शनिवार, 1 मई 2021

लाशें ही तो हैं !


 लाशें ही तो हैं!


वे आते हैं,

अपने साथ लाते हैं,

नफरत का बीज

और रोप देते हैं

हमारे दिमाग में,

और हमारा दिल

दिमाग हो जाता है।


वे आते हैं

ढूंढते है कुछ ज्ञानी, कुछ नामी गिरामी,

पैसे वाले रईस,

या बदमाशों की टोली

और रोप देते हैं 

नफरत के बीज।


धीरे धीरे पनपने

लगता है बीज

दंगे के रुप में

फुटता है अंकुर

खाद पानी के

रुप में मिलता 

रहता है झूठ

अफवाह!


फिर एक दिन

हां एक दिन

पौधा फूटता है

उस बीज से

हम श्रेष्ठ हैं

कुंठित होता पौधा

बड़ा होता है।

पौधों को अब नहीं

चाहिए रोजगार

बढ़ती महंगाई से भी

उसे फर्क नहीं पड़ता


वह तो आतुर है

एक ऐसा फल देने

जिनमें, हमारी भावना हो,

आस्था हो,

सपने हो।

और यह फल ही सत्ता है।

जिसे वे तब तक

खाते रहेंगे

जब तक हम जल

न जाये 

मर न जाये

फना न हो जाये

क्योंकि हम लाशें ही तो हैं। (केटी)

(रोहित सरदाना और उन जैसे पढ़े-लिखे को समर्पित)

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

दोगली शख्सियत...

 कोई भी शख्सियत जब नफरत के मसाले से पकी हो तो वह आम आदमी कहां रह पाता है, उसमें मानवीय संवेदनाओं का तो अभाव होता ही है अपने घर परिवार के प्रति भी निष्ठुर हो जाता है, ऐसेलोग घडिय़ाली आंसू बहाने में तो माहिर होते ही हैं प्रमुख पदों पर बैठते ही इनकी ताकत खौफनाक हो जाती है। वे बात-बात पर झूठ और गुमराह करने वाली तस्वीरें पेश करते रहते हैं। और यह दोगली शख्सियत अचानक रुप नहीं लेता बल्कि यह सालों की मेहनत का नतीजा है। 

खैर इन सब बातों को अब कहने का कोई मतलब ही नहीं है क्यों यह समय कोविड से निपटने का है, इस देवभूमि को पिछली लाशों से मुक्त करने का है, आप इस समय सत्ता से न इस्तीफा मांग सकते हैं और न ही उनसे इस्तीफे की उम्मीद ही कर सकते है। हां उनकी लापरवाही और गैर जिम्मेदारी को चुपचाप किसी तमाशाबीन की तरह देख सकते हैं, जिनके अपने चले जा रहे हैं उनकी हिम्मत बढ़ा सकते हैं ताकि जो सत्ता की इस लापरवाही के बाद भी बच गये हैं वे कम से कम अच्छे से जी तो सके।

अपनों के जाने का दुख वही जानता है जिसका अपना घर-परिवार होता है लेकिन जब व्यक्ति अपने धर्म-जाति को लेकर कुंठित हो जाये तो उसके भीतर की आत्मा कहां जिन्दा रहती है उसे तो बस अपने धर्म को ही श्रेष्ठ बताना है। और इसके एवज में पिछली लाशें उन्हें कभी नहीं दिखाई देगी। कोरोना के शिकार तो फिर भी ठीक हो जा रहे हैं लेकिन सत्ता की लापरवाही के शिकार लोगों का दर्द कोई नहीं समझ सकता। ऐसे मे कल जब रिजाईन मोदी का नारा बुलंद हुआ तो इसे ब्लाक कर दिया गया। सरकार यानी मोदी सत्ता कह रही है कि उसने ब्लॉक नहीं किया? और न ही उसके इशारे पर ही ब्लॉक हुआ है?

