लेबर उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब से आते हैं जो अपने-अपने क्षेत्रों में लौट चुके हैं। लॉकडाउन के खत्म होने के बाद इन कर्मचारियों को वापस लौटने में भी समय लगेगा। जिसके कारण औद्योगिक क्षेत्रों को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ेगा। लॉक डाउन की वजह से छत्तीसगढ़ में इन उद्योगों को बड़ी मार पड़ी है। प्रदेश में बंद पड़ी इन फैक्ट्रीयों को शुरू करने में समय लगेगा साथ ही खर्चे भी बढ़ेंगे। हालांकि केंद्र सरकार ने 10 फीसदी एडॉक लिमित देने हा निर्देश बैंकों को दिया है। इसके बावजूद प्रदेश के व्यापारी वर्ग व उद्योग घरानों को इस लॉकडाउन का नुकसान उठाना पड़ेगा।

नोटः यह लेखक सीए बजरंग अग्रवाल, पूर्व सचिव इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टेड अकाउंट ऑफ इंडिया(ICAI), रायपुर ब्रांच के स्वतंत्र विचार हैं।
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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

कोरोना को लेकर कुछ जानकारी

क्या यह सब बाते सच है ?

प्रश्न 1) क्या कोरोना वायरस को ख़त्म किया जा सकता है?

*उत्तर:-* नहीं! कोरोना वायरस एक निर्जीव कण है जिस पर *चर्बी की सुरक्षा-परत* चढ़ी हुई होती है। *यह कोई ज़िन्दा चीज़ नहीं है, इसलिये इसे मारा नहीं जा सकता* बल्कि यह ख़ुद ही रेज़ा-रेज़ा (कण-कण) होकर ख़त्म होता है।

प्रश्न( 02)- कोरोना वायरस के विघटन (रेज़ा-रेज़ा होकर ख़त्म होने) में कितना समय लगता है?

*उत्तर:-* कोरोना वायरस के विघटन की मुद्दत का दारोमदार, *इसके आसपास कितनी गर्मी या नमी है? या जहाँ ये मौजूद है, उस जगह की परिस्थितियां क्या हैं?* इत्यादि बातों पर निर्भर करता है।

प्रश्न(03):- इसे कण-कण में कैसे विघटित किया जा सकता है?

*उत्तर:-* कोरोना वायरस बहुत कमज़ोर होता है। *इसके ऊपर चढ़ी चर्बी की सुरक्षा-परत फाड़ देने से यह ख़त्म हो जाता है।* ऐसा करने के लिये साबुन या डिटर्जेंट के झाग सबसे ज़्यादा प्रभावी होते हैं। *20 सेकंड या उससे ज़्यादा देर तक साबुन/डिटर्जेंट लगाकर हाथों को रगड़ने से इसकी सुरक्षा-परत फट जाती है* और ये नष्ट हो जाता है। इसलिये अपने शरीर के खुले अंगों को बार-बार साबुन व पानी से धोना चाहिये, ख़ास तौर से उस वक़्त जब आप बाहर से घर में आए हों।

प्रश्न(04):- क्या गरम पानी के इस्तेमाल से इसे ख़त्म किया जा सकता है?

*उत्तर:-* हाँ! गर्मी चर्बी को जल्दी पिघला देती है। इसके लिये कम से कम 25 डिग्री गर्म (गुनगुने से थोड़ा तेज़) पानी से शरीर के अंगों और कपड़ों को धोना चाहिये। छींकते या खाँसते वक़्त इस्तेमाल किये जाने वाले रुमाल को 25 डिग्री या इससे ज़्यादा गर्म पानी से धोना चाहिये। गोश्त, चिकन या सब्ज़ियों को भी पकाने से पहले 25 डिग्री तक के पानी में डालकर धोना चाहिये।

प्रश्न(05):- क्या एल्कोहल मिले पानी (सैनीटाइजर) से कोरोना वायरस की सुरक्षा-परत को तोड़ा जा सकता है?

*उत्तर:* हाँ! लेकिन उस सैनीटाइजर में एल्कोहल की मात्रा 65 पर्सेंट से ज़्यादा होनी चाहिये तभी यह उस पर चढ़ी सुरक्षा-परत को पिघला सकता है, वर्ना नहीं।

प्रश्न(06):-क्या ब्लीचिंग केमिकल युक्त पानी से भी इसकी सुरक्षा-परत तोड़ी जा सकती है?

*उत्तर:-* हाँ! लेकिन इसके लिये *पानी में ब्लीच की मात्रा 20% होनी चाहिये।* ब्लीच में मौजूद क्लोरीन व अन्य केमिकल कोरोना वायरस की सुरक्षा-परत को तोड़ देते हैं। *इस ब्लीचिंग-युक्त पानी का उन सभी जगहों पर स्प्रे करना चाहिये जहाँ-जहाँ हमारे हाथ लगते हैं।* टीवी के रिमोट, लैपटॉप और मोबाइल फ़ोन को भी ब्लीचिंग-युक्त पानी में भिगोकर निचोड़े गये कपड़े से साफ़ करना चाहिये।

प्रश्न(07):-क्या कीटाणुनाशक दवाओं के द्वारा कोरोना वायरस को ख़त्म किया जा सकता है?

