मंगलवार, 11 मई 2021

विचारधारा की शून्यता...

 

भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से असम में कांग्रेस से आए हिमत बिस्वा सरमा को मुख्यमंत्री और बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर आये शुभेन्द्रु अधिकारी को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है उसके बाद तो साफ हो गया है कि सत्ता के लालच में भाजपा बुरी तरह फंस चुकी है और अब संघ या भाजपा के सिद्धांतों की बजाय सत्ता के सिद्धांत पर चलना होगा।

हालांकि भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र में सरकार कभी भी अपने दम पर नहीं बनी है, वह दर्जनों दलों के गठबंधन के साथ ही चलती है तो  इसकी वजह उस पर लगने वाले साम्प्रदायिकता का वह आरोप है जो समय-समय पर परिलक्षित होता रहता है। 2014 में नरेन्द्र मोदी सत्ता में आये तब भी दूसरे दलों से भाजपा में आये सांसदों की संख्या ही वजह थी।

दरअसल भाजपा अब भी नहीं समझ पा रही है कि इस देश का मिजाज क्या है, यदि देश का मिजाज संघ के मिजाज से मेल खाता तो भाजपा या जनसंघ बहुत पहले ही सत्ता में आ गई होती। यह देश पूरी दुनिया को अनेकता में एकता का सिर्फ संदेश ही नहीं देता, बल्कि उसे जीता भी है। कुंठित हिन्दु  और कुंठित मुस्लिम लीग को हवा देकर अंग्रेजों ने भले ही देश का विभाजन धर्म के आधार पर कर दिया हो लेकिन भारत आज भी धर्म निरपेक्ष को जीता है।

यही वजह है कि संघ या भारतीय जनता पार्टी केन्द्र की सत्ता पर काबिज होने उन दलों की बैसाखी पर सवार होते हैं जो महत्वाकांक्षी होते है, भाजपा ऐसे दलों से भी समझौता करने से परहेज नहीं करती जो मुश्किल से एक-दो सीट ही जीत सकते हैं। भले ही संघ या भाजपा के समर्थक यह दावा करे कि वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है या सबसे बड़ा संगठन है उनके सदस्य करोड़ों में है लेकिन सच तो यह है कि संघ या भाजपा के सिद्धांत पर चलने वालों की संख्या दहाई तक भी नहीं पहुंची है।

यही वजह है कि आजादी के सालों बाद पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी सत्ता तक पहुंचे तो 23 दलों का सहयोग था और अब मोदी सत्ता में आये है तब भी दर्जनभर दल के सहयोग के अलावा ऐसे लोगों के कारण सत्ता पर पहुंचे है जो अपने दलों से बगावत कर भाजपा में आये हैं। ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश का है यदि ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस से बगावत नहीं करते तो मध्यप्रदेश में भाजपा सत्ता से बाहर थी।

हिन्दू राष्ट्र का सपना देखने वाले शायद भूल गए हैं कि इस देश में दूसरे धर्म के लोग भी रहते हैं और भारतीय संविधान उन्हें वो सारे अधिकार देता है जो हिन्दुओं को देता है। ऐसे में यदि कुछ लोग सोचते है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हिन्दू राष्ट्र का निर्माण कर देंगे तो यह बचकानी सोच है क्योंकि अब तो भाजपा में इतनी बड़ी संख्या में दूसरे दलों से लोग आ गए हैं जो कभी भी संघ के लिए मुसिबत खड़ी कर सकते हैं।

आखिर असम में पूरी भाजपा को सरमा के सामने झुकना पड़ा हालांकि बंगाल में शुभेन्द्रु अधिकारी को नेता प्रतिपक्ष बनाना भाजपा की रणनीति हो सकती है लेकिन शुभेन्द्रु अधिकारी को संघ के विचारधारा में ढाल लेना नामुमकिन है और कोई बड़ी बात नहीं कि भाजपा इस मामले में धोखा खा जाए।

