बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

सिर्फ चौबे को ही क्यों लगी, 9 एम एम की गोली!


मदनवाड़ा कांड के सुलगते सवाल !
बाकी 29 जवानों को लगी एके 47 या इंसास से गोली !

रायपुर। मदनवाड़ा में एसपी विनोद चौबे सहित 29 जवानों की नक्सली मुठभेड़ में हुई मौत को लेकर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं। सवाल नक्सलियों
ज्ञात हो कि मदनवाड़ा में नक्सलियों ने एसपी विनोद चौबे, टीआई, विनोद धु्रव सहित 29 जवानों की निर्मम हत्या कर दी। इस हत्याकांड पर तब भी सवाल उठे थे लेकिन सिर्फ नक्सली वारदात की वजह से इस पर उतना हो हल्ला नहीं हो पाया। अब इस वारदात को लेकर एक बार फिर मामला गरमाने लगा है।
हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों की माने तो इस नक्सली हमले में एसपी विनोद चौबे सहित शहीद हुए 29 जवानों में से केवल श्री चौबे की मौत 9 एमएम की गोली से हुई जबकि बाकि सभी 28 जवान या तो एके 47 या इंसास रायफल की गोली से मारे गए। बताया जाता है कि सभी शहीदों के पोस्टमार्टम के बाद आये इस तथ्य को बवाल मचने के डर से न केवल दबाया गया बल्कि जांच तक नहीं की गई।
पिछले दिनों विधानसभा में कांग्रेस अध्यक्ष भूपेश बघेल ने मदनवाड़ा  कांड के पोस्टमार्डम रिपोर्ट को सदन में रखने की मांग करते हुए नक्सलियों से सांठगांठ के आरोप भी लगाये हैं। हालांकि मदनवाड़ा कांड को लेकर पुलिस के उ"ााधिकारी की भूमिका को लेकर सवाल पहले भी उठते रहे हैंर्। ज्ञात हो कि झीरम घाटी में कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की नक्सली हत्या को लेकर भी कई तरह के सवाल उठते रहे हैं और इसकी जांच तो की जा रही है लेकिन रिपोर्ट अभी तक सामने नहीं आई है।
इधर नक्सलियों के शहरी नेटवर्क को लेकर जिस तरह के चेहरे सामने आये है वह न केवल हैरान कर देने वाले हैं बल्कि इसके तार भाजपा से जुड़े होने को लेकर भी सवाल उठने लगे है। कोण्डागांव के चोपड़ा परिवार के भाजपा के दिग्गज नेताओं से संबंध किसी से छिपे नहीं है लेकिन पुलिस के लिए यह जांच आसान नहीं है। ऐसा नहीं है कि नक्सलियों के शहरी नेटवर्क को लेकर हो हल्ला पहली बार हुआ है इससे पहले भी सरकार के मंत्रियों पर नक्सलियों से सांठगांठ के आरोप लगते रहे है। हालांकि सांठगांठ के आरोपो से कांग्रेस के कई नेता भी नहीं बच पाये हैं।
सूत्रों का कहना है कि मदनवाड़ा ताल मटेड़ा और झीरम घाटी की घटना सांठगांठ को लेकर सवाल खड़ा करते हैं लेकिन इस दिशा में जांच की विशेष कोशिश कभी नहीं हुई। मदनवाड़ा कांड को लेकर एक बार फिर राजनीति गर्म हो गई है तो इसकी वजह वह पोस्टमार्डम रिपोर्ट है जो कई संदेहो को जन्म दे रही है।
बहरहाल यह मामला कितना तुल पकड़ेगा और केवल विनोद चौबे ही क्यों 9 एमएम की गोली के शिकार हुए यह कब पता चलेगा कहना मुश्किल है। देखना है इस पर क्या कुछ होगा।

से सांठ-गांठ को लेकर ही नहीं उठाये जा रहे हैं बल्कि शहरी नेटवर्क में पकड़ाये आरोपियों की राजनैतिक पहुंच को लेकर भी उठने लगे है। मदनवाड़ा कांड में क्या कोई सांठगांठ हुई है यह सवाल तब और खड़ा हो जाता है जब केवल एसपी विनोद चौबे की 9 एमएम की गोली लगने की बात सामने आती है।

गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

सरोवर हमारी धरोहर...!

