रविवार, 29 मार्च 2020

धोखा देना तुम्हारी फितरत है क्या...!




प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी के तर्ज पर कोरोना से निपटने जब लॉक डाउन की घोषणा की थी तब किसी ने नहीं सोचा था कि इस अचानक फैसले का दुष्परिणाम क्या होगा? किसी ने यह भी नहीं सोचा था कि कितने घरों में चूल्हा नहीं जलेगा और कितने लोगों को डबलरोटी से गुजारा करना पड़ेगा। 15 से 20 करोड़ उन मजदूरों का क्या होगा जो एक राज्य से दूसरे राज्यों में कमाने खाने गये हैं या अपने ही राज्यों के शहर में कमाने आये हैं। पंचर बनाने से लेकर मिी गिरी करने वाले या कचरा में कबाड़ बिनकर जिन्दगी गुजारने वालों का क्या होगा? ऐसे कितने ही सवाल है जिसका जवाब न प्रदेश सरकार के पास है न केन्द्र की मोदी सरकार के पास ही है।
यहां तक की राष्ट्र के नाम संबोधन में ही इस संभावित तकलीफों का ही जिक्र था यही वजह है कि जब लोगों की तकलीफें सामने आने लगी, आवाज बनने लगी तो सरकारों ने मरहम लगाने के लिए चंद रुपये डाल दिये। कुछ दान दाताओं ने भोजन और अनाज विचरित करने की जिम्मेदारी अपने उपर लेने लगे।
दानदाताओं की रोज आती खबरों में हमारे सांसद और विधायक भला क्यों पीछे रहते उन लोगों ने भी इनके खिलाफ उठते आक्रोशित आवाजों को शांत करने भामाशाह या कर्ण बनने के होड़ में लग गये लेकिन कहते हैं चोर चोरी से जाये हेराफेरी से न जाये। बस यही कहावत सांसदों और विधायकों पर लागू होने लगा है कहा जाय तो अतिशंयोक्ति नहीं होगा।
दान देने वाले इन जनप्रतिनिधियों ने मक्कारी की जो सीमा रेखा पार की है वह इतिहास में अनोखे ढंग से दर्ज किया जाना चाहिए। कुछ विधायकों व सांसदों ने जरूर अपनी निजी पूंजी से दान दिया है। लेकिन कई सांसद व विधायकों ने एक माह का वेतन दान दिया है। इस एक माह का वेतन को भी सहायता राशि मानकर दान की श्रेणी में रखा जा सकता है लेकिन कई सांसदों ने इस कठिन दौर में भी अपनी हरकतों से देश को शर्मसार किया है। दानवीर कर्ण और भामाशाह की श्रेणी में अपना नाम दर्ज कराने ऐसा घृणित खेल शायद इस देश के ही जनप्रतिनिधि कर सकते हैं।
ऐसे अनेकों सांसद हैं जिन्होंने कोरोना से निपटने में केन्द्र को मदद देने अपने सांसद निधि का एक-एक करोड़ रुपया दान दिया है। यह वह निधि है जिसका उपयोग सांसद स्वयं के लिए कर ही नहीं सकते लेकिन इसे दान देकर यह बताने की कोशिश हुई मानो ये अपना पैसा दे रहे हैं। जबकि सांसद निधि का उपयोग वैसे भी क्षेत्र के लोगों के लिए ही किया जाता है।
है न ये अपनी तरह का अनोखा दानी।
हैरान की बात तो यह है कि इस खेल में ज्यादातर भाजपा के ही सांसद है जिन्हें राष्ट्रभक्ति का विशेष तमगों से नवाजा जाता है।
अब यह बात कोई नहीं कह सकता कि जमात अंग्रेजों के समय जो हरकत करता रहा है वह अब भी कर रहा है क्योंकि आदतें आसानी से पीछा नहीं छोड़ती। और धोखा देना ही फितरत है।

शनिवार, 28 मार्च 2020

कितने घरों में चूल्हा नहीं जला ! बता पाओगे सरकार ...






