रविवार, 14 जुलाई 2024

अब जेल जाने से कौन बचायेगा...

 बाबा रामदेव फिर फँस गये 

अब जेल जाने से कौन बचायेगा...

 क्या सुप्रीम कोर्ट से बड़े हो गये बाबा...


मोदी सत्ता के  आते ही अपने व्यापार को कई गुणा बड़ाने वाले व्यापारियों में से एक व्यापारी बाबा रामदेव का अब जेल जाना तय माना जा रहा है। हालांकि रामदेव के सिर पर किसका हाथ है यह किती से छिपा नहीं है और वे इसी ताकतवर हाथ के चलते जेल जाने से बचते रहे है।

ज्ञात हो कि पन्तजलि समूह की करतूत को लेकर चल रहे एक मामले में बाबा रामदेव ने किस तरह से हेठी दिखाई थी वह किसी से छिपा नहीं है। भ्रामक प्रचार के इस मामले में बाबा रामदेव ने किस तरह से सुप्रीम कोर्ट को बेवकूफ बनाने की कोशिश की यह बताने की जरूरत नहीं है कि बाबा रामदेव और  बालकृष्ण ने पहले माफी माँगने का नाटक किया, फिर सुप्रीम कोर्ट नाराज हुआ तो विज्ञापन छोटा सा छपवाया, फिर सुप्रीम कोर्ट नाराज हुआ तो बड़ा विज्ञापन छपवावर माफी मांगी।

इसने बाद सरकार ने बाबा रामदेव के पंतजलि समूह की 14  दवाईयों को प्रतिबंधित कर दिया था लेकिन जिस ततह की खबरे आ रही है इससे साफ़ हो गया है कि इन दवाओं की न केवल धड़ल्ले से निर्माण हो रहा है बल्कि पंतजलि के स्टोर में धड़ल्ले से बिक रहा है।

लेकिन इस माम‌ले की सुनवाई के के दौरान एक बार फिर बाबा रामदेव और बालकृष्ण ने सुप्रीम कोर्ट से झूठ  बोला कि न तो इन 14 प्रतिबंधित दवाओ का प्रचार प्रसार किया जा रहा है और न ही इसकी बिकी ही हो रही है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बाबा रामदेव को शपब पत्र देने कहा है।


लेकिन दूसरी तरफ़ इस मामले को लेकर हिन्दूस्तान टाईम्स ने स्ट्रीग़ आपरेशन करके बाबा रामदेव के झूठ का पर्दाफ़ाश कर दिया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (9 जुलाई) को पतंजलि आयुर्वेद को यह सबूत देने का निर्देश दिया था कि उसने अप्रैल में उत्तराखंड राज्य लाइसेंसिंग विभाग द्वारा प्रतिबंधित उसके 14 प्रॉडक्ट्स की बिक्री और विज्ञापन बंद कर दिए हैं। इस दौरान कंपनी ने दावा किया कि उसने सभी स्टोर मालिकों, विज्ञापन आउटलेटों को उन उत्‍पादों की ब‍िक्री रोकने संबंधी सर्कुलर दे द‍िया था और मीड‍िया के जर‍िए भी इसे प्रचार‍ित कर द‍िया था। लेक‍िन, एनडीटीवी और हिंदुस्तान टाइम्स के स्टिंग ऑपरेशन में दावा किया गया है कि बैन किए गए प्रॉडक्‍ट्स अभी भी स्टोर्स में खुलेआम बिक रहे हैं।

खुलेआम बिक रहे बैन प्रॉडक्ट्स

एनडीटीवी का दावा है क‍ि उसके स्टिंग ऑपरेशन में पता चला है कि जिन 14 प्रॉडक्‍ट्स की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया है उनमें से अधिकांश दिल्ली-एनसीआर और कई अन्य राज्यों में पतंजल‍ि के फ्रेंचाइजी स्टोर्स पर ग्राहकों के लिए उपलब्ध हैं।


वहीं,हिंदुस्तान टाइम्स में भी दावा है क‍ि चार शहरों- दिल्ली, लखनऊ, पटना और देहरादून में पतंजलि स्टोर्स में जाने पर उसे वे अधिकांश उत्पाद ब‍िकते म‍िले, ज‍िन्‍हें बैन करने का आदेश है।

