पिछले हफ्ते फ्रांस से खबर आई कि वहां के युवाओं ने सडक़ पर निकल कर न केवल हंगामा किया बल्कि आगजनी से लेकर तोड़-फोड़ भी जमकर की। फ्रांस की पुलिस को उन्हें संभालने में पसीने छूट गए। ऐसा नहीं है कि हंगामा करने वाले युवा बगैर मतलब के सडक़ पर उतर आए। दरअसल ये युवा फ्रांस सरकार के उस फैसले के खिलाफ सडक़ पर उतर आए जिसमें सरकार ने सेवानिवृत्ति की आयु 60 साल से 62 साल कर दी। लालफीता शाही का दबाव फ्रांस में भी जबरदस्त है और सरकार चंद अफसरों के इशारे पर सेवानिवृत्ति की आयु 2 साल बढ़ाने का निर्णय लिया था। फ्रांस के युवाओं का कहना था कि इस तरह से सरकार का निर्णय नौकरी की निर्धारित आयु सीमा के अंतिम सालों पर खड़े युवाओं के लिए मौत का फरमान है। युवाओं के अपने तर्क थे। कुछ ने इसे वोट बैंक करार दिया तो कुछ ने ऐसे कर्मचारियों का षडय़ंत्र करार दिया जिनके बच्चे स्टेबलीस हो चुके हैं। फ्रांस के युवाओं के इस प्रदर्शन से सरकार को झुकना पड़ा है।
भारत में भी यही सब कुछ हो रहा है। युवाओं को छला जा रहा है। खासकर छत्तीसगढ़ में सेवानिवृत्ति की आयु 60 से 62 किए जाने की मांग शुरु हो गई है। लेकिन युवाओं का यहां पता नहीं है। हालांकि कर्मचारियों का एक वर्ग ही इसका विरोध कर रहा है लेकिन 60 से 62 कराने के षडय़ंत्र में शामिल लोगों की कमी नहीं है। यहां तो युवाओं को कांग्रेस व भाजपा ने लालीपॉप थमाकर अपने पाले में कर लिया है कोई एनएसयूआई के बहाने कांग्रेस की राजनीति कर रहा है तो कोई अभाविप के बहाने भाजपा की राजनीति कर रहा है। छात्र नेता अपने आकाओं के इशारे पर काम करते हैं। न उन्हें शिक्षा के व्यवसायीकरण की चिंता है और न ही स्कूल-कॉलेज की मनमानी का ही ख्याल है। यहां तक की कमी और जर्जर भवन के खिलाफ भी छात्र नेता नहीं बोलते।
इसी रायपुर की बात है जब युवाओं पर राजनीति हावी नहीं थी तब टॉकीज में टिकिट की कीमत बढ़ा देने या सिलाई दर बढ़ जाने पर छात्र नेता सडक़ पर उतर आए थे। अब वह सब नहीं दिखता। भाजपा या कांग्रेस का पट्टा डाले युवाओं का जोश चंद रुपयों में ठंडा पड़ चुका है। ऊपर से शिक्षा के व्यवसायीकरण और भारी कोर्स ने उन्हें स्वार्थी बना दिया है। छत्तीसगढ़ शांत प्रदेश जल रहा है। चौतरफा लूट मची है। लेकिन कोई कुछ नहीं बोल रहा है युवाओं का जोश ठंडा पड़ चुका है अब तो मशहूर ‘दुष्यंत’ भी दुखी होकर सोचते होंगे कि क्या वे इन्हीं युवाओं के लिए लिखे थे कि
‘कैसे आकाश में सुराख नहीं होगा
एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।’
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
मंगलवार, 26 अक्टूबर 2010
सोमवार, 25 अक्टूबर 2010
अब आम आदमी क्या करे...
