गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

नरफत का मुंडन

नफरत का मुंडन
आदमी को आदमी बनाये रखना सबसे कठिन काम है। सत्ता की चाहत ने राजनेताओं को इस तरह स्वार्थी बना दिया है कि वह सहज जन की आस्था ही नहीं उसकी भीतरी ताकत व सुरक्षा को हिलाकर रख दिया है। उसकी अपनी आदमी होने की पहचान धर्म-जाति में सिमटने लगी है।
बचपन में एक कहानी पढ़ी थी। दो सेव के पेड़ आपस में बात कर रहे थे। एक सेव दूसरे सेव से कहता है। देख रहे हो धर्म जाति और रंग को लेकर आदमी इस कदर लड़ रहा है कि देखना एक दिन सब कुछ समाप्त हो जायेगा और हम सेव ही सेव बच जायेंगे। उसकी बात पर सहमति जताते हुए दूसरे सेव ने पूछा था कौन सा सेव? हरा या लाल? यानी यह लड़ाई कभी समाप्त नहीं होने वाली है? लेकिन क्या यह लड़ाई समाप्त नहीं होनी चाहिए?
यह सवाल आज मैं इसलिए उठा रहा हूं कि मुझे लगता है कि आदमी होने का अर्थ ही ज्ञान है, उसकी सोच उसका दिमाग है जो उसे अच्छे-बुरे की पहचान करने की ताकत देता है। इस देश में पूर्वजों की यही सोच ने हमें विश्व में गुरु होने की संज्ञा दी। अलग पहचान दी। पूरी दुनिया में भारत जैसा कोई देश नहीं है तो इसकी वजह हमारे आदमियत के नजदीक होने की कोशिश है। जितने श्रीराम यहां के मिट्टी पानी में बसे है उतने ही श्रीकृष्ण, माता स्वरुप शक्ति या हनुमान बसे हैं, ब्रम्हा-विष्णु-महेश भी हवा में समाये हुए हैं। कभी किसी ने एक दूसरे के मानने वालों पर लाठी-बंदूक नहीं तानी।
गौतम-महावी-गांधी के इस देश में न केवल सबको आश्रय मिला और वे भी आपस में गंगा जमुना की तरह मिल गये। राजशाही के दौर में भी दंगों की बात नहीं सुनी गई। पहला दंगा विश्व में कहां हुआ। यह कौन बपता सकता है? पर यह दावा है कि पहला दंगा कम से कम भारत में नहीं हुआ है। क्योंकि यहां वे लोग रहते हैं जो आदमीयत के ज्यादा नजदीक है। आदमी होने का अर्थ बचपन से ही संस्कार की छुट्टी में शामिल है। घर-परिवार-रिश्तेदारी, गांव-समाज का बंधन इस कदर दिलो-दिमाग में समाया है कि भरा-फरा परिवार में स्वर्ग का सुख देखा जाती है।
इस देश में जहां संस्कृति की रक्षा के लिए श्रीराम और धर्म की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण का जन्म होता है वहां आदमियत में जहर घोलने की कोशिश कभी सफल नहीं हो सकती। लेकिन क्षणिक सत्ता सुख की खातिर राजनेताओं का विष वमन विचलित करने वाला है। 
छत्तीसगढ़ में एक कहावत है हंडिया (हंडी) के मुंह में परई (ढक्कन) रख सकते है लेकिन आदमी के मुंह में क्या रखें? यानी आदमी का मुंह कब जहर उगल दे? जिस देश में आदमियत जिन्दा रखने रिश्तेदारी की अहमियत बचपने से समझाई जाती है। धर्म कथाओं व त्यौहारों का उत्सव मनाया जाता है, कर्म के अनुसार फल की दुहाई दी जाती हो। रावण के क्रोध, कंस के अत्याचार और शिशुपाल की बदजुबानी को क्या सिर्फ सत्ता सुख के लिए नजरअंदाज कर दिया जाए।
यह सच है कि कलयुग के पर्दापण के साथ ही बुराईयों का पहाड़ जगह-जगह खड़ा होगा लेकिन क्या हम बुराईयों को समाप्त करने कलि अवतार की प्रतिक्षा में आदमियत में घुलते जहर का घुंट खामोशी से पीते रहे? कर्म के अनुसार फल तो तय है? यह सोचकर कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने वाले समाज में नफरत के बीज बोने वालों के प्रति आखिर कब तक खामोशी की चादर ओढ़ कर बैठा जा सकता है?
अमेरिका में सिर्फ काला या गोरा होने पर हत्या कर दी जाती है? क्या हम वैसा ही विकास चाहते आज तो लोग हिन्दू-मुस्लिम सिख-इसाई को आपस में उलझाकर अपना सुख ढूंढ रहे है कल यदि कोई शिव भक्त, कृष्ण भक्त और राम भक्त को आपस में उलझाने लगे तब अजान से नींद खराब होने की बात कहने वाले सिर्फ इसलिए शिव मंदिर या राम मंदिर में चल रहे भजन कीर्तन को बंद कराने की कोशिश नहीं करेंगे कि वह तो ईश्वर खुदा या गाड को नहीं मानता! यह आज्बर की वजह से उसे आने जाने में तकलीफ होती है। उसकी आवाज उसे विचलित करती है। हिरण्यकश्यप ने आखिर प्रहलाद को सिर्फ विष्णु भक्त होने की सजा देना चाहता था। यह बात सभी को समझनी होगी और अजान पर टिप्पणी करने वाले सोनू निगम की तरह जितनी जल्दी नरफत का मुंडन कर दे उतना ही आदमी का आदमी बने रहने की कोशिश में प्रभावी कदम होगा।