इस दौरान स्वासारि वटी, दृष्टि आई ड्रॉप्स, बीपी ग्रिट, मधुग्रिट, लिवामृत एडवांस, लिवोग्रिट सहित कई उत्पाद दुकानों में पाए गए। जब पूछताछ की गई तो दुकानदार ने कहा कि उसे ये प्रॉडक्‍ट्स बेचना बंद करने के लिए नहीं कहा गया है।

14 पतंजलि प्रोडक्ट्स पर लगा था बैन

दरअसल, अप्रैल में उत्तराखंड राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरण ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि उसने 14 पतंजलि आयुर्वेद, दिव्य फार्मेसी उत्पादों पर तत्काल प्रभाव से बैन लगा दिया है और 15 अप्रैल को उसी संबंध में आदेश जारी किया है। नियमों का बार-बार उल्लंघन करने पर औषधि एवं प्रसाधन सामग्री नियम, 1945 के नियम 159(1) के तहत यह कार्रवाई की गई है।

शीर्ष अदालत का मंगलवार का आदेश उत्तराखंड सरकार के हलफनामे के बावजूद पारित किया गया, जिसमें अदालत को सूचित किया गया था कि 15 अप्रैल को लगाया गया प्रतिबंध राज्य के एक अन्य विभाग द्वारा प्रक्रियात्मक आधार पर रद्द कर दिया गया था। जिसके बाद 8 जुलाई को पतंजलि को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए थे। हालांकि, पतंजलि के वकील ने कहा कि कंपनी को अभी तक प्रतिबंध हटाने के संबंध में कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली है और कंपनी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों से बंधी हुई है।


बाबा रामदेव-बालकृष्ण को सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी- देश सेवा का बहाना मत बनाओ, आप चाहें कितने ऊंचे हों, कानून की महिमा सबसे ऊपर, आपने सारी सीमाएं लांघ दींपतंजलि को दाखिल करना होगा 

पतंजलि आयुर्वेद ने मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उसने उन 14 उत्पादों की बिक्री बंद कर दी है जिनके लाइसेंस अप्रैल में उत्तराखंड में एक राज्य प्राधिकरण द्वारा निलंबित कर दिए गए थे।

योग गुरु बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण द्वारा स्थापित कंपनी ने जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ को बताया कि उसने 5,606 फ्रेंचाइजी स्टोरों से वो 14 प्रॉडक्‍ट्स वापस लेने को कहा है। साथ ही पतंजलि आयुर्वेद ने यह भी कहा कि उसने सभी मीडिया प्लेटफॉर्म्स से इन उत्पादों के विज्ञापन वापस लेने के लिए कहा है।

अदालत ने पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड को एक हलफनामा दाखिल कर यह बताने का आदेश दिया कि बैन किए गए 14 उत्‍पादों की ब‍िक्री रोक दी गई है। पतंजलि के वकीलों ने हलफनामा दाखिल करने के निर्देश को स्वीकार कर लिया है। यह हलफनामा दो सप्ताह के भीतर दाखिल किया जाना है। मामले में अगली सुनवाई 30 जुलाई को होगी।

गौरतलब है कि अदालत एलोपैथी के खिलाफ बोलने वाले वाले और कुछ बीमारियों के इलाज के दावे करने वाले पतंजलि के विज्ञापनों के खिलाफ आईएमए द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही है।

मोदी सरकार का ‘मेडिकल राष्ट्रवाद’, पतंजलि को समर्थन देकर ऐसे साधी गई सियासतइन पतंजलि प्रॉडक्‍ट्स को किया गया है बैन

1. स्वसारि गोल्ड (Swasari Gold)

2. स्वसारि वटी (Swasari Vati)

3. ब्रोंकोम (Bronchom)

4. स्वसारि प्रवाही (Swasari Pravahi)

5. स्वासारी अवलेह (Swasari Avaleh)

6. मुक्तावटी एक्स्ट्रा पावर (MuktaVati Extra Power)

7. लिपिडोम (Lipidom)

8. बीपी ग्रिट (Bp Grit)

9. मधुग्रिट (Madhugrit)

10. मधुनाशिनीवटी एक्स्ट्रा पावर (MadhunashiniVati Extra Power)

11. लिवामृत एडवांस (Livamrit Advance)

12. लीवोग्रिट (Livogrit)

13. आईग्रिट गोल्ड (Eyegrit Gold)