पहले तीन विश्व युद्ध का कारण बताने वाले अम्सर कहते है कि चौथा विश्व युद्ध यदि हुआ तो इसकी वजह पानी होगा। जल ही जीवन है, पानी बगैर न उबरे मोती मानूस चून और न जाने जल की महत्ता को लेकर कितनी ही बाते प्रचलित है लेकिन छत्तीसगढ़ की राजधानी में जिस बेतरतीब से तालाबों को पाटा जा रहा है और उस पर आम लोगों की चुप्पी आश्चर्यजनक है। तालाबों के शहर के रूप में प्रचलित रायपुर में गिरते जल स्तर को लेकर बड़े-बड़े विद्वान चिंतित है। सरकार भी सरोवर हमारी धरोवर के नारे लगाती है हर साल शासन प्रशासन तालाबों की सफ ाई के लिए चिल्ल पौं मचाता है लेकिन इसके बावजूद शहर के तालाबों की जो दुर्दशा हो रही है वह प्रशासन की नियत पर तो सवाल उठाता ही है शहर की चिन्ता करने वालों की भूमिका पर भी सवाल उठाता है। तालाबों की बेशकीमती जमीनों पर जिस तरह से भूमिकाओं की नजर है वह किसी से छिपा नहीं है। नगर निगम की भूमिका भी कम संदेहास्पद नहीं है। कई बार तो यह लगने लगता है कि वह भूमिकाओं के ईशारे पर तालाबों को पाटने पर आमदा है।
तालाबों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट गाईड लाईन की जिस तरह से अनदेखी की जा रही है वह न केवल हैरान कर देने वाला है बल्कि इस तरफ  से समाज सेवी संस्थाओं की अनदेखी भी आश्चर्यजनक है। राजधानी के गिरते जल स्तर को लेकर चिंता जाहिर करने वालों को शहर की तालाबों को पाटने की साजिश भी यदि नजर नहीं आ रही है तो इसे क्या कहा जाए। एक तरफ  स्थानीय प्रशासन तालाबों के सौन्दर्यीकरण के नाम पर हर साल लाखों करोड़ों फू क रही है तो दूसरी तरफ  नालों का पानी तालाब में डाला जा रहा है इससे न केवल तालाबों की हालत खराब होने लगी है बल्कि वह धीरे-धीरे पटने भी लगा है।
    महंत लक्ष्मी नारायण दास वार्ड स्थित प्रहलदवा और खो-खो तालाब में नाले का पानी डाला जा रहा है। जबकि इन दोनों तालाब को निस्तारी केे रूप में हजारों लोग उपयोग करते हैं। बाताया जाता है कि पानी की कमी की वजह से लोग निस्तारी को मजबूर है जबकि तालाब में जलकुंभी भी अपना पैर पसार चुकी है। दूसरी तरफ  तालाब पर कई भूमाफि याओं की नजर है और वे इन तालाबों सुख रही जमीनों पर कब्जा करने की कवायद में लगे हैं।
    दूसरी तरफ  आमातालाब को पाटने की जो कोशिश हो रही है वह भी आश्चर्य जनक है। बाताया जाता है आमातालाब को पाटकर काम्प्लेक्स बनाने की योजना है और इसी योजना के तहत तालाब को पाटा जा रहा है। सूत्रों की माने तो शहर भर से निकलने वाली गंदगी और मलबे से तालाब को पाटा जा रहा है। हालांकि तालाब पाटे जाने का विरोध आसपास के लोग कर रहे हैं लेकिन मलबा डालने का काम गुपचुप तरीके से रात में किया जा रहा है।
    इसी तरह तेलीबांधा तालाब के एक हिस्से को सौन्दर्यीकरण के नाम पर पाटा जा रहा है इस पर कई लोगों ने आपत्ति तक जातई है लेकिन यहां भी सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की सरे आम अनदेखी की जा रही है। ज्ञात हो कि सुप्रीम कोर्ट ने तालाबों को पाटकर काम्प्लेक्स बनाने की नीति के खिलाफ  कड़ा रूख अख्तियार किया है और तालाबों की यथास्थिति बनाये रखने का स्पष्ट निर्देश दिया है। सूत्रों की माने तो सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद तालाब पाटे जाने का काम तो सीधे तौर पर रूक गया है लेकिन साजिशपूर्वक इसे अंजाम दिया जा रहा है। कभी तालाबों का शहर कहलाने वाले रायपुर में कई तालाब पाटे गये। 
    लेंडी तालाब, रजबंधा तालाब को पाटकर जिस तरह से काम्प्लेक्स बनाये गये वह किसी से छिपा नहीं है। और विशेषज्ञों की माने तो रायपुर में गिरते जलस्तर की एक बड़ी वजह तालाबों का पटना है और इस पर ध्यान नहीं दिया गया तो आने वाले दिनों में इसके भीषण दुष्परिणाम भुगतने होंगे।

सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

केवल वोट देने तक प्रजातंत्र-केयूर भूषण



स्वास्थ्य ठीक रहा तो आदिवासी हिंसा पर गांधी विचार यात्रा...
चुने हुए जनप्रतिनिधियों का बजाय प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री ही सत्ता
पीड़ा रहित समाज की स्थापना के लिए गांधीवाद ही विकल्प

कांग्रेस गांधीवाद से पूरी तरह दूर सिर्फ जयंति या निर्वाण दिवस ही...
आजादी की लड़ाई की विशेषता नैतिकता लेकिन आज इसकी कमी...
जनता को गांधीवाद पर विश्वास अन्ना हजारे आंदोलन में झलक से स्पष्ट
वैसे तो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पथ पर चलने वालों की इस देश ही नहीं पूरी दुनिया में कमी नहीं है। गांधी के बताये मार्ग पर चल कर कुछ कर गुजरने की चाह भरना किसे नहीं है। छत्तीसगढ़ में भी गांधीवादी विचारधारा को जीने वालों की कमी नहीं है और इनमें से प्रमुख नाम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी केयूर भूषण का भी है। 1 मार्च 1928 को दुर्ग जिला के छोटे से गांव जांता में जन्में केयूर भूषण महात्मा गांधी के आलोक से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना सारा जीवन इसी पथ पर होम कर दिया। 82 वर्षीय केयूर भूषण जहां कांग्रेस के गांधीवाद से भटकने से दुखी है वहीं समाज में बढ़ती हिंसा से आहत है। वे वर्तमान व्यवस्था को गांधीवाद से बदल कुछ करने की सोच ही नहीं रखते बल्कि वे यह कहने से भी नहीं हिचकते कि वर्तमान में प्रजातंत्र सिर्फ वोट देने तक ही रह गया है। वे कहते हैं चुनकर आने वाले जनप्रतिनिधियों की बजाय सत्ता केवल प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के पास रह गई है। सत्ता का केन्द्रीयकरण हो गया है जिसकी वजह से आम लोग दुखी है। वे नक्सली हिंसा पर भी आहत है। वे कहते हैं कि आदिवासियों की हितों के लिए हिंसा का जो वातावरण बना है उनका गांधीवाद ही एक मात्र हल है। आदिवासी हित के नाम पर नक्सली व पुलिस दोनों ही हिंसा पर आमदा है। वे इस उम्र में हम मामले में कुछ न कर पाने की पीड़ा समेटे कहते हैं कि स्वास्थ्य ठीक हुआ तो शीघ्र ही गांधी विचार यात्रा निकालकर सरकार और नक्सलियों को बिठाकर हिंसा खतम करूंगा। वे नरेन्द्र मोदी और राहुल गांधी के संबंध पर पूछे सवाल पर कहा कि सत्ता में वहीं आयेगा जो सर्वधर्म समभाव रखता हो। अन्ना हजारे के आन्दोलन की झलक से सबको समझ जाना चाहिए कि गांधीवाद से सबको समझ जाना चाहिए गांधीवाद से सबको समझ जाना चाहिए कि गांधीवाद और उनका मार्ग ही प्रासंगिक है और इसी में देश का हित है अन्यथा जिस तेजी से सरकार और उनके लोग विकास की लकीर खींच रहे है उनसे यह डर सताने लगा है कि हम आर्थिक गुलाम