मंगलवार, 22 जून 2021

संघ का करतूत अयोध्या में दिखा...?

 

श्रीराम के नाम पर ठेकेदारी करने वालों को प्रभु राम ने पूंजी-सत्ता सब सौंप दी है लेकिन उनकी नियत अब भी साफ नहीं है और अब तक श्रीराम मंदिर निर्माण के नाम पर जिस तरह की धोखाधड़ी, छल, चंदाखोरी और दूसरे मामले सामने आने लगे हैं उसके बाद तो यह कहना मुश्किल हो गया है कि श्री राम के नाम पर लूट की प्रतिस्पर्धा नहीं चल रही है।

ताजा मामला तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा खरीदी जा रही जमीनों की वैधानिक और राशि को लेकर मामला सामने आया है। पहले मामले में अयोध्या  के मेयर शामिल है तो दूसरे मामले में मेयर का भांजा शामिल है। संघ के चंपत राय की भूमिका तो किसी से छिपी ही नहीं है। हालत यह है कि संघ, भाजपा से जुड़े लोग कम कीमत पर जमीन खरीद कर मंदिर ट्रस्ट को ज्यादा कीमत में जमीन धड़ल्ले से बेच रहे है और राम के नाम पर सत्ता में काबिज लोगों को इसमें कुछ भी गलत नहीं दिखता। तब यह पैसों का बंदरबांट नहीं तो और क्या है।

अयोध्या के मेयर ऋषिकेश उपाध्याय के भांजे दीप नारायण ने दशरथ महल बड़ास्थान के महंत से जो जमीन बीस लाख में खरीदी उस जमीन को ट्रस्ट को ढाई करोड़ में बेच दी। दस्तावेज देखते ही पहली नजर में सब गड़बड़झाला दिख रहा है। राजस्व विभाग के अधिकारी भी इस रजिस्ट्री पर खुलेआम उंगली उठा रहे है लेकिन न ट्रस्ट की बेशर्मी रुक रही है और न ही सत्ता की बेशर्मी।

तब सवाल यही है कि जो संघ अपने को संस्कार, चरित्रनिर्माण और पता नहीं किस-किस तरह की नैतिकता सिखाने का दावा करता है वह क्या ऐसा ही संस्कार और चरित्र निर्माण करता है। हालांकि हमने पहले भी कहा है कि संघ ने जिस तरह से इस देश को धर्म के नाम पर नफरत में झोका है, राष्ट्रपिता की हत्या में शामिल होने क आरोपों के अलावा कितने ही आरोप संघ पर है और आजादी के बाद से अब तक संघ की गतिविधियों पर चार बार बंदिश भी लग चुका है तब सवाल यही है कि देश के लिए जरूरी क्या है।

श्रीराम जन्मभूमि के नाम पर चंदा हजम करने का आरोप न तो नया है और न ही भाजपा का झूठ ही नया नहीं है। पहले के चंदे का हिसाब आज तक नहीं हुआ और अब नये चंदे में जिस तरह के घपले सामने आ रहे है उसके बाद तो संघ के संस्कार पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

रविवार, 20 जून 2021

हिन्दू-मुस्लिम के अलावा कोई मुद्दा नहीं...

 

जिस काला धन को विदेश से वापस लाने का दावा कर सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी अब खामोश है और काला धन दो गुना हो गया, जिस महंगाई को कम करने का दावा था वह भी लगभग दो गुना हो गया, दो करोड़ लोगों को रोजगार देने का दावा ने तो कितनो की ही नौकरी छीन ली। न आतंकवादियों का कमर टूटा न भ्रष्टाचार का खेल ही खत्म हो रहा है उसके बाद भी भाजपा यदि चुनावों में जीत का दावा कर रही है, आयेगा तो मोदी ही का दावा कर रही है तो इसका मतलब साफ है कि धर्म अब जहर बन चुका है और राष्ट्रवाद कोढ़।