पिछले दिनों ठाकुर प्यारे लाल सिंह और हरि ठाकुर की प्रतिमा के सामने जो कुछ भी हुआ वह अराजकता की स्थिति मानी जा रही है। देवांगन समाज के साथ सर्व छत्तीसगढिय़ा समाज ने कानून-व्यवस्था को ठेंगा बताकर जीई रोड पर घंटो हंगामा किया। ये लोग अचानक सडक़ पर नहीं आए थे। बुनकर समाज की जमीन को कब्जे से मुक्ति दिलाने का आंदोलन एकाएक उग्र नहीं हुआ था। उनकी सालों पुरानी मांग रही है। बालकृष्ण अग्रवाल इस शहर के लिए नया नाम नहीं है। और न ही उसके कारनामें से ही लोग अनजान रहे है। अजीत जोगी से लेकर बृजमोहन अग्रवाल से उनके मधुर संबंध जग जाहिर रहे हैं। अग्रोहा सोसायटी से लेकर अपहरण कांड के कितने ही गवाह हैं। लेकिन सरकार ने कभी भी उस पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं की। पुलिस भी थर-थर कांपती नजर आती है।
मैं एक बात सरकार से पूछता हूं कि जब कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि लीज की जमीन का और लीज नहीं हो सकता फिर भी देवांगन समाज को न्याय मिलने में देर क्यों हो रही है। ऊपर से वहां शराब दुकान का खुलना क्या आम लोगों को चिढ़ाने वाला काम नहीं है। मुख्यमंत्री स्वयं सोचे कि अधिकारी उनकी बात मानते हैं या गुण्डा मवालियों या शराब माफियाओं की। तभी तो स्पष्ट निर्देश के बाद न तो तत्कालीन कलेक्टर संजय गर्ग की ही शराब दुकान हटाने की हिम्मत हुई और न ही वर्तमान कलेक्टर डॉ. यादव की ही हिम्मत हो रही है। देवांगन समाज ने पहले ही चेता दिया था कि वे अपनी मांग को लेकर 20 तारीख को रैली व सभा कर रहे हैं। आमंत्रण मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को भी था लेकिन वे नहीं पहुंचे। लोग आक्रोशित तो थे ही। ऐसे में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी क्या सिर्फ पुलिस की है।
यानी शराब माफियाओं से लेकर अपराधियों को संरक्षण नेता दे और मामला बिगड़ जाए तो दोष पुलिस पर मढ़ा जाए। ऐसा न्याय छत्तीसगढ़ के अलावा और कहां होगा? देवांगन समाज का यह आंदोलन एकाएक उग्र नहीं हुआ और न ही मठपुरैना के लोग ही एकाएक उत्तेजित हुए थे। सरकार की मनमानी और न्याय की धीमी रफ्तार की वजह से लोग कानून व्यवस्था अपने हाथ में लेने लगे है। मठपुरैना में मासूम छात्र मनीष की हत्या सरकार के लिए शर्मनाक है। गांव-गली में शराब दुकान व अवैध शराब की गंगा बहाई जा रही है। मंत्री से लेकर अधिकारी अपराधियों को संरक्षण दे रहे हैं। शिकायत करने वाले या तो पुलिस की झिडक़ी का शिकार हो रहे हैं या गुण्डा मवाली का। ऐसे में जब भीड़ आक्रोशित हो तो क्या होगा? यह राजधानी की स्थिति है तो प्रदेश के सुदूर इलाकों की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
सरकार को भी सोचना होगा कि छत्तीसगढ़ जैसे सम्पन्न राज्यों में पूरी पीढ़ी को बर्बाद करने के एवज में शराब का राजस्व कितना मायने रखता है? सरकारी जमीनों के बंदरबांट का आखरी हिस्सा क्या विवाद नहीं है? फिर क्यों इस तरह की लीज दी जानी चाहिए। सवाल सब का है कि क्या सरकार सिर्फ मनमानी के लिए होती है या लोगों की तकलीफों को दूर करने के लिए? सवाल यह भी है कि जिम्मेदारी किसकी है जब अधिकरी मुखिया का ही कहना न माने।
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मैं एक बात सरकार से पूछता हूं कि जब कानून में स्पष्ट प्रावधान है कि लीज की जमीन का और लीज नहीं हो सकता फिर भी देवांगन समाज को न्याय मिलने में देर क्यों हो रही है। ऊपर से वहां शराब दुकान का खुलना क्या आम लोगों को चिढ़ाने वाला काम नहीं है। मुख्यमंत्री स्वयं सोचे कि अधिकारी उनकी बात मानते हैं या गुण्डा मवालियों या शराब माफियाओं की। तभी तो स्पष्ट निर्देश के बाद न तो तत्कालीन कलेक्टर संजय गर्ग की ही शराब दुकान हटाने की हिम्मत हुई और न ही वर्तमान कलेक्टर डॉ. यादव की ही हिम्मत हो रही है। देवांगन समाज ने पहले ही चेता दिया था कि वे अपनी मांग को लेकर 20 तारीख को रैली व सभा कर रहे हैं। आमंत्रण मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को भी था लेकिन वे नहीं पहुंचे। लोग आक्रोशित तो थे ही। ऐसे में कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी क्या सिर्फ पुलिस की है।
