रविवार, 9 मई 2021

हमने किसे चुन लिया !

 

यह सवाल भले ही छोटा हो लेकिन अब महत्वपूर्ण इसलिए हो गया है क्योंकि भाजपा ने जिसे प्रधानमंत्री बनाया है वह अपनी रईसी में इस तरह डूब गया है कि उसे इस महामारी काल में भी सिर्फ और सिर्फ सत्ता की रईसी और चुनाव जीतने की रणनीति से ही मतलब है।

रोम जल रहा था तब वहां राजा नीरो चैन की बंशी बजा रहा था, इस मिथक के दुहराने की बात हम कभी स्वीकार नहीं कर पाते यदि इस देश में कोरोना का प्रकोप नहीं आता। लेकिन कहते हैं इतिहास अपने आप को दोहराता है! कोरोना के इस बढ़ते प्रकोप के बाद भी यदि सरकार का ध्यान सिर्फ कर वसूली हो तो क्या हमें रावण की कर वसूली को याद नहीं कर लेना चाहिए जो ऋषि-मुनियों से कर के बदले में खून तक निकाल लेता था। 

देश की कई राज्यों की सरकारें वैक्सीन को टैक्स फ्री या मुफ्त में देने की मांग कर रही है लेकिन प्रधानमंत्री को केवल टैक्स की पड़ी है। यही वजह है कि बंगाल चुनाव के बाद लगातार पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ रही है। इस लॉकडाउन के दौर में पेट्रोल-डीजल का ज्यादा उपयोग वही लोग कर रहे हैं जो कोरोना से पीडि़त है, जिन्हें अस्पताल, मेडिकल स्टोर्स जाना है तब कीमतों में लगातार वृद्धि होना क्या उनका खून निचोडऩा नहीं हुआ।

मोदी समर्थकों या भाजपाईयों को यह छोटी बात को बड़ा करने की कोशिश लग सकती है लेकिन यह बेहद ही शर्मसार कर देने वाली बात है। इससे भी बड़ी बात तो किसानों को जीते जी मार डालने की कोशिश है। प्रधानमंत्री ने खाद की कीमत 58 फीसदी बढ़ा दी है। चुनाव के दौरान जारी आदेश की लीपापोती का सच सबके सामने है केवल डीएपी की कीमत सात सौ रुपये बढ़ा दी गई यह खेती के लिए बड़ा संकट है। ऐसे में इसे किसान आंदोलन की प्रतिक्रिया में लिया गया फैसला नहीं तो और क्या कहेंगे।

इस कोरोना के दौर में जब केवल किसान ही देश के आर्थिक तंत्र को ही नहीं जान की रक्षा की है तब इस तरह के फैसले को आप क्या कहेंगे। सेन्ट्रल विस्टा के निर्माण कार्य को आवश्यक सेवा बताकर लॉकडाउन में भी बीस हजार करोड़ फूंकने की कोशिश क्या बेईमानी नहीं है। उसमें भई सबसे पहले प्रधानमंत्री का महल बनेगा और यह 2022 तक इसलिए बना दी जायेगी क्योंकि महल में रहने की मंशा 2024 में पता नहीं पूरी होगी या नहीं।

हैरानी तो इस बात की है कि सेन्ट्रल विस्टा को लेकर जिस तरह से पूरी दुनिया में थू-थू हो रहा है वह भी बेशर्मी से देखा जा रहा है। ऐसे में जब कोरोना काल में प्रधानमंत्री के आपदा में अवसर को अमलीजामा पहनाने वालों को भी शर्म नहीं है तब इसका क्या मतलब है। सवाल कई है लेकिन एक सवाल जो सबसे महत्वपूर्ण है कि क्या संघ के संस्कार इसी तरह के हैं, हालांकि संघ को आज भी संविधान पर विश्वास नहीं  है, यह दावा नहीं हकीकत है इसलिए वह हमेशा ही वह दरवाजा चुनती है जिससे वह पकड़ा न जाए। और दोष किसी व्यक्ति पर मढ़ सके। आडवानी की चुप्पी को लेकर भी सवाल है! लेकिन जब सत्ता ही खून चुसने को आमदा हो तो निंदा के अलावा और क्या किया जा सकता है। जरा सोचिए जरुर!