उस दिन अचानक लक्ष्मण मेरे पास आया और कहने लगा गांव जाऊंगा, गाड़ी-मोटर बंद है? कैसे करूं।
मैंने पूछा लिया- क्या करेगा वहां जाकर यहीं रह। सरकार कुछ न कुछ व्यवस्था कर देगी।
नहीं महराज! इंहा अड़बड़ तकलीफ हे फेर जीना मरना जेन होही अपन घर दुवार में होवय तो बने हे। ऐसा कहकर लक्ष्मण ने कहा कोई रास्ता है तो बताईये।
मैंने भी इधर उधर फोन लगाया जब जाने का कोई रास्ता नजर नहीं आया तो मैंने भी कह दिया पता करता हूं धैर्य रख। तब तक तेरे खाने पीने का इंतजाम कर दूंगा। वह चला गया।
रात्रि भोजनपरांत मैं टहलने निकला तो संजय शुक्ला जो मेरे बचपन का मित्र था उसके साथ टहलते-टहलते अचानक लॉक डाउन की स्थिति पर चर्चा होने लगी। अभी मैंने सिर्फ इतना ही कहा था कि रोज कमाने खाने वालों के लिए सरकार ने कुछ उपाय किये बिना लॉक डाउन कर दिया।
तो संजय बोल पड़ा हा वो लक्ष्मण है न। वह पूछ रहा था कि तिल्दा के पास उसका गांव है पैदल कितने घंटे में पहुंच जायेगा मैंने भी कह दिया, सुबह से निकलोगे तो शाम तक पहुंच ही जायोगे।
मैं चौका! आखिर लक्ष्मण और उसका परिवार 50-60 किलोमीटर पैदल कैसे जायेगा। बच्चे छोटे हैं। मन खिन्न हो गया। लक्ष्मण को मैं तीन साल पहले पहली बार तब देखा जब वह मीडिया सिटी में मेरे मकान के लिए ठेकेदार ने चौकीदार बना कर रखा था। तब से मकान बनते तक वह सपरिवार पास ही रहा। उसके बेटे को मैंने ही निजी स्कूल में भर्ती करवाकर फीस कम करवाया था। तब से वह भी मुझे ही नहीं मीडिया सिटी के सभी पत्रकारों की ईज्जत करता था। छोटा मोटा निजी काम कर देता था। जो दो रख लेता था।
पैदल जाने की उसकी सोच ने मुझे भीतर तक हिला दिया। सुबह-सुबह उसके पास पहुंचा तो उसके जाने की तैयारी पूरी हो गई थी। स्वाभिमानी भी था वह। इसलिए मदद नहीं ले रहा था। मनाने की सारी कोशिशें विफल होते देख, मैंने फिर कुछ लोगों से गांव छोडऩे की बात की। अंतत: वह इस बात के लिए तैयार हो गया कि बच्चों को मोटर सायकल में मैं छोड़ दूं दोनों पति-पत्नी पैदल चले जायेंगे।
इस वाक्ये को बताने का मेरा मकसद यही है कि देश में 10 करोड़ से अधिक लोग खाने-कमाने एक राज्य से दूसरे राज्यों में जाते हैं और अचानक लॉक डाउन से उनकी तकलीफ को कौन समझे?
विदेशों में गये लोगों के लिए सरकार ने हवाई जहाज की सुविधा फिर घर तक पहुंचाने की सुविधा कर दी लेकिन इन गरीबों तक सुविधा तब पहुंची, जब देर हो चुकी थी। कितने ही परिवार मासूम बच्चों के साथ दर्जनों मिल चल चुके थे। न उनके पैर के छालों की चिंता थी न उनके भूख प्यास की। लॉक डाउन यानी लॉक डाउन।
यह सच इसलिए भी कह रहा हूं कि कुछ राजनैतिक पार्टी के लोगों ने सरकार की भूमिका पर सवाल उठाने पर मेरी आलोचना करते हुए कहा है कि यह वक्त आलोचना का नहीं चुपचाप घर बैठने का है लेकिन कोई इस त्रासदी में घर में तो बैठ सकता है लेकिन चुप कैसे रह सकता है।
सवाल तो उठाने ही होंगे वरना सरकार कब अपने से व्यवस्था करती है। यदि अपने से व्यवस्था की होती तो हजारों लोगों को भूखे प्यासे यूं ही पैदल नहीं चलना पड़ा। जो राजनैतिक पार्टी के लोग अपनी सरकार के पक्ष में खड़े हैं उन्हें मैं खड़ा होने से नहीं रोकूंगा लेकिन क्या वे इस बात के लिए आवाज उठाने तैयार है कि जो इस घातक चीनी वायरस के ईलाज में जूझ रहे डॉक्टर नर्स को जरूरी मास्क, सेनेटाइजर व अन्य जरूरी मेडिकल सामग्री भी सरकार उपलब्ध नहीं करा पा रही है। चौक-चौराहे से गली-मोहल्लों तक ड्यूटी बजा रहे पुलिस व सफाई कर्मी को आवश्यक चीजें उपलब्ध कराने में सरकार क्यों असफल है।
सरकार को जानने का मैं कोई दावा नहीं करता लेकिन इतना तो जानता हूं कि सरकार तभी जागती है जब लोग सवाल उठाते हैं। लक्ष्मण जैसों की बात को आप भूल भी जाईये तो कोई राजनैतिक दल के सदस्य ये बता सकते हैं कि बड़े व्यापारियों ने इस विषम परिस्थिति में खाद्यानों की कीमत क्यां बढ़ा दी और सरकार लगाम क्यों नहीं लगा पा रही है।
चलों कोई दलदल में फंसे लोग ही सरकार से यह जान ले कि तमाम सूचना तंत्र होने के बाद भी किसी सरकार ने यह पता किया की लॉक डाउन के बाद कितने घरों में चूल्हा नहीं जल रहा और कितने ऐसे लोग हैं जो होटल में खाते थे जिन्हें डबलरोटी या मिक्चर से पेट भरना पड़ा।
जब सरकार के पास यही जानकारी नहीं होगी तो सवाल उठेंगे ही। और सवाल उठते रहेंगे।