लेकिन एक बात सत्ता जान ले किन इस देश की जनता सब-कुछ देख रही है। अब तो पूरी दुनिया में मोदी सत्ता की थू-थू हो रही है और हाईकोर्ट ने जिस तरह से लानत भेजी है उसके बाद तो सत्ता को एक दिन भी बने रहने की नैतिकता नहीं है लेकिन शरम कहां बनती है तब क्या बचा रहता है। अब तो लोगों का भी कहना है कि लानत है सत्ता की आजाद मिजाजी को। मौत के इस मंजर के लिए भले ही कुछ लोग अकेली सत्ता को दोषी मानने से इंकार कर रहे हो। लेकिन सच तो यही है कि यदि उपलब्धि का चोंगा सत्ता अकेले पहनती है तो इन लाशों की साड़ी भी उन्हें ही पहनना है।

प्रख्यात कवि कुमार विश्वास ने जिस ढंग से अपने ट्वीट में कहा है कि उससे तो साफ है कि उनके दिल में कितना गुस्सा है।

यह मंजर क्या गुस्सा दिलाने वाला नहीं है, मां का बच्चों की जिन्दगी के लिए कलपना, पत्नी का मुंह से ही पति को आक्सीजन देने की कोशिश और लाशों को रिक्शा, ठेला, सायकल से ले जाना। क्या सरकार इतनी भी व्यवस्था करने के लायक नहीं बची है तो फिर वह क्यों हैं।

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

सत्ता का तांड़व...

 

क्या आपने उन भेडिय़ा बच्चों के बारे में सुना है जो चांद की तरफ मुंह उठाकर हुंकाती मादा की घातक छातियों से दूध पीते है, और जब उस बच्चे को झुण्ड से अलग कर बचा लिया जाता है तो वह सबसे पहले बचाने वालों को ही काटता है। उनमें न तहजीब होती है और न ही उससे प्रेम की कल्पना ही की जा सकती है।

आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन सत्ता में बैठे लोगों की लापरवाही और गैर जिम्मेदाराना हरकत किसी भेडिय़ा बच्चे से कम नहीं है। बदइंतजामी ने तो जिन्दा लोगों को लाश में तब्दिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ा है। इस माह यानी अप्रैल में ही कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा पचास हजार पार कर चुका है और विशेषज्ञों की माने तो आने वाले दिनों में इसमें और तेजी आएगी। लोगों को तो पचास हजार वाले सरकारी आंकड़ों पर यकीन ही नहीं है वे इसे कई गुणा बता रहे हैं।

अपनी नाकामी छुपाने कोई सत्ता किस हद तक निचता पर उतर जाये ये कहना मुश्किल हो गया है। सत्ता की बेशर्मी आप गिनते रह जाएंगे और उससे ज्यादा निचता और बेशर्मी तो उन लोगों की है जो अपनी हिन्दू कुंठा के चलते देश को पहले ही बर्बाद कर देना चाहते हैं। देशभर में जिस तरह से कब्रिस्तान से श्मशान घाट तक लाशों की लाईने दिखाई देने लगी है वह किसी भी संवेदनशील सरकार के मुंह में तमाचा है लेकिन केन्द्र सरकार अभी भी सिर्फ और सिर्फ राजनीति कर रही है। लगता है कि भाजपा शासित राज्य के मुख्यमंत्री तो मोदी-शाह से इस कदर दहशत में है कि न तो वो एक देश एक कीमत पर ही कुछ बोल पा रहे हैं और न टीका को सभी तरह के टेक्स फ्री पर ही कुछ बोल पा रहे हैं। यदि हम महामारी में भी केन्द्र की सत्ता वेक्सीन में टैक्स माफ नहीं कर पा रही है तो इसका मतलब क्या है। 

पहले ही सरकार की लापरवाही, बदइंतजामी और लॉकडाउन के चलते कालाबाजारी की मार झेल रही जनता यदि सरकारी स्तर पर भी आपदा में अवसर की शिकार होकर अपने जान-माल को नहीं बचा पा रही है तो इस सरकार को होने का मतलब क्या है। अब तो इस सरकार की लापरवाही और बदइंतजामी को गिनाने का कोई मतलब ही नहीं है क्योंकि इस लापरवाही की लाश पर अब भी कुंठित हिन्दू बेशर्मी से जश्न मनाने का मौका ढूंढते रहते है। संघी नफरत का जज्बा लिये झपट्टा मारने को तत्पर गिद्ध की तरह वे केन्द्र की लापरवाही का ठिकरा राज्यों पर फोडऩा चाहते हैं।