शनिवार, 8 मई 2021

प्रधानमंत्री की प्राथमिकता...

 

दिल्ली हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए जब कहा कि कड़ी कार्रवाई के लिए मजबूर न करें! तो यह सवाल उठाया जाना चाहिए कि इस भीषण महामारी में भी केन्द्र की सरकार आखिर लोगों की जान से खिलवाड़ क्यों कर रही है, उसकी प्राथमिकता क्या जनकल्याण नहीं होनी चाहिए? आखिर वह एक कदम आगे बढ़कर देश के लोगों के कल्याण की बात क्यों नहीं कर रही है। क्या वह जानती है कि कुछ भी नहीं करने के बाद भी सिर्फ हिन्दु-मुस्लिम के सहारे वह सत्ता में फिर से आ जायेगी?

यह सवाल अब हर उस देशप्रेमी की जुबान बनने लगी है जो भीषण महामारी से तड़पते जिन्दगी को अपनी खुली आंखों से देख पा रहे हैं। बंगाल चुनाव के नतीजे आने के बाद जिस तरह से वहां भाजपा और तृणमूल कांग्रेस की लड़ाई को हिन्दू-मुस्लिम का रुप देने की कोशिश की गई, उसका सच सामने आने लगा है, दुनियाभर की हिंसा की तस्वीरों को बंगाल की हिंसा बताकर नफरत फैलाने की कोशिश किस तरह की गई, भारतीय जनता पार्टी ने किस तरह से देशभर में धरना प्रदर्शन किया वह अब स्पष्ट होने लगा है।

ऐसे में एक बात तो तय है कि इस भीषण महामारी से अब इस देश की जनता को खुद ही निपटना है, क्योंकि बीस हजार करोड़ के सेन्ट्रल विस्टा को लेकर दायर याचिका पर न्यायालय ने भी हाथ खड़े कर दिये हैं। तब सवाल यही है कि मोदी सत्ता की प्राथमिकता क्या है। महामारी से निपटने मोदी सत्ता को राष्ट्रीय प्लान बनाने, आक्सीजन की सुचारु आपूर्ति और वैक्सीन को लेकर न्यायालयों ने लगातार लानत भेजी है लेकिन सरकार ने रईसी बरकरार रखने का उपाय अपनी प्राथमिकता में रखी है। यही वजह है कि तमाम विरोध के बाद भी इस महामारी में सेन्ट्रल विस्टा का काम बेधड़क चल रहा है और उसमें भी महल जैसे प्रधानमंत्री आवास सबसे पहली प्राथमिकता है जिसे हर हाल में दिसम्बर 2022 तक पूरा किया जाना है।

सरकार की दूसरी प्राथमिकता की रईसी बरकरार रखने की है इसलिए इस महामारी के दौर में सिर्फ आईडीबीआई बैक को बेचने के लिए कैबिनेट की बैठक बुलाई जाती है। इस सरकार की प्राथमिकता तो शुरु ही राज्यों में सत्ता प्राप्ति की रही है इसलिए जब भी किसी राज्य में चुनाव होता है प्रधानमंत्री सहित पूरी कैबिनेट वहां होती है और कई बार तो साफ लगता है कि ये प्रधानमंत्री देश के नहीं सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के नेता बस हैं। यही नहीं ट्रम्प को जिताने भी रैलियां होती है और कोरोना की अनदेखई तब तक की जाती रही जब तक मध्यप्रदेश में सरकार नहीं बन गई।

सवाल बहुत से है लेकिन कोरोना काल में भी सरकार की प्राथमिकता यदि सत्ता की रईसी बरकरार रखने की है तो फिर दूसरी-तीसरी क्या चौथी लहर में भी कुछ नहीं होने वाला है। क्या देश के प्रधानमंत्री को इस भीषण महामारी से निपटने कोई योजना नहीं बनानी चाहिए? क्या मध्यम व लघु व्यापारियों या उद्योगपतियों के लिए कोई योजना नहीं बनानी चाहिए? क्या मध्यम वर्ग के लोगों की तकलीफ दूर करने योजना नहीं बनानी चाहिए। क्या रोज कमाने-खाने वालों के लिए इस सरकार ने कोई योजना बनाई है। सभी को आक्सीजन और वैक्सीन मिल जाये इसकी कोई योजना है। महामारी से बर्बाद हो चुके परिवार के परिवार और अनाथ हो चुके बच्चों के लिए कौन सी योजना है। 

सरकार जानती है कि बेबसी में तड़पते लोग भले ही आज गाली दे रहे है लेकिन वोट उन्हें ही देंगे क्योंकि हिन्दुत्व खतरे में है? राहुल गांधी के परिवार ने देश के लिए कुछ नहीं किया? तब इन सवालों का क्या अर्थ रह जाता है। जिस तरह से असम जीते वैसे ही 2024 में देश जीत लेंगे?