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

पत्रकारिता पर हावी होती वैचारिकता...

पत्रकारिता पर हावी होती वैचारिकता...
एक जमाना था, पत्रकारों का जबरदस्त रुतबा था। पारे-मोहल्ले में ही नहीं शहरभर में पत्रकारों की धाक होती थी। शासन-प्रशासन का रुह कांपता था। तब पत्रकारिता का मतलब देश समाज की सेवा करना, शासन-प्रशासन की खामियों को उजागर करना। मूलभूत सुविधाएं आम लोगों को कैसे मिले, जनप्रतिनिधियों की बेरुखी पर खबरें प्रकाशित होती थी। तब भी ऐसे पत्रकारों की कमी नहीं थी जो कांग्रेस-भाजपा या वामदलों से प्रभावित होते थे परन्तु खबरों पर यह कभी नहीं लगा कि वे खबरों में अपने विचारों को थोप रहे हैं। वैचारिक खबरों के लिए अलग से पेज होते थे।
परन्तु अब जमाना बदल गया है। पत्रकारिता में ऐसे लोग हावी होने लगे हैं जो अपने विचार हर हाल में खबरों के रुप में प्रकाशित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। राजनैतिक दलों के ये पट्टाधारी पत्रकार न केवल खबरों को तोडऩे मरोडऩे लगे हैं बल्कि इस बात का भी ध्यान रखते हैं कि खबरों से उनके राजनैतिक दलों या राजनैतिक आकाओं को कोई नुकसान नहीं पहुंचे। ऐसे लोगों को अपने आकाओं से बंधई बंधाई रकम भी मिलते हैं।
छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में आये इस परिवर्तन से पत्रकारों की विश्वसनियता पर सवाल तो उठा ही है। खबरों से भरोसा भी टूटा है। कलम पर हावी होती वैचारिक पत्रकारिता की एक बड़ी वजह अखबारों का व्यवसायिकरण के अलावा सरकारी विज्ञापन भी है। छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का अपना मुकाम रहा है। स्व. माधवराव सप्रे से लेकर स्व. मधुखेर की बात करें या स्व. बबनप्रसाद मिश्र, रमेश नैयर, आसिफ इकबाल से लेकर वर्तमान में पत्रकारिता के मूल्यो के प्रति चिंतित पत्रकारों की कमी नहीं रही। इनमें से कई पत्रकार संघ या कांग्रेस के विचारों से प्रभावित भी रहे परन्तु उन्होंने अपने विचारों को खबरों पर नहीं लादा। किसी खबर में नहीं लगा कि इसमें जरा भी पूर्वाग्रह है। खबरों को लेकर समान दृष्टिकोण की वजह से वे आम लोगों में सम्मान कायम रख सके। 
परन्तु 90 के दशक के बाद जिस तरह से व्यवसायिकता हावी होने लगी  उसका दुष्परिणाम धीरे-धीरे सामने आने लगा। खबरों पर व्यववसायिकता तो हावी होने ही लगी। राजनैतिक दलों ने भी अपने हिंतों के लिए पत्रकारों पर डोरा डालने का उपक्रम शुरु किया। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद तो अखबारों पर सरकारी विज्ञापनों का असर साफ दिखने लगा। सत्ताधारी की खबर देखने वाले पत्रकारों की रहन सहन की स्थिति में बदलाव साफ महसूस किया जाने लगा। सरकार को लेकर खबरें कैसी और कौन सी जानी चाहिए इस पर तो नजर रखी ही जानी लगी। किसे कौन सा बीट दिया जाए ताकि अखबारों को भरपूर विज्ञापन मिले। इसका भी ध्यान रखा जाने लगा। राजनैतिक दलों का पट्टाधारी पत्रकारों में अचानक वृद्धि होने लगी। ये न केवल अपने दलों के हित में विज्ञप्तियां बनाने लगे। बल्कि विरोधियों के हर कदमों से अपने राजनैतिक आकाओं को आगाह करने लगे। एक दल के नेता का प्रेस कांफ्रेंस की खबर विरोधी दल के नेता के पास कांफ्रेंस समाप्त होने के पहले ही पहुंचने लगा। इसके एवज में नगद गिफ्ट सब चलने लगा है।
जब पहले वाले दिन रहे तो यह दिन भी नहीं रहने वाला है। परन्तु वर्तमान में जिस तरह से पट्टाधारियों का वजन बढ़ा है। वह हैरान कर देने वाला है। क्षीण होती वैचारिक पत्रकारिता के इस दौर में अब भी ऐसे पत्रकार हैं जो पत्रकारिता के मूल्यों को लेकर न केवल चिंतित है बल्कि मूल्यों की रक्षा में लगे है। परन्तु व्यवसायिकता के इस दौर में पट्टाधारियों की बढ़ती आमद चिंतनीय तो है कि इसके परिणाम भी भयावह हो सकते है।