सोमवार, 10 मई 2021

बेज़ुबानो की जान बनी गुप्ता परिवार


बेजुबानों की जान बनी गुप्ता परिवाररायपुर। वैसे तो कोरोना के इस भीषण महामारी में सेवा करने वालों की कमी नहीं है, छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में भी आपको सेवाभावी लोग चौक चौराहों पर भूखों को खाना खिलाते या फल-फूल बांटते दिख जायेंगे लेकिन आज हम आपको अहमद जी कालोनी निवासी ओसीमा गुप्ता और शीला गुप्ता के बारे में बताना चाह रहे है कि वे किस तरह से जब से लॉकडाउन लगा है तब से बेजुबान जानवरों की सेवा कर रहे हैं। इन तस्वीरों में दिखाई देने वाली युवतियां किस तन्मयता से कुत्तों को खाना खिला रही है। हर हाल में बेजुबान खाना खा ले इसलिए वे हर तरह का उपक्रम करती है। ओसीमा गुप्ता ने हमसे बातचीत करते हुए बताया कि वे अपने घर के 500 मीटर रेडियेस में बेजुबानों को खाना खिलाती है। वे स्कूटर से आती है और फिर कागज की प्लेटों में खाना निकालकर खिलाती है।अब तो इस क्षेत्र के बेजुबानों ने भी स्कूटर की आवाज पहचान ली है और उनके आते ही वे पूछ हिलाते हुए प्यार जताती है। ओसीमा कहती है कि उनके घर में भी डॉग है जिन्हें वे बहुत प्यार करते है इसलिए जब लॉकडाउन लगा तो उन्हें यह बात भीतर तक हिला गया कि इस लॉकडाउन में जब लोग घरों के भीतर हैं तब सड़कों पर भटकने वाले इन बेजुबानों को कौन खाना दे रहा होगा। और बस तभी से ये दोनों युवतियां रोज शाम को इन बेजुबानों को खाना खिलाने घर से निकल पड़ती है।कोरोना के इस भीषण महामारी में ऐसे कितने ही लोग है जो बेजुबानों की सेवा में लगे हैं। यही सेवाभाव ही हमारे जीवन का ध्येय है और भारतीय समाज के भीतर आज भी मानवता बची है तो इन जैसे लोगों की वजह से।

 

अब तो समझ जाओं...

 

आपने फिल्म मदारी नहीं देखी है, तो एक बार जरूर देख ले। खासकर, उन लोगों को यह फिल्म जरूर देखनी चाहिए जो नरेन्द्र मोदी या मोहन भागवत जैसे लोगों को भगवान समझते हैं ताकि वे अपनों को खोने से पहले ही समझ जाये। अपनों के खोने का दुख बेहद दर्दनामक होता है और फिर बाद में पछतावा के सिवाय कुछ हासिल नहीं होता। आदमी यही सोचता रह जाता है कि काश!...

मदारी में मंत्री का बेटा कहता है मुझे 5-10 वर्ष नहीं लगेगा समझने में, मैं समझ गया! यह उन लोगों के लिए भी है जो आंख मूंद कर बैठे हैं। याद कीजिए गोरखपुर का वह आक्सीजन कांड जिसने कितने ही बच्चों की जान ले ली थी तभी सत्ता की जवाबदेही तय हो जाती तो आक्सीजन की आपूर्ति सुधर सकती थी।

आज हम यह बात आपसे इसलिए कह रहे हैं क्योंकि इस देश को कोरोना के भीषण संकट में डालने का काम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपनी महत्वाकांक्षा ने किया है। नमस्ते ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सरकार बनाने की पहली बड़ी गलती को माफ कर भी दे तो उसके बाद कोरोना की दूसरी लहर की चेतावनी को नजर अंदाज कर बडे आयोजनों की अनुमति के कारण देश में त्राहिमाम् मचा हुआ है।