हैरानी तो इस बात की है कि वे पिछली गलतियों से सबक लेने की बजाय नई-नई गलितयां कर अपनी बेशर्मी का परिचय देते हैं। और हद तो यह है कि वे अब भी यह मानने को तैयार नहीं है कि उनकी लापरवाही और अहंकार की वजह से दूसरी लहर में मौत का तांडव मचा है। सबसे शर्मनाक और हैरानी की बात तो यह है कि सत्ता अब भी इस विपदा से निपटने की कोई कारगार कोशिश नहीं कर रही है। जबकि विशेषज्ञों  की राय में आने वाला वक्त बेहद मुश्किल भरा होगा। ऐसे में आत्मा चित्कार उठता है और कहता है-

बस-बस-बस

सत्ता का हवस, बस-बस

झूठ का साहस, बस-बस

कोरोना के कहर से सब बेबस

छाती पे जलती लाश बस-बस

बदइंतजामी, बेरुखी का कॉकस 

सत्ता का अट्हास बस बस बस

सत्ता की रईसी, प्राण वायु की गरीबी

दबता जनता का नस, बस बस बस

कौशल दबा दो सत्ता का नस

न हो सके टस से मस।।

बस बस बस...

बुधवार, 28 अप्रैल 2021

सिस्टम का मतलब...

 

क्या देश की जनता को सत्ता द्वारा इतना बेवकूफ समझा जाता है कि वह कुछ भी कहे मान ले। दरअसल बात सिस्टम के फेल हो जाने की हो रही है। सच तो यह है कि सिस्टम फेल नहीं बल्कि एक्सपोज हो गया। खुद को बचाने जिस बेशर्मी से सत्ता ने सिस्टम पर दोष मढ़ा है वह हैरान ही नहीं उन लोगों के मुंह में करार तमाचा है जो दिन-रात इस देश की तरक्की के लिए काम कर रहे हैं।

इस देश की वह पुलिस जो इस भीषण काल में भी अपनी नींद खराब कर, सड़कों पर पहरेदारी कर रही है, इस देश के डाक्टर, नर्स, नर्सिंग स्टॉप अपने परिवार की चिंता किये बगैर गरीबों की सेवा में लगे है, जाति धर्म का भेद भुलाकर इस महामारी में आम जन एक साथ खड़े हैं क्या ये सभी सिस्टम को कटघरे में खड़े करने का अधिकार सत्ता को है? दरअसल खराबी सिस्टम में नहीं सत्ता में बैठे लोगों में है। जब उसकी लापरवाही गैर जिम्मेदारी सबके सामने आने लगा तो वह सिस्टम को दोष देने लग गया। 

जो लोग आज अपनी जिम्मेदारी और लापरवाही के चलते इस देश की यह हालत की है वे लोग तब क्यों सिस्टम को दोष नहीं दे रहे थे जब गृहमंत्री के पुत्र जय शाह को पद दे रहे थे, तीन हजार करोड़ की मूर्ति बनवा रहे थे, सिस्टम खुद के लिए 8 हजार करोड़ का प्लेन खरीदता है। चुनाव प्रचार करने बंग्लादेश चला जाता है लेकिन अस्पताल नहीं जाता। देश की सम्पत्ति को यह सिस्टम निजी हाथों में सौपता है, किसान बिल लाता है, सीएए लाता है, नोटबंदी करता है, विधायक खरीदता है, नमस्ते ट्रम्प करता है तब सिस्टम ठीक था लेकिन जब लोग बिलखकर तड़पकर मरने लगे तो सिस्टम फेल हो गया।