शुक्रवार, 7 मई 2021

घबराईये मत ,आयेगा तो मोदी ही!


 

जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है तभी से इस देश में नई-नई मुसिबत आई है जब कोई यह बात कहता है तो उन्हें अनुपम खेर का वह ट्वीट जरूर पड़ लेना चाहिए जिसमें उन्होंने दस दिन पहले ही कह दिया था। घबराईये मत, आएगा तो मोदी ही। जय हो।

यह विश्वास अकेले अनुपम खेर का नहीं है, कितने ही कुंठित हिन्दु है जो इस विश्वास के साथ कोरोना और दूसरी तकलीफों से ओतप्रोत होकर चले गए। क्योंकि मोदी नहीं होगा तो हिन्दु खतरे में पड़ जायेंगे इसलिए हिन्दुओं को बचाना है तो मोदी को लाना है। देख लेना बंगाल अब कश्मीर बन जायेगा। कोई हिन्दु सुरक्षित नहीं रहेगा। आदि-आदि। 

इस तरह के पोस्ट से सोशल मीडिया में वाट्सअप युर्निवसिटी और ट्रोल आर्मी के सदस्यों द्वारा लाखों की तादात में रोज की जा रही है। उन्हें इस भीषण महामारी से ज्यादा जरूरी मोदी को बचाना लगता है और सरकार क्या कर रही है यह तो बताने की जरूरत ही नहीं है। एक भक्त तो अनुपम खेर से भी आगे निकल कर कहने लगे एक सौ तीस करोड़ का इस देश का कोरोना कुछ नहीं बिगाड़ सकता यदि रोज एक लाख मौते होंगी तब भी इस देश की आबादी को खत्म होने में दशकों लग जायेंगे क्योंकि लोग पैदा भी तो हो रहे हैं।

हालांकि इस बात को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है लेकिन कुंठित हिन्दुओं की सोच को लेकर चिंता जरूर की जानी चाहिए कि आखिर कोई सरकार इतनी लापरवाही और लाशों का ताडंव मचाने के बाद भी कुर्सी से कैसे चिपके रह सकती है। पिछले सप्ताहभर से देश के तमाम तरह के एक्सपर्ट कोरोना की तीसरी लहर को लेकर गंभीर चेतावनी दे रही है, न्यायालय रोज लानत भेज रही है लेकिन सरकार ने अभी तक दूसरी लहर से निपटने ही कोई मास्टर प्लान नहीं बनाया है।

दूसरी लहर में जिस तरह से 25 से 45 साल के उम्र के लोगों की ौत हुई है उसके चलते परिवार का परिवार बर्बाद हो गया है, बच्चे अनाथ हो गये हैं। 18 से अधिक उम्र के लोगों को वैक्सीन लगाने की सिर्फ घोषणा ही हुई है। जब वैक्सीन ही नहीं होगा तो फिर इस तरह की घोषणा का मतलब ही क्या है।

एक तरफ एक्सपर्ट तीसरी लहर में बच्चों पर कहर बरपाने की चेतावनी दे रहे है तो विश्व की सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी हिन्दु-मुस्लिम करते घुम रही है। हिन्दुओं की ठेकेदारी में व्यस्त संगठनों का कहीं पता नहीं है, संघ, बजरंग दल, विश्व हिन्दु परिषद के पदाधिकारी शायद इसलिए चुप है कि भले ही हिन्दुओं की आबादी थोड़ी कम हो जायेगी लेकिन मुसलमान भी तो मर रहे हैं। इतनी भयावह लापरवाही और आम लोगें का मोदी सरकार को लेकर जो गुस्सा साफ दिखाई दे रहा है, इसके बाद भी सरकार कुछ नहीं कर रही है तो इसकी वजह वह पंच लाईन है जो हर व्यक्ति के जेहन में राज कर रहा है। घबराईये नहीं, आयेगा तो मोदी ही!

