शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

कोरोना को लेकर कुछ जानकारी

क्या यह सब बाते सच है ?

प्रश्न 1) क्या कोरोना वायरस को ख़त्म किया जा सकता है?

*उत्तर:-* नहीं! कोरोना वायरस एक निर्जीव कण है जिस पर *चर्बी की सुरक्षा-परत* चढ़ी हुई होती है। *यह कोई ज़िन्दा चीज़ नहीं है, इसलिये इसे मारा नहीं जा सकता* बल्कि यह ख़ुद ही रेज़ा-रेज़ा (कण-कण) होकर ख़त्म होता है।

प्रश्न( 02)- कोरोना वायरस के विघटन (रेज़ा-रेज़ा होकर ख़त्म होने) में कितना समय लगता है?

*उत्तर:-* कोरोना वायरस के विघटन की मुद्दत का दारोमदार, *इसके आसपास कितनी गर्मी या नमी है? या जहाँ ये मौजूद है, उस जगह की परिस्थितियां क्या हैं?* इत्यादि बातों पर निर्भर करता है।

प्रश्न(03):- इसे कण-कण में कैसे विघटित किया जा सकता है?

*उत्तर:-* कोरोना वायरस बहुत कमज़ोर होता है। *इसके ऊपर चढ़ी चर्बी की सुरक्षा-परत फाड़ देने से यह ख़त्म हो जाता है।* ऐसा करने के लिये साबुन या डिटर्जेंट के झाग सबसे ज़्यादा प्रभावी होते हैं। *20 सेकंड या उससे ज़्यादा देर तक साबुन/डिटर्जेंट लगाकर हाथों को रगड़ने से इसकी सुरक्षा-परत फट जाती है* और ये नष्ट हो जाता है। इसलिये अपने शरीर के खुले अंगों को बार-बार साबुन व पानी से धोना चाहिये, ख़ास तौर से उस वक़्त जब आप बाहर से घर में आए हों।

प्रश्न(04):- क्या गरम पानी के इस्तेमाल से इसे ख़त्म किया जा सकता है?

*उत्तर:-* हाँ! गर्मी चर्बी को जल्दी पिघला देती है। इसके लिये कम से कम 25 डिग्री गर्म (गुनगुने से थोड़ा तेज़) पानी से शरीर के अंगों और कपड़ों को धोना चाहिये। छींकते या खाँसते वक़्त इस्तेमाल किये जाने वाले रुमाल को 25 डिग्री या इससे ज़्यादा गर्म पानी से धोना चाहिये। गोश्त, चिकन या सब्ज़ियों को भी पकाने से पहले 25 डिग्री तक के पानी में डालकर धोना चाहिये।

प्रश्न(05):- क्या एल्कोहल मिले पानी (सैनीटाइजर) से कोरोना वायरस की सुरक्षा-परत को तोड़ा जा सकता है?

*उत्तर:* हाँ! लेकिन उस सैनीटाइजर में एल्कोहल की मात्रा 65 पर्सेंट से ज़्यादा होनी चाहिये तभी यह उस पर चढ़ी सुरक्षा-परत को पिघला सकता है, वर्ना नहीं।

प्रश्न(06):-क्या ब्लीचिंग केमिकल युक्त पानी से भी इसकी सुरक्षा-परत तोड़ी जा सकती है?

*उत्तर:-* हाँ! लेकिन इसके लिये *पानी में ब्लीच की मात्रा 20% होनी चाहिये।* ब्लीच में मौजूद क्लोरीन व अन्य केमिकल कोरोना वायरस की सुरक्षा-परत को तोड़ देते हैं। *इस ब्लीचिंग-युक्त पानी का उन सभी जगहों पर स्प्रे करना चाहिये जहाँ-जहाँ हमारे हाथ लगते हैं।* टीवी के रिमोट, लैपटॉप और मोबाइल फ़ोन को भी ब्लीचिंग-युक्त पानी में भिगोकर निचोड़े गये कपड़े से साफ़ करना चाहिये।

प्रश्न(07):-क्या कीटाणुनाशक दवाओं के द्वारा कोरोना वायरस को ख़त्म किया जा सकता है?