दरअसल सिस्टम फेल ही नहीं हुआ है बल्कि एक्सपोज हो गया है। क्योंकि इस सिस्टम ने जिस तरह से बात-बात पर झूठ बोलकर नफरत की दीवार खड़ी की थी और अपनी सुविधानुसार सिस्टम तैयार किया था वह इस महामारी में पूरी तरह एक्सपोज हो गया। हमने पहले ही कहा है कि यह देश दुनिया के किसी भी देश से भिन्न है, इस देश को किसी धर्म या महजब का ही प्रयास है। यह देश बना है प्रेम और सत्य की राह पर चलकर बना है, यहां झूठ-नफरत, छल-प्रपंच का कोई स्थान नहीं है और जिसे भी सत्ता ने इसे अपने इशारे पर हांकने की कोशिश की उसे मुंह की खाना पड़ी है।

जो हिन्दू कुंठा से ग्रसित है वे खुद ही जान ले कि छोटे-छोटे राज्यों में बंटे इस देश को एक करने में क्या कुछ नहीं किया गया, तब भारत बना है। आजादी की लड़ाई में हिन्दु ही नहीं मुस्लिम-सिख सहित सब धर्म के लोगों ने अपना लहू बहाया है। इस देश पर जितना हिन्दुओं का अधिकार है, उतना ही अधिकार दूसरे धर्म के लोगों का है।

लेकिन पिछले सालों में सत्ता ने क्या किया, वह अपनी तरह का सिस्टम तैयार करने लगा, अपनी कुंठा, झूठ और नफरत को सिस्टम का अंग बनाने की कोशिस की गई। जब सत्ता में बैठे लोगों का समूचा ध्यान ही अपनी सत्ता को विस्तार देने में हो तो फिर वह आम लोगों के बारे में कैसे सोच सकता था, उसका सारा सिस्टम सत्ता के लिए था इसलिए महामारी की चेतावनी को नजरअंदाज कर पहली लापरवाही की गई, पहली लहर में हुई लापरवाही ने कितनी ही जाने ली।

मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

जिम्मेदारी से दूर...


एक तरफ सत्ता थी जो अपनी गैर जिम्मेदाराना हरकत और लापरवाही से जनता को मुसिबत में डाल दिया था तो दूसरी तरफ जनता अपनी जिम्मेदारी समझ इस संकटकाल में लोगों की मदद के लिए आगे आ रही थी। सोनू सूद तो हीरो बन गये है लेकिन छत्तीसगढ़ की राजधानी में कितने ही लोग हैं जो लोगों की सेवा कर रहे हैं, विधायक सत्यनारायण शर्मा और उनके दोनों बेटे पंकज और विकास तो पीपीई कीट पहनकर दिन रात सेवा में लगे थे तो विधायक बृजमोहन अग्रवाल ने कोविड सेंटर खोल दिया था, शहर कांग्रेस अध्यक्ष गिरीश दुबे, सराफा व्यापारी अशोक  गोलछा, प्रहलाद सोनी, डॉ. राकेश गुप्ता, मनजीत बल्ला, विकास तिवारी कितने ही नाम है जो सहायता के लिए हर पल तत्पर थे और हैं।

दुख की बात तो यह है कि इस विषम परिस्थिति में राजनीति अपनी हरकत से बाज नहीं आ रहा है और ट्रोल आर्मी और वॉट्सअप यूनिर्वसिटी की बेशर्मी तो अब भी हिन्दू-मुस्लिम में लगी हुई है। चारो तरफ मोदी सरकार के प्रति गुस्सा और असंतोष बढ़ रहा है और उसे दबाने ट्रोल आर्मी और आईटी सेल एक बार फिर झूठ का सहारा लेकर नफरत फैलाने में लग गई। वे अब भी मानने को तैयार नहीं है कि केन्द्रीय सत्ता की लापरवाही और कोविड की गंभीरता को नजरअंदाज करने की वजह से ही हालत यहां तक आ पहुंची है।