14. पतंजलि दृष्टि आई ड्रॉप (Patanjali Drishti Eye Drop)


पतंजलि फूड्स को राहत

वहीं, दूसरी ओर पतंजलि फूड्स को राहत देते हुए, बॉम्बे हाई कोर्ट ने पिछले हफ्ते कंपनी के कच्चे पाम तेल के आयात पर लगाए गए 62 लाख रुपये के बढ़े हुए सीमा शुल्क के आदेश को रद्द कर दिया। जस्टिस केआर श्रीराम और जस्टिस जितेंद्र जैन की खंडपीठ ने पाया कि तेल पर जो कस्टम ड्यूटी जो 13 मई, 2021 को रात 8.20 बजे से 9 बजे के बीच लगाई गयी थी उसे उसी दिन लगभग 9.24 बजे जारी एक टैरिफ अधिसूचना के आधार पर और बढ़ा दिया गया था। कोर्ट ने माना कि बढ़ी हुई ड्यूटी लगाना कानून के खिलाफ है। हौरतलब है कि पतंजलि आयुर्वेद समूह समूह का हिस्सा, पतंजलि फूड्स मुख्य रूप से खाद्य तेल व्यवसाय में शामिल है।

रेत माफियाओं का बढ़‌ता कहर

 रेत माफियाओ का बढ़‌ता कहर


छत्तीसगढ़ में रेत माफियाओं का कहर अब सर चढ़‌कर बोलने लगा है। हालांकि अभी मामला सिर्फ झड्प और धमकी चमकी तक ही सीमित है लेकिन यही स्थिति रही तो इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

प्रदेश में बारिश के मौसम में रेत उत्खनन का कार्य पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया गया है लेकिन कई जिलों से जो खबरें आ रही है वह हैरान कर देने वाली इसलिए भी है क्योंकि खनिज विभाग मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के पास है और प्रतिबंध के बाद भी यदि रेत का कार्य धड़ल्ले से चल रहा है तो इसकी दो ही वजह है, या तो रेत माफियाओं को उत्खनन की छूट दे दी गई है या फिर मुख्यमंत्री से यह विभाग संभल नहीं रहा है।

हालांकि खनिज विभाग ने इस दौरान कुछ कार्रवाई की है लेकिन कहा जा रहा कि इस दौरान जितनी भी कार्रवाई की गई है वह लोगों के दबाव में की गई है और कारवाई के  नाम पर खानापूर्ति की गई है।

बताया जाता है कि छत्तीसगढ़ में रेत माफियाकों की सक्रियता राज्य बनने के बाद से ही शुरू हो चुका था , इन माफियाओं को बक़ायदा राजौतिक संरक्षण भी मिलता रहा है, यही नहीं इस खेल में कहें विधायकों के रिश्तेदारो की सक्रिय भूमिका भी पाई गई है। जोगी- राज में तो तिवारी -जैन की जोड़ी ने जिस धड़ल्ले से काम किया था, उसे लोग आज भी नहीं नहीं भूल पाये हैं।

इसके बाद भी रमन राज हो या भूपेश राज रेत माफियाकों ने जमकर उत्पात मचाया । 

ऐसे में अब जब प्रतिबंधित समय में बड़े पैमाने पर खुले आम रेत का उत्खनन हो रहा है तब क्या इन्हें साय सरकार का सरक्षण है। और इस संरक्षण की वजह से ही रेत माफियाओं के पक्ष में विरोध करने वालों को डराने-धमकाने में राजस्व विभाग के अधिकारी भी खुलकर आ गये हैं।

ऐसा ही एक मामले का आडियो वायरल हो रहा है जिसमें धमतरी क्षेत्र के नायब तहसीलदार ज्योति सिंह के द्वारा जिला पंचायत सदस्य खूबलात ध्रुव के बीच बहस हैरान करने वाला है, और इससे भी ज्यादा हैरानी की बात तो यह है कि अभी तक ज्योति सिंह के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होना।

इधर जिला पंचायत के उपाध्यक्ष नीलू चंद्राकर के एक रेत से भरे हाइवे की चपेट  में आने से बच जाने की घटना से बवाल मच गया है हालांकि इस मामले को शांत करने की कोशिश भी हुई लेकिन जिस तरह से एनजीटी के नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही है वह साय सरकार के क्रिया कलापों पर सवाल उठाते हैं।

