शनिवार, 19 मार्च 2016

आतंकी की भाषा बनते विरोध के स्वर

क्या सरकार के बजट और मौसम की गर्मी का कोई सीधा सम्बन्ध है? यह सवाल कई लोगो के जेहन में पिछले कुछ सालों से उठ रहा हो तो कोई आस्चर्य नहीं है।  बजट आया और पहले ही दिन विरोध का स्वर उठने लगा , सरकार ने सूत-बूट के इतर इसे गरीब किसानो का बजट बताया।  फिर भी ईपीएफ के निकासी पर ब्याज को लेकर उसे बैकफुट पर जाना पड़ा।
अप्रैल से सरकार के बजट का असर शुरू हो जायेगा, गर्मी के मिजाज की तरह।  पिछले कुछ सालो से आम आदमी भी यह मन बैठा है कि बजट के बाद मंहगाई बढ़ेगी ही. कर्मचारियों के दबाव में ईपीएफ निकासी में ब्याज वापस ले ली गई, परन्तु अब जमा राशि में कटौती की घोसना कर दी गई. इतना ही नहीं छोटे और माध्यम श्रेणी के उन तमाम लोगो के ब्याज दर में कटौती कर दी गई जो किसी तरह रो-गाकर थोड़े पैसे जमा कर पाते थे.
सरकार के  छोटे और मध्यम श्रेणी आय वर्ग की जेब से पैसे निकलने की यह योजना से वे लोग भी हैरान होंगे जो जेएनयू  जाकर सरकार के अच्छे कार्यो को देखने की सलाह देते अच्छे कार्यो को लेकर कश्मीर से कन्याकुमारी तक एक सीधी लकीर देखने की वकालत कर रहे थे. सरकार के कसीदे गड़ने के लिए जेएनयू तक पहुचने वाले फिल्म अभिनेता अनुपम खेर को कम से कम वित्त मंत्री के दफ्तर जाकर पूछना    चाहिए कि आखिर  छोटी बचत पर  ब्याज दर में कटौती की जरुरत   क्या  है?
भुखमरी और  बेरोजगारी  के साथ भारत  आज़ादी के सवाल  सवाल  करनेवालो को  पूछना    चाहिए कि हर साल जिस तरह से गरमी तपती ही जा रही है वैसे ही हर बजट के बाद  महंगाई क्यों  है ?    ईपीएफ के निकासी पर ब्याज के फैसले  वापस   लेने वाली सरकार बचत में ब्याज दर कम कर क्या मध्यम वर्ग से  बदला नही ले रही है.
 फिल्म अभिनेता अनुपम खेर उन चंद भाग्यशाली लोगो में होंगे जिनके घरो में आज़ादी के स्वर नही गूंजते वरना कोख से भी बेटियों में  आज़ादी के स्वर सुनाई  है. औरतो और बच्चो की प्रताड़ना से लेकर स्कूल नही जाकर काम करने की मज़बूरी में आज़ादी  सुनाई देते है।  घर में  नही सुन पाने  फिल्म अभिनेता अनुपम खेर को देश में आज़ादी  के स्वर इसलिए बुरा लगता है क्योंकि उन्होंने एक विशेष नंबर का चश्मा पहन रखा है. वे अप्रेल में  साल दर  साल तपती गर्मी भी कंहा महसूस करते होंगे?वे समृद्धि के टापू से बाहर ही नही  जाना चाहते?
कितने किसान और  मध्यम श्रेणी आय वर्ग के परिवार के लिए दो जून का खाना जुटाना दिनों-दिन कठिन होता जा रहा है. कश्मीर से कन्याकुमारी तक विकास की लकीर इण्डिया और  भारत हो गया है यह सब सत्ता के एयरकंडीशन में बैठकर नही देखा    जा सकता. सरकार ने छोटी बचत में ब्याज दर घटाने के लिए इन बचतों को बाजार दरो के समतुल्य के जो  तर्क दिए है और इसे एकमात्र उपाय बताया है वह बचपना है।
विगत वर्षो में महंगाई बड़ी है।   महँगाइयो को विश्व बाजार में आई मंडी से जोड़ा गया।  कल तक महंगाई बाप- रे- बाप! कहने वाले विशेषज्ञ अब सरकार के एयरकंडीशन  कमरे में छूप कर बैठ गए है। सत्ता की ठंडकता के घुंघरू  उनकी वाणी में उलझ गए है,अच्छे दिन की आस जुमलेबाजी हो चली है और  अप्रेल आते आते जब सूरज और तपेगा  तब बजट का असर इस्पात की भट्टी की तरह महसूस होगा और सरकार सौतेली माँ नज़र आएगी। और इसके बाद उठने वाले विरोध के स्वर को आतंकी की भाषा करार दिया जायेगा।


