शनिवार, 10 मई 2025

धोखा…

 धोखा…


पाकिस्तान कभी भी भरोसे के लायक़ नहीं है और उसने हमेशा ही पीठ पर छुरा मारा है 

तब भारत को क्या अब अंतिम उपचार नहीं करना चाहिए

ट्रंप ने जैसे ही सीजफ़ायर की घोषणा की लोग इंदिरा को याद करने लगे

पूरा सोशल मीडिया इंदिरा की तारीफ़ से भर गया,

ऐसे में कुछ सवाल जो सोशल मीडिया में सुलगने लगे

उन चार आतंकवादियों का अब तक  ना पकड़ा जाना, 


उसके बाद पाकिस्तानी सेना द्वारा आम नागरिकों की हत्या,


सैनिकों का शहीद होना, 


पाकिस्तान को लोन मिलना, 


इस सबके दौरान मीडिया का बेशर्मी से अनियंत्रित होकर झूठ फैलाना,


अमेरिका का खुले आम कहना कि हमने सीज़फायर करवाया, जबकि हमारा स्टेंड हमेशा से रहा है कि हम तीसरे पक्ष की मध्यस्थता स्वीकार नहीं करेंगे, 


कूटनीतिक रूप से असफलता, जबकि कहा जाता है कि हमारा डंका विदेशों में बज रहा है,


पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वी पी मलिक का बेहद निराशाजनक बयान कि हमें इस सबसे क्या मिला,


इन सब बातों के बाद भी आप सरकार का समर्थन कर रहे हैं तो मान लीजिये कि आपकी भक्ति देश से बढ़कर किसी पार्टी के प्रति है, और ये शर्म की बात है.

मनी तिवारी लिखते है… आप लोग अपने अपने तर्क और अंदाजे लगाते रहिए पर इस युद्ध और युद्धविराम, दोनों के पीछे पूरा खेला IMF का ही है। 


आईएमएफ यानी "इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड" हिंदी में कहें तो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष।


एक तरीके से बीसी या फिर कमेटी वाले खेल की तरह यहां भी करीब 190 देश अपना अंशदान करते है ताकि संकट में जरूरत पड़ने पर यहां से लोन लिया जा सके।


अब पाकिस्तान को लोन चाहिए था तो उसे अपने देश पर संकट तो दिखाना पड़ेगा, मसलन भारत ने वो मंसूबा पूरा कर दिया। फिर अमेरिका के वॉशिंगटन डीसी स्थित आईएमएफ मुख्यालय से पाकिस्तान को वो फंड भी जारी कर दिया गया।


190 देशों के इकट्ठा किए अरबों डॉलर किसी को संकट के नाम पर बांट देना कोई आसान काम नहीं है। बकायदे तनाव और युद्ध जैसी स्थितियां निर्मित करनी पड़ती है।


बाकी दलाली क्या होता है आप सब को पता हइए है। किसी सरकारी बैंक से लोन अप्रूव तो आपने भी करवाया  ही होगा।

रजनीश जे जैन का लिखना है… सीज़फायर ! इस एक शब्द ने बहुत कुछ बदल दिया है। 


आज दो बाते सिद्ध हुई। पहला , यह तय हो गया कि दुनिया का चौधरी कौन है। विश्व गुरु का गुब्बारा फुट गया।  दूसरा ,  भारत की कूटनीति पर प्रश्न चिन्ह लग गया। सन इकहत्तर में जो कमाया था , आज गँवा दिया।  भारत पाकिस्तान को आतंकवादी राष्ट्र घोषित नहीं करवा पाया , न ही आईएमएफ को खैरात देने से रोक पाया ,  न ही पहलगाम  पीड़ितों को न्याय दिला पाया ! 


अब सवाल तो उठेंगे ही ! पीछा भी करेंगे। मिटटी में मिला देने वाली हुंकार का क्या होगा ? यह भी पूछा जाएगा कि क्या  एक रिफाइनरी और एक पोर्ट आई बी की ख़ुफ़िया रिपोर्ट में संभावित टारगेट होने की पुष्टि के बाद सीज फायर की प्रस्तावना लिखी गई ?


देश तो सवाल करेगा ही , और करना भी चाहिए कि ऐसी कौन सी नस दबा दी मित्र डोलांड ने जिसने भारत के विजय रथ को रोक दिया है।

और भी लोगो की प्रतिक्रिया में इंदिरा ऐसे याद आई..