देश में सबका साथ सबका विकास का नारा जब जुमला बन जाए और जनता से किये वादों पर सत्ता की चुप्पी हो तो फिर चुनाव जीतने का सशक्त माध्यम झूठ-नफरत और अफवाह के अलावा कुछ हो भी नहीं हो सकता। पिछले 90-95 साल से या यूं कहें कि आजादी के बाद से धर्म को लेकर नफरत का जो बीज बोया गया वह परवान चढ़ चुका है और जब तक आदमी स्वयं धोखा नहीं खायेगा तब तक यह परवान उतरने वाला भी नहीं है।

यही वजह है कि इस देश में चल रहा किसान आंदोलन अपने रिकार्ड दिन गितने आगे बढ़ रहा है और सत्ता इस आंदोलन से इसलिए भी विचलित नहीं है क्योंकि वह जानती है धर्म का जहर फैल चुका है। हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति सत्ता तक पहुंचने के लिए ज्यादा सुविधाजनक रास्ता है तब वह किसान की नाराजगी से क्यों विचलित हो। विचलित तो वह पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम और इसे लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शन से भी नहीं है क्योंकि अब भी ऐसे जहर बुझे लोग हैं जो साफ कहते हैं कि हिन्दु धर्म को बचाने वे दो सौ रुपए लीटर या उससे अधिक में भी खरीदी कर सकते हैं। यानी महंगाई भी इस हिन्दू-मुस्लिम के आगे बौनी है। आप चिखते रहे महंगाई डायन खाय जात हे और डायन धर्म की राजनीति के सहारे सत्ता तक पहुंचा देगी।

ऐसे में राहुल गांधी को छोड़ शेष कांग्रेसी अब भी सिर्फ प्रदर्शन के नाटक पर निर्भर है तो इसका मतलब साफ है कि सत्ता की मनमानी को रोकने का कोई कारगर न तो उपाय है और न ही नफरत की राजनीति का कोई तोड़ ही है। इस खेल में इन दिनों पूंजी महत्वपूर्ण हो चला है और यदि पूंजी भी सत्ता के साथ है तब बर्बादी का नया अध्याय लिखा जायेगा। यही वजह है कि सत्ता अब विदेशी बैंक में बढ़ रहे पूंजी के प्रति लापरवाह है, उन्हें उन लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं करनी है और न ही नाम ही सार्वजनिक करने हैं क्योंकि चुनाव में बांटे जाने वाले काले धन विदेशों से ही आयेंगे। 

तब सवाल यही है कि आम आदमी क्या करे, क्योंकि सत्ता ने तो विरोध के स्वर को पहले ही पप्पू घोषित कर रखा है और जनता भी उन्हें पप्पू मान चुकी है इसलिए जैसे तैसे परिवार चलायें, मस्त रहें सत्ता तो उन्हीं की रहेगी।

शुक्रवार, 18 जून 2021

विरोध के स्वर...

 

राजनीति जो करा दे वह कम है, और जब सवाल अस्तित्व बचाने का हो तो राजनीति किसी नौटंकी से कम नहीं होता। ये हाल है छत्तीसगढ़ में भाजपा की। छत्तीसगढ़ में 15 साल की सत्ता का सुख भोगने वाली भाजपा लगभग दर्जनभर सीट में सिमट गई है और इन दिनों वह एक बार फिर अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। यह लड़ाई कम नौटंकी ज्यादा है कहा जाए तो कम नहीं होगा। क्योंकि एक तरफ पूरे देश में आम आदमी जिस तरह से केन्द्र सरकार की नीतियों के चलते महंगाई और बेरोजगारी से त्रस्त है केन्द्र की लापरवाही के चलते कोरोना महामारी से जूझ रहे हैं, वैक्सीन की कमी बड़ा मुद्दा  है उसे छोड़ छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी कुछ और ही मुद्दों पर आंदोलन करने जा रही है। ये वे मुद्दे हैं जिसके बारे में डॉ. रमन सिंह की सरकार ने 15 साल कुछ नहीं किया।