यानी शराब माफियाओं से लेकर अपराधियों को संरक्षण नेता दे और मामला बिगड़ जाए तो दोष पुलिस पर मढ़ा जाए। ऐसा न्याय छत्तीसगढ़ के अलावा और कहां होगा? देवांगन समाज का यह आंदोलन एकाएक उग्र नहीं हुआ और न ही मठपुरैना के लोग ही एकाएक उत्तेजित हुए थे। सरकार की मनमानी और न्याय की धीमी रफ्तार की वजह से लोग कानून व्यवस्था अपने हाथ में लेने लगे है। मठपुरैना में मासूम छात्र मनीष की हत्या सरकार के लिए शर्मनाक है। गांव-गली में शराब दुकान व अवैध शराब की गंगा बहाई जा रही है। मंत्री से लेकर अधिकारी अपराधियों को संरक्षण दे रहे हैं। शिकायत करने वाले या तो पुलिस की झिडक़ी का शिकार हो रहे हैं या गुण्डा मवाली का। ऐसे में जब भीड़ आक्रोशित हो तो क्या होगा? यह राजधानी की स्थिति है तो प्रदेश के सुदूर इलाकों की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।
सरकार को भी सोचना होगा कि छत्तीसगढ़ जैसे सम्पन्न राज्यों में पूरी पीढ़ी को बर्बाद करने के एवज में शराब का राजस्व कितना मायने रखता है? सरकारी जमीनों के बंदरबांट का आखरी हिस्सा क्या विवाद नहीं है? फिर क्यों इस तरह की लीज दी जानी चाहिए। सवाल सब का है कि क्या सरकार सिर्फ मनमानी के लिए होती है या लोगों की तकलीफों को दूर करने के लिए? सवाल यह भी है कि जिम्मेदारी किसकी है जब अधिकरी मुखिया का ही कहना न माने।
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रविवार, 24 अक्टूबर 2010
राज्योत्सव के नाम पर अपराधी पर लाखों रूपया खर्च
दमदार बृजमोहन की दबंगई फिर विवाद में...भाजपाई नैतिकता पर सवाल...राजनैतिक सुचिता और नैतिकता का राग अलापने वाली भाजपा सत्ता पाते ही किस तरह से कारनामें कर रहे है यह किसी से छिपा नहीं है ताजा मामला राज्योत्सव के बहाने लुटोत्सव का है जिसमें संस्कृति विभाग के द्वारा विवादास्पद और काले हिरण को मारने के आरोपी सलमान खान पर लाखों रुपए खर्च कर रही है। आम लोग इसकी कटु आलोचना कर रहे हैं कि किसी अपराधिक तत्व को सरकार कैसे मंच दे सकती है?ज्ञात हो कि फिल्म कलाकार सलमान खान पर एक नहीं कई आरोप है। सोए हुए लोगों पर कार चढ़ाने सहित विलुप्त प्राय या कहे संरक्षित काले हिरण के शिकार मामले के वे आरोपी है और उन्हें जेल तक जाना पड़ा है। फिल्मी अफेयर से लेकर बात
इधर सलमान खान को बुलाने को लेकर एक ओर कुछ युवा वर्ग उत्साहित है तो एक वर्ग ऐसा भी है जो इसका यह कहकर विरोध कर रहे हैं कि इतनी बड़ी राशि खर्च कर अपराधिक छवि वाले अभिनेता को बुलाने का कोई औचित्य नहीं है। एक ने तो मंत्री की करतूत पर ही सवालिया निशान लगा दिया। संजय शर्मा नामक इस युवक का कहना था कि विवादास्पद रहना और विवादास्पद छवि वालों से संबंध रखना मंत्री की आदत बन चुकी है। सलमान खान को बुलाने का फार्मूला किसका था और क्यों बुलाया जा रहा है इसे लेकर भी तीखी प्रतिक्रिया है। कहा जाता है कि एक मंत्री भाई की निजी रूचि के चलते यह सब तय किया गया है। बहरहाल इस मामले में आम लोगों की तीखी प्रतिक्रिया तो है ही। कांग्रेसियों की चुप्पी भी आश्चर्यजनक है।-बात में कई लोगों पर हाथ उठाने को लेकर भी सलमान खान विवादों में रहे हैं। हमारे भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक संस्कृति विभाग ने सलमान खान को 50 लाख रुपए का भुगतान कर रहा है और यह मंत्री परिवार और संस्कृति आयुक्त की निजी रूचि के चलते ही हो रहा है।सलमान का दस का दम
खास आरोप या अपराध1. 26 व 27 सितम्बर 1997 राजस्थान में काले हिरण का शिकार।2. 2 अक्टूबर को 50 हजार के बांड पर रिहा।3. 1998 में सोमी अली का आरोप।4. 1999 में एश्वर्या रॉय परिवार का आरोप।5. 28 सितम्बर 2002 को फुटपाथ पर सोए लोगों पर चढ़ाई कार। एक मृत तीन घायल।6. सलमान को रोड एक्सीडेंट में जमानत 29 सितम्बर को।7. शराब पीकर गाली गलौच, मारपीट।8. 12 मार्च 2006 को चिंकारा मामले में एक साल सजा मिली।9. 10 अप्रैल 2007 को चिंकारा मामले में पांच साल की सजा।10. जेल में सलमान खान बने कैदी नंबर 210।
शनिवार, 23 अक्टूबर 2010
चुनौती देकर पीछे हटना...