कागो प्रसादो महलो अपि न गरुणायते....


अर्थात महल के सबसे उंचे शिखर पर बैठने से कौवा कभी गरुण नहीं हो जाता।


इसी तरह पीएम की कुर्सी पर बैठ जाने से हर कोई इंदिरा नहीं बन जाता, वह इंदिरा गांधी ही थी जिसने अमेरिकी राष्ट्रपति निक्सन को अपने जूती के नोक पर रखा, पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए एवं 1983 में दुनिया के 108 गुट निरपेक्ष राष्ट्रों का नेतृत्व संभाला।


सर्दियों का नवंबर 1971...

इंदिरा गांधी अमेरिका के दौरे पर थीं। व्हाइट हाउस में राष्ट्रपति निक्सन से मुलाकात हुई। बातचीत शुरू होते ही निक्सन ने घमंड में डूबकर चेतावनी दे डाली:

"अगर भारत ने पाकिस्तान के मामले में नाक घुसाई, तो अमेरिका चुप नहीं बैठेगा!"


इंदिरा गांधी ने बिना किसी उत्तेजना के, बेहद गरिमामयी अंदाज़ में जवाब दिया:

"भारत अमेरिका को मित्र मानता है, मालिक नहीं। हम अपनी किस्मत खुद लिखते हैं।"

और इतना कहकर वे बैठक छोड़कर उठ गईं।


बाद में इस पूरी मुलाकात का ज़िक्र अमेरिकी विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर ने अपनी आत्मकथा "White House Years" में किया।


उस दिन बैठक के बाद मीडिया को साझा संबोधन होना था — पर इंदिरा गांधी बाहर निकलते ही कार्यक्रम रद्द करके सीधे अपनी कार की ओर बढ़ गईं।


कार का दरवाज़ा बंद करते वक्त किसिंजर ने कहा:

"मैडम, आपको नहीं लगता कि राष्ट्रपति के प्रति थोड़ा और धैर्य दिखाना चाहिए था?"


इंदिरा गांधी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया:

"धन्यवाद मिस्टर सेक्रेटरी, भारत भले ही विकासशील देश हो, लेकिन हमारी रीढ़ की हड्डी मजबूत है। हमारे पास अत्याचार झेलने की आदत नहीं, बल्कि उसका जवाब देने का साहस है। वो दिन लद चुके जब कोई ताकत हज़ारों मील दूर बैठकर हम पर राज कर सके।"


इसे कहते हैं नेतृत्व, साहस और आत्मविश्वास ।


" एक वो थीं.....,एक ये हैं "


युद्ध समाप्ति की घोषणा अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने किया, ऐसा भारत के इतिहास में पहली बार हुआ, एक सार्वभौमिक राष्ट्र का अपमान हुआ ।


गरिमामयी हार भी स्वीकार्य है किन्तु साहसहीन,डरपोक नेतृत्व कभी नहीं, कभी भी नहीं !


मंगलवार, 6 मई 2025

जूलियस रेबेरो ने पीएम नरेंद्र मोदी से क्या कहा

 जूलियस रेबेरो ने पीएम नरेंद्र मोदी से क्या कहा, कृपया पढ़ें


पंजाब के पूर्व डीजीपी और देश के बेहद प्रतिष्ठित आईपीएस अधिकारी के विचार.

जूलियस रेबेरो आईपीएस (सेवानिवृत्त) (पूर्व डी.जी.पी. महाराष्ट्र)

आंखें खोलने वाला

देश के नागरिक के तौर पर मुझे लगा कि ये बात उन तक पहुंचानी होगी.