मंगलवार, 15 मार्च 2016

लिखने की दो...... आजादी!


जेएनयू में कन्हैया कुमार जब लाल सलाम का मतलब समझा रहा था तब दिल्ली से दूर बैठे छत्तीसगढ़ में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यहां सिर्फ लाल सलाम कहने वाले जेल में क्यों और कैसे ठूंस दिये जाते है। दिल्ली में लाल सलाम पर कानून का नजरिया अलग और छत्तीसगढ़ में अलग क्यों है। क्या इस देश में दो तरह के कानून है।
सवाल तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस वक्तव्य को लेकर भी उठ रहे है कि कल तक भारत में पैदा होने में शर्म महसूस होता था। कोई और ऐसा कह दे तो चड्डी वाले उसका जुलूस ही नहीं निकालते पुलिस भी मार कूट कर उसे सलाखों के पीछे डाल देती।
सवाल अभिव्यक्ति की आजादी और उसके खतरे का बना हुआ है। सरकार किसी की भी हो अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे सामान रुप से बना हुआ है। पत्रकारिता से इन बातों का सीधा संबंध हम देखते हैं कि कैसे दिल्ली से दूर गांव तक आते-आते पत्रकारिता पर दबाव बढ़ता जाता है।
राजधानी में यह खतरे दूसरी तरह का है। यहां पत्रकारों को कोई सीधा पकड़कर जेल में नहीं डालता परन्तु उसकी नौकरी छुड़ा दी जाती है। इस खेल में पुलिस का नहीं जनसंपर्क विभाग का सहारा लिया जाता है। ऐसे कितने ही उदाहरण है जब सिर्फ एक खबर पर कितनों की नौकरी चली गई कितनों के तबादले कर दिये गये। एक अखबार सारा संसार की बात हो या पत्र नहीं मित्र की बात हो राजस्थान से आये धुरंधर की बात हो या मंझोले कद की बात हो। खबरों की सच्चाई पर कम जनसंपर्क के दबाव में लिखने की आजादी पर बंदिशें लगाई गई।
कन्हैया के लाल सलाम का जिक्र यहां इसलिए किया जा रहा है कि बस्तर में पत्रकारिता तलवार की धार पर चलने जैसी है। नक्सली की आड़ में भ्रष्टाचार खूब फल फूल रहा है। सड़क-भवन के नाम पर आने वाले करोड़ों रुपये भ्रष्टाचार की भेट चढ़ रहा है। नक्सलियों का डर बताकर सरकारी सेवक कार्यालयों से गायब हो जाते हैं। महिनों स्कूल नहीं लगता पर वेतन बराबर बंटता है। राजीव गांधी शिक्षा मिशन का बुरा हाल है। पीडब्ल्यूडी के भवन व सड़क निर्माण का कोई हिसाब नहीं है। मनरेगा से लेकर दूसरी सरकारी योजनाएं दम तोड़ रही है और इस पर लिखने वालों को सीधे धमकी ही नहीं दी जाती जेल तक में ठूंस दिया जाता है। आरोप भी नक्सलियों से सांठ-गांठ का होता है। 
दिल्ली में जिस मस्ती से कन्हैया ने लाल सलाम कह दिया वैसा बस्तर में कोई कह नहीं सकता। जन सुरक्षा कानून मजबूती से पैर जमाये हुए है। बीबीसी के पत्रकार आलोक पुतुल को भेजे जाने वाले मैसेज क्या यह चुगली करने के लिए काफी   नहीं है कि यहां सब कुछ ठीक नहीं है। परन्तु सरकार को यह सब नहीं दिखता। पर्याप्त सबूत के बाद भी सरकार की खामोशी क्या यह साबित नहीं करते कि बस्तर में पत्रकारों के साथ जो कुछ हो रहा है वह सब सरकार के इशारे पर हो रहा है?
यह सच है कि इन दिनों देश भर में पत्रकारों को गरियाने का दौर चल रहा है। परन्तु इसके लिए जिम्मेदार क्या सरकार-प्रशासन और वे मीडिया हाउस नहीं है जो दबाव में है। जो अपने हितों के लिए पत्रकारों को शार्प शूटर की तरह इस्तेमाल करते हैं और जब उन्हें खबरों पर स्वयं के हित में खतरे दिखते हैं पीछे हट जाते हैं।
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सोमवार, 14 मार्च 2016

