शनिवार, 4 अप्रैल 2020

जनआवाज की सुविधानुसार परिभाषा...


मीडिया की विश्वसनियता पर जब सवाल उठने लगे हैं तब यह सवाल मौजूदा वक्त में बेहद जरूरी हो जाता है कि आखिर यह सब हो क्या रहा है? मीडिया की भूमिका में कहा चूक हो रही है। क्या उसने सचमुच जन सरोकार की तरफ से आंख मूंद लिया है? या फिर वह अपनी सुविधानुसार खबरें छापने लगा है? सवाल यह भी है कि क्या सरकार की पसंद नापसंद पर मीडिया की भूमिका सिमटता चला जा रहा है? तब फिर जन सरोकार की पैरवी कौन करें।
सवाल यह नहीं है कि मीडिया की विश्वसनियता क्यों समाप्त हो रही है बल्कि सवाल यह है कि मीडिया अपनी भूमिका निभाने में कहां चूक कर रही है। अपना प्रचार बढ़ाने या टीआरपी बढ़ाने की अंधी दौड़ में वह कहां चली जायेगी। मीडिया की भूमिका विवाद बढ़ाने की है या विवाद को समाप्त करने की है।
मौजूदा दौर में जब सब कुछ बदल रहा है तो मीडिया की भूमिका के बदलाव पर चर्चा जरुरी हो गया है। राजनीति के रंग से दूर जन सरोकार में मीडिया क्योंं पीछे होते चली जा रही है। क्या राजनेताओं की बयानबाजी और भ्रष्टाचार ही मीडिया का एकमात्र हथियार हो गया है या शिक्षा स्वास्थ्य बेरोजगारी बिजली-पानी भी पत्रकारिता का ह्स्सिा है?
राज्य बनने के पहले छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता को जिन उंचाईयों पर देखा जन सरोकार के मुद्दों ने जिस तरह से सरकार की चूलें हिला दी थी। क्या वैसी खबरें राज्य बनने के बाद देखने को मिल रही है। इसका जवाब में ही मीडिया की विश्वासनियता का पैमाना जुड़ा हुआ है।
राज्य बनने के बाद पत्रकारिता ने नई करवट ली। चूंकि छत्तीसगढ़ की राजधानी में मीडिया की बाढ़ आ गई तो पत्रकारिता भी यहीं से चलने लगी। राजधानी में नेताओं अफसरों और माफियाओं के गठजोड़ ने सबसे पहले तो मीडिया को घेरना शुरु किया और विज्ञापन के दबाव तले पत्रकारिता को दबाने की कोशिश होने लगी। नेताओं की बयानबाजी और भ्रष्टाचार की खबरों ने अखबारों या चैनलों की जह को घेरना शुरु किया तब स्कूल में टीचरों या अस्पतालों में दवाओं का अभाव पर खबरें कम होती चली गई। रिपोर्टिंग जैसी चीज तो लुप्त प्राय: होने लगी और यह किसी से नहीं देखा कि कांक्रीट में तब्दिल होते शहर में प्रदूषण का स्तर कहां जा रहा है।
पत्रकारिता के रवैये में आई इस तब्दिली के इस दौर में एक खास बात और हुई कि मीडिया सत्ता केन्द्र के आगे मंडराने लगी और यह सब इतना खुला होने लगा कि आम जन भी इसे आसानी से देखने लगे और यहीं से उनकी विश्वसनियता पर सवाल उठने लगे और जब सवाल उठेंगे तो निशाना भी वहीं होंगे इसलिए जैसे ही सोशल मीडिया का दौर आया सबसे पहले निशाने पर मीडिया ही आया।
मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रहार करने की कोशिश में वे लोग भी जुड़ गए जो माफियागिरी चला रहे थे। भ्रष्टाचार में लिप्त थे और अनैतिक कार्य कर रहे थे। यह सब साजिशन भी हुआ क्योंकि उनके खिलाफ मीडिया में खबरें आने पर जनआक्रोश बढ़ सकता था तो जनआक्रोश को दबाने के लिए ही मीडिया की विश्वसनियता पर सवाल उठाये गए।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