मोदी जी, एक मंच पर खड़े होकर चिल्लाने और यह सवाल पूछने का कोई 👍मतलब नहीं है कि पिछले 60 वर्षों में क्या हासिल हुआ। क्या आपको नहीं लगता कि हमारे देश के नागरिक मूर्ख हैं.  आप एक ऐसे देश के प्रधान मंत्री हैं, जो 300 से अधिक वर्षों तक ब्रिटिश शासन के अधीन था।  लोग बिल्कुल गुलामों की तरह जी रहे थे।  आज़ादी के बाद 1947 में कांग्रेस सत्ता में आई और शून्य से शुरुआत की. इस देश में अंग्रेजों द्वारा छोड़े गए कूड़े के अलावा कुछ भी नहीं था। अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद से भारत के पास एक पिन बनाने के भी संसाधन नहीं थे।  पूरे देश में केवल 20 गांवों के लिए बिजली उपलब्ध थी।  इस देश में केवल 20 शासकों (राजाओं) के लिए ही टेलीफोन सुविधा उपलब्ध थी। पीने के पानी की कोई आपूर्ति नहीं थी. केवल 10 छोटे बांध थे।  खेती के लिए न अस्पताल, न शैक्षणिक संस्थान, न खाद, न चारा, न पानी की आपूर्ति।  कोई नौकरियाँ नहीं थीं और पूरे देश में केवल भुखमरी देखी जा सकती थी।  अनेक शिशुओं की मृत्यु हुई।  सीमा पर बहुत कम सैन्य कर्मचारी. केवल 4 विमान, 20 टैंक और देश के चारों तरफ पूरी तरह खुली सीमाएँ। बहुत कम सड़कें और पुल। खाली खजाना.


इन परिस्थितियों में नेहरू सत्ता में आये।


60 साल बाद भारत क्या है?

विश्व की सबसे बड़ी सेना में से एक.  हजारों युद्धक विमान, टैंक।  लाखों औद्योगिक संस्थान। लगभग सभी गांवों में बिजली. सैकड़ों विद्युत विद्युत स्टेशन। लाखों किलोमीटर लंबे राष्ट्रीय राजमार्ग और ओवर ब्रिज।  नई रेलवे परियोजनाएं, स्टेडियम, सुपर स्पेशलिटी अस्पताल, अधिकांश भारतीय घरों में टेलीविजन, सभी देशवासियों के लिए टेलीफोन।  देश के भीतर और बाहर काम करने के लिए सभी बुनियादी ढांचे, बैंक, विश्वविद्यालय, एम्स, आईआईटी, आईआईएम, परमाणु हथियार, पनडुब्बी, परमाणु स्टेशन, इसरो, नवरत्न सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयाँ।

सालों पहले लाहौर तक घुसी थी भारतीय सेना...पाकिस्तान के 2 टुकड़े कर दिए. पाकिस्तान के 1 लाख सैनिकों और कमांडरों ने भारतीय सेना के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

भारत ने खनिज और खाद्य पदार्थों का निर्यात शुरू कर दिया। श्रीमती इंदिरा गांधी द्वारा बैंकों का राष्ट्रीयकरण। भारत में कंप्यूटर का आगमन हुआ और भारत तथा देश के बाहर रोजगार के अनेक अवसर प्राप्त हुए।

आप सूचना प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कर पीएम बने हैं.

जब आपने प्रधानमंत्री का पद संभाला था, तब भारत दुनिया की शीर्ष 10 अर्थव्यवस्थाओं में था। इसके अलावा जीएसएलवी, मंगलयान, मोनोरेल, मेट्रो रेल, अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे, पृथ्वी, अग्नि, नाग, परमाणु पनडुब्बियां....ये सब आपके पीएम बनने से पहले ही हासिल कर लिया गया था।

कृपया लोगों के पास चिल्लाने और पूछने न आएं कि कांग्रेस ने 60 वर्षों में क्या हासिल किया है।

कृपया लोगों को बताएं कि आपने पिछले 9 वर्षों में क्या हासिल किया है, नाम बदलने, मूर्ति स्थापित करने और लगातार गाय की राजनीति करने, हिंदू और मुस्लिम, हिंदू और ईसाई, हिंदू और दलित, हिंदू और अन्य अल्पसंख्यकों के बीच दरार पैदा करने के अलावा।

आपकी असफल नोटबंदी, खराब ढंग से क्रियान्वित जीएसटी (आज़ादी मिलने के बाद से सबसे कम) और लोगों को लंबी कतारों में खड़ा करना, जिससे अनावश्यक मौतें हुईं।