शनिवार, 13 जुलाई 2024

बुरी तरह घिर गये गृहमंत्री…

 बुरी तरह घिर गये विजय शर्मा गृहमंत्री


छत्तीसगढ़  के उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा के सामने दोहरी चुनौति खड़ी हो गई है एक तरफ़ प्रदेश में कानून व्यवस्था की बदतर होती स्थिति से निपटने की चुनौति है तो दूसरी तरफ पार्टी के भीतर उनके बढ़ते विरोधियों को संभालने की। 

हिन्दू ध्रुवीकरण की राजनीति के आसरे पहली बार विधायक बने विजय शर्मा को उपमुख्यमंत्री के साथ गृह विभाग जैसे सबसे महत्वपूर्ण विभाग दिया गया तो इसके पीछे की राजनीति को आसानी से समझा जा सकता है। क्योंकि बीजेपी को यही रास आता है।

कहा जाता है कि मुख्यमंत्री की दौड़ में सबसे आगे होने के बावजूद पिछड़  जाने की बड़ी वजह रमन सिंह को बताया जा रहा है, लेकिन उनकी राजनैतिक विरोधियों की संख्या दिनों दिन बढ़ते ही जा रही है तो इसकी वजह उनका मोहन सेठ से नजदिकियों को माना जा रहा है।

सूत्रों का कहना है कि बलौदा बाजार कांड के बाद हुए मॉब लिंचिंग की घटना के बाद वे हिन्दुवादी  संगठनों के निशाने पर भी आ गये है । ऐसे में सबसे बड़ा सवाल तो प्रदेश के कानून व्यवस्था की बिगड़ती स्थिति  को लेकर उठने लगा है। और वसूली में अभ्यस्त हो चुके पुलिस को संभालना एक अलग ही चुनौतीपूर्ण कार्य है।

बताया जाता है कि पार्टी के भीतर ही अब विजय शर्मा के खिलाफ गोलबंदी शुरु हो गई है तो इसकी बड़ी वजह पार्टी में कोयला, शराब और दूसरे क़िस्म के  माफिया खासकर सरकारी विभाग में सप्लाई करने वालों का बढ़ता प्रभाव है। और ऐसे माफियाओं के साथ यदि विधायक और संगठन के ज़िम्मेदारों के खड़े होने की चर्चा है तब क़ानून व्यवस्था को संभालना आसान भी नहीं है।

सूत्रों की माने तो प्रदेश में बिगड़‌ती कानून व्यवस्था के लिए यही लोग जिम्मेदार है। तब राज्य में मौजूद प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस को साधने की एक अलग ही चुनौती है।

कांग्रेस ने तो प्रदेश में बिगड़‌ती कानून व्यवस्था  को लेकर विधानसभा घेराव का निर्णय मी कर लिया है और प्रदेश अंग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने जिस तरह की रणनीति बनाई है उसका असर तो बाद में देखने को मिलेगा, लेकिन इन दिनों कांग्रेस ने अपने पदाधिकारियों के खिलाफ हो रही काविाई की वजह से आक्रमक मुद्रा में है तो इसकी वजह मुख्यमंत्री के सलाहकारों की उदासिनता को माना जा रहा है।

ऐसे में प्रदेश में जिस तरह से नशे के कारोबारियों ने शासन-प्रशासन में अपनी घुसपैठ बना रखी है उसे लेकर भी कई तरह की चर्चा है तो दुसरी तरफ पार्टी संगठन में दागी अफसरों के साथ खड़े होने वाले दलालों की सक्रियता ने  भी गुटबाजी को हवा दी है। 

बहरहाल गृहमंत्री विजय शर्मा बुरी तरह से फँस गए है और इससे निकलना अब बड़ी चुनौति है।

रूस-आस्ट्रि‌या यात्रा का सच

 रूस-आस्ट्रि‌या यात्रा का सच 

छटपटाते अफवाह का खुलता झूठ...