मंगलवार, 31 मार्च 2020

जीना है तो कैद हो जाइये...


राशन दुकान में टूट पड़ी भीड़ रामनगर 

आउटर में फँसे ट्रक वालों को भोजन वितरित करते हुए समाजसेवी अशोक गोलछा और  उनके साथी 

जब सरकार के स्तर पर गलतियों का अंबार हो तो आम लोगों के घरों में रहने का कितना फायदा मिलेगा। घरों में रहने के बाद भी वे कितने सुरक्षित है कहना कठिन है?
हम यहां मोदी सरकार की गलतियां नहीं गिनाने बैठे हैं बल्कि लोगों को सचेत कर रहे हैं कि वे सरकार की तरफ से हुई इतनी गलतियों के बाद भी गलती न करे। घर में स्वयं को कैद कर लें। जरूरत हो तभी घर से निकले और सामान खरीदने के बाद घर वापसी त चेहरों को हाथ न लगाये। सामानों को अच्छी तरह धोकर ही उपयोग करे। एक बार बाहर निकलने के बाद वापसी में कोशिश करें की हाथ को साफ करके ही घर में घुसे। क्योंकि जिस स्तर पर गलतियां हुई है हमारी छोटी सी लापरवाही हमें मौत के मुंह में ढकेल सकती है। 
हालाँकि यह वक़्त सरकार की ग़लतियाँ गिनाने का नहीं है लेकिन यक़ीन मानिए की इस देश के लोगों को लाठी का डर न होगा तो वे घर में ही न रहे लेकिन सरकार ने भी कब उनके लिए सोचा यही वजह है कि वे कुछ पा जाने के लालच में सड़कों पर हैं क्योंकि अब उनको रोज़गार कब मिलेगा इसका ठिकाना भी तो नहीं है ,हर तरफ़ जब अंधेरा नज़र आए सरकार से कोई उम्मीद न हो तो लोग क्या करे ,सच तो यह है कि ग्रामीण भारत ही असली भारत है लेकिन लाँकडाउन में इसकी ही अनदेखी की गई । सरकार ने तो कह दिया किसी का वेतन न काटे लेकिन क्या शिकायत आने पर वह वेतन नहीं देने वाले के ख़िलाफ़ कार्रवाई करेगी सच मानिए वह वेतन भी नहीं दिला पाएगी ।इस देश में मध्यम वर्ग भी है उनके लिए क्या किया गया , कुछ नहीं उनका भी रोज़गार गया पैसों की उन्हें भी दिक़्क़त है
पहले ही जनसंख्या विस्फोटक के कगार पर खड़े इस देश में कोरोना को लेकर सरकार की रीति नीति अक्षम्य है लेकिन जो गलतियां हुई है उससे आम लोगों को सबक लेकर कार्य करना है स्वयं को और देश को सुरक्षित रखने का इससे बेहतर कोई उपाय नहीं है।
चीनी और अमेरिकी वायरस से वैसे भी समूचा विश्व परेशान रहा है। वे कब क्या कर दे इनका कोई भरोसा नहीं है। ऐसे में इस देश के लोगों के साथ किस हद तक राजनीति हुई है यह बताने की जरूरत नहीं है। इन दिनों जब पूरे विश्व में कोरोना की त्रासदी से आम लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है तब यह जान ले कि ऐसी कौन-कौन सी गलतियां है जिसकी वजह से स्वयं को पूरी तरह कैद में रखने की जरूरत है।