दरअसल मोदी सत्ता की लापरवाही से हुए कोरोना नरसंहार के बाद भाजपा के सामने प्रधानमंत्री मोदी की छवि की चिंता है, महामारी के इस दौर में आक्सीजन की कमी और दवा की कालाबाजारी भारतीय जनता पार्टी के लिए कभी मुद्दा नहीं बना, पेट्रोल, डीजल, खाद्य तेलों के अलावा राशन की बढ़ती कीमत भी भाजपा के लिए इन दिनों कोई मुद्दा नहीं है क्योंकि यदि वे इसे मुद्दा बनायेंगे तो फिर प्रधानमंत्री की छवि का क्या होगा।

हैरानी की बात तो यह है कि 15 साल सत्ता में रहने के दौरान जिन पर शराब की नदिया बहाने, दारु वाले बाबा की तोहमत लगने और जिनके राज में शराब ठेकेदारों के हाथों दस-दस हजार में थाना खरीदे जाने का आरोप लगता रहा है वे अब वादा निभाओं और भूपेश सरकार के ढाई साल को असफल बताते हुए आंदोलन कर रहे हैं। असल में यह जनता के लिए आंदोलन के नाम पर राजैतिक नौटंकी है कहा जाए तो गलत नहीं होगा। क्योंकि यह हर व्यक्ति जानता है कि आज जनता के लिए असल मुद्दा महंगाई और बेरोजगारी के साथ कोरोना है ऐसे में मोदी सरकार  की टैक्स नीति के चलते आम आदमी व्यापारी किसान मजबूर किस तरह से परेशान है यह किसी से छिपा नही है।

एक तरफ छत्तीसगढ़ भाजपा अपने अस्तित्व बचाने छटपटा रही है तो दूसरी तरफ देश की सत्ता अपनी छवि चमकाने विरोध के स्वर या असहमति के स्वर को कुचल देना चाहती है। जो ट्वीटर कभी भाजपा के लिए अभिव्यक्ति की आजादी का  सबसे बेहतर हथियार था वही ट्वीट के खिलाफ अब पूरी सत्ता की ताकत लगी है। सत्ता की ताकत तो विरोध में प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ भी लगी है। यूएपीए कानून का जिस  तरह से बेजा इस्तेमाल किया गया वह किसी से छिपा नहीं है, पढऩे-लिखने वाले छात्रों, कलाकारों, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों को जेल में डाला गया और इसके बाद कोर्ट ने जो तीखी टिप्पणी की वह कौन नहीं जानता।

गुरुवार, 17 जून 2021

पैसा खुदा से कम नहीं...

 

आर्थिक झंझावतों से गुजर रहे देश की राजनीति भी इन दिनों प्रसव वेदना से गुजरने लगी है, देश की सबसे बड़े राजनैतिक दल के भीतर भी सब कुछ ठीक नहीं है, उत्तरप्रदेश, कर्नाटक, मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों में गड़बड़झाला है कई राज्यों में स्थिति डावाडोल है लेकिन हम आज बात करेंगे, देश की सबसे बड़ी पार्टी कहलाने वाली भाजपा की।

वैसे तो भाजपा पर नरेन्द्र मोदी, अमित शाह की मजबूत पकड़ है और वे जो चाहे पार्टी में वही होगा तब सवाल यही है कि क्या भाजपा में अधिनायकवाद ने कदम बढ़ा दिया है। हालांकि भाजपा नेताओं के तमाम दावों के बाद भी हमारा शुरु से मानना रहा है कि जिस तरह से कांग्रेस में गांधी परिवार के इतर कुछ भी नहीं है उसी तरह भाजपा में संघ परिवार की स्थिति है।

देशभर की तमाम पार्टियों को परिवारवाद के नाम पर गरियाने वाली भाजपा में भी वहीं होता है जो संघ परिवार चाहता है, लेकिन स्थिति में थोड़ा बदलाव हुआ है और अब वही होगा जो गुजरात गैंग चाहता है। गुजरात गैंग क्या है और इनमें कौन कौन लोग जुड़े हैं इस पर कभी विस्तार से जानकारी दी जायेगी। अभी तो भाजपा के भीतर की स्थिति को समझने की कोशिश होनी चाहिए।