गुरुवार, 6 मई 2021

बंगाल हिंसा- सौ चूहे खाकर बिल्ली हज...

 

जिस राजनैतिक पार्टी भाजपा के 150 से अधिक सांसद और सैकड़ों विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हो, जिसने पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में सौ से अधिक ऐसे लोगों को प्रत्याशी बनाया हो जिसके खिलाफ आपराधिक प्रकरण हो वह भाजपा बंगाल चुनाव में राजनैतिक हिंसा पर देशभर में धरना दे तो इसे आप नौटंकी, घडिय़ाली आंसू बहाना नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे।

इसका यह कतई मतलब नहीं कि पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा का हम समर्थन करते हैं, हम इस देश-दुनिया में किसी भी तरह की हिंसा और अपराध की न केवल निंदा करते हैं बल्कि न्यायोचित निर्णय के लिए प्रतिबद्ध हैं। पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा में अब तक डेढ़ दर्जन से अधिक लोग जान गंवा चुके है जबकि उत्तरप्रदेश में पंचायत चुनाव के बाद हुई हिंसा में भी आधा दर्जन लोगों की जान जा चुकी है लेकिन उत्तरप्रदेश में भाजपा की सरकार है इसलिए भारतीय जनता पार्टी ने केवल बंगाल में हुई हिंसा के खिलाफ ही धरना दिया। इसका मतलब साफ है कि उनके लिए हिंसा या हत्या सिर्फ राजनैतिक फायदे के लिए है।

वैसे तो चुनावी हिंसा भारतीय राजनीति में नया नहीं है लेकिन जिस तरह से राजनैतिक फायदे के लिए राजनैतिक दल तत्पर रहते हैं वह न केवल शर्मनाक है बल्कि बेशर्मी की पराकाष्ठा है। सत्ता के नशे में हिंसा की शुरुआत कहां से हुई कहना मुश्किल है लेकिन हम यहां भारतीय जनता पार्टी की भूमिका पर ही केन्द्रीय करेंगे अन्य दलों की भूमिका पर भी विस्तार देंगे।

हमने शुरुआत में ही कहा है कि जिस तरह से भाजपा में आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को हाल के सालों में बढ़ावा दिया गया वह शर्मनाक है। याद कीजिए राजनीति के अपराधीकरण को लेकर अटल-आडवानी के दौर में क्या कुछ नहीं कहा गया लेकिन मोदी का दौर अपराधियों को भाजपा में लाकर शुद्धिकरण करने का दौर है। यही वजह है कि 2014 में सत्ता में आते ही संसद में जनप्रतिनिधियों के अपराधिक प्रकरण को निपटाने के लिए स्पेशल कमेटी, स्पेशल कोर्ट बनाने की बात धरी की धरी रह गई, यहां तक कि लोकायुक्त का मामला भी ठंडे बस्ते में चला गया।

सत्ता मद में अपराध को पिछले सालों में जिस तरह से भाजपा ने प्रोत्साहित किया, उसे भी इस देश ने देखा है, हत्या और बलात्कार जैसे मामलों के अपराधियों को मोदी सत्ता के आने के बाद न केवल संरक्षण मिला बल्कि सम्मानित करने जैसा घृणित कार्य भी किया गया। जो भाजपा आज बंगाल चुनाव के बाद हिंसा में दर्जनभर लोगों की हत्या के बाद क्रोधित दिखाई दे रही है वह भाजपा शायद भूल गई कि इसी देश में अखलाक से लेकर इंस्पेक्टर सुबोध सिंह सहित 64 लोगों की सड़कों पर ही हत्या कर दी गई। मॉबलिंचिंग से लेकर गौ मांस और पता नहीं कितने ही तरह के आरोप लगा कर हत्या की गई तब किसी भाजपा नेता को धरना प्रदर्शन का ध्यान नहीं आया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नमस्ते ट्रम्प और लापरवाही के चलते कोरोना और सड़कों में मरते मजदूरों के लिए भी उनकी संवेदना का स्तर नीचे ही रहा। उसी बंगाल में राजनैतिक हिंसा के दौरान तीन दिन में पांच सौ लोग कोरोना से मर गये। देश में सैकड़ों लोग मोदी सत्ता की आक्सीजन नीति के चलते प्राणवायु के अभाव में दम तोड़ते रहे, और अब भी मौतों का सिलसिला जारी है तब भी पार्टी चुप है पूरी सत्ता का ध्यान अब भी कोरोना से निपटने की बजाय छवि सुधारने में लगी है तब कोई कैसे मान ले कि भाजपा बंगाल हिंसा को लेकर सचमुच दुखी है और राजनैतिक नौटंकी नहीं कर रही है। यदि भाजपा सचमुच राजनैतिक हिंसा को लेकर दुखी है तो उसे सबसे पहले आपराधिक छवि के सांसद-विधायकों से इस्तीफा लेना चाहिए? गृहमंत्री अमित शाह के बारे में फिर कभी....?