गुरुवार, 26 मार्च 2020

निजी स्कूलों की मनमानी



नोटिस भेज मामले का पटाक्षेप!
छत्तीसगढ़ की राजधानी में संचालित हो रहे निजी स्कूलों की मनमानी चरम पर है न बच्चों की सुरक्षा की चिंता है न ही शिक्षकों की बेहतर व्यवस्था भी है। स्कूल में बलात्कार जैसी घटनाओं के बाद भी शिक्षा विभाग का रवैया इतना उदासीन है कि वह इस भर्राशाही पर कार्रवाई की बजाय वसूली में व्यस्त है और यदि मामले को लेकर लोग आक्रोशित भी हुए तो नोटिस थमाकर मामले का पटाक्षेप कर दिया जाता है।
ताजा मामला टाटीबंध स्थित भारत माता स्कूल का है जहां एक चार वर्षीय बच्ची बलात्कार की शिकार हो जाती है लेकिन शाला प्रबंधन का रवैया इतना गैर जिम्मेदाराना है कि वह पीडि़त पक्ष से ही दुव्र्यवहार करती है। शाला प्रबंधन के इस रवैये को लेकर यहां बच्चों के पालक आक्रोशित है और ब्लू बर्ड की अध्यक्ष शिवानी सिंह ने तो स्कूल की मान्यता रद्द करने की मांग की है।
ऐसा नहीं है कि शाला प्रबंधकों का इस तरह गैर जिम्मेदाराना व्यवहार का मामला पहला हो इससे पहले भी स्कूल की तरफ से पिकनिक गये बच्चों में से दो बच्चों की मौत सिरपुर में नदी में डूबने से हो गई थी तब भी साथ गये शिक्षकों की लापरवाही सामने आई थी लेकिन इस मामले में न तो शाला प्रबंधकों ने ही कोई कार्रवाई की और न ही शिक्षा विभाग की तरफ से ही कोई कार्रवाई की गई। जिसकी वजह से बच्ची के बलात्कार के बाद पालकों का आक्रोश खुलकर सामने आया है। इस मामले में ब्लू बर्ड के सचिव नियाज अहमद का कहना है कि निजी स्कूलों की मनमानी और लापरवाही से बच्चों की जान पर बन आई है। निजी स्कूलों के संचालकों से शिक्षा विभाग वसूली में व्यस्त है।
ऐसा नहीं है कि निजी स्कूलों की लापरवाही पहली बार सामने आई है इससे पहले रेडियंट स्कूल और राजकुमार कॉलेज में भी बच्चों की जान पर बन आई थी। हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि शिक्षा विभाग के अधिकारियों के द्वारा निजी स्कूलों से जमकर वसूली की जाती है और हर शिखायत पर वसूली धड़ल्ले से चल रही है। वहीं कई निजी स्कूलों के संचालक अपने प्रभाव और पैसों का इस्तेमाल कर बच्चों के जान से खिलवाड़ करने से भी नहीं चूक रहे हैं।