न हो जाए। गांधीवादी चिंतक केयूर भूषण कांग्रेस की टिकिट पर 1980 से लेकर 1989 तक रायपुर लोकसभा के सांसद रहे। अपनी गांधीवादी छवि के लिए प्रसिद्ध केयूर भूषण को सन् 2001 में छत्तीसगढ़ शासन के द्वारा सद्भावना पुरस्कार भी दिया गया। हरिजन उद्धार से लेकर उनके कार्यों को लोग आज भी याद करते नहीं थकते यही नहीं जब पंजाब जल रहा था तब भी केयूर भूषण ने पंजाब में शांति बहाली के लिए अपनी भूमिका से पीछे नहीं हटे थे। सादगी के साथ पूरा जीवन बीताने वाले केयूर भूषण ने हिन्दी व छत्तीसगढ़ी में कई किताबें लिखी है। स्वतंत्रता आन्दोलन के महापुरूषों पर उन्होंने काफी कुछ लिखा है और पीड़ा रहित समाज के निर्माण को लेकर वे आज इस उम्र में भी चल पड़ते है।
स्वतंत्रता के लिए देश के महान नेताओं के संघर्ष को याद करते हुए वे वर्तमान विषन्नावस्था को लेकर मुखरित हो उठते हैं। वे कहते हैं कि हमने विज्ञान और तकनीक की सहायता से प्रगति तो की है लेकिन भौतिक उपलब्धियों की जगमगाहट में नैतिक मूल्य और भारतीय परम्परा खो सी गई है संकट से निकालने वाले महापुरूषों के चले जाने से हम भटक गए है जबकि स्वतंत्रता की पूरी लड़ाई की विशेषता नैतिकता रही है।
केयूर भूषण जी यह कहने से भी नहीं चुकते कि स्वतंत्रता पश्चात भारतीय जीवन का परिस्कार करने के लिए हमें उन बंधनों को तोड़ फेंकना था जिनसे हम बंधे है। विनोबाजी से लेकर कई लोगों ने इन बंधनों को तोडऩे का प्रयास किया। दुर्भाग्य से वे उन्हें पूर्णतया समाप्त नहीं कर पाये। वह खरपतवार आज बढ़कर सब तरफ फैल गई है और आज सारा देश उन विकृतियों से आक्रांत हो रहा है। वे कहते है कि राजनीति में अवसरवादिताओं की संख्या बढ़ी है और इन्हें निकाल फेकने की जरूरत आ पड़ी है ऐसे लोगों को निकाल फेंकने की जरूरत आ पड़ी है ऐसे लोगों को निकालने में कुर्बानी भी देनी पड़े तो पीछे नही हटुंगा। वे कहते है कि ऐसे ही लोगों की वजह से राजनीति अछूत कहलाने लगी है वे युवाओं से आव्हान भी करते है कि युवाओं को अपने महापुरूषों के बताये मार्ग पर चलकर नये व्यवस्था गढऩा चाहिए। केयूर भूषण जी का कहना है कि महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज, स्वालंबन, अन्तयोदय और नैतिकता की दुहाई तो सब देते है उनकी जयंती व निर्वाण दिवस भी खूब आयोजित होते है लेकिन जब तक गांधी के बताये मार्ग के अनुरूप सत्ता नहीं होगी आम आदमी तिरस्कृत होता रहेगा। आज गांधीवाद को लेकर आन्दोलन की जरूरत है। जनता चाह भी रही है जिसकी झलक अन्ना हजारे के आंदोलन में दिखा भी है। छोटे रूप में छत्तीसगढ़ में इस तरह का आन्दोलन करना चाहता हूं। गांधी विचार मंच इसलिए बना भी है। उन्होंने कहा कि राजनीति की वजह से आज हिंसा का वातावरण बन