बुधवार, 5 मई 2021

साजिश...

 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की प्राथमिकता यदि इस भीषण आपदा में भी सेन्ट्रल विस्टा है तो यकीन मानिये ये सत्ता देश के लाखों लोगों की जान लेने का क्या षडयंत्र नहीं कर रही है। यह सवाल इसलिए उठाये जा रहे है ताकि लोग अपने घरों में चुपचाप बैठे रहे और कोरोना से बचे।

वैसे भी पूरी दुनिया में भारत ऐसा देश होगा जिसकी सत्ता हर समस्या के लिए अपने नागरिकों को ही दोष देती है, बेरोजगारी, महंगाई के लिए सत्ता ने बढ़ती जनसंख्या को वजह बताती है। तो कुंठित हिन्दुओं को लगता है कि आबादी बढऩे की वजह मुसलमान है। वैसे कुंठित हिन्दु तो हर समस्या के लिए ही मुसलमानों या अल्पसंख्यकों पर निशाना साधते रहे है।

ये कुंठित हिन्दू जनसंख्या नियंत्रण के लिए उपाय भी बताती है तो मानसिक रुप से दिवालिया हो चुके वे लोग हिन्दुओं को अधिकाधिक बच्चा पैदा करने की सलाह भी देते हैं। कोरोना की पहली लहर के लिए नरेन्द्र मोदी की नाकामी छुपाने जिस तरह से तब्लिकी जमात पर निशाना साधा गया वह किसी से छिपा नहीं है। नोटबंदी के दौरान मां को लाईन में लगाना और किसान आंदोलन के दौरान अल्पसंख्यक सिखों को खालिस्तानी और देशद्रोही बताकर निशाने में लेने की कोशिश को भी इस देश ने देखा है। बंगाल चुनाव में भाजपा नेताओं की टिप्पणी तो विभाजनकारी थी ही खुद प्रधानमंत्री की भाषा ने सारी मर्यादाओं को लांघकर पूरी दुनिया में भारत को शर्मसार करने में कोई कमी नहीं रखा था। उनके नेताओं ने जिस तरीके से दो र्म को ममता के जाने के बाद टीएमसी को सबक सिखाने की धमकी देते रहे उसका दुष्परिणाम सबके सामने है।

स्व. इंदिरा गांधी ने 80 के दशक में मेरठ दंगे के बाद अटल बिहारी बाजपेयी के आरोपों का जवाब देते हुए कहा था कि यह अजीब संयोग है कि संघ के लोगों के जाने के बाद ही दंगे भड़कते हैं? सवाल बंगाल चुनाव के बाद की हिंसा निश्चित रुप से निंदनीय है लेकिन इसके लिए संघ और भाजपा को भी आत्ममंथन की जरूरत है कि उनका तेवर कितना आक्रमक होना चाहिए। कंगना रनौत जैसी फिल्म अभिनेत्री के नफरत भरा ट्वीट का मतलब क्या है?