वैसे तो भाजपा को शुरु से ही पूंजीवादियों, व्यापारियों की पार्टी कहा जाता रहा है लेकिन अटल-अडवानी की जोड़ी के हटने के बाद यह साफ तौर पर दिखने भी लगा है कहा जाए तो गलत नहीं होगा। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि संघ किनारे कर दिये गए है बल्कि सवाल यह है कि वर्तमान परिदृश्य में क्या पैसा और पूंजी ही महत्वपूर्ण हो चला है और जिसके पांस पूंजी की ताकत होगी वही पार्टी को अपने हिसाब से चलायेगा?

तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि संघ की भूमिका इतनी बेबस क्यों है? इसके लिए इतिहास में ज्यादा दिन पीछे जाने की जरूरत नहीं है। यह 2013-14 की ही बात है। कांग्रेस के खिलाफ पूरे देश में माहौल था और संघ को सत्ता की राह आसान तो दिख रहा था लेकिन वह हर  कदम सोच समझ कर चलना चाहते थे। ऐसे में मामला आडवानी और मोदी के बीच जा फंसा। भाजपा का एक बड़ा वर्ग चाहता था कि आडवानी के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाए लेकिन संघ ने एक दांव खेला कि पैसा कौन लायेगा। यानी पूंजी की जवाबदारी के आगे आडवानी मौन रह गये और नरेन्द्र मोदी ने बाजी मार ली। आखिर तीन बार के मुख्यमंत्री और सहारा डायरी तो इसका संकेत था ही।

और जब संघ और पूरी भाजपा ही पूंजी के आगे नतमस्तक हो तब फिर सवाल बेमानी है कि पार्टी कौन चलायेगा। और यह बात न केवल नरेन्द्र मोदी जानते है बल्कि पूरा गुजरात गैंग जानता है कि जब तक पूंजी की ताकत रहेगी उनका न तो योगी आदित्यनाथ ही कुछ कर पायेगा और न ही संघ ही कुछ कर पायेगा।

यही वजह है कि गुजरात गैंग ने सबसे पहले योगी आदित्यनाथ का पर कतर देना चाहते हैं क्योंकि मोदी के बाद कौन के सवाल पर अब भी योगी ही है। जबकि योगी से पहले अमित शाह थे। इसलिए उत्तरप्रदेश की दमदारी और कट्टर हिन्दू चेहरा के बाद भी यदि योगी पर वार हो रहे हैं और संघ तथा पूरी भाजपा इसे खामोशी से दख रहा है तो जान लीजिए की पूंजी की ताकत ने अपना प्रभाव जमा लिया है।

बुधवार, 16 जून 2021

संघियों का ये कैसा राष्ट्रहित...

 

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के बारे में कहा जाता है कि उसके संघ चालक, प्रचारक सभी काम राष्ट्रहित में कते है, राष्ट्रहित की वजह से वे परिवार नहीं बसाते और राष्ट्र निर्माण में ही अपना पूरा जीवन समर्पित कर देते हैं।

तब सवाल यह उठता है कि राष्ट्रहित क्या है और संघ के राष्ट्रहित का क्या मतलब है। यह सवाल इसलिए उठाये जा रहे है क्योंकि अयोध्या में जो जमीन घोटाले का आरोप सामने आया है उसके केन्द्र में जो नाम चर्च में है वे हैं चम्पत राय। चम्पत राय विश्व हिन्दू परिषद के बड़े चेहरे रहे हैं और संघ के प्रचारक भी रहे है यानी संघ के अनुसार चम्पत राय जो भी काम करते है वह राष्ट्रहित और राष्ट्र निर्माण के अनुरुप होता है तब सवाल यही उठता है कि राम मंदिर निर्माण के लिए जो जमीन घोटाले की खबर आ रही है उसकी हकीकत क्या है।