30 जनवरी को इस देश में पहला केस सामने आता है लेकिन इसके 50 दिन बाद ही लॉक डाऊन किया जाता है। इसके पीछे अमेरिकी वायरस के स्वागत या मध्यप्रदेश में सरकार बनाने की छिपी मंशा के बजाय इसकी गंभीरता को सरकार के स्तर पर कम आंकना ही कहा जा सकता है।
पूरी दुनिया में जब कोरोना को लेकर चिंता जताई जा रही थी और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी घोषित कर दिया था तब सरकार ने विदेश से आने वालों की जांच में गंभीरता नहीं दिखलाई। लोग बीमारी लेकर अपने-अपने शहरों तक बेधड़क लौट गये। लॉक डाउन से पहले सरकार ने यह नहीं सोचा कि 15 से 20 करोड़ वे लोग जो रोजी-रोटी के चक्कर में शहरों में है उनकी वापस कैसे होगी। या उन्हें वापसी से कैसे रोका जायेगा। यही वजह है कि दिल्ली से लेकर हर राज्यों की सरहदों में भीड़ बढ़ गई और परेशान लोग सैकड़ों किलोमीटर पैदल ही निकल पड़े।
सरकार की सबसे बड़ी गलती तो यह भी है कि शुरु में इसकी गंभीरता नहीं समझने की वजह से अचानक लॉक डाउन की गलती करनी पड़ी। प्रधानमंत्री के संबोधन में दैनिक उपयोग को लेकर कोई बात नहीं करन से अफरा-तफरी का माहौल हो गया। कालाबाजारियों को मौका मिल गया।
सवाल यह नहीं है कि सरकार ने गरीबों के लिए एक लाख सत्तर हजार करोड़ का पैकेज दिया है सवाल यह है कि यह हर जरूरतमंद तक कैसे पहुंचेगा। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि तीस जनवरी को पहला केस आने के बाद लाक डाउन के 50 दिन तक जो लोग विदेशों से आकर  छुप गये उनमें से जिन्हें बीमारी थी वह कहां-कहां है यह भी किसी को पता नहीं है। ऐसे में स्वयं को कैद रखें। 
आश्चर्य की बात तो यह भी है कि अभी भी आयोजन हो रहे हैं। मस्जिदों व अन्य स्थानों से विदेशी पकड़ा रहे हैं और कुछ लोग अभी भी हिन्दू-मुस्लिम या राज्य सरकारों को बदनाम करने में लगे है लेकिन सच यही है कि गलतियां उपर से हुई है और स्वयं को कैद में रखने के अलावा कोई उपाय नहीें है।यक़ीन मानिए यदि तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने हल्ला न मचाया होता तो दिल्ली की दोनो ही सरकारें अभी भी सोते रहती इसलिए प्लीज़ स्वयं को क़ैद कर लें।

सोमवार, 30 मार्च 2020

एक बहस पत्रकारिता पर...