सत्ता की इस लापरवाही की वजह से ही सुप्रीम कोर्ट को टास्क फोर्स बनाना पड़ा और कोर्ट को कहना पड़ा कि हम लोगों को इस तरह से मरते नहीं देख सकते। हैरानी की बात तो यह है कि सुप्रीम कोर्ट को वह काम अपने हाथ में लेना पड़ा जिस काम को सरकार को करना था। यह किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए बेहद दुखद है और सत्ता के लिए तो शर्मसार कर देने वाला निर्णय है। लेकिन जब सत्ता में शर्म नाम की चीज ही न बची हो तो पूरी दुनिया हंसेगी। और यही हो रहा है। समूचा दुनिया ने भारत के इस मौजूदा संकट के लिए केन्द्र की सरकार को दोषी माना है। मेड़िकल जर्नल की सम्पादकीय में मोदी सत्ता के लिए जिस तरह के शब्दों को इस्तेमाल करते हुए लानत भेजी है वह चौकाने वाला है।

हालांकि इससे पहले कई राज्यों के न्यायालय ने नरसंहार जैसे शब्दों का उपयोग करते हुए यहां तक कहा कि चोरी करो डाका डालो लेकिन आक्सीजन और दवाई का इंतजाम करो। इस तरह की टिप्पणी के बाद अब सरकार कोरोना की बजाय अपनी छवि चमकाने पूरी पार्टी को झोंक दे और पार्टी के पढ़े-लिखे लोग यदि सरकार की छवि सुधारने छल-प्रपंच, झूठ, अफवाह, हिन्दू-मुस्लिम करने लगे तो कोरोना का यह रुप नरसंहार बन जायेगा।

इसलिए हमने जब कहा कि ऐसे लोगों को फिल्म मदारी इसलिए भी देख लेना चाहिए क्योंकि फिल्म समाज का आईना होता है। और वह सिखाता है कि देश के प्रति प्रेम और मानवता की रक्षा के लिए किस तरह से हर व्यक्ति की जवाबदारी है। ऐसे कितने ही उदाहरण है कि इस देश के लोगों ने पट्टा उतारकर देश हित में कड़े फैसले लिये है लेकिन जिस तरह का दुरंगी पट्टा पहनाकर लोगों की आंखों में भी पट्टा बांधी गई है उनके लिए फिल्म का यह डायलॉग महत्वपूर्ण है तुम मेरी दुनिया छिनोगे, मैं तुम्हारी दुनिया में घुस जाउंगा। यह कहता है अब भी देर हुई  है सवाल कीजिए, रोज कीजिए! नहीं तो अपनी बारी का इंतजार कीजिए।

रविवार, 9 मई 2021

हमने किसे चुन लिया !

 

यह सवाल भले ही छोटा हो लेकिन अब महत्वपूर्ण इसलिए हो गया है क्योंकि भाजपा ने जिसे प्रधानमंत्री बनाया है वह अपनी रईसी में इस तरह डूब गया है कि उसे इस महामारी काल में भी सिर्फ और सिर्फ सत्ता की रईसी और चुनाव जीतने की रणनीति से ही मतलब है।

रोम जल रहा था तब वहां राजा नीरो चैन की बंशी बजा रहा था, इस मिथक के दुहराने की बात हम कभी स्वीकार नहीं कर पाते यदि इस देश में कोरोना का प्रकोप नहीं आता। लेकिन कहते हैं इतिहास अपने आप को दोहराता है! कोरोना के इस बढ़ते प्रकोप के बाद भी यदि सरकार का ध्यान सिर्फ कर वसूली हो तो क्या हमें रावण की कर वसूली को याद नहीं कर लेना चाहिए जो ऋषि-मुनियों से कर के बदले में खून तक निकाल लेता था। 

देश की कई राज्यों की सरकारें वैक्सीन को टैक्स फ्री या मुफ्त में देने की मांग कर रही है लेकिन प्रधानमंत्री को केवल टैक्स की पड़ी है। यही वजह है कि बंगाल चुनाव के बाद लगातार पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ रही है। इस लॉकडाउन के दौर में पेट्रोल-डीजल का ज्यादा उपयोग वही लोग कर रहे हैं जो कोरोना से पीडि़त है, जिन्हें अस्पताल, मेडिकल स्टोर्स जाना है तब कीमतों में लगातार वृद्धि होना क्या उनका खून निचोडऩा नहीं हुआ।