पैदा होते ही चर्चा में आ गए दोनों बच्चे



रायपुर के मेडिकल कालेज अस्पताल में लगभग एक सप्ताह पहले प्रीति वर्मा ने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया था | डॉ. भीमराव आम्बेडकर मेमोरियल अस्पताल के डाक्टरों ने ऑपरेशन कर दोनों बच्चों का जन्म कराया। अस्पताल की जनसंपर्क अधिकारी शुभ्रा सिंह ने बताया कि महिला को लॉक डाउन की स्थिति में जब लेबर पैन की शिकायत हुई तो उसे यहां लेकर आया गया था ।

महिला प्रीति ने बताया कि जब पेट में दर्द उठा कोई वाहन नहीं मिल रहा था। ऐसे में उसके पति ने यहां उसे मोटरसाइकिल में ही बैठाकर उसे अस्पताल पहुंचाया था। यह आधी रात की बात थी। रास्ते में कई जगह उन्हें पुलिसवालों ने रोककर पूछताछ की थी। डिस्चार्ज होने के बाद घर में जब नामकरण संस्कार हुआ तो घर के बुजुर्गों ने बेटे का नाम कोविड एवं बेटी का नाम कोरोना रखने पर सहमति जताई ।
इस बारे में श्रीमती वर्मा ने कहा कि अभी सभी के दिलो दिमाग में कोरोना छाया है।ऐसे में लोगो में कोरोना का भय दूर करने के लिए बेटे का नाम कोविड एवं बेटी का नाम कोरोना रखने का निर्णय लिया। बच्चों के पिता विनय वर्मा ने बताया कि कोरोना संक्रमण को लेकर लोगों में काफी ज्यादा चिंता देखने को मिल रही है, ऐसे में वह इनका ट्रेंडिंग नामकरण करके लोगों का कुछ तनाव कम करने की कोशिश की है। उधर इन बच्चों की चर्चा लोगों की जुबान पर है |