एक बहस पत्रकारिता पर...
अब इस पत्रकारिता का क्या करोगे? जिसे देखो वही गरियाने लगा है। लोगों की उम्मीद बढ़ी है। इस उम्मीद में खरा उतरना मुश्किल होता जा रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे पहले भी कम नहीं थे परन्तु सरकार का पहले इतना दबाव नहीं होता था। तब अखबार का मतलब एक मिशन होता थआ। परन्तु समय बदला। सरकार और कार्पोरेट सेक्टर ने विज्ञापन का ऐसा दबाव बनाया कि इसके झांसे में सभी आ गये। सिर्फ यही नहीं तय होने लगा कि खबरे कौन सी छपनी है बल्कि यह भी तय होने लगा कि खबरें कैसे बनाई जाए। खबरों का इस्तेमाल शार्प शूटर की तरह होने लगा।
बड़े कार्पोरेट सेक्टर के लिए मीडिया मुनाफा कमाने का व्यवसाय बन गया और इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने के बाद जिस तरह की क्रांति आई उससे पत्रकारिता के मूल उद्देश्य ही बिखर कर रह गया। जो दिखता है वह बिकता है का खेल शुरु हुआ और यह उस स्तर तक जा पहुंचा जहां अवसाद के अलाला कुछ नहीं बचा। अपने नंगे पन पर गर्व करते मीडिया पर लोगों का कितना गुस्सा है यह कहीं भी महसूस किया जा सकता है।
कौन पत्रकार नाम कमाना नहीं चाहता और कौन मेहनत करना नहीं चाहता। सारे पत्रकार सहज भाव से अव्यवस्था के खिलाफ कलम चलाना चाहते हैं। हर अव्यवस्था पर शब्दों के प्रहार से वह सिर्फ हंगामा ही नहीं खड़ा करना चाहता बल्कि अव्यवस्था को मिटा देना चाहता है। परन्तु सबको मनचाही स्थिइत नहीं मिलती। कुछ पत्रकार जरुर क्यारी में लगे गुलाब की तरह अपनी सुंगध बिखरने में सफल हो जाते हैं परन्तु यह सब इतना आसान नहीं होता। कोई आंख तरेर खड़ा होता है। कोई नोटों की गड्डियां लिये खड़ा होता है और अब तो सरकारी पदों में बैठे लोगों में भी संयम नहीं रहा। सीधे जेल भिजवाने की धमकी तो किसी के मुंह से सीधी सुनी जा सकती है और फिर अखबार खोलने वाले भी तो दुकानदार हो गये हैं। लाखों करोड़ों की मशीन लगाकर कोई सरकार से पंगा क्यों ले? अखबार की आड़ में माफियागिरी भी करनी है। चिटफंड कंपनी चलानी है, जमीन लेनी है कोल ब्लॉक से लेकर सरकारी ठेका भी तो लेना दिलाना है।
पत्रकारिता के प्रति आम लोगों का गुस्सा यूं ही नहीं बढ़ा है। इसके पीछे दुकानदारी की वह सोच है जो सरकार के भ्रष्ट तंत्र के साथ खुद वैतरणी पार लगाकर सात पुश्तों की की व्यवस्था कर लेना चाहता है। वह दिन लद गये जब पत्रकार मरियल सा पायजामा कुर्ता या खद्दर पहने समाज सेवा के लिए जाना जाता था। मोहल्ले से लेकर शहर में उसकी इज्जत होती थी। हर पीडि़त पक्ष बेधड़क अपनी व्यथा कह देता था। अच्छे-अच्छे पुलिस के अधिकारी भी पत्रकारों के सामने आने से कतराते थे। परन्तु जमाना बदल गया है। तेजी से बदला है अब कलम की विवशता आंखों में साफ पढ़ी जा सकती है यह अलग  बात है कि अब इन पानीदार आंखों को देखने की फुर्सत किसी के पास नहीं है वह तो बस पत्रकारिता में आये इस बीमारी को ही देखकर अपनी भड़ास निकालने में सुकून महसूस करता है।
पत्रकारिता का एक और मिजाज है। वह कभी कभी उत्साही हो जाता है और जिसकी परिणिति बस्तर जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों की स्थिति से साफ समझा जा सकता है जहां सरकारी पदों पर बैठे लोगों के पास जनविरोधी कानून जैसे हथियार के अलावा कुचलने या जेल में भेजने के सारे सामान होते हैं। राजधानी तक उनकी आवाज कैसे पहुंचे। यह भी प्रश्न खड़ा है। प्रश्न तो राजधानी के पत्रकारों और पत्रकारिता पर भी उठने लगे है परन्तु वे सौभाग्यशाली होते है कि उनके पास बंधी बंधाई तनख्वाह है।
परन्तु अभिव्यक्ति की आजादी पर मंडरा रहे खतरों के बाद भी सरकारी तंत्र और माफियाओं के गठजोड़ से मचे लूट के बाद भी क्यारियों के गुलाब की तरह पत्रकारिता का सुंगध कायम है पीडि़तों के लिए न्याय का दरवाजा खोलता है और अव्यवस्था के खिलाफ हंगामा खड़ा करता है। भले ही क्या करोगे ऐसा पत्रकारिता के शब्द ताकतवर दिखाई पड़ रहे हो परन्तु वह ताकतवर कतई नहीं है। पत्रकारिता आज भी खामोश नहीं है उसके कलम में धार कायम है स्याही जरुर फीकी हो गई है परन्तु अभी इतनी फीकी नहीं हुई है कि इसे पढ़ा न जाए। स्याही गाढ़ी जरुर होगी। समय लगेगा।

रविवार, 29 मार्च 2020

धोखा देना तुम्हारी फितरत है क्या...!