पाखंडी भाजपाइयों ने एफडीआई का विरोध किया और अब भाजपा बेशर्मी से एफडीआई का समर्थन कर रही है.. भाजपा भारत को अंबानी और अडानी को बेच रही है और भारत सरकार के स्वामित्व वाली एचएएल के बजाय अनिल अंबानी की 2 महीने पुरानी कंपनी को राफेल सौदा इसका एक प्रमुख उदाहरण है.. भाजपा  ज्यादा टैक्स लगाकर पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दाम बढ़ा दिए, जबकि कच्चे तेल के दाम सस्ते हो गए.. मोदी सरकार ने गरीबों से मिनिमम बैलेंस न रख पाने पर एसबीआई के जरिए जुर्माने के तौर पर 1771 करोड़ रुपये वसूले हैं.  भारत के लोग.  विकास अमित शाह के बेटे, शौर्य डोभाल, अंबानी, अडानी, बाबा रामदेव के पतंजलि समूह और बीजेपी को प्रायोजित करने वाले लोगों के लिए हो रहा है.. बीजेपी ने गंगा नदी को साफ करने के लिए 3000 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, जिसका भ्रष्टाचार हर कोई पा सकता है  गंगा नदी में डुबकी लगाने से आप अपने पूरे शरीर पर मल, मैल, ग्रीस लेकर बाहर आते हैं।

पुनश्च.  यह कांग्रेस के प्रचार अभियान का विज्ञापन नहीं है.  मैं कांग्रेस समर्थक नहीं हूं.  मैं सिर्फ एक जागरूक मतदाता हूं, जो हर बार यह महसूस करता है कि यह उसकी बुद्धि का अपमान है जब वर्तमान सरकार कहती है कि हमारा देश पिछले 60 वर्षों में अच्छा नहीं रहा है!

गरिमा पर समझौता नहीं किया जा सकता!!

From Rakesh Nagar post

बुधवार, 23 अप्रैल 2025

आपदा में अवसर और गिद्धों की वोटों पर निगाह


 आपदा में अवसर और गिद्धों की वोटों पर निगाह 

करोना काल में जब देश के प्रधान सेवक ने आपदा में अवसर की बात कही थी तब भी कुछ लोग आक्सीजन और रेमडीसीवीर की कालाबाज़ारी कर रहे थे

शायद उन्हीं लोगो को अब पहलगाम में हुए आतंकी हमला से मारे गये लोगों की चिता की राख ठंडी होने का भी सब्र नहीं है और वे लोग नफ़रत की बीज बोकर वोटों की फसल काटने आतुर है

आतंकवादियों की नीचताई पर सरकार से सवाल क्यों नहीं पूछा जा रहा…

नीचता की भी हद होती है, लेकिन भाजपाइयों ने तो उसे भी पार कर दिया है...


वोटिंग कैंपेन में लगे हो तुम?

27 भारतीयों की लाशें पड़ी हैं, और तुम्हारी आंखों में सिर्फ वोट नाच रहा है?


सरकार तुम्हारी, गृहमंत्री तुम्हारा, जिम्मेदारी भी तुम्हारी — फिर क्यों नहीं जवाब दे रहे हो?

कश्मीर में 2000 पर्यटकों की मौजूदगी में आतंकवादी घुस आए, हमला किया, लोगों को बेरहमी से मार डाला और आराम से निकल भी गए — कहाँ थी तुम्हारी सुरक्षा? कहाँ था तुम्हारा इंटेलिजेंस?


गृहमंत्री कहां थे उस वक़्त? चुप क्यों हैं अब?

क्या गृहमंत्री सिर्फ चुनावी भाषणों और रैलियों के लिए हैं? जब देश के नागरिक मारे जा रहे हों, तब क्या उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं?


पूछो सवाल! उठाओ आवाज़! मांगो इस्तीफा उस निकम्मे गृहमंत्री से!

और पाकिस्तान से आये इन दरिंदों के आकाओं को सबक सिखाने की बात करो, सिर्फ टीवी पर गाल बजाने से कुछ नहीं होगा!


लेकिन नहीं —

तुम्हारा ज़मीर तो कब का मर चुका है…

तुम्हें हर लाश में सिर्फ एक नया वोट बैंक दिखता है,

तुम्हें हर आतंकवादी हमले में चुनावी रणनीति नज़र आती है,

तुम इंसान नहीं, प्रचार के गुलाम बन चुके हो।


कल से देख रहा हूँ —

कोई नहीं पूछ रहा कि सुरक्षा कहाँ थी,

कोई नहीं पूछ रहा गृहमंत्री क्या कर रहे थे,

कोई नहीं कह रहा कि इस बर्बर हमले का ज़ोरदार बदला लिया जाए!


नीचता की भी कोई हद होती है...