हैरानी तो तब होती है जब देश के गृहमंत्री अमित शाह या दूसरे केन्द्रीय मंत्रियों का इस पर बयान आता है और राज्य सरकार को दोषी ठहराते हैं। जिन लोगों ने अपनी सत्ता बचाने बार-बार प्रोटोकाल की अवहेलना की हो वे प्रोटोकॉल को मुद्दा बनाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में धर्म की राजनीति करने वालों को याद करना चाहिए कि सत्ता को प्रोटोकाल की याद तभी आती है जब संकट में अपनी भूमिका को उजागर होते देखते हैं। महाभारत को याद कीजिए कि प्रोटोकाल की याद कब-कब दिलाई गई वे लोग जिन्हें पांच गांव नहीं देने को राजी थे, भरी सभा में द्रोपदी का चीरहरण कर रहे थे, अभिमन्यु को अकेले घेर कर मार रहे थे। वे जब कर्ण पर बाण चला रहे थे तो प्रोटोकाल बता रहे थे, दुर्योधन के जंघा पर वार के समय प्रोटोकाल बता रहे थे।

हैरानी तो तब होती है कि देश के प्रधानमंत्री जैसे ही प्रधानमंत्री केयर फंड से देश के सभी जिलों में आक्सीजन प्लांट डालने की घोषणा करते हैं उसके कुछ ही घंटों बाद देश के गृहमंत्री इस कदम का स्वागत करते हुए कहते हैं कि अब आक्सीजन की कमी नहीं होगी। यानी आक्सीजन प्लांट न हुआ अलाउद्दीन का चिराग हो गया, बोलते ही प्लांट तैयार होकर आक्सीजन देने लगेगा। आक्सीजन की जरुरत आज है और अभी है ऐसे में इस प्लांट का लाभ तो बाद में ही मिलेगा लेकिन जब देश के एक्सपर्ट और संसद में सांसद आने वाले दिनों में आक्सीजन की जरूरत बता रहे थे तब सत्ता ने क्या किया? तब क्यों नहीं व्यवस्था की। आक्सीजन के निर्यात को क्यों नहीं रोका गया।

दूसरी लहर की चेतावनी को क्यों नजर अंदाज किया गया? और आज भी केयर फंड से जो आक्सीजन प्लांट बनाने की घोषणा की गई है उसका पूरा नियंत्रण केन्द्र के ही हाथ में है। यानी पिछली घोषणा की तरह क्या यह भी हवा हवाई होकर नहीं रह जायेगी। तब जनता के प्रति जिम्मेदारी की बात सत्ता न ही करे तो अच्छा है।

सोमवार, 26 अप्रैल 2021

पत्रकार साथी तिवारी और हसन का निधन

 रायपुर – जनसंपर्क विभाग के सहायक संचालक डॉ छेदीलाल तिवारी हमारे बीच नहीं रहे, उनका बीती रात रायपुर के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। डॉ तिवारी कोरोना से हारने वालों में से नहीं थे, उनकी मौत का जिम्मेदार सुयश हॉस्पिटल की अव्यवस्था है। करीबी सूत्रों के मुताबिक उनके सिर में चोट लगी है और खून निकल रहा था, जबकि वे एक हफ्ते से अधिक समय से आईसीयू में थे। उनकी इस तरह मौत यह सवाल खड़े करती है कि कोरोना के इलाज के नाम पर आखिर हो क्या रहा है।

डॉ तिवारी एक सरल मिलनसार व्यवहार कुशल सहित जीवट व्यक्ति थे, अनेक चुनौतियों और संघर्षों के सामना करते हुए आगे बढ़े थे। उन्होंने अविभाजित मध्य प्रदेश के जनसम्पर्क विभाग में ऑटो चालक के रूप में नौकरी की शुरुआत की। उस ऑटो से वे डाक बांटा करते थे। लेकिन उन्होंने यह नौकरी करते हुए अपनी आगे की पढ़ाई जारी रखी। राजनीति विज्ञान में मास्टर डिग्री ली। तबतक विभाग ने उन्हें वाहन चालक बना दिया। इसके बाद छेदीलाल तिवारी ने पीएचडी की। उनके पीएचडी का विषय था ‘मध्य प्रदेश शासन में जनसम्पर्क की भूमिका’। पीएचडी करने के बाद साहब का ड्राइवर , डॉक्टर हो गया। इसकी चर्चा खूब हुई, इंडिया टुडे जैसी प्रतिष्ठित पत्रिका ने इसे खबर बनाया। यह खबर तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को मिली। इसके कुछ समय बाद दिग्विजय सरकार की कैबिनेट ने एक प्रस्ताव पारित कर डॉ छेदीलाल तिवारी को सूचना सहायक बना दिया। और फिर धीरे धीरे डॉ तिवारी अपनी काबिलियत के बल पर आगे बढ़ते रहे।