छत्तीसगढ़ में वैसे तो अखबार का व्यवसाय सबसे चोखा धंधा है इसकी आड़ में बड़े बड़े खेल खेले जा रहे हैं जमीन से लेकर खदान और उद्योग से लेकर लोगों को ठगने में अखबार की भूमिका जबरदस्त रुप से हावी है। हाल ही में आए अखबार ने तो यहां पहले से स्थापित अखबारों को चुनौती दी कि हम खबरें नहीं गढ़ते, हालात बदलते हैं, जनता की आवाज उठाने वाला कौन जैसे जुमले से शुरु हुआ अखबार अब उसी ढर्रे पर उतर आया है। मंत्रियों के प्रति निष्ठा ने गोल मोल खबरें देने मजबूर कर दिया और उसकी चुनौती को लेकर दूसरे अखबारों ने जो कदम उठाया यह नया नवेला अखबार उतना भी नहीं कर पाया है। जनता जान गई अरे इसे भी तो धंधा ही करना है।
हग--मूत ही रहेंगे?
कभी अर्जुन सिंह का खास रहकर वीसी शुक्ला के पीछे पड़े रहने वाले इस अखबार की अपनी कहानी है। कहने को तो यह दलाली करने वाले अखबार की श्रेणी में भी नहीं आते हैं और खिलाफत भी जमकर करते हैं लेकिन चमचाई में भी इनकी सोच सारी लकीरों को बौनी साबित कर देती है अब 15 अक्टूबर को ही देख लिजिए? है किसी में इतना घूसने की हिम्मत?रंगा-बिल्ला की सेटिंग-
नागपुर में बंटवारा क्या हुआ रायपुर में रंगा-बिल्ला की निकल पड़ी है। प्रतिष्ठित माने जाने वो इस अखबार के संपादक-प्रबंधक यानी रंगा-बिल्ला सेटिंग में उतर आए हैं। जब पत्रिका उसके दुश्मन भास्कर को ही निपटाने में पूरी ताकत लगा दे तो फिर इन्हें क्या फर्क पडऩा है। वेटरों से मार खाकर भी शर्म बेचने वाले इन रंगा-बिल्ला को पैसा देने वाले कुछ भी कह देते हैं लेकिन इसका कोई फर्क नहीं पड़ता?
लुक में बेचैनी
डाल्फिन स्कूल के शिक्षकों ने अपने ही छात्र से अप्राकृतिक कृत्य क्या किया नेशनल लुक के रिपोर्टरों की बेचैनी बढ़ गई है। उन्हें जवाब देते नहीं बन रहा है कि यह सब कैसे हो गया आखिर तनख्वाह भी तो स्कूल के पैसे ही मिलती है। कुछ तो पाप न लगे इसलिए मंदिरों में मत्था टेक रहे हैं?
ड्रेस कोड के बाद
जूता जरूरी...
हरिभूमि में हर शनिवार को सफेद टी शर्ट पहनना जरूरी है बेचारे इस बैंडपार्टी से बेचैन है कि पत्रिका में अप टू डेट रखने की मुहिम छिड़ गई है भले ही वेतन कम मिले जूता पहनना जरूरी है वह भी चमकदार व साफ सुथरा हो?
और अंत में...