गुरुवार, 17 अप्रैल 2025

ग्राहम स्टेन्स की हत्या करने वाला महेंद्र की रिहाई

 ग्राहम स्टेन्स की हत्या करने वाला महेंद्र की रिहाई  




आस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स को जिंदा जलाकर मार डालने के अपराध में शामिल महेंद्र हेम्ब्रम को अच्छे व्यवहार के आधार पर जेल से रिहा कर दिया गया है । 


ऑस्ट्रेलिया के एक पादरी थे ग्राहम स्टेन्स । ओडिशा के आदिवासी इलाकों में कुष्ठ रोगियों की सेवा करते थे। 30 सालों से वहां एक्टिव थे । 

22-23 जनवरी 1999 के रात की बात है जब वह अपने दो बेटों 10 साल के फिलिप और 6 साल के टिमोथी के साथ ग्राहम अपनी जीप में सो रहे थे । तभी कुछ लोगों ने उनकी जीप में आग लगा दी । उन्हें शक था कि ग्राहम सेवा की आड़ में धर्मांतरण कराते हैं । अपने 2 बेटों के साथ ग्राहम स्टेन्स जीप में जिंदा जलकर मर गए । 

इस घटना ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया था । इस केस में 51 लोगों की गिरफ्तारी हुई जिसमे 14 लोग दोषी पाए गए पर सजा 3 को ही हुई । सजा पाए इन्हीं लोगों में से एक था महेंद्र हेम्ब्रम । कोर्ट ने उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी लेकिन 25 साल की कैद के बाद अब उसे कोर्ट ने रिहा कर दिया गया है क्योंकि कैद मे उसका व्यवहार ‘ अच्छा ‘ पाया गया है । 

'द हिंदू' की रिपोर्ट के मुताबिक, महेंद्र हेम्ब्रम की रिहाई के लिए ओडिशा राज्य सजा समीक्षा बोर्ड (Odisha State Sentence Review Board) ने सिफारिश की थी । इसके बाद कोर्ट ने जेल में 'अच्छे व्यवहार’ के आधार पर हेम्ब्रम को रिहा करने का आदेश दिया। 25 साल की उम्र में सजा मिली । 50 साल का हेंब्रम बुधवार को जेल से बाहर आया । स्वागत में उसके समर्थकों ने उसे माला पहनाई और ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाए । 

दारा सिंह जेल में- 

ग्राहम स्टेन्स को बेटों समेत जिंदा जलाने वाले लोगों में हेम्ब्रम के अलावा दारा सिंह भी मुख्य दोषी पाया गया था । उसे कोर्ट ने मौत की सजा सुनाई थी । पर बाद में इसे आजीवन कारावास में बदल दिया था । दारा सिंह अब इस मामले का अकेला दोषी है, जो अभी भी जेल में है । उसकी भी रिहाई के लिए भी लगातार अभियान चलाया जा रहा है और उम्मीद है कि वह भी ‘ अचछे व्यवहार ‘ के आधार पर शीघ्र रिहा हो जाएगा । 

इन लोगों की रिहाई कैंपेन को प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन माझी ने भी तब समर्थन दिया था , जब वो क्योंझर से विधायक होते थे ।

शनिवार, 5 अप्रैल 2025

रग रग में राम

 