पाकिस्तान जिंदाबाद ! का मतलब

या खुदा मेरे दुश्मन को सलामत रखना
 वर्ना मेरे मरने की दुआ   कौन करेगा
 यह बहुत ही मार्मिक और असाधारण बातें हैं , जिसके भाव पर कोई नहीं जाना चाहता , केवल ऊपर ऊपर ही अर्थ निकाल  लिया जाता है । फिर जब आजकल हर बातों का मतलब अपनी सुविधानुसार निकाला  जाता हो वंहा ऐसे गुड़ वाक्यों का मतलब ही कहा  समझ आएगा ।
देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह अवाक् हो जाते हैं , जब आध्यात्मिक गुरु के रूप में चर्चित श्री श्री रविशंकर जय हिन्द के साथ पाकिस्तान जिंदाबाद का  उद्घोष करते हैं , कार्यक्रम में उपस्थित  गृहमंत्री राजनाथ सिंह के सामने ही यह उद्घोष उनके लिए हैरान करने वाला होगा जो  श्री श्री रविशंकर को केवल हिंदूवादी मानते हैं , हतप्रभ तो कार्यक्रम में उपस्थित अन्य हिंदूवादी भी थे ,और  श्री श्री रविशंकर ने इस स्तिथि को भांपते हुए तुरंत सफाई देते हुए सवाल उछाल दिया कि  जय हिन्द के साथ पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे क्यों नहीं लग सकता ।
यह सवाल  गृहमंत्री राजनाथ सिंह के लिए था या दूसरे कट्टरपंथी हिन्दू नेताओं के लिए यह तो  श्री श्री रविशंकर ही बता सकते हैं, परन्तु सवाल बहुत गहरा है ,और तब जब इन दिनों पुरे देश में असहिष्णुता और जेएनयू का मामला सुर्ख़ियों में हो, क्या  श्री श्री रविशंकर ने यह सवाल इसलिए तो नहीं उठाये कि इस देश में ज्यादार लोगों की  सोच यही है ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्तासीन होने के बाद असहिष्णुता के पक्छ और विपक्छ में तर्क दिए जा रहे हैं, कोई किसी का सुनाने को तैयार नहीं है ।
तुम्हारी कमीज से ज्यादा उजली की प्रतिस्पर्धा में उजाला कंही खोने लगा है , सब तरफ धुंधला है, जनता के सामने इस धुंध को हटाने का कोई उपाय नहीं करना चाहता, क्योंकि धुंध हटते ही सच्चाई सामने आ जाएगी, इसलिए सभी ने   तय  कर  लिया हैं  कि धुंध  कायम रहे  । जनता  को  कुछ दिखाई न दें    क्योंकि जिस दिन  जनता देखने लगेगी उनकी कुर्सी चली जाएगी ।  इसलिए  धुंध में उतनी ही शब्दों के फूंक मरे जातें हैं जितने में उन्हें सामने वाले  की कालिमा दिखाई दे ।
श्री श्री रविशंकर का पाकिस्तान जिंदाबाद का उद्घोष का क्या होगा ? राजनाथ की इस दौरान उपस्तिथि के क्या मायने निकाले जायेंगे ? जेएनयू में कश्मीर की  आज़ादी के नारे  कभी रुक पाएंगे ? मोदी-शरीफ  दोस्ती का रंग कितना चढ़ पायेगा?  पाकिस्तान को लेकर कब तक क्रिकेट की बलि चढाई जाएगी?और  न जाने कितने सवाल पाकिस्तान जिंदाबाद  उद्घोष  जायेंगे? यह कहना  मुश्किल है ।
पाकिस्तान जिंदाबाद को लेकर सहमति असहमति  का खेल भी राजनैतिक फायदे के लिए चलता रहेगा । शिवसेना और भाजपा का इसे   लेकर अपना - अपना विचार हो सकता है, परन्तु श्री श्री रविशंकर के  पाकिस्तान जिंदाबाद के उद्घोष के   अपने मायने है,श्री श्री रविशंकर बड़ी आसानी से  देश की राजधानी में  देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह के सामने पाकिस्तान जिंदाबाद का  उद्घोष कर लिए , परन्तु क्या यह उद्घोष कोई देश के दूसरे हिस्से या सुदूर कोने से कर सकता है?
यह उद्घोष कट्टरपंथी हिन्दू संगठनो के लिए चेतावनी भले ही न हो,सरकार के लिए मुसीबत का सबब भले ही न  बने परन्तु विश्वबंधुत्व के लिए एक नई  राह उनके लिए है जो राजनैतिक तिकड़म का शिकार होतें है। अब सवाल इस बात का  भी है कि  श्री श्री रविशंकर के इस आयोजन का सार क्या  जय हिन्द के साथ पाकिस्तान जिंदाबाद का उद्घोष है?
कश्मीर से लेकर सुदूर बस्तर तक और उत्तर पूर्व से लेकर कन्याकुमारी तक श्री श्री रविशंकर के सन्देश का मतलब क्या होगा? यह सरकार को भी समझाना होगा ?