हकीकत में देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर के लिए जो जमीन दी गई यानी 70 करोड़ जमीन के अलावा ट्रस्ट और जमीन क्यों खरीद रही है क्या इसके लिए कोर्ट से ईजाजत ली गई। दूसरा सवाल यही है कि क्या ट्रस्ट को कुछ भी कीमत पर जमीन खरीदने का अधिकार है। तीसरा सवाल उत्तरप्रदेश राजस्व अधिनियम के उल्लंघन का है कि आखिर रजिस्ट्रार ने बाजार दर से कम में रजिस्ट्री क्यों की और इसके एवज में होने वाली राजस्व घाटा के लिए क्या रजिस्ट्रार को बर्खास्त नहीं कर दिया जाना चाहिए या संघ के राष्ट्र हित कानून से उपर है।

ऐसे में सवाल यदि संघ के संस्कार पर भी उठ रहे हैं तो यकीन मानिये मोदी सरकार के इस दौर में संघ की प्रतिष्ठा भी गिरी है क्योंकि नरेन्द्र मोदी भी संघ के प्रचारक रहे हैं और राजनैतिक शुद्धिकरण के चलते संघ में आये हैं चूंकि प्रचारक राष्ट्रहित में काम करते है और परिवार के झंझट में नहीं पड़ते इसलिए नरेन्द्र मोदी के शादीशुदा होने के बाद भी प्रचारक बनना  और न बनना किसे धोखा देना था यह संघ ही जाने। संघ प्रचारक अटल बिहारी वाजपेयी जी भी रहे और गुजरात कांड के बाद एक संघ प्रचारक जो राष्ट्रहित में ही काम करते हैं दूसरे संघ प्रचारक नरेन्द्र मोदी को राष्ट्र धर्म सिखलाने गुजरात जाते है तो कौन राष्ट्रहित का काम कर रहे थे यह भी संघ जाने।

तब सवाल यही है कि क्या संघ के प्रचारक राष्ट्रहित में ही काम करते हैं तब प्रचारक से प्रधानमंत्री बने नरेन्द्र मोदी का हर निर्णय क्या राष्ट्रहित में ही है। यह सवाल संघ के राष्ट्रहित की सोच को भी प्रदर्शित करता है कि आखिर नोटबंदी की लाईन में डेढ़ सौ लोगों की मौत क्या राष्ट्रहित में था, कोरोना की चेतावनी को नजर अंदाज करके नमस्ते ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सत्ता का लोभ क्या राष्ट्रहित का निर्णय था, रिजर्व बैंक का रिजर्व फंड का उपयोग यदि राष्ट्रहित का निर्णय मान भी ले तो क्या 8 लाख करोड़ रुपये उद्योगपतियों का राईट ऑफ करना राष्ट्रहित का निर्णय है? या बढ़ती बेरोजगारी बढ़ती महंगाई और टैक्स में बढ़ोत्तरी भी क्या राष्ट्रहित का निर्णय है।

चूंकि संघ के मुताबिक प्रचारक राष्ट्रहित में ही निर्णय लेते हैं इसलिए बंगारु लक्ष्मण से लेकर राघव जी का कार्य भी क्या राष्ट्रहित का ही है? तब सवाल यही है कि राम मंदिर ट्रस्ट को मिले चंदा का खर्च राष्ट्रहित में है और घोटाले तो हो ही नहीं सकते भले ही कानून का उल्लंघन हो जाए।

मंगलवार, 15 जून 2021

ज्ञान पर नफरत का ध्वजारोहण-4

 

1989 में सत्ता कांग्रेस के हाथ से निकल चुकी थी, बाफोर्स के भूत ने और परिवारवाद से चिढ़ ने भारतीय राजनीति को नई दिशा दी थी। यह वह दौर था जब लोगों को विश्वनाथ प्रताप सिंह से बहुत उम्मीद थी और इनके सामने न केवल पांच साल सरकार चलाने की चुनौती थी बल्कि फिर सत्तासीन होने की चुनौती थी।