घर का भेदी की कहावत इन दिनों जनसंपर्क में पूरी तरह हावी है। यहां की हर बात चर्चा में है। चर्चा इस बात की भी है कि एक अधिकारी जो वर्तमान में निगम में है वह किस तरह से संवाद को चूना लगा रहा है और पैसा अखबार में लगा रहा है नाम किसी भी भिखारी का दो पता तो लोगों को चल ही जाता है।
हग--मूत ही रहेंगे?
कभी अर्जुन सिंह का खास रहकर वीसी शुक्ला के पीछे पड़े रहने वाले इस अखबार की अपनी कहानी है। कहने को तो यह दलाली करने वाले अखबार की श्रेणी में भी नहीं आते हैं और खिलाफत भी जमकर करते हैं लेकिन चमचाई में भी इनकी सोच सारी लकीरों को बौनी साबित कर देती है अब 15 अक्टूबर को ही देख लिजिए? है किसी में इतना घूसने की हिम्मत?रंगा-बिल्ला की सेटिंग-
नागपुर में बंटवारा क्या हुआ रायपुर में रंगा-बिल्ला की निकल पड़ी है। प्रतिष्ठित माने जाने वो इस अखबार के संपादक-प्रबंधक यानी रंगा-बिल्ला सेटिंग में उतर आए हैं। जब पत्रिका उसके दुश्मन भास्कर को ही निपटाने में पूरी ताकत लगा दे तो फिर इन्हें क्या फर्क पडऩा है। वेटरों से मार खाकर भी शर्म बेचने वाले इन रंगा-बिल्ला को पैसा देने वाले कुछ भी कह देते हैं लेकिन इसका कोई फर्क नहीं पड़ता?
लुक में बेचैनी
डाल्फिन स्कूल के शिक्षकों ने अपने ही छात्र से अप्राकृतिक कृत्य क्या किया नेशनल लुक के रिपोर्टरों की बेचैनी बढ़ गई है। उन्हें जवाब देते नहीं बन रहा है कि यह सब कैसे हो गया आखिर तनख्वाह भी तो स्कूल के पैसे ही मिलती है। कुछ तो पाप न लगे इसलिए मंदिरों में मत्था टेक रहे हैं?
ड्रेस कोड के बाद
जूता जरूरी...
हरिभूमि में हर शनिवार को सफेद टी शर्ट पहनना जरूरी है बेचारे इस बैंडपार्टी से बेचैन है कि पत्रिका में अप टू डेट रखने की मुहिम छिड़ गई है भले ही वेतन कम मिले जूता पहनना जरूरी है वह भी चमकदार व साफ सुथरा हो?
और अंत में...
घर का भेदी की कहावत इन दिनों जनसंपर्क में पूरी तरह हावी है। यहां की हर बात चर्चा में है। चर्चा इस बात की भी है कि एक अधिकारी जो वर्तमान में निगम में है वह किस तरह से संवाद को चूना लगा रहा है और पैसा अखबार में लगा रहा है नाम किसी भी भिखारी का दो पता तो लोगों को चल ही जाता है।
पर कोई बोलता नहीं...
पूरे छत्तीसगढ़ को मालूम है कि यहां उद्योगपतियों ने सरकार के साथ मिलकर या सरकार के संरक्षण में जल
प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत प्रमोद कुमार जोगी ने लगातार कम होती जमीनों और उद्योगों की दादागिरी व सरकार की मनमानी पर ऐसे चिंता जता रहे थे मानों यह सब नई बात हो। अजीत जोगी नि, जंगल और जमीन को लूट रहे हैं। अवैध कब्जा की बात हो या अवैध उत्खनन सब कुछ सरकार की जानकारी में हो रहा है। आम लोग तो कभी बोलते नहीं है और जब कोई बोलता है तो उसे वर्दी वाले गुण्डों के सहारे चुप करा दिए जाते हैंं।:संदेह मॉस लिडर हैं उन्हें प्रदेश में चल रही सरकारी अंधेरगर्दी की पल पल की खबर भी है लेकिन उनकी चिंता भी सिर्फ राजनैतिक हो कर रह गई है। वे बस्तर में ट्रेन के लिए आंदोलन तो कर लेते हैं लेकिन गरीब आदिवासियों व किसानों की छिनती जमीन पर आंदोलन इसलिए नहीं करते क्योंकि इस आंदोलन से उद्योगपति नाराज हो जाएंगे। वे अधिकारी भी नाराज हो जाएंगे जो उद्योगपतियों की गोद में बैठकर अपनी सुख सुविधा का साधन जुटा रहे हैं। उनकी चिंता तो अब स्वयं पत्नी व पुत्र तक सिमट कर रह गया है। कांग्रेस की राजनीति ने क्या छत्तीसगढ़ को कम बर्बाद किया है जो भाजपाई राजनीति को कोसा जाए?