मोदी समर्थकों या भाजपाईयों को यह छोटी बात को बड़ा करने की कोशिश लग सकती है लेकिन यह बेहद ही शर्मसार कर देने वाली बात है। इससे भी बड़ी बात तो किसानों को जीते जी मार डालने की कोशिश है। प्रधानमंत्री ने खाद की कीमत 58 फीसदी बढ़ा दी है। चुनाव के दौरान जारी आदेश की लीपापोती का सच सबके सामने है केवल डीएपी की कीमत सात सौ रुपये बढ़ा दी गई यह खेती के लिए बड़ा संकट है। ऐसे में इसे किसान आंदोलन की प्रतिक्रिया में लिया गया फैसला नहीं तो और क्या कहेंगे।

इस कोरोना के दौर में जब केवल किसान ही देश के आर्थिक तंत्र को ही नहीं जान की रक्षा की है तब इस तरह के फैसले को आप क्या कहेंगे। सेन्ट्रल विस्टा के निर्माण कार्य को आवश्यक सेवा बताकर लॉकडाउन में भी बीस हजार करोड़ फूंकने की कोशिश क्या बेईमानी नहीं है। उसमें भई सबसे पहले प्रधानमंत्री का महल बनेगा और यह 2022 तक इसलिए बना दी जायेगी क्योंकि महल में रहने की मंशा 2024 में पता नहीं पूरी होगी या नहीं।

हैरानी तो इस बात की है कि सेन्ट्रल विस्टा को लेकर जिस तरह से पूरी दुनिया में थू-थू हो रहा है वह भी बेशर्मी से देखा जा रहा है। ऐसे में जब कोरोना काल में प्रधानमंत्री के आपदा में अवसर को अमलीजामा पहनाने वालों को भी शर्म नहीं है तब इसका क्या मतलब है। सवाल कई है लेकिन एक सवाल जो सबसे महत्वपूर्ण है कि क्या संघ के संस्कार इसी तरह के हैं, हालांकि संघ को आज भी संविधान पर विश्वास नहीं  है, यह दावा नहीं हकीकत है इसलिए वह हमेशा ही वह दरवाजा चुनती है जिससे वह पकड़ा न जाए। और दोष किसी व्यक्ति पर मढ़ सके। आडवानी की चुप्पी को लेकर भी सवाल है! लेकिन जब सत्ता ही खून चुसने को आमदा हो तो निंदा के अलावा और क्या किया जा सकता है। जरा सोचिए जरुर!

शनिवार, 8 मई 2021

प्रधानमंत्री की प्राथमिकता...

 

दिल्ली हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए जब कहा कि कड़ी कार्रवाई के लिए मजबूर न करें! तो यह सवाल उठाया जाना चाहिए कि इस भीषण महामारी में भी केन्द्र की सरकार आखिर लोगों की जान से खिलवाड़ क्यों कर रही है, उसकी प्राथमिकता क्या जनकल्याण नहीं होनी चाहिए? आखिर वह एक कदम आगे बढ़कर देश के लोगों के कल्याण की बात क्यों नहीं कर रही है। क्या वह जानती है कि कुछ भी नहीं करने के बाद भी सिर्फ हिन्दु-मुस्लिम के सहारे वह सत्ता में फिर से आ जायेगी?

यह सवाल अब हर उस देशप्रेमी की जुबान बनने लगी है जो भीषण महामारी से तड़पते जिन्दगी को अपनी खुली आंखों से देख पा रहे हैं। बंगाल चुनाव के नतीजे आने के बाद जिस तरह से वहां भाजपा और तृणमूल कांग्रेस की लड़ाई को हिन्दू-मुस्लिम का रुप देने की कोशिश की गई, उसका सच सामने आने लगा है, दुनियाभर की हिंसा की तस्वीरों को बंगाल की हिंसा बताकर नफरत फैलाने की कोशिश किस तरह की गई, भारतीय जनता पार्टी ने किस तरह से देशभर में धरना प्रदर्शन किया वह अब स्पष्ट होने लगा है।