आदमी तोता नहीं है

आदमी तोता नहीं  है
एक  कहानी है। गर्मी में शिकारियों का जंगल  की तरफ बढते कदम से चिंतित एक बुजुर्ग पक्छी अपने साथियो को सावधानी बरतने की सलाह देता है। शिकारी आएगा , दाना डालेगा , जाल फैलाएगा,दाना नहीं चुगना,जाल में फंस जावोगे।  जंगल के दूसरे पक्छियो ने यह ज्ञान सीख ली।  तोतो ने भी इसे रट लिया ,परन्तु ज्ञान रटने से नहीं आता , ज्ञान का जिव्हा से नहीं मष्तिस्क से सम्बन्ध है बुध्दि से सम्बन्ध है। सिर्फ जिव्हा से काम नहीं चलता , आत्मसात करना पड़ता है।  दूसरे पकछियों ने बुजुर्ग की सलाह को  आत्मसात किया।  तोतो ने     शब्दों को जिव्हा में ही लटका रखा , वे शब्दों को न नीचे दिल तक उतार पाए और न ही ऊपर मष्तिस्क तक ही ले जा पाए। वे दिन-रात रटते रहे, शिकारी आएगा , दाना डालेगा , जाल फैलाएगा,दाना नहीं चुगना,जाल में फंस जावोगे। परन्तु दिल और दिमाग के बीच शब्द का कोई महत्व नहीं रह जाता,काला  अक्छर भैंस बराबर ,,,,,,, .
          अब वे दिन गुजरे जमाने की बात है। शिकारियों ने शिकार का तरीका ही नहीं  बदला  है बल्कि  शिकार तक  बदल चुके है।  उत्तर आधुनिकता ने मनुष्य और जानवर में फर्क का अवकाश समाप्त कर दिया है।  तोता अब भी सिर्फ रटकर रह जाता है।  आदमी अपनी भाषा की बजाय अंग्रेजी बोलने में गर्व महसूस करने लगा है। आज भी  कई लोग है जो सोचना भी नहीं चाहते कि जुबान के अलावा भी कुछ है जो मनुष्य को आगे बढ़ाती है , वह समझना ही नहीं चाहता कि उसके जबान के ऊपर मष्तिस्क और निचे भरोसा है। ऊपर पहाड़ है,निचे जल श्रोत है। ऊपर राजधानी है,नीचे शहर है गांव है। ऊपर राजा है नीचे प्रजा है।
ऊपर और निचे के बिच भी कुछ है और इस खाई में जुबान महत्वपूर्ण है वह पूल का काम करती है , और इस पूल पर पहरा बैठा दिया जाये तो उसकी स्थिति उस रटन्त तोते  की तरह ही होगी जो शिकारियों के आने से लेकर फसने तक को झटके में बोल लेता है,परन्तु शिकार होने से नहीं बच पाता।  सत्ता यही करती है।  ज़माने से यही करते आई है।  उसने दिल और दिमाग के बिच के सेतु पर पहरा बिठा रखा है।  प्रजा को उतना ही बोलना है जितना सिखाया गया है। उससे ज्यादा नहीं बोलना है। क्योंकि वह जनता है,मष्तिष्क और हृदय के बीच जुबान पर पहरा नहीं लगाया गया तो सब कुछ संतुलित हो जायेगा , फिर उसकी सत्ता कैसे बनी रहेगी। सोवियत संघ की तरह बिखर जायेगा,लातूर या केदार नाथ की तरह तबाह हो जायेगा। इस तबाही को रोकना है।  कुछ ऐसा करना है कि आदमी तोता हो जाये। सत्ता की अनचाही भाषा न बोल पाए।
वाणी व्यक्ति को पहचान के स्तर पर खोलती है।  उसका एक एक शब्द समाज में दूर दूर तक असर करता है।  जिस तरह से आग जलती है तो लौ ऊपर की तरफ उठती है,उसी तरह वाणी भी दूर दूर तक लोगो के मष्तिस्क तक पहुंचती है।  कुछ हृदय में भी जा पहुंचती है।  तोते की तरह सिर्फ जिव्हा में नहीं अटकती। यह बात सत्ता में बैठे लोग जानते है , इसलिए अभिव्यक्ति पर पहरा लगाने के नए नए तरीके ईजाद किये जाते हैं। ऐसे शब्दों पर पानी डाल दिया जाता है जो आग की लौ की तरह सुलगते है उप्र उठते है।