विकास के नाम पर जिस तरह से सडक़ों व भवनों का जाल बिछाया जा रहा है क्या इससे छत्तीसगढ़ का विकास होगा। बल्कि गांव-गांव में सडक़ें बनाने का मतलब शोषण के नए रास्ते खोलना है। हमारे पत्रकार मित्र कमल शुक्ला ने पिछले हफ्ते इसी तरह की बात कही है। प्रदेश में भूख से कोई न मरे इसकी जिम्मेदारी सरकार की है और सरकार की यह भी जिम्मेदारी है कि आने वाले पीढि़ नशे के गर्त में न चला जाए लेकिन रुपया किलो चावल और गांव-गांव में खुलते शराब दुकानों ने छत्तीसगढ़ की आने वाली पीढिय़ों को बर्बाद कर रही है और यह सब सरकार की नीति की वजह से है। इस पर न तो कोई बोलता है और न ही कोई प्रदेशव्यापी आंदोलन करता है क्योंकि जब प्रदेश का गृहमंत्री ननकीराम कंवर स्वीकार कर चुके हैं कि शराब माफिया के गुण्डे थाना चलाते है तब भला इससे बुरी बात और क्या होगी। कांग्रेसी भी इन शराब माफियाओं के साथ मिलकर चल रहे हैं वे भी इन शराब माफियाओं से अवैध उगाही करते हैं तथा एक सांसद के तो शराब माफियाओं से पार्टनरशिप की कहानी पूरा छत्तीसगढ़ जानता है।
प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत प्रमोद कुमार जोगी ने लगातार कम होती जमीनों और उद्योगों की दादागिरी व सरकार की मनमानी पर ऐसे चिंता जता रहे थे मानों यह सब नई बात हो। अजीत जोगी नि, जंगल और जमीन को लूट रहे हैं। अवैध कब्जा की बात हो या अवैध उत्खनन सब कुछ सरकार की जानकारी में हो रहा है। आम लोग तो कभी बोलते नहीं है और जब कोई बोलता है तो उसे वर्दी वाले गुण्डों के सहारे चुप करा दिए जाते हैंं।:संदेह मॉस लिडर हैं उन्हें प्रदेश में चल रही सरकारी अंधेरगर्दी की पल पल की खबर भी है लेकिन उनकी चिंता भी सिर्फ राजनैतिक हो कर रह गई है। वे बस्तर में ट्रेन के लिए आंदोलन तो कर लेते हैं लेकिन गरीब आदिवासियों व किसानों की छिनती जमीन पर आंदोलन इसलिए नहीं करते क्योंकि इस आंदोलन से उद्योगपति नाराज हो जाएंगे। वे अधिकारी भी नाराज हो जाएंगे जो उद्योगपतियों की गोद में बैठकर अपनी सुख सुविधा का साधन जुटा रहे हैं। उनकी चिंता तो अब स्वयं पत्नी व पुत्र तक सिमट कर रह गया है। कांग्रेस की राजनीति ने क्या छत्तीसगढ़ को कम बर्बाद किया है जो भाजपाई राजनीति को कोसा जाए?विकास के नाम पर जिस तरह से सडक़ों व भवनों का जाल बिछाया जा रहा है क्या इससे छत्तीसगढ़ का विकास होगा। बल्कि गांव-गांव में सडक़ें बनाने का मतलब शोषण के नए रास्ते खोलना है। हमारे पत्रकार मित्र कमल शुक्ला ने पिछले हफ्ते इसी तरह की बात कही है। प्रदेश में भूख से कोई न मरे इसकी जिम्मेदारी सरकार की है और सरकार की यह भी जिम्मेदारी है कि आने वाले पीढि़ नशे के गर्त में न चला जाए लेकिन रुपया किलो चावल और गांव-गांव में खुलते शराब दुकानों ने छत्तीसगढ़ की आने वाली पीढिय़ों को बर्बाद कर रही है और यह सब सरकार की नीति की वजह से है। इस पर न तो कोई बोलता है और न ही कोई प्रदेशव्यापी आंदोलन करता है क्योंकि जब प्रदेश का गृहमंत्री ननकीराम कंवर स्वीकार कर चुके हैं कि शराब माफिया के गुण्डे थाना चलाते है तब भला इससे बुरी बात और क्या होगी। कांग्रेसी भी इन शराब माफियाओं के साथ मिलकर चल रहे हैं वे भी इन शराब माफियाओं से अवैध उगाही करते हैं तथा एक सांसद के तो शराब माफियाओं से पार्टनरशिप की कहानी पूरा छत्तीसगढ़ जानता है।
शुक्रवार, 22 अक्टूबर 2010
खाओ गुटखा पियो शराब, किसने कहा ये है खराब?