आज जब देश कोरोना के भीषण महामारी की चपेट में है और न्यायालय लगातार सरकार के क्रिया कलापों को लेकर नाराजगी जाहिर कर रही है तब भी यदि सरकार कोई योजना नहीं बना रही है और तो और दुनियाभर के देशों से प्राप्त राहत सामग्री को भी हवाई अड्डे से जरुरतमंदों तक नहीं पहुंचा रही है तब क्या यह लोगों को मौत के मुंह में ढकेलने का उपक्रम नहीं है। 

दिल्ली के बीचों बीच बन रहे प्रधानमंत्री के आवास को जल्द से जल्द पूरा करने की प्राथमिकता को लेकर अब तो प्रधानमंत्री की नियत को लेकर चौतरफा सवाल उठने लगे हैं? सरकार द्वारा मौतों के आंकड़े छुपाने का आरोप लगने के बावजूद यदि सरकार का यही रवैया रहा तो मई में एक लाख से उपर मौत होना तय है।

तब यह भी सवाल उठेगा कि जनसंख्या नियंत्रण के लिए क्या महामारी को जरिया बनाया जा रहा है। या महामारी की आड़ में एक झटके में जनसंख्या कम करने की कोशिश हो रही है।

मंगलवार, 4 मई 2021

सबसे बड़ा लुजर...

 

न कोरोना से मौते ही थम रही है और न ही सरकार अपनी गैर जिम्मेदाराना हरकत से ही बाज आ रही है! सरकार लाख दावा करे कि सब कुछ ठीक हो गया है, लेकिन जमीन में माजरा दिल दहला देने वाला है। कोर्ट ने सरकार को दो महत्वपूर्ण सुझाव दिये है पहला इस आपदा से निपटने राष्ट्रीय योजना बनाने की और दूसरा फ्री में वेक्सिन देने की लेकिन  आज की तारीख तक सरकार ने इन दोनों ही सुझाव पर अमल नहीं किया है।

इसका मतलब साफ है कि मोदी सरकार लोगों की मौत को लेकर जरा भी चिंतित नहीं है, वह सिर्फ हवा में बात कर रही है। मोदी सत्ता का दावा जमीन में पूरी तरह असफल है, अब भी आक्सीजन की कमी है, वेक्सिन की कमी से जूझ रही राज्य सरकार के सामने कानून व्यवस्था की चुनौती खड़ी हो गई है।

इतनी निर्दयी सत्ता... कितनों ने देखी है। इस आपदा से परिवार के परिवार बरबाद होते जा रहा है, बच्चे अनाथ होते जा रहे है, लघु और मध्यम व्यापारियों के सामने जीवन और परिवार बचाने का संकट खड़ा हो गया है लेकिन सत्ता के पास किसी भी तरह की योजना नहीं है। हैरानी तो इस बात की है कि भाजपा की राज्य इकाई और राज्य सरकारें भी खामोशी से जलती चिता और बिलखते लोगों को तमाशाबीन बनी देख रही है। सत्ता की निष्ठुरता का इससे बड़ा सबूत और क्या होगा कि उसने मान्य परम्पराओं तक को तिलांजलि दे दी है और बंगाल चुनाव में ममता बैनर्जी को प्रधानमंत्री ने बधाई तक नहीं दी। शायद वे कोरोना से हो रही मौत से दुखी होंगे। लेकिन जिस बेशर्मी से वह सब ठीक ठाक व्यवस्था  यानी आक्सीजन सप्लाई की बात कर रही है वह हैरान कर देने वाला है।

यदि देखा जाये तो केन्द्र की यह सत्ता हर मोर्चे में बुरी तरह फेल हो चुकी है। इतिहास में अब तक के सबसे लूजर प्रधानमंत्री के रुप में यह दर्ज हो चुका है। और पूरी दुनिया में जिस तरह से प्रतिक्रिया आ रही है वह बेहद शर्मनाक है। इसके बाद भी कोई सत्ता में कैसे बना रह सकता है। लेकिन तमाम असफलता के बाद भी हम खामोश है, सवाल नहीं पूछ रहे हैं तो इसका मतलब है हम अपने भीतर की आदमियत को धीरे-धीरे मार रहे हैं और अपने दिलों दिमाग में राज करने वालों के हाथ में एक पट्टा गले में डाल कर दे चुके हैं। अंत में-

शरम!

तुम्हे क्या लगता है

वह पहली बार

बेशरम तब हुआ था

जब उसकी दस लाख

की सूट उतरवाई गई थी

नहीं।

उसकी बेशर्मी बहुत

पहले की है

शायद जब राष्ट्रधर्म

की नसीयत मिलने

से पहले ही वह

बेशरम हो चुका था

लेकिन वह कब

कहना कठिन है लेकिन

शायद बीस साल की

उम्र में अपनी पत्नी 

को छोड़ देने से

बहुत पहले ही

उसने शरम छोड़ दी थी।

या उससे भी पहले...। (केटी)

सोमवार, 3 मई 2021

मोदी की मात...