ऐसे में एक बात तो तय है कि इस भीषण महामारी से अब इस देश की जनता को खुद ही निपटना है, क्योंकि बीस हजार करोड़ के सेन्ट्रल विस्टा को लेकर दायर याचिका पर न्यायालय ने भी हाथ खड़े कर दिये हैं। तब सवाल यही है कि मोदी सत्ता की प्राथमिकता क्या है। महामारी से निपटने मोदी सत्ता को राष्ट्रीय प्लान बनाने, आक्सीजन की सुचारु आपूर्ति और वैक्सीन को लेकर न्यायालयों ने लगातार लानत भेजी है लेकिन सरकार ने रईसी बरकरार रखने का उपाय अपनी प्राथमिकता में रखी है। यही वजह है कि तमाम विरोध के बाद भी इस महामारी में सेन्ट्रल विस्टा का काम बेधड़क चल रहा है और उसमें भी महल जैसे प्रधानमंत्री आवास सबसे पहली प्राथमिकता है जिसे हर हाल में दिसम्बर 2022 तक पूरा किया जाना है।

सरकार की दूसरी प्राथमिकता की रईसी बरकरार रखने की है इसलिए इस महामारी के दौर में सिर्फ आईडीबीआई बैक को बेचने के लिए कैबिनेट की बैठक बुलाई जाती है। इस सरकार की प्राथमिकता तो शुरु ही राज्यों में सत्ता प्राप्ति की रही है इसलिए जब भी किसी राज्य में चुनाव होता है प्रधानमंत्री सहित पूरी कैबिनेट वहां होती है और कई बार तो साफ लगता है कि ये प्रधानमंत्री देश के नहीं सिर्फ भारतीय जनता पार्टी के नेता बस हैं। यही नहीं ट्रम्प को जिताने भी रैलियां होती है और कोरोना की अनदेखई तब तक की जाती रही जब तक मध्यप्रदेश में सरकार नहीं बन गई।

सवाल बहुत से है लेकिन कोरोना काल में भी सरकार की प्राथमिकता यदि सत्ता की रईसी बरकरार रखने की है तो फिर दूसरी-तीसरी क्या चौथी लहर में भी कुछ नहीं होने वाला है। क्या देश के प्रधानमंत्री को इस भीषण महामारी से निपटने कोई योजना नहीं बनानी चाहिए? क्या मध्यम व लघु व्यापारियों या उद्योगपतियों के लिए कोई योजना नहीं बनानी चाहिए? क्या मध्यम वर्ग के लोगों की तकलीफ दूर करने योजना नहीं बनानी चाहिए। क्या रोज कमाने-खाने वालों के लिए इस सरकार ने कोई योजना बनाई है। सभी को आक्सीजन और वैक्सीन मिल जाये इसकी कोई योजना है। महामारी से बर्बाद हो चुके परिवार के परिवार और अनाथ हो चुके बच्चों के लिए कौन सी योजना है। 

सरकार जानती है कि बेबसी में तड़पते लोग भले ही आज गाली दे रहे है लेकिन वोट उन्हें ही देंगे क्योंकि हिन्दुत्व खतरे में है? राहुल गांधी के परिवार ने देश के लिए कुछ नहीं किया? तब इन सवालों का क्या अर्थ रह जाता है। जिस तरह से असम जीते वैसे ही 2024 में देश जीत लेंगे?

शुक्रवार, 7 मई 2021

घबराईये मत ,आयेगा तो मोदी ही!


 

जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है तभी से इस देश में नई-नई मुसिबत आई है जब कोई यह बात कहता है तो उन्हें अनुपम खेर का वह ट्वीट जरूर पड़ लेना चाहिए जिसमें उन्होंने दस दिन पहले ही कह दिया था। घबराईये मत, आएगा तो मोदी ही। जय हो।

यह विश्वास अकेले अनुपम खेर का नहीं है, कितने ही कुंठित हिन्दु है जो इस विश्वास के साथ कोरोना और दूसरी तकलीफों से ओतप्रोत होकर चले गए। क्योंकि मोदी नहीं होगा तो हिन्दु खतरे में पड़ जायेंगे इसलिए हिन्दुओं को बचाना है तो मोदी को लाना है। देख लेना बंगाल अब कश्मीर बन जायेगा। कोई हिन्दु सुरक्षित नहीं रहेगा। आदि-आदि। 