शनिवार, 5 मार्च 2016

गुरुवार, 3 मार्च 2016

एक बहस पत्रकारिता पर...

अब इस पत्रकारिता का क्या करोगे? जिसे देखो वही गरियाने लगा है। लोगों की उम्मीद बढ़ी है। इस उम्मीद में खरा उतरना मुश्किल होता जा रहा है। अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरे पहले भी कम नहीं थे परन्तु सरकार का पहले इतना दबाव नहीं होता था। तब अखबार का मतलब एक मिशन होता थआ। परन्तु समय बदला। सरकार और कार्पोरेट सेक्टर ने विज्ञापन का ऐसा दबाव बनाया कि इसके झांसे में सभी आ गये। सिर्फ यही नहीं तय होने लगा कि खबरे कौन सी छपनी है बल्कि यह भी तय होने लगा कि खबरें कैसे बनाई जाए। खबरों का इस्तेमाल शार्प शूटर की तरह होने लगा।
बड़े कार्पोरेट सेक्टर के लिए मीडिया मुनाफा कमाने का व्यवसाय बन गया और इलेक्ट्रानिक मीडिया के आने के बाद जिस तरह की क्रांति आई उससे पत्रकारिता के मूल उद्देश्य ही बिखर कर रह गया। जो दिखता है वह बिकता है का खेल शुरु हुआ और यह उस स्तर तक जा पहुंचा जहां अवसाद के अलाला कुछ नहीं बचा। अपने नंगे पन पर गर्व करते मीडिया पर लोगों का कितना गुस्सा है यह कहीं भी महसूस किया जा सकता है।
कौन पत्रकार नाम कमाना नहीं चाहता और कौन मेहनत करना नहीं चाहता। सारे पत्रकार सहज भाव से अव्यवस्था के खिलाफ कलम चलाना चाहते हैं। हर अव्यवस्था पर शब्दों के प्रहार से वह सिर्फ हंगामा ही नहीं खड़ा करना चाहता बल्कि अव्यवस्था को मिटा देना चाहता है। परन्तु सबको मनचाही स्थिइत नहीं मिलती। कुछ पत्रकार जरुर क्यारी में लगे गुलाब की तरह अपनी सुंगध बिखरने में सफल हो जाते हैं परन्तु यह सब इतना आसान नहीं होता। कोई आंख तरेर खड़ा होता है। कोई नोटों की गड्डियां लिये खड़ा होता है और अब तो सरकारी पदों में बैठे लोगों में भी संयम नहीं रहा। सीधे जेल भिजवाने की धमकी तो किसी के मुंह से सीधी सुनी जा सकती है और फिर अखबार खोलने वाले भी तो दुकानदार हो गये हैं। लाखों करोड़ों की मशीन लगाकर कोई सरकार से पंगा क्यों ले? अखबार की आड़ में माफियागिरी भी करनी है। चिटफंड कंपनी चलानी है, जमीन लेनी है कोल ब्लॉक से लेकर सरकारी ठेका भी तो लेना दिलाना है।
पत्रकारिता के प्रति आम लोगों का गुस्सा यूं ही नहीं बढ़ा है। इसके पीछे दुकानदारी की वह सोच है जो सरकार के भ्रष्ट तंत्र के साथ खुद वैतरणी पार लगाकर सात पुश्तों की की व्यवस्था कर लेना चाहता है। वह दिन लद गये जब पत्रकार मरियल सा पायजामा कुर्ता या खद्दर पहने समाज सेवा के लिए जाना जाता था। मोहल्ले से लेकर शहर में उसकी इज्जत होती थी। हर पीडि़त पक्ष बेधड़क अपनी व्यथा कह देता था। अच्छे-अच्छे पुलिस के अधिकारी भी पत्रकारों के सामने आने से कतराते थे। परन्तु जमाना बदल गया है। तेजी से बदला है अब कलम की विवशता आंखों में साफ पढ़ी जा सकती है यह अलग  बात है कि अब इन पानीदार आंखों को देखने की फुर्सत किसी के पास नहीं है वह तो बस पत्रकारिता में आये इस बीमारी को ही देखकर अपनी भड़ास निकालने में सुकून महसूस करता है।
पत्रकारिता का एक और मिजाज है। वह कभी कभी उत्साही हो जाता है और जिसकी परिणिति बस्तर जैसे क्षेत्रों में काम करने वाले पत्रकारों की स्थिति से साफ समझा जा सकता है जहां सरकारी पदों पर बैठे लोगों के पास जनविरोधी कानून जैसे हथियार के अलावा कुचलने या जेल में भेजने के सारे सामान होते हैं। राजधानी तक उनकी आवाज कैसे पहुंचे। यह भी प्रश्न खड़ा है। प्रश्न तो राजधानी के पत्रकारों और पत्रकारिता पर भी उठने लगे है परन्तु वे सौभाग्यशाली होते है कि उनके पास बंधी बंधाई तनख्वाह है।
परन्तु अभिव्यक्ति की आजादी पर मंडरा रहे खतरों के बाद भी सरकारी तंत्र और माफियाओं के गठजोड़ से मचे लूट के बाद भी क्यारियों के गुलाब की तरह पत्रकारिता का सुंगध कायम है पीडि़तों के लिए न्याय का दरवाजा खोलता है और अव्यवस्था के खिलाफ हंगामा खड़ा करता है। भले ही क्या करोगे ऐसा पत्रकारिता के शब्द ताकतवर दिखाई पड़ रहे हो परन्तु वह ताकतवर कतई नहीं है। पत्रकारिता आज भी खामोश नहीं है उसके कलम में धार कायम है स्याही जरुर फीकी हो गई है परन्तु अभी इतनी फीकी नहीं हुई है कि इसे पढ़ा न जाए। स्याही गाढ़ी जरुर होगी। समय लगेगा।

सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

शक्ति स्वरूपा जगदम्बा...