*उत्तर:-* नहीं! कीटाणु सजीव होते हैं इसलिये उनको *एंटीबायोटिक* यानी कीटाणुनाशक दवाओं से ख़त्म किया जा सकता है लेकिन *वायरस निर्जीव कण होते हैं, इन पर एंटीबायोटिक दवाओं का कोई असर नहीं होता।* यानी कोरोना वायरस को एंटीबायोटिक दवाओं से ख़त्म नहीं किया जा सकता।

प्रश्न(08):-कोरोना वायरस किस जगह पर कितनी देर तक बाक़ी रहता है?

*उत्तर:-*
*कपड़ों पर :* तीन घण्टे तक
*तांबा पर :* चार घण्टे तक
*कार्डबोर्ड पर :* चौबीस घण्टे तक
*अन्य धातुओं पर :* 42 घण्टे तक
*प्लास्टिक पर :* 72 घण्टे तक

इस समयावधि के बाद कोरोना वायरस ख़ुद-ब-ख़ुद विघटित हो जाता है। लेकिन इस समयावधि के दौरान अगर किसी इंसान ने उन संक्रमित चीज़ों को हाथ लगाया और अपने हाथों को अच्छी तरह धोये बिना नाक, आँख या मुंह को छू लिया तो वायरस शरीर में दाख़िल हो जाएगा और एक्टिव हो जाएगा।

प्रश्न(09):-क्या कोरोना वायरस हवा में मौजूद हो सकता है? अगर हाँ तो ये कितनी देर तक विघटित हुए बिना रह सकता है?

*उत्तर:-* जिन चीज़ों का सवाल न. 08 में ज़िक्र किया गया है उनको हवा में हिलाने या झाड़ने से कोरोना वायरस हवा में फैल सकता है। कोरोना वायरस हवा में तीन घण्टे तक रह सकता है, उसके बाद ये ख़ुद-ब-ख़ुद विघटित हो जाता है।

प्रश्न(10):-किस तरह का माहौल कोरोना वायरस के लिये फायदेमंद है और किस तरह के माहौल में वो जल्दी विघटित होता है?

*उत्तर:-* कोरोना वायरस क़ुदरती ठण्डक या एसी की ठण्डक में मज़बूत होता है। इसी तरह अंधेरे और नमी (Moisture) वाली जगह पर भी ज़्यादा देर तक बाक़ी रहता है। यानी इन जगहों पर ज़्यादा देर तक विघटित नहीं होता। *सूखा, गर्म और रोशनी वाला माहौल कोरोना वायरस के जल्दी ख़ात्मे में मददगार है।* इसलिये जब तक इसका प्रकोप है तब तक एसी या एयर कूलर का इस्तेमाल न करें।

प्रश्न(11):-सूरज की तेज़ धूप का कोरोना पर क्या असर पड़ता है?

*उत्तर:-* सूरज की धूप में मौजूद *अल्ट्रावायलेट किरणें* कोरोना वायरस को तेज़ी से विघटित कर देती है यानी तोड़ देती है क्योंकि सूरज की तेज़ धूप में उसकी सुरक्षा-परत पिघल जाती है। इसीलिये चेहरे पर लगाए जाने वाले फेसमास्क या रुमाल को अच्छे डिटर्जेंट से धोने और तेज़ धूप में सुखाने के बाद दोबारा इस्तेमाल किया जा सकता है।

प्रश्न(12):-क्या हमारी चमड़ी (त्वचा) से कोरोना वायरस शरीर में जा सकता है?

*उत्तर:-* नहीं! तंदुरुस्त त्वचा से कोरोना संक्रमण नहीं हो सकता। अगर त्वचा पर कहीं कट लगा है या घाव है तो इसके संक्रमण की संभावना है।

प्रश्न(13):-क्या सिरका मिले पानी से कोरोना वायरस विघटित हो सकता है?