एक तरफ आधुनिकता के चलते पूरा विश्व एक गावं की तरह हो गया है,श्री श्री रविशंकर जैसे आध्यात्मिक गुरु जय हिन्द के साथ पाकिस्तान जिंदाबाद के उद्घोष करते हैं तो दूसरी तरफ बस्तर है जंहा अभिव्यक्ति पर पहरे है,सत्ता की अनचाही भाषा राष्ट्रदोह बन जाता है। सत्ता की अनचाही भाषा को आतंक की भाषा करार दिया जाता है। यह सत्ता की विकृति है,लोकतंत्र पर गहरे काले धब्बे है। हमारी विचारधारा ही सही है , यह हठधर्मिता का उदाहरण जेएनयू दिल्ली के साथ पुरे देश ने देखा है।  हठधर्मिता कही न कही संकीर्णता को छूती है।  पहरा कंही भी बिठाओ , अभिव्यक्ति पर या जीवन पर , इससे स्वतंत्रता और विकास के मूल्य तो प्रभावित होंगे ही।  मूल्यों को लेकर कल तक चिंता जताने वाले आज स्वयं पहरेदार होने लगे है। हर बात में बुराई देखने वाले अब अच्छाई की वकालत करने लगे हैं वे भूल जाते है कि पहरेदारी आदमी को तोता बना देता है।
परन्तु आदमी तोता नहीं। है।  लोकतंत्र में हमारी आस्था है।  आस्था तुलसी के बिरवे में भी है,और गंगा  जल के साथ भी है। आस्था में तर्क नहीं चलता।  सिर्फ भारत माता की जय नहीं कहने या लाल सलाम कह देने भर से लोकतंत्र और देश के प्रति आस्था को नहीं तौला जा सकता।  आस्थाएं  है जो मनुष्य को उसके हक और उसूल के साथ खड़ा होने की ताकत दे।  प्रगति वह जो विवेकशील हो।  कागज पर लिखे शब्द केवल आड़ी तिरछी रेखाएं भर नहीं होती , कलम उन रेखाओं में जान डालती है। मनुष्य के हृदय और मष्तिस्क में हलचल उतपन्न करती है।  इसलिए वह हृदय के पास खीसे में रहती है,वाणी और ह्रदय के बीच कलम होती है।  आदमी चुप भी रहे तब भी कलम दिखती है,बोलती है। अभिव्यक्ति के खतरे सामने है। कोई भी एक चीज ज्यादा होगी तो दूसरे का पलड़ा हल्का हो जायेगा।  दोलन की स्थिति बनेगी।  इस स्थिति को कोई बदलना नहीं चाहता सब अपना पलड़ा भारी रखना चाहता है।
इसलिए धर्म में नैतिकता,मर्यादा की सीख है। संस्कार को लेकर पूरी किताबें है।  राम-कृष्ण से लेकर जीसस-पैगम्बर तक मर्यादा में रचे-बसे है। धर्म और संस्कृति को लेकर हाय तौबा मचने,मार -काट  करने वाले यह भूल जाते है कि जब आदमी ही नहीं बचेगा तब धर्म का औचित्य क्या रह जायेगा।  धर्म व्ही है जो धारण करने योग्य है।  और शासक वह है जो सबकी सुने।
इतिहास की दुहाई देने वाले इतिहास से सबक लेने को तैयार नहीं है।  राम को मानने वाले राम की सुनने तैयार नहीं है। जबकि राम ने पवित्रता पर उठी तर्जनी को न्याय देने सीता को वनवास की आज्ञा देने से भी नहीं हिचके ।  उन्होंने न्याय स्थापना के लिए आमजन की सुनी। जबकि तब बड़ी आसानी से वे उस तर्जनी को मरोड सकते थे परन्तु उनके मानने  वाले तर्जनी दिखाने वालो के गर्दन और जुबान तक नापने तैयार है।
विरोधियो को कुचलने की कोशिश  का हश्र हमने ७० के दशक के मध्य में देखा है।  इतिहास से भी हम सबक लेने को तैयार नहीं है।  जब धर्म और इतिहास से भी सबक नहीं लिया जाये तब क्या किया जा सकता है।  तब बस्तर ही क्यों कही भी अभिव्यक्ति का गला घोटने वाले खड़े हो जायेंगे जब पांच साल के लिए कुर्सी संभालने वाले तर्जनी तोड़ने आमदा हो तो साठ साल तक कुर्सी में बैठने वालो से क्या उम्मीद बेमानी हो जाती है क्योंकि इन पर लगाम कसने की जिम्मेदारी ही पांच साल वालो की है।  जनप्रतिनिधियों को याद रखना चाहिए कि पांच साल में परीक्छा उन्हें ही देनी है।  तब वह तर्जनी मतदान केंद्र में  अपना काम करेगी। लोकतंत्र कायम रहेगा,यह विश्वास अपनी जड़े जमा चुका है।