डॉ तिवारी का पूरा जीवन प्रेरणा देने वाला है। डॉक्टर तिवारी की असामयिक मृत्यु से छत्तीसगढ़ एवं मध्यप्रदेश के जनसंपर्क विभाग में शोक की लहर व्याप्त है वही एक और दिल दहला देने वाले समाचार आया की रायपुर के वरिष्ट पत्रकार जियाउल हसन का कल रात रायपुर के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया वे लंबे समय से दैनिक समाचार पत्र वरिष्ठ पत्रकार अग्रदूत सहित अन्य संस्थाओं में अपनी सेवाएं दी हमेशा जिंदादिल एवं मिलनसार व्यक्तित्व के धनी भाई जियाउल हसन के मृत्यु समाचार से प्रेस जगत को गहरा आघात लगा है वरिष्ठ पत्रकार जियाउल हसन को रायपुर प्रेस क्लब एवं छत्तीसगढ़ एडिटर्स एंड पब्लिशर्स एसोसिएशन द्वारा श्रद्धांजलि अर्पित की गई है



जन की बात-10

 

कोरोना की दूसरी लहर में सब तरफ वही हालात बनने लगे जो पहली लहर में देखी गई। सत्ता के उपर न मजदूरों को भरोसा है और न ही किसान-जवान, व्यापारी, मध्यम वर्ग किसी को भरोसा नहीं है, इसलिए मजदूर फिर वापस अपने घरों की ओर लौटने लगे। किसान पहले से ही आंदोलित हैं, व्यापारी सरकार की जीएसटी प्रणाली से असंतुष्ट है तो मध्यम वर्ग बढ़ती महंगाई, ऊपर से कोरोना का कहर और सत्ता की कथनी करनी में भेद।

सत्ता के प्रति आसक्ति जब जब इस देश ने देखा है वह अन्याय का शिकार हुआ है। याद कीजिए ऐसी ही आसक्ति इंदिरा गांधी ने 1975 में दिखाई थी, तब वे कहां न्याय के मार्ग पर चले थे लेकिन जल्द ही आंखे खुल गई लेकिन इस बार तो सत्ता के प्रति आसक्ति ने सारी सीमाएं लांघ दी है। रामायण में प्रभु राम ने भी कहा था सत्ता के प्रति आसक्ति का ही अन्याय की जननी है। दिन-रात जय श्री राम के नारे चीख-चीख कर बोलने वाले भी प्रभु राम की इस भाषा को नहीं समझ रहे हैं तब यह देश और किससे उम्मीद करें।

क्या सत्ता का वर्तमान इतना संवेदनाशून्य है कि उसे बिखरते परिवार, गिरती लाशें दिखाई नहीं दे रही है, अस्पतालों में उठ रहे सिसकने की , रोने की आवाज सुनाई नहीं दे रहा है। सत्ता वे होती है जो चुनौती को पहले ही पहचान लेता है या चुनौती का सामना करने को सदैव तत्पर रहता है। लेकिन यहां तो सिर्फ दायित्व का दंभ है, जिम्मेदारी का कहीं पता नहीं है। भक्त अब भी अपने कथित अवतारी के प्रेम में पशु हो गये हैं, ऐसे में इतिहास में घटित एक घटना को याद किया जाना चाहिए।

मिशिगन की डोरोथी मार्टिन ने अपने अनुनायियों और भक्तों को कयामत की चेतावनी देते हुए एक बार कहा कि 21 दिसम्बर 1954 की सुबह दुनिया खत्म हो जायेगी। भक्त तो भक्त होते हैं, कईयों ने अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़ दी, कई लोग तो अपना सब कुछ बेच बाच कर डोरोधी के शरण में आ गये, डोरोथी ने कहा कि जो लोग उन्हें सच्चा गुरु मानते हैं वे सभी उडऩ तश्तरी में सवार होकर जायेंगे।