कहा जाता है कि झूठ के पांव नहीं होते लेकिन जब सच आकर सामने खड़ा हो जाता है तो छटपटाते हुए दम तोड़ देता है। लेकिन जिनकी पूरी राजनीति ही अफवाह उड़ाने वाली संस्था के आसरे टिकी हो वह भला सच को इतनी आसानी से कैसे मान लें, या पचा लें? तब वह बेशर्मी पर उतर आता है…।

देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रुस और आस्ट्रिया की यात्रा का सच यही है कि जो कुछ हुआ या होगा  वह मित्रता की उस बुनियाद पर टिका है जिसका पहला पत्थर नेहरू ने रखा है।

वहीं पंडित जवाहर लाल नेहरू जिसे पानी पी-पीकर कोसा जाता है, जिसके नाम से झूठ परोसने की परम्परा निभाई जाती है और जिसे गाली देकर अपनी राजनीति साधने की कोशिश की जाती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इन दो देशों की यात्रा के सच की शुरुआत  कहां से की जाए । आस्ट्रिया से !

शुरुआत कहीं से कर ले बुनियाद में नेहरू आज भी सीना ताने खड़े नज़र आ जाएँगे,हालांकि इस दौर में उनका क़द छोटा  करने  की तमाम कोशिश हुई लेकिन हर कोशिश का अंजाम झूठ और अफवाह की शक्ल में उभर आया।

तब रुस की यात्रा में क्या हुआ ? यह सवाल इसलिए भी नहीं होना चाहिए क्योंकि जिस मित्रता की बुनियाद में पं. नेहरू जैसे महान नेता ने पहला पत्थर रखा हो उसकी ईमारत हिल ही नहीं सकती।

मोदी सत्ता की अमेरिका परस्त्त नीति के बाद भी यदि भारत के साथ रुस खड़ा है तो इसकी वजह बुनियाद का वह पहला पत्थर है जो पंडित नेहरु ने उस वक्त रखा था जब वे आधुनिक भारत के निर्माण में जुटे थे। और नेहरू की ताकत ही थी कि रूस ने तब नेहरू के सपने को पूरा करने न्यौछावर हो गया था।

तब रुस से यदि कुछ मिल रहा है,  मान-सम्मान आर्थिक मदद  उस मित्रता की बुनियाद का हिस्सा है जिसे भारत ने भी बखूबी निभाया।

भले ही मोदी समर्थक इस बात को प्रचारित करते रहे कि रूस ने जो सम्मान दिया है वह मोदी की ताकत का फल है। लेकिन सच तो यह है कि रूस का सम्मान इस देश के प्रधानमंत्री के लिए है जो मित्रता की उस बुनियाद का हिस्सा है जिसका पहला पत्थर पंडित नेहरू ने रखा और रचा है।

रुस जानता है कि भारत के दिल में रुस कहाँ है सर पर लाल रूसी टोपी, जिसे मोदी ने भी गुनगुनाया वह नेहरू और भारत की सोच से निकला ही गीत था।

तब पंडित नेहरु का कद क्या सरदार पटेल की सबसे ऊंची मूर्ति बनाकर की जा सकती है। मोदी समर्थकों को 'भारत एक खोज' पढ़‌नी चाहिए और यदि वे इसे नेहरू की वजह से नहीं पढ़ रहे है तो राष्ट्रीय कवि रामधारी सिह दिनकर की वह 186 पेज की किताब जरूर पढ़‌नी चाहिए ताकि वे झूठ और अफवाह से अपने को ही नहीं इस देश को भी बचा ले। 

तब आस्ट्रि‌या दौरे का सच क्या वे लोग पचा पायेंगे जो झूठ और अफवाह की राजनीति में फँसे हुए हैं।

आस्ट्रिया की यात्रा  में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  ने शायद सपने में भी नहीं  सोचा रहा होगा कि पंडित नेहरू की ऊंचाई उन्हें यहां भी बौना साबित कर देगी। यात्रा के दौरान जब आस्ट्रि‌या के चांसलर कार्ल नेहमर ने कहा कि पंडित नेहरू की ठोस मध्यस्थता की वजह से 1955 में आस्ट्रिया एक अलग देश बना।

इस पर मोदी ज़रूर हतप्रभ  रह गये होंगे! 