इस तरह के पोस्ट से सोशल मीडिया में वाट्सअप युर्निवसिटी और ट्रोल आर्मी के सदस्यों द्वारा लाखों की तादात में रोज की जा रही है। उन्हें इस भीषण महामारी से ज्यादा जरूरी मोदी को बचाना लगता है और सरकार क्या कर रही है यह तो बताने की जरूरत ही नहीं है। एक भक्त तो अनुपम खेर से भी आगे निकल कर कहने लगे एक सौ तीस करोड़ का इस देश का कोरोना कुछ नहीं बिगाड़ सकता यदि रोज एक लाख मौते होंगी तब भी इस देश की आबादी को खत्म होने में दशकों लग जायेंगे क्योंकि लोग पैदा भी तो हो रहे हैं।

हालांकि इस बात को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है लेकिन कुंठित हिन्दुओं की सोच को लेकर चिंता जरूर की जानी चाहिए कि आखिर कोई सरकार इतनी लापरवाही और लाशों का ताडंव मचाने के बाद भी कुर्सी से कैसे चिपके रह सकती है। पिछले सप्ताहभर से देश के तमाम तरह के एक्सपर्ट कोरोना की तीसरी लहर को लेकर गंभीर चेतावनी दे रही है, न्यायालय रोज लानत भेज रही है लेकिन सरकार ने अभी तक दूसरी लहर से निपटने ही कोई मास्टर प्लान नहीं बनाया है।

दूसरी लहर में जिस तरह से 25 से 45 साल के उम्र के लोगों की ौत हुई है उसके चलते परिवार का परिवार बर्बाद हो गया है, बच्चे अनाथ हो गये हैं। 18 से अधिक उम्र के लोगों को वैक्सीन लगाने की सिर्फ घोषणा ही हुई है। जब वैक्सीन ही नहीं होगा तो फिर इस तरह की घोषणा का मतलब ही क्या है।

एक तरफ एक्सपर्ट तीसरी लहर में बच्चों पर कहर बरपाने की चेतावनी दे रहे है तो विश्व की सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी हिन्दु-मुस्लिम करते घुम रही है। हिन्दुओं की ठेकेदारी में व्यस्त संगठनों का कहीं पता नहीं है, संघ, बजरंग दल, विश्व हिन्दु परिषद के पदाधिकारी शायद इसलिए चुप है कि भले ही हिन्दुओं की आबादी थोड़ी कम हो जायेगी लेकिन मुसलमान भी तो मर रहे हैं। इतनी भयावह लापरवाही और आम लोगें का मोदी सरकार को लेकर जो गुस्सा साफ दिखाई दे रहा है, इसके बाद भी सरकार कुछ नहीं कर रही है तो इसकी वजह वह पंच लाईन है जो हर व्यक्ति के जेहन में राज कर रहा है। घबराईये नहीं, आयेगा तो मोदी ही!

गुरुवार, 6 मई 2021

बंगाल हिंसा- सौ चूहे खाकर बिल्ली हज...

 

जिस राजनैतिक पार्टी भाजपा के 150 से अधिक सांसद और सैकड़ों विधायकों पर आपराधिक मामले दर्ज हो, जिसने पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव में सौ से अधिक ऐसे लोगों को प्रत्याशी बनाया हो जिसके खिलाफ आपराधिक प्रकरण हो वह भाजपा बंगाल चुनाव में राजनैतिक हिंसा पर देशभर में धरना दे तो इसे आप नौटंकी, घडिय़ाली आंसू बहाना नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे।