सच को भ्रमित करता ट्रोल आर्मी

कोई माने या न माने, लेकिन यह सत्य है कि पत्रकारिता इन दिनों बेहद नाजुक दौर में है, आलोचना सहन नहीं करने की बढ़ती प्रवृत्ति का सर्वाधिक शिकार पत्रकार ही हुए है। स्वयं की सत्ता स्थापित करने और पैसों की भूख ने पत्रकारिता को ऐसे अंधेरे कमरे में कैद कर लिया है जहां से रोशनी की किरणें भी बेहद बारिक हो चली है। जहां से निकलना मुश्किल नजर आ रहा है।
हमने इसी जगह पर ट्रोल आर्मी के तेवर और इससे होने वाले खतरे को लेकर विस्तार दिया था लेकिन इस दौर में पत्रकारिता के लिए गंभीर चुनौती खड़ा हुआ है। झूठ की चादर इतनी उजली दिखाई देने लगा है कि सच को लेकर भ्रम होने लगा है।
प्रो सरकारी तंत्र से जिस तरह से मीडिया के सच को ट्रोल करना शुरु किया उससे भ्रम तो फैला ही मीडिया की विश्वसनियता को भी कटघरे में खड़ा करने का काम किया और यह सब इतने सलीके से किया गया कि वह आदमी भी मीडिया को गरियाने लगा जिसे अपने रोजी रोटी के अलावा किसी से मतलब नहीं है। मीडिया न हुआ गरीब की लुगाई हो गई जिसके साथ आप जब चाहे कुछ कर लो।
ऐसा नहीं है कि यह सब हाल के वर्षों में हुआ लेकिन चंद सालों में इसे धारदार तरीके से इस्तेमाल किया जाने लगा। दरअसल बगैर संवैधानिक अधिकार के मीडिया ने जिस तरह से राजनेताओं, अधिकारियों और अपराधियों के गठजोड़ पर प्रहार करना शुरु किया तब से ही इन तीनों के गठजोड़ ने अपनी ईज्जत बचाने मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रहार शुरु किया।
नेताओं, अफसरों और माफियाओं के गठजोड़़ ने जिस तरह से देश में लूट खसोट की परिपाटी शुरु की उस पर मीडिया ने ही बाधा डाली कहा जाए तो गलत नहीं होगा। मीडिया के बढ़ते प्रभाव से लुट खसोट में बाधाओं को बर्दाश्त करना इन गठजोड़ के लिए कठिन काम था इसलिए साजिशन मीडिया की विश्वसनियता पर न केवल सवाल उठाये गये बल्कि पत्रकारों की हत्या तक की जाने लगी है। 
अपनी छवि चमकाये रखने मीडिया की छवि को बिगाडऩे के लिए जिस तरह का षडय़ंत्र किया गया वह शोध का विषय है। ऐसे गठजोड़ ने सत्ता के दम पर सबसे पहले ऐसे मीडिया घराने को अपने जाल में फंसाया जो पैसों के दिवाने थे। उन्हें भय और प्रलोभन से ऐसी खबरों के लिए मजबूर किया गयाजो उनके हितों की रक्षा तो करे ही उनकी छवि को भी चमकाने का काम करे। इसके बाद आपराधिक कमाई से मिले धन से स्वयं का मीडिया हाउस खड़ा करने की कोशिश में ऐसे पत्रकारों को अपने जाल में फंसाया जिसके नाम का इस्तेमाल शार्पशूटर की तरह कर ले।
इन सबके बाद भी जब मीडिया को जब वे प्रभावित नहीं कर पाये तब फेंक न्यूज और ट्रोल आर्मी का इस्तेमाल करना शुरु कर दिया। हालात को इस तरह से वे संचालित करने लगे कि आम आदमी की जरुरतों को नजरअंदाज किया जा सके और आम आदमी अपनी जरुरतों की बजाय उन मुद्दों में भटक जाए जिससे उनका ध्यान सरकार की तरफ से हट जाए और वे जाति, धर्म और देशभक्ति में उलझ कर रह जाए।
जन सरोकार के मुद्दे उठाने वालों को इतना ट्रोल किया जाए कि उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर दिया जाए। उसे धर्म विरोधी, देश विरोधी साबित कर दिया जाए। राजनीति, अपराधियों और अफसरों के इन गठजोड़़ की वजह से पत्रकारिता के इस नाजुक दौर में जिस तरह से खबरों की विश्वसनीयता संकट में है वह देश के हित में कतई नहीं है। मीडिया हाउस तो पहले ही बंटे थे और अब पत्रकार भी बंटे नजर आने लगे है।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