बुधवार, 25 मार्च 2020

संगठन पर सत्ता भारी अध्यक्ष मरकाम की लाचारी...


बघेल समर्थकों का दबदबा, पुरानों की छुट्टी

छत्तीसगढ़ कांग्रेस कमेटी की घोषणा के बाद यह स्पष्ट रुप से सामने आया है कि संगठन पर सत्ता हावी है और नये चेहरों के नाम पर जिस तरह से युवाओं को तवज्जों दी गई है  उसके बाद यह भी स्पष्ट हो गया है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम संगठन को कैसे चलाने वाले हैं। हालांकि सत्ताधारी दलों में संगठनों का रोल क्या होता है यह किसी से छिपा नहीं है।
छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस की बहुप्रतीक्षित सूची जारी  की गई तब किसी ने नहीं सोचा था कि उन चेहरों को नजरअंदाज कर दिया जायेगा जो अब तक संगठन में पहचाने जाते थे। या जिनकी पहचान कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के रुप में होते रही है। नई टीम में जिस तरह से गिरिश देवांगन को उपाध्यक्ष बनाया गया है वह भी कम हैरानी वाला नहीं है। प्रभारी महामंत्री के तौर पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के सबसे करीबी माने जाने वाले गिरिश देवांगन को संगठन के हिसाब से प्रमोशन देना कहा जा सकता है लेकिन राजनैतिक रुप से इसका अलग ही अर्थ लगाया जा रहा है। हालांकि देवांगन समर्थक यह भी कहते हैं कि चूंकि उन्हें लालबत्ती दिया जाना है इसलिए भी प्रभारी महामंत्री के पद से हटाया गया है। मोहन मरकाम ने इस मामले में अपनी पसंद के रवि घोष को प्रभारी मंत्री बनाने में जरूर सफलता पाई है लेकिन पूरी कमेटी में मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और स्वास्थ्य मंत्री टीएस बाबा का दबदबा अब भी कायम है। कन्हैया अग्रवाल, पंकज शर्मा जैसे युवा चेहरों को महामंत्री का पद देकर कांग्रेस किस तरह से राजनीति करना चाहती है यह भी आने वाले दिनों में देखना होगा। हालांकि कई चर्चित नाम सूची से गायब होने की वजह उन्हें निगम-मंडल में नियुक्ति देने की चर्चा भी है लेकिन यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम को ध्यान में रखकर ही दमदार व चर्चित माने जाने वाले चेहरों को संगठन से दूर रखा गया है ताकि मोहन मरकाम का ेकिसी तरह की दिक्कतों का सामना न करना पड़े। और वे पूरी टीम के साथ तालमेल बिठा सके। हालांकि गुरुमुख सिंह होरा, कमला मनहर, गिरिश देवांगन, अटल श्रीवास्तव जैसे आधा दर्जन ऐसे नाम भी संगठन में है जो प्रदेश अध्यक्ष पर भारी पड़ सकते हैं। 
भूपेश मंत्रिमंडल के सदस्यों में किसकी कहां चली यह कहना मुश्किल है लेकिन जिस तरह से नगरीय निकाय मंत्री डॉ. शिव डहरिया ने अपनी पत्नी को कार्यसमिति में जगह दिलाई है वह भी चर्चा का विषय है। हालांकि इन दिनों मिसेस डहरिया आरंग क्षेत्र में बेहद सक्रिय है और प्राय: हर कार्यक्रमों में उनकी बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी को देखा जा सकता है। इसी तरह महापौर नहीं बनाने के बाद भी सभापति बनने वाले प्रमोद दुबे ने भी अपने विरोधियों को करार जवाब देते हुए यह साबित कर दिया है कि वे अब भी भूपेश बघेल के करीबी है यही वजह है कि उनके खास समर्थक गिरिश दुबे को एक बार फिर शहर अध्यक्ष बना दिया गया है।
बहरहाल जिला अध्यक्षों में भी महिलाओं को महत्व दिया गया है और पूरी सूची में जिस तरह से सत्ता का प्रभाव दिख रहा है वह आने वाले दिनों में मरकाम के लिए क्या असर करेगा यह वक्त ही बतायेगा।