प्रतिवर्ष दुर्गोत्सव मनाया जाता है। गांव, शहर, मोहल्ले और यहां तक कि घर-घर में माँ के हर रूप की पूजा होती है। चौक चौराहों पर माता की प्रतिमा स्थापित किए जाते हैं। मंदिरों में ज्योति कलश व जंवारा स्थापित ही नहीं होते बल्कि माता की सेवा में ढोलक के थाप पर गीत गूंजते हैं। मेहमूद या फैज़ल के संगीत की थाप पर डांडिया की गूंज आकाश में दूर-दूर तक सुनाई पड़ती हैं। याद किया जाता है माँ के स्वरूप को, याद किया जाता है माँ की महिमा और भारतीय संस्कृति तथा उत्सव की वजह को।
भारतीय जीवन में नारी सा पूज्यनीय कोई और नहीं है। यही वजह है कि कई प्रांतों में माता-पिता आज भी अपनी पुत्री का चरण स्पर्श करते हैं और विवाह पश्चात उनके घर का अन्न-जल ग्रहण नहीं करते। नारी पूज्यनीय है, देवी है और उनकी शक्ति का सर्वत्र गुणगान करते नहीं थकते। नारी सावित्री बनकर अपने पति का जीवन लाने यमराज से लड़ जाती है। राधा बनकर पूरी सृष्टि में प्रेम का संचार करती है, मीरा बनकर वह सब कुछ त्याग करने तैयार रहती है तो रानी लक्ष्मी बाई बनकर देश को आजादी दिलाने तत्पर हो जाती है, वह कृष्ण की मां बनकर यशोदा मैय्या हो जाती है तो राम की मां बनकर कौशल्या माता बन जाती है, नारी में मां का स्वरूप अवर्णित है। मां के दूध से सिर्फ जीवन नहीं मिलता वह लहु में घुलकर हमारे भीतर शक्ति का संचार करती है। शक्ति हमारे भीतर है, धर्म हमारे भीतर है। धर्म हमें राह दिखाता है और शक्ति इस राह की कठिनाई को दूर करती है।  शक्ति हमारा विश्वास है। विश्वास का प्रतीक गणेश जी है इसलिए हम हर साल गणेशोत्सव भी मनाते हैं। वे विध्नहर्ता हैं, हमारा विश्वास है। यही विश्वास लिये हम अपने पूर्वजों का आशीर्वाद लेने के बाद माता की शक्ति को ग्रहण करते हैं। विश्वास के बाद शक्ति ही हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। शक्ति का दुरुपयोग न हो, मां यही तो सिखाती है।
शक्ति के अनेक रूप है इसलिए वह महामाया है, वह शक्तिशाली होते हुए भी शीतल है इसलिए छत्तीसगढ़ में गांव-गांव में शीतला माता विराजती हैं। पूरे नौ दिन माता की सेवा में गीत गाये जाते हैं, वह जननी है इसलिए जंवारा बोया जाता है। उत्सव हमारे प्राण वायु है, उत्सव हमें एक होने की प्रेरणा देता है। उत्सव हमें समझाता है जीव मात्र एक है, इसलिए माता का वाहन सिंह है। हम फल पुष्प चढ़ाते हैं, उपवास रखते हैं, सिर्फ फलाहार करते हैं। यह उत्सव हमें सबक देता है कि ईश्वर और प्रकृति के सामने सब एक हैं। मनुष्य को बचाना है तो प्रकृति को बचाना जरूरी है। इसलिए देवी-देवताओं ने अपने वाहनों, पूजा अर्चना में प्रकृति को जोड़कर रखा।