*उत्तर:-* नहीं! सिरका कोरोना वायरस की सुरक्षा-परत को नहीं तोड़ सकता। इसलिये सिरका वाले पानी से हाथ-मुंह धोने से कोई फ़ायदा नहीं है।

Jya Jaya Singh जी

मैं जीऊँगी...

कितनी अजीब बात है
किसी को ज़िंदगी भर प्यार नहीं मिलता
ना माँ का
ना पिता का
ना ही पति का
ना ही किसी का साथ
सिर्फ इसलिए क्योंकि
मैं किन्नर हूँ
ये जिंदगी हैं
ये कोई सोचता ही नहीं
सपने भी
अपने भी
वही ज़ज़्बात
वही रूह
वही खून
फिर क्यों नहीं है साथ
मैं मन क्यों मारू
इच्छा क्यों ना रखूं
इश्क क्यों ना करूँ
ज़िंदगी से
मैं जीऊँगी ,जीने की संघर्ष के लिए
खुश रहने के लिए
हँसने के लिए
अपने अरमानों को
पूरा करने  के लिए
तब तक
जब तक ज़िंदगी मेरी
तेरी जैसी नहीं हो जाती
मैं जीऊँगी

-विद्या राजपूत 

गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

पूरी मानव सभ्यता के लिए कोरोना का खुला पत्र.

पूरी मानव सभ्यता के लिए कोरोना का खुला पत्र....✍️श्रिया

कहते हैं प्रकृति अपना विकास हो या विनाश स्वयं कर लेती है.. और शायद आप ये बात भूल गए थे तो उसे ही याद दिलाने ये कोरोना महामारी अपने इस भयावह रूप के साथ वापस आई है...

ये वक़्त एक दूसरे को कोसने या बेफिजूल के बहस में समय व्यर्थ करने का नही बल्कि ये सोचने का है कि, ये पृथ्वी आपको क्या सीखना चाह रही है..? किन वास्तविकताओँ से आपका परिचय करना चाह रही है..?
इन्हीं कुछ मुख्य बातों पर गौर फरमाइए..!

1} शादी:- आजकल 25 लाख से कम में किसी की शादी नही होती.. लेकिन सोचिये की क्या इसकी सच मे जरूरत होती है.. जवाब मिलेगा बिल्कुल नही..सादगी के साथ सिर्फ उतने ही लोग जितनी जरूरत हो जितने की आशीर्वाद हेतु आवश्यकता होती है... दिखावे की इस दुनिया से बाहर निकलने की सीख यह कोरोना बीमारी आपको दे रही है...

2}माल, फ़ूड, मनोरंजन:- इन सब ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए आपको बेहिसाब मेहनत करनी पड़ती है ताकि आप जरूरत से ज्यादा कमा सके और उन पैसों को मनोरंजन हेतु मॉल , फूड या फिर लग्जरियस गाड़ी से उतरकर अपनी शेखी बघारने में खर्च कर सके.. लेकिन इस कोरोना वायरस ने सबको एक ही लाइन पर लाकर खड़ा कर दिया है क्योंकि अब आपके पास लंबोर्गिनी भी होगी तो वहआपके घर के बाहर धूल खाती पड़ी होगी और बाहर निकलने के लिए आपको पैदल या साइकिल की ही जरूरत होगी...