रहा है। कांग्रेस भी गांधी के रास्ते से दूर हुई है। नक्सली हिंसा और पुलिस हिंसा बढ़ी है। गांधी जा रहते तो आदिवासियों के हित के लिए जरूर आगे आते। सरकार और नक्सली दोनों आदिवासी हित की बात करते है लेकिन दोनों ही हिंसा का रास्ता अपनाए हुए है। गांधी की विचारधारा के अनुरूप जब तक ग्राम स्वराज, स्वालंबन और अत्योदय के आधार पर सरकार काम नहीं करेगी सत्ता का विकेन्द्रीकरण नहीं होगा यह स्थिति सुधर रही सकती। आदिवासी क्षेत्रों में यह स्थिति यहां की संपदा की वजह से है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नजर इन संपदाओं पर है। इसके चलते आदिवासी उजाड़े जा रहे है या वे पलायन कर रहे हैं।  भ्रष्टाचार आखरी स्तर तक पहुंच गया है। सिस्टम बदलना चाहिए। उन्होंने कहा कि आज हर कोई राज सत्ता हासिल करने के लिए आम आदमी का उपयोग कर रहा है। आरएसएस और भाजपा की नजर बहुसंख्यक वोट बैंक पर है। जबकि इस देश में सर्वधर्म एकता की भावना है सत्ता का लाभ आम आदमी को मिलना ही चाहिए और सरकार उसी की बने जो इन भावना को जीता है। कांग्रेस धर्मनिरपेक्ष का नाम लेती है लेकिन काम नहीं करती है और इन दोनों की रजनीति में जनता पीस रही है।
स्वतंत्रता संग्राम सैनिक एवं गांधीवादी चिन्तक
जन्म : एक मार्च 1928, ग्रामा जाँता, जिला दुर्ग
पुरस्कार : छत्तीसगढ़ शासन का पं. रविशंकर शुक्ल सद्भावना पुरस्कार 2001 से सम्मानित जन प्रतिनिधित्व : सन् 1980 से सन् 1989 तक रायपुर लोकसभा से संसद सदस्य
प्रकाशित कृति: 1. लहर (छत्तीसगढ़ी कविता संग्रह)
2. कुल के मरजाद (छत्तीसगढ़ी उपन्यास)
3. कहां बिलागे मोर धान के कटोरा (छत्तीसगढ़ उपन्यास)
4. नित्य प्रवाह (प्रार्थना एवं भजन)हिन्दी
5. कालू भगत (छत्तीसगढ़ी  कहानी संग्रह)
6. छत्तीसगढ़ के नारी रत्न
7. मोर मयारूक गाँव (छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह)
8. हीरा के पीरा (छत्तीसगढ़ी निबंध संग्रह)
9. पथ (विभूतियों को समर्पित काव्य संग्रह)
संपादन : 1. साप्ताहिक छत्तीसगढ़ 2. साप्ताहिक छत्तीसगढ़ संदेश 3. त्रैमासिक हरिजन सेवा (नई दिल्ली) 4. मासिक अन्त्योदय (इंदौर) अप्रकाशित छत्तीसगढ़ी साहित्य : 1. डोंगराही रद्दा (कहानी संग्रह) 2. लोक-लाज(उपन्यास) 3. समें के बलिहारी (उपन्यास) 4. आंसू म फिले अचरा (कहानी संग्रह)
    अप्रकाशित: 1. उनका युग (लेखमाला-स्व. इंदिराजी के युव के संदर्भ हिन्दी साहित्य में) 2. राजीव गांधी का अंतरमन 3. अंकुर (हिन्दी कवितायें तथा किशोर साहित्य) 4. सम सामयिक लेखों का संग्रह 5. छत्तीसगढ़ के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की जीवनगाथा
    संपर्क : 247, सुन्दर नगर, रायपुर (छत्तीसगढ़) 492001 फोन नं. -0771-2243524