प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नोटबंदी के तर्ज पर कोरोना से निपटने जब लॉक डाउन की घोषणा की थी तब किसी ने नहीं सोचा था कि इस अचानक फैसले का दुष्परिणाम क्या होगा? किसी ने यह भी नहीं सोचा था कि कितने घरों में चूल्हा नहीं जलेगा और कितने लोगों को डबलरोटी से गुजारा करना पड़ेगा। 15 से 20 करोड़ उन मजदूरों का क्या होगा जो एक राज्य से दूसरे राज्यों में कमाने खाने गये हैं या अपने ही राज्यों के शहर में कमाने आये हैं। पंचर बनाने से लेकर मिी गिरी करने वाले या कचरा में कबाड़ बिनकर जिन्दगी गुजारने वालों का क्या होगा? ऐसे कितने ही सवाल है जिसका जवाब न प्रदेश सरकार के पास है न केन्द्र की मोदी सरकार के पास ही है।
यहां तक की राष्ट्र के नाम संबोधन में ही इस संभावित तकलीफों का ही जिक्र था यही वजह है कि जब लोगों की तकलीफें सामने आने लगी, आवाज बनने लगी तो सरकारों ने मरहम लगाने के लिए चंद रुपये डाल दिये। कुछ दान दाताओं ने भोजन और अनाज विचरित करने की जिम्मेदारी अपने उपर लेने लगे।
दानदाताओं की रोज आती खबरों में हमारे सांसद और विधायक भला क्यों पीछे रहते उन लोगों ने भी इनके खिलाफ उठते आक्रोशित आवाजों को शांत करने भामाशाह या कर्ण बनने के होड़ में लग गये लेकिन कहते हैं चोर चोरी से जाये हेराफेरी से न जाये। बस यही कहावत सांसदों और विधायकों पर लागू होने लगा है कहा जाय तो अतिशंयोक्ति नहीं होगा।
दान देने वाले इन जनप्रतिनिधियों ने मक्कारी की जो सीमा रेखा पार की है वह इतिहास में अनोखे ढंग से दर्ज किया जाना चाहिए। कुछ विधायकों व सांसदों ने जरूर अपनी निजी पूंजी से दान दिया है। लेकिन कई सांसद व विधायकों ने एक माह का वेतन दान दिया है। इस एक माह का वेतन को भी सहायता राशि मानकर दान की श्रेणी में रखा जा सकता है लेकिन कई सांसदों ने इस कठिन दौर में भी अपनी हरकतों से देश को शर्मसार किया है। दानवीर कर्ण और भामाशाह की श्रेणी में अपना नाम दर्ज कराने ऐसा घृणित खेल शायद इस देश के ही जनप्रतिनिधि कर सकते हैं।
ऐसे अनेकों सांसद हैं जिन्होंने कोरोना से निपटने में केन्द्र को मदद देने अपने सांसद निधि का एक-एक करोड़ रुपया दान दिया है। यह वह निधि है जिसका उपयोग सांसद स्वयं के लिए कर ही नहीं सकते लेकिन इसे दान देकर यह बताने की कोशिश हुई मानो ये अपना पैसा दे रहे हैं। जबकि सांसद निधि का उपयोग वैसे भी क्षेत्र के लोगों के लिए ही किया जाता है।
है न ये अपनी तरह का अनोखा दानी।
हैरान की बात तो यह है कि इस खेल में ज्यादातर भाजपा के ही सांसद है जिन्हें राष्ट्रभक्ति का विशेष तमगों से नवाजा जाता है।
अब यह बात कोई नहीं कह सकता कि जमात अंग्रेजों के समय जो हरकत करता रहा है वह अब भी कर रहा है क्योंकि आदतें आसानी से पीछा नहीं छोड़ती। और धोखा देना ही फितरत है।

शनिवार, 28 मार्च 2020

कितने घरों में चूल्हा नहीं जला ! बता पाओगे सरकार ...