इन दिनों पूरे देश ही नहीं छत्तीसगढ़ में जिसे देखो वही गुटखा-शराब के खिलाफत में उतर आया है। साधु संतों की बात करें या समाज सेवियों की सभी गुटखा-शराब के पीछे पड़ गए हैं। उन्हें लगता है कि ये आने वाले पीढिय़ों को बर्बाद कर देगी? उनके सामने घर-परिवार टूटने के कई उदाहरण भी है और वे इन्हीं उदाहरणों के साथ गुटखा व शराब के खिलाफ आम लोगों को सीख देते हैं? बहुत कम लोग यह बात समझते हैं कि वे ऐसा नहीं करेंगे तो न तो वे साधु संत कहलायेंगे और न ही समाजसेवी?भाजपा के एक नेता अशोक बजाज को तो फितूर सवार ही है और अब पुरन्दर मिश्रा भी गुटखा छुड़वाने निकल पड़े हैं। उनका दावा है कि गांधी पदयात्रा के दौरान बसना क्षेत्र के
जहां तक गुटखा और शराब की बात है तो इसका सेवन में अति करने से ही नुकसान है513 बच्चों ने गुटखा नहीं खाने का संकल्प लिया है। कुछ माह पहले जैन सम्प्रदाय के रतन मुनि ने तो मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह और उनकी सरकार को ही नसीहत दे डाली कि शराब बंद करों इस दौरान मौजूद उनके समाज के मंत्री राजेश मूणत को भी वे मुख्यमंत्री बनने का आशीर्वाद दे गए। अब मुनि संत की बात कौन मानता है? इतनी सी बात मुनि जी या संतों को क्यों नहीं समझ आता कि आकल प्रवचन से लेकर हर आयोजन में राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति की जाती है। ? और अति तो सर्वत्र वर्तते है फिर गुटखा-शराब के पीछे क्यों पड़ गए है लोग यह कई लोगों के समझ में ही नहीं आता। पीने वालों का अपना तर्क है। वे तो इसे दवा तक बना देते हैं या मूड फ्रेशनर? सरकार भी जानती है कि यह खराब नहीं है? तभी तो वह बिकवा रही है? अब भला यह खराब चीज होती तो क्यों बेची जाती? सिर्फ रुपयों के लालच में सरकार और उसके धर्म परायण मंत्री तो इतना निकृष्ट कार्य नहीं कर सकते? कम से कम धर्म को आधार मानने वाली भाजपा सरकार तो साधु संतों का कहा जरूर मानेगी? इसलिए भाजपा सरकार में भी शराब गुटखे बिकवाये जा रहे हो तो भला इसे गलत ठहराना कहां तक उचित होगा? भाजपा के ही अशोक बजाज और पुरन्दर मिश्रा इस तरह का अभियान चलाकर पार्टी और सरकार विरोधी काम कर रहे है। बजाज भले कांग्रेसी न रहे हो लेकिन पुरन्दर मिश्रा कांग्रेसी रहे हैं और कांग्रेसी मानसिकता की वजह से ही वे लोग गुटखा-शराब का विरोध कर रहे हैं?छत्तीसगढ़ में तो शराब की गंगा बह रही है? पानी जब उद्योगपतियों को बेच दी जाए तो पीने की दूसरी व्यवस्था सरकार ने कर दी है। गांव-गांव में साफ पानी भेजने में दिक्कत है और फिर ग्रामीण लोग पीने के लिए पानी पर खर्च करेंगे नहीं इसलिए शराब बेचने के फायदे भी है? पेट के किटाणु भी मर जाते हैं और प्यास भी बूझ जाती है? पता नहीं ननकीराम कंवर क्यों शराब ठेकेदारों से चिढ़ते हैं बेवजह थानेदारों को कोस रहे हैं कि वे शराब माफियाओं के इशारे पर चल रहे हैं। क्या गृहमंत्री इतने कमजोर है कि थानेदार उनकी नहीं सुनता? दरअसल यह गृहमंत्री की चालाकी है वे अच्छा बने रहने के लिए उपाय ढूंढते रहते हैं तभी तो वे कभी एसपी को निकम्मा तो कलेक्टर को दलाल कह देते हैं? छत्तीसगढ़ में शराब और गुटखा के राजस्व की वजह से ही विकास हो रहा है वरना केन्द्र में बैठी कांग्रेस सरकार तो विकास के लिए फूटी कौड़ी ही न दें? फिर महंगाई में वेतन कहां पूरता है इसलिए गुटखा शराब को कोसने वालों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज होना चाहिए सिर्फ पुलिस से पिटवाने से काम नहीं चलेगा।