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

कुकुर ह गंगा जाही त पतरी ल कोन चाटही...


छत्तीसगढ़ म एक ठिन कहावत हे के कुकुर ह गंगा जाही त पतरी ल कोन चाटही। ए कहावत ल कोन केहे रीहिस, काखर बर केहे रीहिस। कोनो नई जानय फेर आजकल  ए कहावत के अड़बड़ जोर हे। आम आदमी पार्टी के नेता केजरीवाल अऊ समाज सेवक अन्ना हजारे के आन्दोलन ह कई झन के नींद ल उड़ा दे हे।
राजनीति में आय बदमाश चोर लुटेरा मन के नींद उड़ गे हे। अऊ अब कई झन अइसे गोठियावत हें जानो मानों ओखर मन ले बड़े हरीशचंद कोनो नहीं हे।
आम आदमी पार्टी ह राजनीति के नवा परिभाषा गढ़त हावय। ए राजधानी वाला मन ह आज ले सुरता करथे के एक झन बदमाश बालकृष्ण अग्रवाल ह कइसे बड़े-बड़े विज्ञापन छपवा के कहे रीहिस के वो ह अब सुधर गे हे फेर न तो ओखर करम ह सुधरीस न तो ओखर गुण ह बने होईस। बालकृष्ण अग्रवाल ह अपन ल बने बताय बर का का काम नहीं करीस। बड़े बड़े नेता मन संग उठईया बईठया बालकृष्ण अग्रवाल ल कोनो भुलाही।
वइसने दिल्ली म जब भाजपा ह देखीस के आम आदमी पार्टी के चारो मुड़ा जोर हे त कहे लागीस के हमन ह खरीद फरोख्त के राजनीति नहीं करन त कांग्रेस के राहुल गांधी ह काहत घुमत हे के आम आदमी पार्टी ले सीखबों।
आज के राजनीति के खेल म सबला मतवईया कांग्रेस के नेता ह जब सुधरे के बात करथे त कतकोन झन ल हंसी आ जथे। उही हाल भाजपा के होगे हावय तभे त आम आदमी पार्टी ह जोर मारत हे।
अवईया लोकसभा चुनाव बर जम्मो पार्टी ह तैयारी करत हावय अऊ जनता जनहित के तीर जाय बर अपन आप ल दुध के धुले बतावत हे। दुसर के पाप ल अइसे गिनावत हे जानो मानो ए मन ह कुछुच नहीं करे हे। तभे त वो दिन गांव के बइठका म जब चोरी के मामला आइस त जीवराखन ह कही दिस देख गा चोरी चोरी हे एक रूपया के हांवय चाहे सौ रूपया के सजा बरोबर होना चाही। अऊ पंच मन ल जीवराखन के बात ल मानेच ल पड़ीस।
अइसने कोनो पार्टी ह लाख काहय के अब तक जेन होगे तउन होगे आगु अइसने नहीं होही, कोनों नहीं पतीयाने वाला हे। सब के रंग ढंग ल देख डारे हावय। कहावत घलो हे चोर चोरी ले जाए हेराफेरी ले नहीं जावय।

बुधवार, 25 दिसंबर 2013

सोचना पड़ेगा....