वीपी सिंह ने धर्मनिरपेक्षता को जीवित रखने का प्रयास शुरु किया और मंडल कमीशन की सिफारिश लागू कर दी, समूचा पिछड़ा वर्ग इस फैसले से उत्साहित था, लेकिन हिन्दूत्व की राह में यह बड़ा रोड़ा हो सकता था। लालकृष्ण अडवानी ने सोमनाथ से अयोध्या तक राममंदिर निर्माण के लिए रथयात्रा का दांव चल दिया। रथयात्रा को रोकने पर सरकार गिरा देने की धमकी से एक बार फिर सरकार न चला पाने का दाग उभरकर सामने आ गया। भाजपा जो चाहती थी या संघ की सोच के अनुसार सब कुछ हो रहा था, गठबंधन की राजनीति ने एक बार फिर भाजपा को ताकतवर बना दिया था ऐसे में रथयात्रा को रोकने की हिम्मत कौन करे वह भी जब इस देश की भावना और आस्था से जुड़े प्रभु राम जी के नाम पर हो।

रथयात्रा की घोषणना ने देश की हवा में नफरत की फिंजा फैला दी, सामाजिक सौहाद्रर्य, गंगा जमुना संस्कृति, सामाजिक एकता डगमगाने लगा। कई जगह पर दंगे हुए, रक्तपात होने लगा। लेकिन इस यात्रा को रोकने की हिम्मत की लालू प्रसाद यादव ने। भाजपा अब तक स्वयं को ताकतवर तो समझ रही थी लेकिन वह जानती थी कि उस पर लगे साम्प्रदायिकता का दाग वह अकेले नहीं धो पायेगी। सरकार गिर गई लेकिन  कांग्रेस ने चन्द्रशेखर को समर्थन देकर चुनाव कुछ दिनों के लिए टाल दिया। लेकिन वह हिन्दू वोटों का धु्रवीकरण करने पर लगातार अपने वोट बढ़ा रही थी लेकिन अचानक वह हुआ जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

श्री पेरुबंदुर में राजीव गांधी को बम विस्फोट से उड़ा दिया गया। चुनाव चल रहा था, हिन्दी भाषी क्षेत्र में भाजपा ध्रुवीकरण करने में कामयाब हो रही थी लेकिन इस घटना ने भाजपा को फिर सत्ता से पीछे ढकेल दिया। नरसिंम्हन राव की अगुवाई में कुछ दलों के समर्थन से कांग्रेस सरकार बनाने में सफल हो गई थी और उधर सोनिया गांधी के विदेशी मूल के मुद्दे को लेकर कांग्रेस में फूट पडऩे लगी। नारायण दत्त तिवारी-अर्जुन सिंह जैसे नेता अपनी अलग राह चुन चुके थे।

पति के दुख की पीड़ा ने सोनिया गांधी को घर में कैद कर रखा था। विवाह के बाद भारतीय बहु का फर्ज निभाने वाली सोनिया गांधी पर जब पार्टी के भीतर ही विदेशी के बाण चले तो दूसरे कहां मौका छोडऩे वाले थे। एक तरफ कांग्रेस के भीतर ही लड़ाई चल रही थी तो दूसरी ओर साम्प्रदायिक शक्तियां सिर उठाने लगी। हालांकि भाजपा को अपनी ताकत दिखाने का मौका तो तभी मिल गया था जब शहबानों प्रकरण में बहुमत की ताकत से राजीव गांधी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले बदल दिये थे। ये तुष्टीकरण पर प्रहार माना गया और हिन्दू वोट खिसकने का डर से कांग्रेस इतनी भयभीत हो गई कि उसने हिन्दू वोटों की खातिर राम मंदिर का ताला खुलवा दिया। भूमिपूजन भी तय हो गया।

ये एक तरह से हिन्दू कुंठा की जीत थी। जो हिन्दू कुण्ठा प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु को सोमनाथ के जीर्णोद्धार के कार्यक्रम से दूर रखा था वह राजीव गांधी पर सफल हो गया था।  राम मंदिर के ताला खुलने के फैसले भले कांग्रेस ने किया लेकिन यह ध्रुवीकरण की राजनीति का नया मोड़ था। ज्ञान पर नफरत के ध्वजारोहण का एक और चरण था।

सोमवार, 14 जून 2021

राम नाम की लूट...