लेकिन सच यही है कि डंका यदि आज रही दुनिया में भरात का बज रहा है तो इसरी वजह नेहरू  का रखा बुनियाद ही है।

शुक्रवार, 12 जुलाई 2024

एम्स रायपुर में टेंडर घोटाला

एम्स रायपुर में टेंडर घोटाला
चहेते को ठेका देने एकता हुई

(विशेष-प्रतिनिधि)


छत्तीसगढ़ की राजधानी स्थित अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान (AIMS) में लाखों रुपये का टेंडर घोटाला सामने आया है। इस टेंडर घोटाला में चहेते ठेकेदार को टेडर देने न केवल दो बार निविदा आमंत्रित की गई बल्कि दूसरी निविदा में भाग लेने वालों का टेडर खोला ही नहीं गया। और  उस ठेकेदार को टेंडर दे दिया जो एक करोड़ के टर्न ओवर वाली शर्त को पूरा नहीं करता।
इस घोटाले को लेकर जो खबरें आ रही है वह हैरान करने वाली इसलिए भी है क्योंकि इस खेल में दिल्ली से आई किसी महिला का नाम सुर्खियों में है। और कहा जा रहा है कि अभी इसे तरह के करोड़ों रुपये का टेंडर अभी और होना है।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार रायपुर एम्स ने एम्स में आयोजित एक कार्यक्रम में टेंट, एलईडी वॉल,फ्लावर और फ़्लैक्स सहित विभिन्न साज सज्जा के लिए टेंडर जारी किया था।

३० मई को पहला टेंडर खोला गया। इस काम के लिए 3 कंपनियों ने टेंडर में हिस्सा लिया था, जिसमें मैवरिक एल-1 था। जबकि इवेंचुरी और व्यापक की दर में काफी अंतर था। कहा जाता है कि एल-1 आने वाली कंपनी मैवरिक ने इस काम को सबसे कम दर पर करने को तैयार भी हो गया था जबकि व्यापक इसी काम के लिए 65 लाख की राशि बताया था, लेकिन मैवरिक को वर्क ऑर्डर यह कहकर देने से इंकार करते हुए टेंडर ही रद्द कर दिया गया कि फाईनेस किट इन कम्पलीट है जबकि जो कालम छूटे थे इसे फुल-फिल किया जा सकता था।
 कहा जाता है कि इसके बाद चहेते ठेकेदार को काम देने फिर से टेंडर निकाला गया जिसे 26- जून को खोला गया । इस दूसरे टेंडर में 6 कंपनियों ने हिस्सा लिया लेकिन चार कंपनियों ने प्रजेंटेशन नहीं दिया तो उनका टेंडर अमान्य हो गया।

अब मुकाबले में केवल दो कंपनियां इवेन्चुरी और मैवरिक ही  रह गये थे। लेकिन मैवरिक का टेंडर यह कहकर खोला नहीं गया कि अप टू मार्क पर प्रज़ेंटेशन  नहीं है जबकि इसी कंपनी की निरस्त होने वाले टेंडर में प्रजेंटेशन को माना गया था और टेंडर दिया गया था। फिर सेम प्रजेंटेशन के बाद अप टू मार्क प्रजेटेशन के नाम पर निरस्तकैसे किया जा सकता था, और यहीं से  टेंडर में गड़बड़ी का संकेत साफ़ हो जाता है।

इधर सूत्रों का यह भी दावा है कि टेंडर भरने की शर्त में टर्न ओवर एक करोड़ रूपये की शर्त रखी गई की लेकिन जिस कंपनी को यह टेंडर मिला है उसका टर्न ओवर 50 लाख भी नहीं है ऐसे में उन्हें टेंडर कैसे दिया गया।
दूसरी तरफ़ यह भी कहा जा रहा है कि एम एस एम ई के तहत टर्न ओवर में छूट देकर दूसरों का टेंडर ही नहीं खोला गया।जबकि कहा जा रहा है कि यदि यह छूट दी जानी थी तो टेंडर में एक करोड़ टर्न ओवर की शर्त क्यों रखी गई। और यह शर्त नहीं रखी जाती तो एमएसएमई वाली कई दूसरी कंपनियां भी भाग लेती और एम्स रायपुर का पैसा बच जाता।
लेकिन चहेते कंपनी को ठेका देने के लिए किस तरह की एकता हुई यह एम्स के कालेज बिल्डिंग के पहली मंजिल पर जाते ही समझा जा सकता है।
बताया जाता, है कि इस पूरे खेल में या प्रबंधन की भूमिका को लेकर सवाल तो उठ ही रहे हैं और इस घोटाले के लिए एकता की चर्चा भी खूब जोरशोर से चल रही है।
इस संबंध में जब हमारे संवाददाता ने एम्स प्रबंधन से बात करने की कोशिश की तो वे उपलब्ध नहीं थे।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि एम्स में आये दिन इस तरह  के कार्यक्रमों के लिए आनलाईन टेंडर जारी होता रहता है और ऑनलाईन टेंडर में हस तरह की गड़बड़ी  हो रही है तब आसानी से समझा जा सकता है कि किस ताह से शासन को करोड़ों रुपये का चूना लगाया जा रहा है।

सगाई का खर्चा सरकारी खजाने से...