इसका यह कतई मतलब नहीं कि पश्चिम बंगाल में हुई हिंसा का हम समर्थन करते हैं, हम इस देश-दुनिया में किसी भी तरह की हिंसा और अपराध की न केवल निंदा करते हैं बल्कि न्यायोचित निर्णय के लिए प्रतिबद्ध हैं। पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा में अब तक डेढ़ दर्जन से अधिक लोग जान गंवा चुके है जबकि उत्तरप्रदेश में पंचायत चुनाव के बाद हुई हिंसा में भी आधा दर्जन लोगों की जान जा चुकी है लेकिन उत्तरप्रदेश में भाजपा की सरकार है इसलिए भारतीय जनता पार्टी ने केवल बंगाल में हुई हिंसा के खिलाफ ही धरना दिया। इसका मतलब साफ है कि उनके लिए हिंसा या हत्या सिर्फ राजनैतिक फायदे के लिए है।

वैसे तो चुनावी हिंसा भारतीय राजनीति में नया नहीं है लेकिन जिस तरह से राजनैतिक फायदे के लिए राजनैतिक दल तत्पर रहते हैं वह न केवल शर्मनाक है बल्कि बेशर्मी की पराकाष्ठा है। सत्ता के नशे में हिंसा की शुरुआत कहां से हुई कहना मुश्किल है लेकिन हम यहां भारतीय जनता पार्टी की भूमिका पर ही केन्द्रीय करेंगे अन्य दलों की भूमिका पर भी विस्तार देंगे।

हमने शुरुआत में ही कहा है कि जिस तरह से भाजपा में आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों को हाल के सालों में बढ़ावा दिया गया वह शर्मनाक है। याद कीजिए राजनीति के अपराधीकरण को लेकर अटल-आडवानी के दौर में क्या कुछ नहीं कहा गया लेकिन मोदी का दौर अपराधियों को भाजपा में लाकर शुद्धिकरण करने का दौर है। यही वजह है कि 2014 में सत्ता में आते ही संसद में जनप्रतिनिधियों के अपराधिक प्रकरण को निपटाने के लिए स्पेशल कमेटी, स्पेशल कोर्ट बनाने की बात धरी की धरी रह गई, यहां तक कि लोकायुक्त का मामला भी ठंडे बस्ते में चला गया।

सत्ता मद में अपराध को पिछले सालों में जिस तरह से भाजपा ने प्रोत्साहित किया, उसे भी इस देश ने देखा है, हत्या और बलात्कार जैसे मामलों के अपराधियों को मोदी सत्ता के आने के बाद न केवल संरक्षण मिला बल्कि सम्मानित करने जैसा घृणित कार्य भी किया गया। जो भाजपा आज बंगाल चुनाव के बाद हिंसा में दर्जनभर लोगों की हत्या के बाद क्रोधित दिखाई दे रही है वह भाजपा शायद भूल गई कि इसी देश में अखलाक से लेकर इंस्पेक्टर सुबोध सिंह सहित 64 लोगों की सड़कों पर ही हत्या कर दी गई। मॉबलिंचिंग से लेकर गौ मांस और पता नहीं कितने ही तरह के आरोप लगा कर हत्या की गई तब किसी भाजपा नेता को धरना प्रदर्शन का ध्यान नहीं आया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नमस्ते ट्रम्प और लापरवाही के चलते कोरोना और सड़कों में मरते मजदूरों के लिए भी उनकी संवेदना का स्तर नीचे ही रहा। उसी बंगाल में राजनैतिक हिंसा के दौरान तीन दिन में पांच सौ लोग कोरोना से मर गये। देश में सैकड़ों लोग मोदी सत्ता की आक्सीजन नीति के चलते प्राणवायु के अभाव में दम तोड़ते रहे, और अब भी मौतों का सिलसिला जारी है तब भी पार्टी चुप है पूरी सत्ता का ध्यान अब भी कोरोना से निपटने की बजाय छवि सुधारने में लगी है तब कोई कैसे मान ले कि भाजपा बंगाल हिंसा को लेकर सचमुच दुखी है और राजनैतिक नौटंकी नहीं कर रही है। यदि भाजपा सचमुच राजनैतिक हिंसा को लेकर दुखी है तो उसे सबसे पहले आपराधिक छवि के सांसद-विधायकों से इस्तीफा लेना चाहिए? गृहमंत्री अमित शाह के बारे में फिर कभी....?