आज़ादी के बाद हमें संभलना था। इन उत्सवों के माध्यम से हमें सबको जोड़कर चलना था। मंदिर में हीरे-मोती चढ़ाने वाले भी पहुंचते हैं और खाली हाथ दर्शन करने वाले भी आते हैं। देवी-देवताओं ने कभी भेद नहीं किया। परन्तु भेद करना हमने शुरू किया। हमारे स्वार्थ ने मानव-मानव में अंतर किया। यह अंतर मिटना चाहिए। छत्तीसगढ़ की नारी बलशाली है। वह खेतों में भी उतनी ही सिद्धत से काम करती है जितना वह जंवारा विसर्जन के लिए समर्पित होती है। यहां बेटियों में भेद नहीं है, यहां कोख में बेटियां नहीं उजाड़ी जाती। इसलिए छत्तीसगढ़ महतारी है। महतारी यानी मां, मां यानी जननी। जननी भेद नहीं करती बल्कि वह कमजोर बच्चों पर ज्यादा ध्यान देती है।
मां की माया अपरंपार है। इसलिए वह महामाया है। नई पीढ़ी यह सब नहीं जानती। इसमें इनका दोष नहीं है। हमने ही इन्हें नहीं बताया। विदेशीपन की दौड़ शुरु कर दी। इस आधे अधुरे दौड़ में न वह विदेशी ही बन सका न ही अपनी संस्कृति और संस्कार से ही परिचित हो सका। वह विज्ञान की जाल में उलझ गया। उसे वही ठीक लगा जो       विज्ञान कहता है। परन्तु विज्ञान वही कहता है जो वह जानता है। विज्ञान आस्था को नहीं जानता। कण-कण में भगवान को वह अभी भी ठीक से नहीं जान सका। इसलिए नई पीढ़ी दुर्गोत्सव तो मना रहा है परन्तु विदेशी तौर तरीकों से। ऐसे में न संस्कार बचेगा न संस्कृति। सब गड़बड़ हो जायेगा।
आधा अधूरा रिश्ता या समझ हमेशा ही तकलीफ देता है। आज वहीं हो रहा है। जरूरत है तो काम ले लो वरना प्रवेश पर ही पाबंदी लगा दो। ईश्वर पाबंदी से परे है यह सब जानते हैं परन्तु जाति धर्म की खाई चौड़ी हो गई है। हम जगत जननी जगदम्बा का उत्सव तो मना रहे हैं परन्तु जननी की सहनशीलता से कुछ नहीं सीख रहे हैं।
उत्सव हमारी संस्कृति है। मनुष्य को मनुष्य से जोडऩे का माध्यम है। उन्हेंं समझने का साधन है। उत्सव से राष्ट्रीय स्वरूप विकसित होता है। देवी-देवताओं का प्रकृति से लगाव हमें नई सीख देती है। ताकि हम संस्कार के नए बगीचे तैयार कर सकें। परन्तु क्या ऐसा हो रहा है? हम उत्सव मना तो रहे हैं, अपने तौर-तरीकों से। जगत जननी जगदम्बा के आगे संगीत की थाप पर डांडिया खेला जा रहा है। ढोलक की थाप पर सेवा गीत गाये जा रहे हैं, पर श्रद्धा और विश्वास कम होता जा रहा है। शक्ति का दुरुपयोग हो रहा है, पर माँ सब चुपचाप देख रही है। महिषामर्दन होगा... जरूर होगा...।