*उत्तर:-* नहीं! कीटाणु सजीव होते हैं इसलिये उनको *एंटीबायोटिक* यानी कीटाणुनाशक दवाओं से ख़त्म किया जा सकता है लेकिन *वायरस निर्जीव कण होते हैं, इन पर एंटीबायोटिक दवाओं का कोई असर नहीं होता।* यानी कोरोना वायरस को एंटीबायोटिक दवाओं से ख़त्म नहीं किया जा सकता।

प्रश्न(08):-कोरोना वायरस किस जगह पर कितनी देर तक बाक़ी रहता है?

*उत्तर:-*
*कपड़ों पर :* तीन घण्टे तक
*तांबा पर :* चार घण्टे तक
*कार्डबोर्ड पर :* चौबीस घण्टे तक
*अन्य धातुओं पर :* 42 घण्टे तक
*प्लास्टिक पर :* 72 घण्टे तक

इस समयावधि के बाद कोरोना वायरस ख़ुद-ब-ख़ुद विघटित हो जाता है। लेकिन इस समयावधि के दौरान अगर किसी इंसान ने उन संक्रमित चीज़ों को हाथ लगाया और अपने हाथों को अच्छी तरह धोये बिना नाक, आँख या मुंह को छू लिया तो वायरस शरीर में दाख़िल हो जाएगा और एक्टिव हो जाएगा।

प्रश्न(09):-क्या कोरोना वायरस हवा में मौजूद हो सकता है? अगर हाँ तो ये कितनी देर तक विघटित हुए बिना रह सकता है?

*उत्तर:-* जिन चीज़ों का सवाल न. 08 में ज़िक्र किया गया है उनको हवा में हिलाने या झाड़ने से कोरोना वायरस हवा में फैल सकता है। कोरोना वायरस हवा में तीन घण्टे तक रह सकता है, उसके बाद ये ख़ुद-ब-ख़ुद विघटित हो जाता है।

प्रश्न(10):-किस तरह का माहौल कोरोना वायरस के लिये फायदेमंद है और किस तरह के माहौल में वो जल्दी विघटित होता है?

*उत्तर:-* कोरोना वायरस क़ुदरती ठण्डक या एसी की ठण्डक में मज़बूत होता है। इसी तरह अंधेरे और नमी (Moisture) वाली जगह पर भी ज़्यादा देर तक बाक़ी रहता है। यानी इन जगहों पर ज़्यादा देर तक विघटित नहीं होता। *सूखा, गर्म और रोशनी वाला माहौल कोरोना वायरस के जल्दी ख़ात्मे में मददगार है।* इसलिये जब तक इसका प्रकोप है तब तक एसी या एयर कूलर का इस्तेमाल न करें।

प्रश्न(11):-सूरज की तेज़ धूप का कोरोना पर क्या असर पड़ता है?

*उत्तर:-* सूरज की धूप में मौजूद *अल्ट्रावायलेट किरणें* कोरोना वायरस को तेज़ी से विघटित कर देती है यानी तोड़ देती है क्योंकि सूरज की तेज़ धूप में उसकी सुरक्षा-परत पिघल जाती है। इसीलिये चेहरे पर लगाए जाने वाले फेसमास्क या रुमाल को अच्छे डिटर्जेंट से धोने और तेज़ धूप में सुखाने के बाद दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है।

प्रश्न(12):-क्या हमारी चमड़ी (त्वचा) से कोरोना वायरस शरीर में जा सकता है?

*उत्तर:-* नहीं! तंदुरुस्त त्वचा से कोरोना संक्रमण नहीं हो सकता। अगर त्वचा पर कहीं कट लगा है या घाव है तो इसके संक्रमण की संभावना है।

प्रश्न(13):-क्या सिरका मिले पानी से कोरोना वायरस विघटित हो सकता है?

*उत्तर:-* नहीं! सिरका कोरोना वायरस की सुरक्षा-परत को नहीं तोड़ सकता। इसलिये सिरका वाले पानी से हाथ-मुंह धोने से कोई फ़ायदा नहीं है।

Jya Jaya Singh जी

मैं जीऊँगी...

कितनी अजीब बात है
किसी को ज़िंदगी भर प्यार नहीं मिलता
ना माँ का
ना पिता का
ना ही पति का
ना ही किसी का साथ
सिर्फ इसलिए क्योंकि
मैं किन्नर हूँ
ये जिंदगी हैं
ये कोई सोचता ही नहीं
सपने भी
अपने भी
वही ज़ज़्बात
वही रूह
वही खून
फिर क्यों नहीं है साथ
मैं मन क्यों मारू
इच्छा क्यों ना रखूं
इश्क क्यों ना करूँ
ज़िंदगी से
मैं जीऊँगी ,जीने की संघर्ष के लिए
खुश रहने के लिए
हँसने के लिए
अपने अरमानों को
पूरा करने  के लिए
तब तक
जब तक ज़िंदगी मेरी
तेरी जैसी नहीं हो जाती
मैं जीऊँगी

-विद्या राजपूत