उस दिन अचानक लक्ष्मण मेरे पास आया और कहने लगा गांव जाऊंगा, गाड़ी-मोटर बंद है? कैसे करूं।
मैंने पूछा लिया- क्या करेगा वहां जाकर यहीं रह। सरकार कुछ न कुछ व्यवस्था कर देगी।
नहीं महराज! इंहा अड़बड़ तकलीफ हे फेर जीना मरना जेन होही अपन घर दुवार में होवय तो बने हे। ऐसा कहकर लक्ष्मण ने कहा कोई रास्ता है तो बताईये।
मैंने भी इधर उधर फोन लगाया जब जाने का कोई रास्ता नजर नहीं आया तो मैंने भी कह दिया पता करता हूं धैर्य रख। तब तक तेरे खाने पीने का इंतजाम कर दूंगा। वह चला गया।
रात्रि भोजनपरांत मैं टहलने निकला तो संजय शुक्ला जो मेरे बचपन का मित्र था उसके साथ टहलते-टहलते अचानक लॉक डाउन की स्थिति पर चर्चा होने लगी। अभी मैंने सिर्फ इतना ही कहा था कि रोज कमाने खाने वालों के लिए सरकार ने कुछ उपाय किये बिना लॉक डाउन कर दिया।
तो संजय बोल पड़ा हा वो लक्ष्मण है न। वह पूछ रहा था कि तिल्दा के पास उसका गांव है पैदल कितने घंटे में पहुंच जायेगा मैंने भी कह दिया, सुबह से निकलोगे तो शाम तक पहुंच ही जायोगे।
मैं चौका! आखिर लक्ष्मण और उसका परिवार 50-60 किलोमीटर पैदल कैसे जायेगा। बच्चे छोटे हैं। मन खिन्न हो गया। लक्ष्मण को मैं तीन साल पहले पहली बार तब देखा जब वह मीडिया सिटी में मेरे मकान के लिए ठेकेदार ने चौकीदार बना कर रखा था। तब से मकान बनते तक वह सपरिवार पास ही रहा। उसके बेटे को मैंने ही निजी स्कूल में भर्ती करवाकर फीस कम करवाया था। तब से वह भी मुझे ही नहीं मीडिया सिटी के सभी पत्रकारों की ईज्जत करता था। छोटा मोटा निजी काम कर देता था। जो दो रख लेता था।
पैदल जाने की उसकी सोच ने मुझे भीतर तक हिला दिया। सुबह-सुबह उसके पास पहुंचा तो उसके जाने की तैयारी पूरी हो गई थी। स्वाभिमानी भी था वह। इसलिए मदद नहीं ले रहा था। मनाने की सारी कोशिशें विफल होते देख, मैंने फिर कुछ लोगों से गांव छोडऩे की बात की। अंतत: वह इस बात के लिए तैयार हो गया कि बच्चों को मोटर सायकल में मैं छोड़ दूं दोनों पति-पत्नी पैदल चले जायेंगे।
इस वाक्ये को बताने का मेरा मकसद यही है कि देश में 10 करोड़ से अधिक लोग खाने-कमाने एक राज्य से दूसरे राज्यों में जाते हैं और अचानक लॉक डाउन से उनकी तकलीफ को कौन समझे?
विदेशों में गये लोगों के लिए सरकार ने हवाई जहाज की सुविधा फिर घर तक पहुंचाने की सुविधा कर दी लेकिन इन गरीबों तक सुविधा तब पहुंची, जब देर हो चुकी थी। कितने ही परिवार मासूम बच्चों के साथ दर्जनों मिल चल चुके थे। न उनके पैर के छालों की चिंता थी न उनके भूख प्यास की। लॉक डाउन यानी लॉक डाउन।
यह सच इसलिए भी कह रहा हूं कि कुछ राजनैतिक पार्टी के लोगों ने सरकार की भूमिका पर सवाल उठाने पर मेरी आलोचना करते हुए कहा है कि यह वक्त आलोचना का नहीं चुपचाप घर बैठने का है लेकिन कोई इस त्रासदी में घर में तो बैठ सकता है लेकिन चुप कैसे रह सकता है।
सवाल तो उठाने ही होंगे वरना सरकार कब अपने से व्यवस्था करती है। यदि अपने से व्यवस्था की होती तो हजारों लोगों को भूखे प्यासे यूं ही पैदल नहीं चलना पड़ा। जो राजनैतिक पार्टी के लोग अपनी सरकार के पक्ष में खड़े हैं उन्हें मैं खड़ा होने से नहीं रोकूंगा लेकिन क्या वे इस बात के लिए आवाज उठाने तैयार है कि जो इस घातक चीनी वायरस के ईलाज में जूझ रहे डॉक्टर नर्स को जरूरी मास्क, सेनेटाइजर व अन्य जरूरी मेडिकल सामग्री भी सरकार उपलब्ध नहीं करा पा रही है। चौक-चौराहे से गली-मोहल्लों तक ड्यूटी बजा रहे पुलिस व सफाई कर्मी को आवश्यक चीजें उपलब्ध कराने में सरकार क्यों असफल है।
सरकार को जानने का मैं कोई दावा नहीं करता लेकिन इतना तो जानता हूं कि सरकार तभी जागती है जब लोग सवाल उठाते हैं। लक्ष्मण जैसों की बात को आप भूल भी जाईये तो कोई राजनैतिक दल के सदस्य ये बता सकते हैं कि बड़े व्यापारियों ने इस विषम परिस्थिति में खाद्यानों की कीमत क्यां बढ़ा दी और सरकार लगाम क्यों नहीं लगा पा रही है।
चलों कोई दलदल में फंसे लोग ही सरकार से यह जान ले कि तमाम सूचना तंत्र होने के बाद भी किसी सरकार ने यह पता किया की लॉक डाउन के बाद कितने घरों में चूल्हा नहीं जल रहा और कितने ऐसे लोग हैं जो होटल में खाते थे जिन्हें डबलरोटी या मिक्चर से पेट भरना पड़ा।
जब सरकार के पास यही जानकारी नहीं होगी तो सवाल उठेंगे ही। और सवाल उठते रहेंगे।