नरफत का मुंडन

नफरत का मुंडन
आदमी को आदमी बनाये रखना सबसे कठिन काम है। सत्ता की चाहत ने राजनेताओं को इस तरह स्वार्थी बना दिया है कि वह सहज जन की आस्था ही नहीं उसकी भीतरी ताकत व सुरक्षा को हिलाकर रख दिया है। उसकी अपनी आदमी होने की पहचान धर्म-जाति में सिमटने लगी है।
बचपन में एक कहानी पढ़ी थी। दो सेव के पेड़ आपस में बात कर रहे थे। एक सेव दूसरे सेव से कहता है। देख रहे हो धर्म जाति और रंग को लेकर आदमी इस कदर लड़ रहा है कि देखना एक दिन सब कुछ समाप्त हो जायेगा और हम सेव ही सेव बच जायेंगे। उसकी बात पर सहमति जताते हुए दूसरे सेव ने पूछा था कौन सा सेव? हरा या लाल? यानी यह लड़ाई कभी समाप्त नहीं होने वाली है? लेकिन क्या यह लड़ाई समाप्त नहीं होनी चाहिए?
यह सवाल आज मैं इसलिए उठा रहा हूं कि मुझे लगता है कि आदमी होने का अर्थ ही ज्ञान है, उसकी सोच उसका दिमाग है जो उसे अच्छे-बुरे की पहचान करने की ताकत देता है। इस देश में पूर्वजों की यही सोच ने हमें विश्व में गुरु होने की संज्ञा दी। अलग पहचान दी। पूरी दुनिया में भारत जैसा कोई देश नहीं है तो इसकी वजह हमारे आदमियत के नजदीक होने की कोशिश है। जितने श्रीराम यहां के मिट्टी पानी में बसे है उतने ही श्रीकृष्ण, माता स्वरुप शक्ति या हनुमान बसे हैं, ब्रम्हा-विष्णु-महेश भी हवा में समाये हुए हैं। कभी किसी ने एक दूसरे के मानने वालों पर लाठी-बंदूक नहीं तानी।
गौतम-महावी-गांधी के इस देश में न केवल सबको आश्रय मिला और वे भी आपस में गंगा जमुना की तरह मिल गये। राजशाही के दौर में भी दंगों की बात नहीं सुनी गई। पहला दंगा विश्व में कहां हुआ। यह कौन बपता सकता है? पर यह दावा है कि पहला दंगा कम से कम भारत में नहीं हुआ है। क्योंकि यहां वे लोग रहते हैं जो आदमीयत के ज्यादा नजदीक है। आदमी होने का अर्थ बचपन से ही संस्कार की छुट्टी में शामिल है। घर-परिवार-रिश्तेदारी, गांव-समाज का बंधन इस कदर दिलो-दिमाग में समाया है कि भरा-फरा परिवार में स्वर्ग का सुख देखा जाती है।
इस देश में जहां संस्कृति की रक्षा के लिए श्रीराम और धर्म की रक्षा के लिए श्रीकृष्ण का जन्म होता है वहां आदमियत में जहर घोलने की कोशिश कभी सफल नहीं हो सकती। लेकिन क्षणिक सत्ता सुख की खातिर राजनेताओं का विष वमन विचलित करने वाला है। 
छत्तीसगढ़ में एक कहावत है हंडिया (हंडी) के मुंह में परई (ढक्कन) रख सकते है लेकिन आदमी के मुंह में क्या रखें? यानी आदमी का मुंह कब जहर उगल दे? जिस देश में आदमियत जिन्दा रखने रिश्तेदारी की अहमियत बचपने से समझाई जाती है। धर्म कथाओं व त्यौहारों का उत्सव मनाया जाता है, कर्म के अनुसार फल की दुहाई दी जाती हो। रावण के क्रोध, कंस के अत्याचार और शिशुपाल की बदजुबानी को क्या सिर्फ सत्ता सुख के लिए नजरअंदाज कर दिया जाए।
यह सच है कि कलयुग के पर्दापण के साथ ही बुराईयों का पहाड़ जगह-जगह खड़ा होगा लेकिन क्या हम बुराईयों को समाप्त करने कलि अवतार की प्रतिक्षा में आदमियत में घुलते जहर का घुंट खामोशी से पीते रहे? कर्म के अनुसार फल तो तय है? यह सोचकर कानून व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने वाले समाज में नफरत के बीज बोने वालों के प्रति आखिर कब तक खामोशी की चादर ओढ़ कर बैठा जा सकता है?
अमेरिका में सिर्फ काला या गोरा होने पर हत्या कर दी जाती है? क्या हम वैसा ही विकास चाहते आज तो लोग हिन्दू-मुस्लिम सिख-इसाई को आपस में उलझाकर अपना सुख ढूंढ रहे है कल यदि कोई शिव भक्त, कृष्ण भक्त और राम भक्त को आपस में उलझाने लगे तब अजान से नींद खराब होने की बात कहने वाले सिर्फ इसलिए शिव मंदिर या राम मंदिर में चल रहे भजन कीर्तन को बंद कराने की कोशिश नहीं करेंगे कि वह तो ईश्वर खुदा या गाड को नहीं मानता! यह आज्बर की वजह से उसे आने जाने में तकलीफ होती है। उसकी आवाज उसे विचलित करती है। हिरण्यकश्यप ने आखिर प्रहलाद को सिर्फ विष्णु भक्त होने की सजा देना चाहता था। यह बात सभी को समझनी होगी और अजान पर टिप्पणी करने वाले सोनू निगम की तरह जितनी जल्दी नरफत का मुंडन कर दे उतना ही आदमी का आदमी बने रहने की कोशिश में प्रभावी कदम होगा।

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

पत्रकारिता पर हावी होती वैचारिकता...