 दिल्ली में आई राजनैतिक विपदा से राजनैतिक दलों की चिंता बड़ा दी है। आम आदमी पार्टी को मिले 28 सीट ने पूरे देश में नई बहस छेड़ दी है कि क्या उन पार्टियों को सरकार बनाने ऐसे पार्टियों से समर्थन लेना चाहिए जो चुनाव में एक दूसरे के खिलाफ खड़े थे।  यह बहस का मौका इसलिए भी आया क्योंकि सामने लोकसभा चुनाव है और इस वजह से हर दल तेरी कमीज से मेरी कमीज ज्यादा सफेद के दिखावे पर काम कर रही है वरना पिछले दो दशक के राजनैतिक हालत ऐसे कभी नहीं रहे। जिसे जहां जैसे मौका मिला राज्यों से लेकर केन्द्र तक सरकारें बनाई बिगाड़ी गई और आज जब लोकसभा चुनाव सिर पर है तो केन्द्र की सत्ता का मोह उन्हें खरीद फरोख की राजनीति से अचानक दूर कर दिया है। राजनैतिक दलों की चिंता यही है कि लोकसभा चुनाव में भी यही स्थिति रही तो क्या होगा ? क्योंकि जिस राह पर आम आदमी पार्टी ने कदम बढ़ाया है और इसका परिणाम दिल्ली विधानसभा के चुनाव में आया है वहीं समर्थन लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी को मिलने की संभावना से इंकार करना मुश्किल हो गया है। सड़ चुकी राजनैतिक व्यवस्था में आम आदमी पार्टी की सोच ने आम आदमी को यह सोचने मजबूर कर ही दिया है कि आखिर कांग्रेस और भाजपा में कितना अंतर रह गया है। राज्यों से लेकर केन्द्र तक के कांग्रेस और भाजपा नेताओं की न तो गलबहियां छुपी है और न ही वोट बैंक की राजनैति ही छिप सका है। एक दूसरे के खिलाफ भ्रष्ट्राचार को लेकर आवाज उठाने वाले सत्ता पाते ही कार्रवाई से कैसे दूर भागते है और जनता इस खेल में स्वयं को ठगा सा महसूस करने लगी है। यही वजह है कि जब आम आदमी पार्टी का गठन हुआ तो उसे नजर अंदाज वाले भी दिल्ली के चुनाव परिणाम से न केवल भौचक है बल्कि लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की संभावना से चिंतित है। पिछले दो दशकों की राजनीति में हम किसी से कम नहीं की तर्ज पर काम करने वाली कांग्रेस और भाजपा में आए इस तत्कालीन परिवर्तन का दूरगामी परिणाम अभी आना शेष्ज्ञ है लेकिन यह तो तय है  िकआम आदमी पार्टी ने अच्छे-अच्छे को आईना दिखा दिया है। लालवत्ती के धौस और सरकारी बंगलों के रूतबे से दूर रहने के फैसले से राज्यों में बैठी सरकारों के मंत्री चितिंत हो गए है यदि ऐसे में विधायक व सांसद निधि को लेकर आम आदमी की सोच को अमली जामा पहनाया गया तो राजनैतिक दादागिरी तो खत्म होगी ही भ्रष्टाचार और स्वेच्छाचारिता पर भी विराम लगेगा। जब-जब मंत्रियों के बंगलों पर होने वाले खर्चों की खबरें आएंगी आम आदमी पार्टी और भी मजबूत होगा। गाली देने वालों के साथ सत्ता सुख या सत्ता सुख के लिए मुद्दों की अनदेखी भी आम आदमी को हताश नहीं करेगा। आम आदमी पार्टी क्या भाजपा-कांग्रेस का विकल्प हो सकती है। लोगों को सोचना पड़ेगा।

मंगलवार, 24 दिसंबर 2013

आप ने कर दी सपने खाक...


आम आदमी पार्टी बनाते ही दिल्ली की सत्ता तक पहुंचे केजरीवाल को ल
ेकर जितनी चिंता समर्थन कर रही कांग्रेस को है उससे कही ज्यादा चिंता भाजपा को है।
आम आदमी पार्टी ने लोकसभा चुनाव लडऩे का एलान कर दिया है और वह इस देश में कांग्रेस-भाजपा के बाद तीसरी पार्टी बनकर चुनाव लड़ेगी। इससे पहले तीसरा मोर्चा बनाकर चुनाव लडऩे की कवायद होते रही है लेकिन इस बार हो रहे लोकसभा चुनाव का नजारा ही अलग होगा।
कांग्रेस और भाजपा जहां अपने अपने साथियों के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी तो आम आदमी अपने दम पर चुनाव लड़ेगी।
दिल्ली के चुनाव परिणाम यदि लोकसभा चुनाव में भी दोहराया गया तब कांग्रेस और भाजपा का क्या होगा? आज तक कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियों क्षेत्रिय दलों को नहीं रोक पायी है ऐसे में आप का इनसे सीधे लड़ाई का परिणाम क्या होगा? क्या आप को वजह से कांग्रेस और भाजपा ही नहीं दूसरी पार्टियों को भी नुकसान होगा। ये तमाम सवाल अभी भले ही मायने नहीं रखते हो पर सच तो यह है कि सडऩे की कगार तक पहुंच चुकी राजनैतिक व्यवस्था में आप ने ताजा हवा का झोंका की तरह अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। दिल्ली विधानसभा के परिणाम से कांग्रेस के चेहरे पर भले ही भाजपा के सत्ता नहीं पाने का संतोष हो या भाजपा के चेहरे पर आप को लेकर मलाल हो पर सच तो यही है कि आप ने राजनीति में चली आ रही परम्परा को बदलने की कोशिश की है।
चुनाव जीतने के बाद अपनी मर्जी से विकास गढऩे की तुगलकी परम्परा को दिल्ली के लोगों ने तोडऩे में जो तेजी दिखाई है वहीं तेजी लोकसभा चुनाव में दिखाने की पहल के लिए आप तैयारी कर रही है। पूरे देश में यूपीए सरकार के खिलाफ भाजपा ने जो माहौल खड़ा किया है उस माहौल को जीत में हासिल करने में आप का रोढ़ा साफ दिखने लगा है और यदि दिल्ली में बैठी आप के फैसले अच्छे रहे तो फिर भाजपा को नुकसान उठाना पड़ेगा।
ऐसे में भाजपा भले ही कांग्रेस पर वार करते दिख रही है लेकिन भीतर खाने में आप की चिंता भी कम नहीं है।