गुरुवार, 26 मार्च 2020

निजी स्कूलों की मनमानी



नोटिस भेज मामले का पटाक्षेप!
छत्तीसगढ़ की राजधानी में संचालित हो रहे निजी स्कूलों की मनमानी चरम पर है न बच्चों की सुरक्षा की चिंता है न ही शिक्षकों की बेहतर व्यवस्था भी है। स्कूल में बलात्कार जैसी घटनाओं के बाद भी शिक्षा विभाग का रवैया इतना उदासीन है कि वह इस भर्राशाही पर कार्रवाई की बजाय वसूली में व्यस्त है और यदि मामले को लेकर लोग आक्रोशित भी हुए तो नोटिस थमाकर मामले का पटाक्षेप कर दिया जाता है।
ताजा मामला टाटीबंध स्थित भारत माता स्कूल का है जहां एक चार वर्षीय बच्ची बलात्कार की शिकार हो जाती है लेकिन शाला प्रबंधन का रवैया इतना गैर जिम्मेदाराना है कि वह पीडि़त पक्ष से ही दुव्र्यवहार करती है। शाला प्रबंधन के इस रवैये को लेकर यहां बच्चों के पालक आक्रोशित है और ब्लू बर्ड की अध्यक्ष शिवानी सिंह ने तो स्कूल की मान्यता रद्द करने की मांग की है।
ऐसा नहीं है कि शाला प्रबंधकों का इस तरह गैर जिम्मेदाराना व्यवहार का मामला पहला हो इससे पहले भी स्कूल की तरफ से पिकनिक गये बच्चों में से दो बच्चों की मौत सिरपुर में नदी में डूबने से हो गई थी तब भी साथ गये शिक्षकों की लापरवाही सामने आई थी लेकिन इस मामले में न तो शाला प्रबंधकों ने ही कोई कार्रवाई की और न ही शिक्षा विभाग की तरफ से ही कोई कार्रवाई की गई। जिसकी वजह से बच्ची के बलात्कार के बाद पालकों का आक्रोश खुलकर सामने आया है। इस मामले में ब्लू बर्ड के सचिव नियाज अहमद का कहना है कि निजी स्कूलों की मनमानी और लापरवाही से बच्चों की जान पर बन आई है। निजी स्कूलों के संचालकों से शिक्षा विभाग वसूली में व्यस्त है।
ऐसा नहीं है कि निजी स्कूलों की लापरवाही पहली बार सामने आई है इससे पहले रेडियंट स्कूल और राजकुमार कॉलेज में भी बच्चों की जान पर बन आई थी। हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि शिक्षा विभाग के अधिकारियों के द्वारा निजी स्कूलों से जमकर वसूली की जाती है और हर शिखायत पर वसूली धड़ल्ले से चल रही है। वहीं कई निजी स्कूलों के संचालक अपने प्रभाव और पैसों का इस्तेमाल कर बच्चों के जान से खिलवाड़ करने से भी नहीं चूक रहे हैं।