 

राम मंदिर निर्माण के नाम पर जिस तरह से भ्रष्टाचार करने की खबरें आ रही है, वह हैरान कर देने वाला है। हालांकि राम के नाम पर न तो दुकानदारी नई है और न ही लूट-मार की कहानी ही नहीं है लेकिन ताजा मामले में जिस तरह से राम मंदिर निर्माण ट्रस्ट पर दो करोड़ की जमीन  को दस मिनट के भीतर 18 करोड़ में खरीदी की गई वह साफ संकेत देता है कि राममंदिर ट्रस्ट में बैठे लोग किस तरह से मंदिर निर्माण की आड़ में अवैध रुप से पैसा कमाने में लगे हैं।

दरअसल आस्था के नाम पर जिस तरह खेल चल रहा है वह न तो समाज हित में है और न ही धर्म के हित में ही है। ताजा मामला एक ऐसे जमीन घोटाले और साजिश की ओर संकेत करते हैं जो लोगों की आस्था पर प्रहार है। वैसे तो राम मंदिर निर्माण के मुद्दे में जब से संघ और भाजपा ने हस्तक्षेप किया तभी से पैसों के हिसाब किताब को लेकर सवाल उठते रहे हैं, पिछली बार हुए हजार करोड़ से उपर के चंदे का कोई हिसाब किताब नहीं दिया गया और इस बार भी बीस हजार करोड़ से अधिक रकम इकट्ठा हुआ है।

ऐसे में जिस तरह से जमीन घोटाले की खबर सामने आई है उसके बाद ट्रस्ट से जुड़े लोगों की भूमिका और नियत पर सवाल उठ रहे हैं। इस घोटाले का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ट्रस्ट से जुड़े लोगों ने राम के नाम पर किस तरह से लूट मचा रखी है। चूंकि पूरे प्रकरण का दस्तावेज सार्वजनिक हो गया है तब ट्रस्ट निर्माण करने वालों की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।

राम के नाम पर इस तरह से कोई घोटाला करेगा यह सोचा ही नहीं जा सकता था लेकिन पूरे प्रकरण में जिस तरह का खेल खेला गया उसमें सत्ता की भागीदारी से भी इंकार नहीं किया जा सकता। ट्रस्ट के सचिव चंपत राय और ट्रस्ट के एक सदस्य अनिल शर्मा के मिलीभगत से केवल दस मिनट में जमीन की कीमत 2 करोड़ से बढ़कर 18 करोड़ हो गई और हैरानी तो यह है कि जमीन खरीदने के लिए स्टाम्प की खरीदी भी जमीन बिकने के दस मिनट पहले ही कर ली गई। यानी जिस जमीन को दो करोड़ में खरीदा जाना था उसे 18 करोड़ में खरीदने के लिए स्टाम्प दो करोड़ में खरीदने के पहले ही खरीद लिया गया। यही नहीं दोनों ही खरीदी बिक्री में ट्रस्ट के सदस्य अनिल शर्मा और अयोध्या के मेयर गवाह भी बन गए।

ऐसे में सवाल यह है कि मोदी सत्ता ने जो ट्रस्ट बनाई है वह क्या कर रही है। हालांकि संघ और भाजपा पर राम के नाम पर राजनीति करने और  लोगों की आस्था से खिलवाड़ करने का आरोप पहले भी लगता रहा है लेकिन इस जमीन घोटाले में रजिस्ट्री के दस्तावेज सामने आने के बाद सब कुछ साफ होने लगा है। देखना है कि इस घोटाले को दबाने के लिए सत्ता का प्रभाव कहां तक जाता है।