रामचरित मानस में तुलसीदासजी कहते हैं-
सीय राम मय सब जग जानी। 
करहुँ प्रणाम जोरि जुग पानी ।। 
सबसे कठिन और सबसे अद्भूत इस एक चौपाई में राम -सीता के जीवन का पूरा सार छिपा है। इस देश के पूरब से पछचिम और उत्तर से ठत दक्छिन तक राम  रचे बसे हैं,तो इसकी वजह राम  का वह जीवन-दर्शन है जो उन्हें आम जन के साथ खड़ा करता है।  वे चाँद पाने माता कौशल्या से हट करते हैं,तो पिता के वनवास की आज्ञा को सिर झुकाकर स्वीकार करते हैं। विश्वामित्र की यज्ञ की रक्छा से लेकर सीता वनवास का निर्मम फैसला हो या शबरी के जूठे बेर खाने का निर्णय , सबमे राम अलग से दिखलाई पड़ते हैं। सीता के अपहरण के बाद वन में भटकने से लेकर राम का सारा निर्णय राजा को राजघरानों और महलों से निकालकर भाषा-बानी ,मिटटी-पानी ,जड़-चेतन में फैलने का  उपक्रम है।  मनुष्य-मात्र का आख्यान वाले इन निर्णयों की वजह से ही राम पुष्प गंध की तरह हवा-पानी में रचे बसे हैं। राजशक्ति पर उठती ऊँगली को आमजन का अधिकार मानने की वजह से ही वे साधारण बन कर रग  रग में समाते चले गए।
यह साधारण सहजता ही राम को जन जन जन से जोड़ती है। वे कैकेई के  पुत्र मोह को सहज मानवीय प्रवृति के रूप में देखते हैं। राम की यही दृष्टि उन्हें वनवासियों से जोड़ती है,केवंट के दिल में उतारती है तो आमजन के सुख-दुःख का हिस्सेदार बनाती है। विश्वामित्र की यज्ञ की रक्छा से लेकर वनवास काल में जो उनसे मिलता है,अपना दुखड़ा सुनाते है,और राम उन सबको उबारते हैं। माता अहिल्या से लेकर सुग्रीव-हनुमान और फिर विभीषण सबमे वे ताकत बनकर समाते हैं।
राम से मिलन तब भी उत्सव था और आज भी उत्सव है। ऐसा उत्सव जिसमे राम न  स्वयं के रह जाते हैं और न ही उनका उत्सव मनाने वाले ही स्वयं के रह पाते हैं। राम का इस तरह मिलना ही राम राज्य की कल्पना को मूर्तरूप देता है। राम राजा है फिर भी वे किसी को अपने दरबार तक नहीं बुलाते , वे स्वयं सब तक जातें हैं। वे केंवट,शबरी , काक ,बंदर भालू सबको मान देते हैं। राम सबके बीच जाकर घुलते-मिलते हैं। यह घुलना-मिलना ही राम को व्यापकता देती है। राम सबको अपने लगते हैं। यंहा तक कि मृत्यु शैया में पड़े रावण से वे राजनीती का पाठ सीखने  लक्छ्मन को सलाह देते हैं। राम ने मानो कहा हो अच्छे गुण सीखने में कभी भी संकोच नहीं करना चाहिए। दुश्मन की शक्ति को रेखांकित व् मान देने वाला यह निर्णय अद्भुत है।
इतिहास के सत्य से बड़ा कोई नहीं   होता। इतिहास आमजन का दर्शन बने। राम की यह कोशिश उनके हर निर्णय में शामिल है। इसलिए उनके हर निर्णय के पीछे साफ दिखता है कि व्यक्ति कितना भी बलवान हो जाये वह सत्य से बड़ा नहीं है। पिता की आज्ञा पर वनगमन का उनका निर्णय सत्ता का जन जन तक पहुंचने का अद्भुत मेल है। यह सहजता राम को जन जन से जोड़ती है। धरती-पुत्रों के नजदीक लाती है। पेड़-पौधों,पशु-पकछियों वनवासियों सबसे जोड़ती है। इस सहजता में सर्वशक्तिमान का कंही आभास नहीं होने देते राम। कठिन परिस्थितियों में भी राम की सहजता उन्हें सबसे अलग तो करती है,लेकिन इस अलगपन में भी वे सबसे घुल-मिल जाते हैं। वे कोई घोषणा नहीं करते। बल्कि वे स्वयं को लोगों की रक्त धमनियों में प्रवाहित करते हैं।
वनवास काल की सहजता में सीता को पाने की अधीरता के बाद भी राम सत्य के साथ  हैं। साधारण जन के प्रश्न पर सीता को वन वन में छोड़ने का आदेश सत्य को न्याय देने का निर्णय है। धरती-पुत्री की पवित्रता पर उठी ऊँगली को न्याय देने का यह निर्मम निर्णय ही सीता-राम को एक करता है।
मनुष्य मात्र की नियति कर्म मात्र है। नियति के  इस खेल से कोई अछूता नहीं है। समय की माप का सृष्टा सूर्य भी कंहा इससे बच पाया है। फिर राम और सीता कर्म से परे कैसे हो सकते थे। उन्हें कितनी परीक्छा देनी पड़ी। पूरे  जीवन में राम अकेले दिखलाई पड़ते हैं।चौदह साल के वनवास और फिर एक साधारण जन के सवाल पर सीता का वनवास। फिर भी राम-सीता कभी अलग नहीं हुए। सीता,राम के पार्श्व में नहीं सदा साथ-संग बगल में खड़ी हैं। सही मायने में राम की पूर्णता सीता की भूमिका के बगैर क्रियान्वित हो ही नहीं सकता। अन्याय का विरोध और उसके नाश का कारण की भूमिका में सीता खड़ी ही है,साधारण जन के आरोप में न्याय की सत्ता स्थापित करने की बड़ी भूमिका भी सीता की रही है।
राम-सीता का जैसे कुछ था ही नहीं,वे तो न्याय की सत्ता स्थापित करने ही अवतरित हुए थे। और इस कार्य में दोनों को सहस्त्रधाराओं में बंटना पड़ा। वे बंटे पर धरती  के प्राण में समाकर एक हो गए। पेड़-पौधों,,मिट्टी पानी में अलग-अलग  समाते हुए एक होते चले गए। वे एक-दूसरे में इतना समा गए कि आज भी भारत की हर स्त्रियां अपने पति में राम का रूप देखती हैं,और हर पति अपनी पत्नी में सीता का स्वरूप देखता है।
राम के निर्मम निर्णय के बाद भी राम-सीता अलग नहीं हुए। वे अलग कभी थे ही नहीं बल्कि अपने में       अडिग सत्य की स्थापना का प्रतिमान बने रहे। सत्य की मर्यादा में दोनों ऐसे घुलते रहे कि वे लोगों के रग रग में समाते चले गए। आदमी को आदमी बनाए रखने वे साधारण जन को मान देते रहे। राम ने राज्य और साधारण जन की अवधारणा ही बदल दी। वे अपनी सत्ता स्थापित करने की बजाय सत्य की सत्ता की स्थापना के कर्म में लगे रहे। यही वजह है कि राम आज भी इस देश के पूरब से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्छिन तक पूजे जाते हैं। वे देश के बोली,भाषा,मिट्टी ,पानी और जड़-पत्ते के शिराओं में आमजन के रग रग में रमे हैं। 