जहां तक गुटखा और शराब की बात है तो इसका सेवन में अति करने से ही नुकसान है513 बच्चों ने गुटखा नहीं खाने का संकल्प लिया है। कुछ माह पहले जैन सम्प्रदाय के रतन मुनि ने तो मुख्यमंत्री डा. रमन सिंह और उनकी सरकार को ही नसीहत दे डाली कि शराब बंद करों इस दौरान मौजूद उनके समाज के मंत्री राजेश मूणत को भी वे मुख्यमंत्री बनने का आशीर्वाद दे गए। अब मुनि संत की बात कौन मानता है? इतनी सी बात मुनि जी या संतों को क्यों नहीं समझ आता कि आकल प्रवचन से लेकर हर आयोजन में राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति की जाती है। ? और अति तो सर्वत्र वर्तते है फिर गुटखा-शराब के पीछे क्यों पड़ गए है लोग यह कई लोगों के समझ में ही नहीं आता। पीने वालों का अपना तर्क है। वे तो इसे दवा तक बना देते हैं या मूड फ्रेशनर? सरकार भी जानती है कि यह खराब नहीं है? तभी तो वह बिकवा रही है? अब भला यह खराब चीज होती तो क्यों बेची जाती? सिर्फ रुपयों के लालच में सरकार और उसके धर्म परायण मंत्री तो इतना निकृष्ट कार्य नहीं कर सकते? कम से कम धर्म को आधार मानने वाली भाजपा सरकार तो साधु संतों का कहा जरूर मानेगी? इसलिए भाजपा सरकार में भी शराब गुटखे बिकवाये जा रहे हो तो भला इसे गलत ठहराना कहां तक उचित होगा? भाजपा के ही अशोक बजाज और पुरन्दर मिश्रा इस तरह का अभियान चलाकर पार्टी और सरकार विरोधी काम कर रहे है। बजाज भले कांग्रेसी न रहे हो लेकिन पुरन्दर मिश्रा कांग्रेसी रहे हैं और कांग्रेसी मानसिकता की वजह से ही वे लोग गुटखा-शराब का विरोध कर रहे हैं?छत्तीसगढ़ में तो शराब की गंगा बह रही है? पानी जब उद्योगपतियों को बेच दी जाए तो पीने की दूसरी व्यवस्था सरकार ने कर दी है। गांव-गांव में साफ पानी भेजने में दिक्कत है और फिर ग्रामीण लोग पीने के लिए पानी पर खर्च करेंगे नहीं इसलिए शराब बेचने के फायदे भी है? पेट के किटाणु भी मर जाते हैं और प्यास भी बूझ जाती है? पता नहीं ननकीराम कंवर क्यों शराब ठेकेदारों से चिढ़ते हैं बेवजह थानेदारों को कोस रहे हैं कि वे शराब माफियाओं के इशारे पर चल रहे हैं। क्या गृहमंत्री इतने कमजोर है कि थानेदार उनकी नहीं सुनता? दरअसल यह गृहमंत्री की चालाकी है वे अच्छा बने रहने के लिए उपाय ढूंढते रहते हैं तभी तो वे कभी एसपी को निकम्मा तो कलेक्टर को दलाल कह देते हैं? छत्तीसगढ़ में शराब और गुटखा के राजस्व की वजह से ही विकास हो रहा है वरना केन्द्र में बैठी कांग्रेस सरकार तो विकास के लिए फूटी कौड़ी ही न दें? फिर महंगाई में वेतन कहां पूरता है इसलिए गुटखा शराब को कोसने वालों के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज होना चाहिए सिर्फ पुलिस से पिटवाने से काम नहीं चलेगा।
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