पत्रकारिता पर हावी होती वैचारिकता...
एक जमाना था, पत्रकारों का जबरदस्त रुतबा था। पारे-मोहल्ले में ही नहीं शहरभर में पत्रकारों की धाक होती थी। शासन-प्रशासन का रुह कांपता था। तब पत्रकारिता का मतलब देश समाज की सेवा करना, शासन-प्रशासन की खामियों को उजागर करना। मूलभूत सुविधाएं आम लोगों को कैसे मिले, जनप्रतिनिधियों की बेरुखी पर खबरें प्रकाशित होती थी। तब भी ऐसे पत्रकारों की कमी नहीं थी जो कांग्रेस-भाजपा या वामदलों से प्रभावित होते थे परन्तु खबरों पर यह कभी नहीं लगा कि वे खबरों में अपने विचारों को थोप रहे हैं। वैचारिक खबरों के लिए अलग से पेज होते थे।
परन्तु अब जमाना बदल गया है। पत्रकारिता में ऐसे लोग हावी होने लगे हैं जो अपने विचार हर हाल में खबरों के रुप में प्रकाशित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते। राजनैतिक दलों के ये पट्टाधारी पत्रकार न केवल खबरों को तोडऩे मरोडऩे लगे हैं बल्कि इस बात का भी ध्यान रखते हैं कि खबरों से उनके राजनैतिक दलों या राजनैतिक आकाओं को कोई नुकसान नहीं पहुंचे। ऐसे लोगों को अपने आकाओं से बंधई बंधाई रकम भी मिलते हैं।
छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में आये इस परिवर्तन से पत्रकारों की विश्वसनियता पर सवाल तो उठा ही है। खबरों से भरोसा भी टूटा है। कलम पर हावी होती वैचारिक पत्रकारिता की एक बड़ी वजह अखबारों का व्यवसायिकरण के अलावा सरकारी विज्ञापन भी है। छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का अपना मुकाम रहा है। स्व. माधवराव सप्रे से लेकर स्व. मधुखेर की बात करें या स्व. बबनप्रसाद मिश्र, रमेश नैयर, आसिफ इकबाल से लेकर वर्तमान में पत्रकारिता के मूल्यो के प्रति चिंतित पत्रकारों की कमी नहीं रही। इनमें से कई पत्रकार संघ या कांग्रेस के विचारों से प्रभावित भी रहे परन्तु उन्होंने अपने विचारों को खबरों पर नहीं लादा। किसी खबर में नहीं लगा कि इसमें जरा भी पूर्वाग्रह है। खबरों को लेकर समान दृष्टिकोण की वजह से वे आम लोगों में सम्मान कायम रख सके। 
परन्तु 90 के दशक के बाद जिस तरह से व्यवसायिकता हावी होने लगी  उसका दुष्परिणाम धीरे-धीरे सामने आने लगा। खबरों पर व्यववसायिकता तो हावी होने ही लगी। राजनैतिक दलों ने भी अपने हिंतों के लिए पत्रकारों पर डोरा डालने का उपक्रम शुरु किया। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद तो अखबारों पर सरकारी विज्ञापनों का असर साफ दिखने लगा। सत्ताधारी की खबर देखने वाले पत्रकारों की रहन सहन की स्थिति में बदलाव साफ महसूस किया जाने लगा। सरकार को लेकर खबरें कैसी और कौन सी जानी चाहिए इस पर तो नजर रखी ही जानी लगी। किसे कौन सा बीट दिया जाए ताकि अखबारों को भरपूर विज्ञापन मिले। इसका भी ध्यान रखा जाने लगा। राजनैतिक दलों का पट्टाधारी पत्रकारों में अचानक वृद्धि होने लगी। ये न केवल अपने दलों के हित में विज्ञप्तियां बनाने लगे। बल्कि विरोधियों के हर कदमों से अपने राजनैतिक आकाओं को आगाह करने लगे। एक दल के नेता का प्रेस कांफ्रेंस की खबर विरोधी दल के नेता के पास कांफ्रेंस समाप्त होने के पहले ही पहुंचने लगा। इसके एवज में नगद गिफ्ट सब चलने लगा है।
जब पहले वाले दिन रहे तो यह दिन भी नहीं रहने वाला है। परन्तु वर्तमान में जिस तरह से पट्टाधारियों का वजन बढ़ा है। वह हैरान कर देने वाला है। क्षीण होती वैचारिक पत्रकारिता के इस दौर में अब भी ऐसे पत्रकार हैं जो पत्रकारिता के मूल्यों को लेकर न केवल चिंतित है बल्कि मूल्यों की रक्षा में लगे है। परन्तु व्यवसायिकता के इस दौर में पट्टाधारियों की बढ़ती आमद चिंतनीय तो है कि इसके परिणाम भी भयावह हो सकते है।

मंगलवार, 31 मार्च 2020

जीना है तो कैद हो जाइये...