 

सवाल यह नहीं है कि पश्चिम बंगाल चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार के लिए कौन दोषी है, जबकि पार्टी ने जीत के लिए कोई कसर बाकी नहीं रखा था? बल्कि सवाल यह है कि क्या कोई प्रधानमंत्री एक राज्य में जीत हासिल करने पूरे देश को दांव पर कैसे लगा सकता है। हर मोर्चे में बुरी तरह विफल रहने के बाद भी यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता बरकरार रखने का दावा किया जा रहा है तो इसका मतलब साफ है कि छल-प्रपंच, झूठ-नफरत के इस खेल को चंद पैसों की लालच में बढ़ावा देने वालों की रणनीति सफल हो रही है।

जिस ढंग से संघ का मैनेजमेंट काम कर रहा है, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में घृणा की खाई और चौड़ी होगी और देश में तरक्की बात बेमानी हो जानी है। कोविड के पहली लहर में जिस तरह से तबगिली जममात को निशाने पर लेकर नफरत फैलाई गई ुसका भांडा फूट जाने के बाद भी यदि देश के लोग सचेत होने की बजाय नफरत के रास्ते को ही चुन रहे हैं तो इसका मतलब साफ है कि संघ ने अपनी ताकत ही नहीं बढ़ाई है बल्कि उसने अपने मैनेजमेंट को भी इतना तगड़ा कर लिया है कि उससे निपटना आसान नहीं है।

बंगाल चुनाव में भले ही ममता बैनर्जी ने उम्दा प्रदर्शन किया है लेकिन भाजपा के तीन से करीब 80 सीट हासिल करना भी किसी उपलब्धि से कम नहीं है और यह एक तरह से समूचे देश को चेतावनी है कि आने वाले दिनों में नरेन्द्र मोदी को मात देना आसान नहीं है। बंगाल के चुनाव परिणाम के बाद समूचा विपक्ष ममता बैनर्जी की ओर देख रहा है। यह ठीक है कि ममता ने बंगाल बचा लिया लेकिन फिल्म तारिका कंगना रनौत के ट्वीट ने भविष्य का संकेत दे दिया है। रनौत ने जिस तरह से ममता की जीत पर ट्वीट किया है क्या वह नफरत का सैलाब नहीं है, कंगना अपने ट्वीट में कहती है कि अब वहां बहुमत में हिन्दू नहीं बचे हैं, एक और कश्मीर जन्म ले रहा है?

भले ही लोग इसे भाजपा का हार का झल्लाहत बता रहे हैं लेकिन यह झल्लाहत नहीं संघ की रणनीति का हिस्सा है, हिन्दुओं में खौफ पैदा करने का तरीका है, बहुसंख्यक समाज को उत्तेजित करने का कार्यक्रम है। बंगाल चुनाव से पहले ही जिस तरह से ममता बैनर्जी पर हमला हुआ है वह कम खतरनाक नहीं है। एक ब्राम्हण महिला पर जिस तरह से नफरती बाण चलाए गए, विष वमन किया गया यदि कोई धर्मनिरपेक्ष दल के लोग किसी दक्षिणपंथी विचारधारा के नेता पर इस तरह का दुष्प्रचार करते तो अभी तक उसका समाज जाग जाता। लेकिन सूती साड़ी और हवाई चप्पल पहनकर भी ममता ने क्षत्राणी जैसा रुप दिखला कर भाजपा को करारी शिकस्त दी।

जो लोग बंगाल चुनाव के दुरगामी परिणाम की आशा में डूबे है उनके लिए यह जानना जरूरी है कि प्रेम और घृणा की लड़ाई आसान नहीं होती, और जिन्हें लगता है कि प्रेम की जीत तो होनी ही है वे महाभारत फिर से पढ़ लें क्योंकि धर्मराज की जीत के बाद भी क्या बचा रह गया था। इसलिए सच की जीत जो चाह रहे हैं वे त्याग, कुर्बानी और दुनिया भर के आक्षेप के लिए खुद को तैयार कर लें।