शुक्रवार, 9 अक्टूबर 2015

जीवंत दस्तावेज



'मैं और मेरा प्रेस क्लब राजधानी रायपुर के पत्रकारों का जीवंत दस्तावेज है, इतिहास की गवाही है। पूरे देश में प्राय: हर शहर में प्रेस क्लब है। परन्तु प्रेस क्लब पर लिखी यह पहली पुस्तक है। जिसमें कौशल तिवारी ने प्रेस क्लब से अपने संबंधों को रेखांकित तो किया ही है। पत्रकारिता के मूल्यों व आदर्शों के उच्चमाप दण्ड पर प्रकाश डालने की कोशिश की है।
रायपुर प्रेस क्लब की अपनी गरिमा है। यहां की सदस्यता आज भी गौरव की बात है। विषम और विकराल होते समय में जब बाजारवाद से कोई नहीं बच सका है। पत्रकारिता के मूल्यों को लेकर सर्वत्र चिंता है ऐसे में यह पुस्तक नई पीढ़ी के लिए धरोहर की तरह है। पुस्तक की जीवंतता और तथ्यों का लाभ नई पीढिय़ों को मिलेगा यह निश्चित है।
अगली सदी पत्रकारिता की संवेदनशीलता और मापदंड की होगी या बाजारवाद की काली छाया, जहां संवेदना का मतलब सिर्फ पैसा होग? यह सोचने में क्या नुकसान है। कोई भी एक चीज हावी होगा तो दूसरा कमजोर होगा। यह न हो इसलिए रुक कर विचार कर लिया जाए। इतिहास की पलें हमें राह दिखाती है। और इतिहास का पुर्वालोकण हमें सही दिशा दिखाता है।
प्रस्तुत पुस्तक का यह प्रथम संस्करण है, तथापि सूचना के अभाव में कुछ छूट गया है और आने वाले संस्करण में इसका परिमार्जन किया जा सकता है। वरिष्ठ पत्रकारों के जीवन वृत्त और प्रेस क्लब की ऐतिहासिक तवय पुस्तक में संकलित हुआ है जो निश्चित ही सुखद है।

डॉ. सुधीर शर्मा
अध्यक्ष, हिन्दी विभाग
कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिलाई (दुर्ग)