राशन दुकान में टूट पड़ी भीड़ रामनगर 

आउटर में फँसे ट्रक वालों को भोजन वितरित करते हुए समाजसेवी अशोक गोलछा और  उनके साथी 

जब सरकार के स्तर पर गलतियों का अंबार हो तो आम लोगों के घरों में रहने का कितना फायदा मिलेगा। घरों में रहने के बाद भी वे कितने सुरक्षित है कहना कठिन है?
हम यहां मोदी सरकार की गलतियां नहीं गिनाने बैठे हैं बल्कि लोगों को सचेत कर रहे हैं कि वे सरकार की तरफ से हुई इतनी गलतियों के बाद भी गलती न करे। घर में स्वयं को कैद कर लें। जरूरत हो तभी घर से निकले और सामान खरीदने के बाद घर वापसी त चेहरों को हाथ न लगाये। सामानों को अच्छी तरह धोकर ही उपयोग करे। एक बार बाहर निकलने के बाद वापसी में कोशिश करें की हाथ को साफ करके ही घर में घुसे। क्योंकि जिस स्तर पर गलतियां हुई है हमारी छोटी सी लापरवाही हमें मौत के मुंह में ढकेल सकती है। 
हालाँकि यह वक़्त सरकार की ग़लतियाँ गिनाने का नहीं है लेकिन यक़ीन मानिए की इस देश के लोगों को लाठी का डर न होगा तो वे घर में ही न रहे लेकिन सरकार ने भी कब उनके लिए सोचा यही वजह है कि वे कुछ पा जाने के लालच में सड़कों पर हैं क्योंकि अब उनको रोज़गार कब मिलेगा इसका ठिकाना भी तो नहीं है ,हर तरफ़ जब अंधेरा नज़र आए सरकार से कोई उम्मीद न हो तो लोग क्या करे ,सच तो यह है कि ग्रामीण भारत ही असली भारत है लेकिन लाँकडाउन में इसकी ही अनदेखी की गई । सरकार ने तो कह दिया किसी का वेतन न काटे लेकिन क्या शिकायत आने पर वह वेतन नहीं देने वाले के ख़िलाफ़ कार्रवाई करेगी सच मानिए वह वेतन भी नहीं दिला पाएगी ।इस देश में मध्यम वर्ग भी है उनके लिए क्या किया गया , कुछ नहीं उनका भी रोज़गार गया पैसों की उन्हें भी दिक़्क़त है
पहले ही जनसंख्या विस्फोटक के कगार पर खड़े इस देश में कोरोना को लेकर सरकार की रीति नीति अक्षम्य है लेकिन जो गलतियां हुई है उससे आम लोगों को सबक लेकर कार्य करना है स्वयं को और देश को सुरक्षित रखने का इससे बेहतर कोई उपाय नहीं है।
चीनी और अमेरिकी वायरस से वैसे भी समूचा विश्व परेशान रहा है। वे कब क्या कर दे इनका कोई भरोसा नहीं है। ऐसे में इस देश के लोगों के साथ किस हद तक राजनीति हुई है यह बताने की जरूरत नहीं है। इन दिनों जब पूरे विश्व में कोरोना की त्रासदी से आम लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है तब यह जान ले कि ऐसी कौन-कौन सी गलतियां है जिसकी वजह से स्वयं को पूरी तरह कैद में रखने की जरूरत है।