सोमवार, 23 दिसंबर 2013

जयचंद-मीरजाफर के जय होवय...


चुनाव होगे, सरकारो बनगे फेर हरईया मन के दुख ल कोनों नहीं समझत हे। बपरी रेणुका सिंह ह रो रो के कतका कलपे रीहिस के वोला भाजपाच के मन ह हरवाईन हे। मुख्यमंत्री घलो ह वोखर पीरा ले पिघल गे     रीहिस अऊ अइसन मन के खिलाफ कार्रवाई करे के बात करे रीहिस फेर आज तक रेणुका ह रोवत हे अऊ जयचंद अऊ मीरजाफर मन ह सरकार बने के खुशी मनावत हे।
इही हाल राजनांदगांव जिला ले लेके बस्तर अऊ सरगुजा म हे। हरईया ह हार गे अऊ पार्टी के घलो सरकार बन गे अब का करे बर हे। भीतरघात करईया मन के सूची अतेक लम्बा हे के  ओमन ल पार्टी ले निकाल दीही त लोकसभा चुनाव के का होही।
अइसने होथे जीतने वाला दल ह अपन भीतरघाती मन ल भुला जाथे अऊ सरकार बने के खुशी म मगन हो जथे। अऊ हरईया मन ह दु चार दिन जोर लगाथे अऊ तहां ले ए सोच के कलेचुप बइठ जथे के अगला चुनाव आही त महु ह मजा चखाहुं।
सत्ताबाजी दल के जब ए हाल हे त जेखर सत्ता नहीं आय हे तेखर त गोठेच बाल झन कर उहां त नीतईया घलो ह खुश नहीं हे। सत्ता आही त का का करबो कहीके सोचे रीहिन फेर सत्ता नहीं मिलीस त मुंह मसोस के रही गे।
इहों भीतरघाती मन ह सीना तान के चलत हे अऊ गोठियावत हे के कइसे कइसे करम करे बर पड़ीस हे। कांग्रेस म त अइसनेच होथे। प्रदेश अध्यक्ष चरणदास महंत ल हटाय ल पड़ गे नवा प्रदेश अध्यक्ष भूपेश बघेल ल बना दिन।
भूपेश बघेल के प्रदेश अध्यक्ष बने ले अजीत जोगी ह उपरे ऊपर भले बने काहत हे फेर भीतरे भीतर जी ह कतका जरत हे तेन ल ो जानत हे अऊ ओखर जी ह जातर हे। तभे त कही दिस मे हा लोकसभा चुनाव नहीं लड़व।
अजीत जोगी ह लोकसभा नहीं लड़ही त कांग्रेस के का बिगड़ही तउन ल कोनो नहीं जानय फेर एक बात त तय हे के जोगी लडय़ चाहे झन लडय़ कांग्रेस ल छत्तीसगढ़ म खोयबर कुछु नहीं हे। पा जही त वाहवाही जरूर मिलही। अऊ कांग्रेस तीर नेता मन के घलो कमी नहीं हे एक एक सीट ले दस-दस झन दावेदार बाइठे हे जोगी नहीं लड़ही त कोनो अऊ लड़ही।
आज कल त खुला बात अऊ भीतरघात के जमाना हे तभे त भीतरघाती जयचंद मीर जाफर मन के जगह जगह पूछ होवत हे।