लेकिन, 21 दिसम्बर की दोपहर को ही स्पष्ट हो गया कि डोरोथी की भविष्यवाणी हवा-हवाई है, लेकिन आप हैरान हो जायेंगे की भविष्यवाणी झूठी होने पर उनके भक्त और कट्टर हो गये, इन भक्तों का तर्क था कि डोरोथी के पूण्य प्रताप की वजह से कयामत टल गई। 

शायद ऐसा ही कुछ वर्तमान में चल रहा है, आप अस्पताल की कमी बताओं वे 70 साल में आ जायेंगे, आप ऑक्सीजन की कमी बोलिये वे 70 साल में आ जायेंगे, आप कुछ भी समस्या बताओ वे 70 साल में आ ही जायेंगे। कहेंगे अवतारी तो समस्या से निजाद का पूरा प्रयास कर रहे हैं लेकिन 70 साल ? असल में ये लोग फंस चुके है, सांप-छुंछुदर सी स्थिति है फिर कौन व्यक्ति अपने को गलत कहेगा। फिर कौन चाहेगा कि लोग कहे देखों मुर्ख बनकर चले गए थे। इसलिए कोरोना की दूसरी लहर ने तबाही मचाई, तो इसके लिए राज्यों को दोष देना शुरु हो गया।

वे यह कतई नहीं बताएंगे कि लोग उत्तरप्रदेश में ही नही, महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, छत्तीसगढ़, झारखंड में भी मर रहे है। और हम बायस्ड लोग वहां के मुख्यमंत्री को कुछ नही बोलते। मैं बताता हूँ क्यों नही बोलते.. 

1- आयात निर्यात की नीति, केंद्र बनाता है। राज्य नही। दवा , वैक्सीन का कृत्रिम अभाव, निर्यातलिप्सा की वजह से बना है। (अदार पूनावाला ने लन्दन में प्रोपर्टी खरीद ली। क्यों, इसलिए कि विदेश का पैसा विदेश में ठिकाने लगाना था। निर्यात की अनुमति न मिलती तब??? तब पूनावाला इलेक्टरल बांड नही खरीद पाते।) 

2- इसी वैक्सीन माफिया के फायदे के लिए ये कोविशील्ड की अनुमति लटकाए हुए थे। मगर पिछली बार जब मामले बढ़े, तो मजबूरी में उसे अनुमति दी। कम्पटीशन खड़ा हो गया। अब तीसरा कॉम्पटीशन नही चाहिए था। इसलिए विदेश में धड़ल्ले से बन बिक यूज हो रही स्पुतनिक वगेरह को लोकल ट्रायल की शर्त रख दी। याने छह आठ महीने लटकाने का प्लान था। राहुल के पत्र के बाद इसे भी मजबूरी में अनुमत करना पड़ा। याने पूरे वक्त ये दवाओं का कृत्रिम अभाव पैदा करते रहे।

3-  पीएम केयर के नाम पर हर कम्पनी का सीएसआर का पैसा अपने पास खींच लिया। क्या किया उसका?? ठेके दिये अनाम-गैर अनुभवी कम्पनी को। वक्त पर सप्लाई नही मिली। हस्पताल दवाओं, इक्विपमेंट की कमी से जूझ रहे हैं। 

4- सीएम फोन कर रहे हैं, क्यों कर रहे है, रेमेडीसीवीर चाहिए। पीएम नही बात कर सकते , क्यों रैली कर रहे हैं। रेमेडीसीवीर क्यों नही है, इसलिए कि तमाम दवा कम्पनियों को धकाधक लायसेंस नही दे रहे। 

5- दवा नही, तो मरीज का जल्दी सुधार नही। दो दिन की जगह पांच दिन बेड ऑक्युपाई कर रहा है। जाहिर है जगह की कमी होगी। अब आप दीजिये स्टेट को दोष। क्योकि हेल्थ तो स्टेट का मसला है।