30 जनवरी को इस देश में पहला केस सामने आता है लेकिन इसके 50 दिन बाद ही लॉक डाऊन किया जाता है। इसके पीछे अमेरिकी वायरस के स्वागत या मध्यप्रदेश में सरकार बनाने की छिपी मंशा के बजाय इसकी गंभीरता को सरकार के स्तर पर कम आंकना ही कहा जा सकता है।
पूरी दुनिया में जब कोरोना को लेकर चिंता जताई जा रही थी और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे महामारी घोषित कर दिया था तब सरकार ने विदेश से आने वालों की जांच में गंभीरता नहीं दिखलाई। लोग बीमारी लेकर अपने-अपने शहरों तक बेधड़क लौट गये। लॉक डाउन से पहले सरकार ने यह नहीं सोचा कि 15 से 20 करोड़ वे लोग जो रोजी-रोटी के चक्कर में शहरों में है उनकी वापस कैसे होगी। या उन्हें वापसी से कैसे रोका जायेगा। यही वजह है कि दिल्ली से लेकर हर राज्यों की सरहदों में भीड़ बढ़ गई और परेशान लोग सैकड़ों किलोमीटर पैदल ही निकल पड़े।
सरकार की सबसे बड़ी गलती तो यह भी है कि शुरु में इसकी गंभीरता नहीं समझने की वजह से अचानक लॉक डाउन की गलती करनी पड़ी। प्रधानमंत्री के संबोधन में दैनिक उपयोग को लेकर कोई बात नहीं करन से अफरा-तफरी का माहौल हो गया। कालाबाजारियों को मौका मिल गया।
सवाल यह नहीं है कि सरकार ने गरीबों के लिए एक लाख सत्तर हजार करोड़ का पैकेज दिया है सवाल यह है कि यह हर जरूरतमंद तक कैसे पहुंचेगा। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि तीस जनवरी को पहला केस आने के बाद लाक डाउन के 50 दिन तक जो लोग विदेशों से आकर  छुप गये उनमें से जिन्हें बीमारी थी वह कहां-कहां है यह भी किसी को पता नहीं है। ऐसे में स्वयं को कैद रखें। 
आश्चर्य की बात तो यह भी है कि अभी भी आयोजन हो रहे हैं। मस्जिदों व अन्य स्थानों से विदेशी पकड़ा रहे हैं और कुछ लोग अभी भी हिन्दू-मुस्लिम या राज्य सरकारों को बदनाम करने में लगे है लेकिन सच यही है कि गलतियां उपर से हुई है और स्वयं को कैद में रखने के अलावा कोई उपाय नहीें है।यक़ीन मानिए यदि तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने हल्ला न मचाया होता तो दिल्ली की दोनो ही सरकारें अभी भी सोते रहती इसलिए प्लीज़ स्वयं को क़ैद कर लें।