 सगाई का खर्चा सरकारी खजाने से...

आठ हजार रुपये प्रति प्लेट का खाना खिलाया..


ऐसा पहली बार नहीं हुआ जब संघ और भाजपा के संस्कारितों ने सरकारी खजाने पर लूट मचाई हो। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद - धर्म - राजनैतिक सुचिता नैतिकता और बेहतर संस्कार । यही तो संघ का ध्येय वाक्य है।

लेकिन यह सब तभी तक है जब तक सत्ता न मिली हो, कुर्सी न मिली हो। और कुर्सी मिलते ही पैसों की भूख किसी आवारा पशु की तरह दिखः जाता है।

इलेक्ट्रान बॉण्ड, पीएम केचर फंड, नोट बंदी और उ‌द्योगपतियों के कर्ज माफ करने या राईट ऑफ़  करने के नाम पर वसूली का खेल किस तरह खेला गया यह किसी से छिपा नहीं है।




तब जम्मू कश्मीर  के उपराज्यपाल मनोज सिंहा ने यदि बेटे की सगाई का खर्चा जम्मू कश्मीर के खजाने से भर दिया तो फिर उनकी राष्ट्र‌वादिता पर सवाल क्यों ।

दरअसल इसकी शिकायत अब पीएमओ में की गई है कि मनोज सिंहा ने अपने बेटे की सगाई दिल्ली में की है। इस सगाई समारोह में सौ से अधिक वीआईपी मेहमान थे। जिसका केटरिंग का बिल क़रीब ग्यारह  लाख रुपये आया। यानी लगभग आठ हजार रुपये प्लेट। ये बिल जम्मू कश्मीर सरकार से भरवा दिया गया।

 पीएमओ से की गई शिकायत में वैसे तो कई तरह की शिकायत है लेकिन  गाजीपुर से सांसद रहे मनोज सिंहा के बारे में कहा जाता है कि वे छात्र जीवन से ही संघ और भाजपा का संस्कार लेते रहे हैं, और इसके परिणाम स्वरूप वे केद्र मैं मंत्री भी रहे तो उन्हें जम्मू कश्मीर का उपराज्यपाल की बनाया गया ।

सवाल कई है ख़ासकर  धर्म का चश्मा पहनाकर लूट मचाने का लेकिन सवाल पूछने वाले को यदि देश द्रोही का तमगा मिलने लगे तो...।

आप तय कीजिए  कि धर्म का  आड़ में किस तरह का खेल चल रहा है और कैसे संस्कार मिला या सिखाया गया है।




द वायर की रिपोर्ट के अनुसार अब्दुल्ला ने कहा, "चाहे उनके लिए खरीदे गए वाहन हों, किराए पर लिए गए निजी जेट हों या उनके मेहमानों पर खर्च किए गए करोड़ों रुपये हों, एलजी जम्मू-कश्मीर को अपनी निजी जागीर समझते हैं, जो इस बात से स्पष्ट है कि कैसे यातायात को 25-30 मिनट तक रोक दिया जाता है ताकि वह बिना देरी के यात्रा कर सकें।"

एलजी के तत्कालीन प्रधान सचिव नीतीश्वर कुमार को संबोधित और सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा किए गए 6 अप्रैल, 2021 के एक कथित आधिकारिक संचार के अनुसार, नई दिल्ली में जम्मू और कश्मीर के रेजिडेंट कमिश्नर ने एलजी सिन्हा के कार्यालय के निर्देशों का पालन करते हुए 2 फरवरी, 2021 को 7 अकबर रोड पर दोपहर के भोजन, रात के खाने और सजावट की व्यवस्था की थी।

पत्र में कहा गया है, "इस निजी समारोह के लिए हमारे कार्यालय द्वारा कुल 10,71,605 रुपये का भुगतान किया गया। हम अनुरोध करते हैं कि इस मुद्दे को हल करने के लिए यह राशि राजकोष में जमा कर दी जाए।"