मंगलवार, 24 मार्च 2020

जिनसे लोकतंत्र को खतरा बयाया उन्हीं से जा मिले गोगोई


दो हजार अठ्ठारह की जनवरी में जब जस्टिज रंजन गोगोई ने प्रेस कांफ्रेस लेकर जिस सत्ता को लोकतंत्र के लिए खतरा बताया था और आज जबप वे सेवानिवृत्ति के बाद उन्हीं सत्ता के साथ खड़ा हो जाते हैं तो इस परिस्थिति को कोई कैसे देखेगा? सवाल यह नहीं है कि इस देश में ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है सवाल यह भी नहीं है कि इससे पहले जब कांग्रेस की सत्ता भी यही करते रही है। सवाल है कि कांग्रेस ने यदि कोई गलत किया तो क्या वर्तमान सत्ता को भी गलत करना चाहिए।
देश के राष्ट्रपति ने जैसे ही पूर्व जस्टिज रंजन गोगोई का नाम राज्यसभा के लिए प्रेषित किया वैसे ही पूरे देश में यह बहस छिड़ गई कि क्या यह सही फैसला है। बहस इस बास की भी होने लगी कि क्या जिसे लोकतंत्र के लिए उन्होंने खतरा बताने के लिए प्रेस कांफ्रेंस तक ले डाली थी वह सत्ता आज उन्हें अनुकूल कैसे हो गई। इस बहस में यह सवाल भी उठकर सामने आयें है कि तब उनके फैसले न्याय के अनुरूप थे या सत्ता के अनुरूप थे। राफेल से लेकर उनके कितने ही फैसले को लेकर सवाल गहराने लगे हैं तब संवैधानिक संस्थानों की साख कहां रह जायेगी।
रंजन गोगाई को लेकर उठ रहे इन सवालों का जवाब रंगनाथ मिश्रा से लेकर हिदायतुल्ला तक दिया जा रहा है लेकिन इस फैसले ने लोकतंत्र की चिंता तो बढ़ा रही है।

मॉल की छत में चल रहे हुक्का बार में छापा



सौरभ धाड़ीवाल और भूपेन्द्र माखीजा चला रहे थे
विशेष प्रतिनिधि
रायपुर। प्रदेश सरकार के द्वारा हुक्का बार प्रतिबंधित करने के बाद भी कलर्स मॉल में हुक्का पार्लर चलाने वाले सौरभ धाड़ीवाल और भूपेन्द्र माखीजा को गिरफ्तार तो किया लेकिन नशीली सामग्री मिलने के बाद भी जानबूझकर केस को कमजोर किया गया। क्या धाड़ीवाल और माखीजा के खिलाफ कमजोर केस दबाव में बनाया गया।
छत्तीसगढ़ सरकार ने हुक्का पार्लरों में चल रहे नशे के व्यापार को देखते हुए इसे प्रतिबंधित तो किया है लेकिन अभी भी शहर के कई जगहों पर चोरी छिपे हुक्का पार्लरों का न केवल संचालन किया जा रहा है बल्कि इन पार्लरों में तम्बाकू सहित अन्य नशीले पदार्थों का भी धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है।
ताजा मामला कर्लर मॉल के छत पर चल रहे टॉय हुक्का पार्लर का है। इस छापे ने शहर में चल रहे चोरी छिपे हुक्का पार्लरों की न केवल कलई खोल दी बल्कि छापे के बाद पुलिस पर दबाव का जो खेल चला वह भी साबित करता है कि किस तरह से पहुंच वाले लोग कानून को ठेंगा दिखकर हुक्का पार्लरों का संचालन कर रहे हैं। आखिर सौरभ धाड़ीवाल और भूपेन्द्र माखीजा कौन है यह तो शीघ्र ही खुलासा हो जायेगा लेकिन पुलिस ने यहां कुल छ: लोगों को गिरफ्तार किया है।