सोमवार, 30 मार्च 2020

एक बहस पत्रकारिता पर...

एक बहस पत्रकारिता पर...
अब इस पत्रकारिता का क्या करोगे? जिसे देखो वही गरियाने लगा है। लोगों की उम्मीद बढ़ी है। इस उम्मीद में खरा उतरना मुश्किल होता जा रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे पहले भी कम नहीं थे परन्तु सरकार का पहले इतना दबाव नहीं होता था। तब अखबार का मतलब एक मिशन होता थआ। परन्तु समय बदला। सरकार और कार्पोरेट सेक्टर ने विज्ञापन का ऐसा दबाव बनाया कि इसके झांसे में सभी आ गये। सिर्फ यही नहीं तय होने लगा कि खबरे कौन सी छपनी है बल्कि यह भी तय होने लगा कि खबरें कैसे बनाई जाए। खबरों का इस्तेमाल शार्प शूटर की तरह होने लगा।
बड़े कार्पोरेट सेक्टर के लिए मीडिया मुनाफा कमाने का व्यवसाय बन गया और इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने के बाद जिस तरह की क्रांति आई उससे पत्रकारिता के मूल उद्देश्य ही बिखर कर रह गया। जो दिखता है वह बिकता है का खेल शुरु हुआ और यह उस स्तर तक जा पहुंचा जहां अवसाद के अलाला कुछ नहीं बचा। अपने नंगे पन पर गर्व करते मीडिया पर लोगों का कितना गुस्सा है यह कहीं भी महसूस किया जा सकता है।
कौन पत्रकार नाम कमाना नहीं चाहता और कौन मेहनत करना नहीं चाहता। सारे पत्रकार सहज भाव से अव्यवस्था के खिलाफ कलम चलाना चाहते हैं। हर अव्यवस्था पर शब्दों के प्रहार से वह सिर्फ हंगामा ही नहीं खड़ा करना चाहता बल्कि अव्यवस्था को मिटा देना चाहता है। परन्तु सबको मनचाही स्थिइत नहीं मिलती। कुछ पत्रकार जरुर क्यारी में लगे गुलाब की तरह अपनी सुंगध बिखरने में सफल हो जाते हैं परन्तु यह सब इतना आसान नहीं होता। कोई आंख तरेर खड़ा होता है। कोई नोटों की गड्डियां लिये खड़ा होता है और अब तो सरकारी पदों में बैठे लोगों में भी संयम नहीं रहा। सीधे जेल भिजवाने की धमकी तो किसी के मुंह से सीधी सुनी जा सकती है और फिर अखबार खोलने वाले भी तो दुकानदार हो गये हैं। लाखों करोड़ों की मशीन लगाकर कोई सरकार से पंगा क्यों ले? अखबार की आड़ में माफियागिरी भी करनी है। चिटफंड कंपनी चलानी है, जमीन लेनी है कोल ब्लॉक से लेकर सरकारी ठेका भी तो लेना दिलाना है।
पत्रकारिता के प्रति आम लोगों का गुस्सा यूं ही नहीं बढ़ा है। इसके पीछे दुकानदारी की वह सोच है जो सरकार के भ्रष्ट तंत्र के साथ खुद वैतरणी पार लगाकर सात पुश्तों की की व्यवस्था कर लेना चाहता है। वह दिन लद गये जब पत्रकार मरियल सा पायजामा कुर्ता या खद्दर पहने समाज सेवा के लिए जाना जाता था। मोहल्ले से लेकर शहर में उसकी इज्जत होती थी। हर पीडि़त पक्ष बेधड़क अपनी व्यथा कह देता था। अच्छे-अच्छे पुलिस के अधिकारी भी पत्रकारों के सामने आने से कतराते थे। परन्तु जमाना बदल गया है। तेजी से बदला है अब कलम की विवशता आंखों में साफ पढ़ी जा सकती है यह अलग  बात है कि अब इन पानीदार आंखों को देखने की फुर्सत किसी के पास नहीं है वह तो बस पत्रकारिता में आये इस बीमारी को ही देखकर अपनी भड़ास निकालने में सुकून महसूस करता है।
पत्रकारिता का एक और मिजाज है। वह कभी कभी उत्साही हो जाता है और जिसकी परिणिति बस्तर जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों की स्थिति से साफ समझा जा सकता है जहां सरकारी पदों पर बैठे लोगों के पास जनविरोधी कानून जैसे हथियार के अलावा कुचलने या जेल में भेजने के सारे सामान होते हैं। राजधानी तक उनकी आवाज कैसे पहुंचे। यह भी प्रश्न खड़ा है। प्रश्न तो राजधानी के पत्रकारों और पत्रकारिता पर भी उठने लगे है परन्तु वे सौभाग्यशाली होते है कि उनके पास बंधी बंधाई तनख्वाह है।
परन्तु अभिव्यक्ति की आजादी पर मंडरा रहे खतरों के बाद भी सरकारी तंत्र और माफियाओं के गठजोड़ से मचे लूट के बाद भी क्यारियों के गुलाब की तरह पत्रकारिता का सुंगध कायम है पीडि़तों के लिए न्याय का दरवाजा खोलता है और अव्यवस्था के खिलाफ हंगामा खड़ा करता है। भले ही क्या करोगे ऐसा पत्रकारिता के शब्द ताकतवर दिखाई पड़ रहे हो परन्तु वह ताकतवर कतई नहीं है। पत्रकारिता आज भी खामोश नहीं है उसके कलम में धार कायम है स्याही जरुर फीकी हो गई है परन्तु अभी इतनी फीकी नहीं हुई है कि इसे पढ़ा न जाए। स्याही गाढ़ी जरुर होगी। समय लगेगा।