जम्मू-कश्मीर के पूर्व कानून सचिव अशरफ मीर ने इसकी आलोचना करते हुए इसे केंद्र शासित प्रदेश के प्रमुख द्वारा घोर उल्लंघन और सार्वजनिक धन के दुरुपयोग का स्पष्ट मामला बताया है।

मीर ने द वायर को बताया, "चूंकि जम्मू-कश्मीर एक केंद्र शासित प्रदेश है, इसलिए भारत की समेकित निधि से धन को संसद द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिए और राज्य कल्याण या सार्वजनिक हित के उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए। व्यक्तिगत कार्य इस श्रेणी में नहीं आते हैं।"

गुरुवार, 11 जुलाई 2024

संघ का खेल, शंकराचार्य फेल

 संघ का खेल, शंकराचार्य फेल

करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान 

रसरी आवत जात है, सील पर पड़त निशान ।


वृंद सतसई ने यह दोहा लिखते समय यह नहीं सोचा होगा कि इसका उपयोग नरैटिव बनाने के लिए भी जब किया जायेगा तो लोग झूठ को भी सच मान बैठेंगे। हालांकि हिटलर ने बहुत पहले ही कह दिया था कि किसी झूठ को बार-बार बोलने से वह सच लगने लगता है। 

और इस खेल को क्या संघ यानी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने इस तरह खेला कि अब हिन्दू‌ओं के सर्वोच्च गुरु की बातों की बजाय समाज संघ और बीजेपी के हिंदुत्व पर ही भरोसा करने लगी। 

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हो चला है क्योंकि हाल की दो घटनाओं में हिंदू समाज के एक बड़े वर्ग ने न केवल हिन्दू समाज के सर्वोच्च गुरु शंकराचार्यों की बातों की बजाय संघ के प्रचारक रहे  देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बातों का समर्थन ही नहीं किया बल्कि शंकराचार्यों के खिलाफ विषवमन करते नजर आये।

पहली घटना राममंदिर के प्राण प्रतिष्छा समारोह से जुड़ी है, इस मामले में प्राणप्रतिष्ता समारोह को लेकर शंकराचार्यों ने जब आपत्ति की, और इसे पूरे समारोह को धर्म-शास्त्र के खिलाफ बताते हुए इसके गंभीर दुष्परिणाम की चेतावनी भी दी।

लेकिन स्वयं को धार्मिक मानने वाले या धर्म का रक्षक बताने वाले संघ ने ही शंकराचार्यो की बात नहीं मानी और न ही हिदुत्व का बखेड़ा खड़ा करने वाली पार्टी भाजपा ने ही शंकराचार्यों का कहा माना। इतना ही नहीं शंकराचार्यों की नाराजगी की खबर पर इन संगठनों से जुड़े लोगों ने शंकराचार्यों की आलोचना करना शुरू कर दिया ।

दूसरी घटना संसद में राहुल गांधी के द्वारा हिंदुओं को कथित तौर पर हिंसक बताने वाले बयान से जुड़ा है। राहुल गांधी ने संसद में जिस तेवर के साथ मोदी, भाजपा और संघ  पर हिंसा फैलाने, डराने दौर नफरत फैलाने का आरोप लगाया उसके बाद ख़ुद देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहना शुरू कर दिया कि राहुल गांधी ने हिन्दु समाज को हिंसक बताया है।

इसके बाद देश भर में किस तरह से संघ और भाजपा से जुड़े संगठनों ने धमाचौकड़ी मचाई, वह किसी से छिपा नहीं है।

इस धमाचौकड़ी को रोकने जब शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद जी सामने आकर कहा कि राहुल गांधी ने हिन्दू समाल को हिसक नहीं कहा है और उन संगठनो को हिंसक कहा  है, तब भी न तो भाजपा सुनने को तैयार है और न ही संघ से जुड़े संगठन ही प्रदर्शन रोक रहे हैं ।

यानी इस घटना के बाद भी शंकराचार्यों की अवहेलना की जा रही है तब यह सवाल इसलिए भी बड़ा हो जाता है कि क्या संघ और भाजपा ने स्वयं को हिंदुओं का ठेकेदार और रक्षक के रूप में जो प्रचारित-प्रसारित किया है (सालों से) वह अब आम लोगों के दिलो-दिमाग में इस कदर बैठ गया है कि सर्वोच्च गुरु भी अब उनके  लिए कोई मायने नहीं रखता ।