गुरुवार, 27 मार्च 2025

जज कर्णन रिहा हो गये, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना भारी पड़ा था

 जज कर्णन रिहा हो गये, भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना भारी पड़ा था  

सच कड़वा होता है लेकिन यह वह सच है जो दलितों को उसकी हैसियत बताता है, अम्बेडकर के संविधान के रहते 


 पढ़िए. समझिये. कोई दलित जज बनकर भी आवाज़ नहीं उठा सकता है. और अगर हिमाकत की तो सजा तय है, भले ही आप जज क्यों नहीं हों।



यह व्यक्ति जस्टिस कर्णन है जो कोट पहनकर फिल्मी स्टाइल में घूमता है। चिन्नास्वामी स्वामीनाथन कर्णन। वह न्यायालय की अवमानना के लिए छह महीने की जेल की सजा काटकर बाहर आ रहे हैं। 


कर्णन कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं। वह मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। वहां के पहले दलित न्यायाधीश। वह न्यायाधीश रहते हुए जेल की सजा काटने वाले पहले न्यायाधीश भी हैं। अब उनके बारे में बात करने की वजह भी है। 


2017 में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र भेजा था। एक पत्र जिसमें 20 न्यायाधीशों के भ्रष्टाचार की जानकारी थी। यह पत्र एक बड़ा विवाद बन गया। इससे संवैधानिक संकट पैदा हो गया।


 इतिहास में पहली बार किसी मौजूदा न्यायाधीश ने दूसरे न्यायाधीशों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। केंद्र सरकार इस पत्र को जारी करने के लिए तैयार नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमूर्ति कर्णन के खिलाफ न्यायालय की अवमानना का मामला दर्ज किया। 


न्यायमूर्ति कर्णन ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और कुछ अन्य न्यायाधीशों को पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने यह मामला जीत लिया। 


उन्होंने छह महीने की जेल की सजा काटी। उस समय उनका विरोध करने वालों ने कहा था कि वे पागल हैं। लेकिन अब जब एक जज के घर से करोड़ों रुपए का काला धन बरामद हुआ है, तो यह स्पष्ट हो गया है कि कर्णन सही थे।


न्यायपालिका को न्यायालय के अलावा कोई और नहीं सुधार सकता। जस्टिस कर्णन की ओर से यह एक विनम्र प्रयास था। हमारे पास यह उम्मीद करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है कि ऐसे और भी जज होंगे!!

(साभार)