3} पैसो की जरूत:- कोरोना आपको यह सिखाना चाह रही है कि आपको आखिर कितने पैसों की जरूरत पड़ती है.. सिर्फ उतनी ही जिससे आप दो वक्त की रोटी खा सकें और अपने परिवार के चेहरे पर खुशी ला सके,  ना कि अपनी पूरी जिंदगी को भागदौड़ में बिताते हुए पैसे कमा कर अपनी परिवार को लग्जरियस लाइफ दे सके.. और इस चक्कर में आप अपनों से दूर हो जाते हैं, परिवार टूट के बिखर जाते हैं ..लेकिन हम अपनी लालच में इस कदर डूबे रहते हैं कि इस बारे में सोचते ही नहीं कि बिना परिवार के यह पैसे किस काम के..?  तो सिर्फ उतना ही कमाए जितना आपके जिंदगी को गुजारने के लिए जरूरी है अधिक धन संग्रह आपको व्यासना की ओर धकेलता है..

4} खुशी का अर्थ:- कोरोना आपको यह सिखाना चाह रहा है कि आखिर जीवन में वास्तविक खुशी क्या है..?
 देश और दुनिया को बदलना आपके बस में नहीं क्योंकि प्रकृति अपने अनुसार स्वयं का परिवर्तन करती है आप मंगल पर पहुंचना चाहते थे,  लेकिन प्रकृति तो धरती पर ही रहना चाह रही थी..और उसने आपको ही उस एक कमरे में बंद करके रख दिया है.. जहां से आप मंगल तो जाना छोड़ घर के बाहर तक नहीं निकल सकते...फिर इतनी हाय तौबा करने से क्या फायदा..!

5}. प्रसिद्धि का पैमाना:- कोरोना ने आपको यह समझा दिया है कि आखिर प्रसिद्धि का क्या पैमाना होना चाहिए अगर वैश्विक महामारी के दौर में आप अपने आस-पड़ोस के लोगों की मदद करते हैं तो आप श्रेष्ठ हैं..
ना कि बड़ी-बड़ी बातें कर,  टीवी पर आने , ऑटोग्राफ देने या भीड़ के सामने हाथ हिलाने वाले को महान समझा जाए.. क्योंकि जब प्रकृति अपने वास्तविक रूप में आती है तब यह सभी जो तथाकथित प्रसिद्ध और महानहस्ति थे..वह भी अपने घर में दुबके बैठे हैं इसलिए श्रेष्ठ या महान बनने के लिए जरूरी नहीं कि करोड़ों लोग आपको जाने बल्कि वे लोग आपको जाने जिनसे आप रोज मुलाकात करते हैं और किसी एक व्यक्ति के भी काम आ सके तो आप श्रेष्ठ हैं..

6.}प्रकृति का न्याय:- पूरा विश्व फिलहाल जलवायु संकट को लेकर चिंतित था लेकिन कोई भी खनन कार्य हो या फिर औद्योगिक कार्य बंद करने को आतुर नहीं था.. एक तरफ तो आप जलवायु परिवर्तन को लेकर बड़ी-बड़ी डींगे हांक रहे थे लेकिन वहीं दूसरी तरफ आपका कार्य निरंतर जारी था .. इसलिए प्रकृति ने अपने आप को फिर से रिकवर करने के लिए आप सभी को अपने घरों पर बिठा दिया...ताकि ना कोई उद्योग काम कर सके ना ही कोई खुदाई हो सके.. जितने बेदर्दी से आपने धरती का सीना चीरा है और इस वायुमंडल को अपने उद्योगों से निकलने वाले धुंवे से बर्बाद किया है.. उसका बदला लेना तो प्रकृति का धर्म था ..बिना देरी के उसने अपने साथ हुए अन्याय का बदला लिया और आप सबको अपनी वास्तविक औकात दिखा दी कि आप सिर्फ अपनी चिंता करें ना कि इस पूरे विश्व की..क्योंकि इस धरती को बनाने वाला मौजूद है..

#imshriya #कोरोना_मंथन

सोमवार, 6 अप्रैल 2020

प्रतिक्रियाएँ


मेरी किताब के शीर्षक ,कवर पेज और भूमिका पर फ़ेसबुक में प्रतिक्रिया आनी शुरू हो गई
इन प्रतिक्रियाओं में शुभकामनाएँ भी है तो गालियाँ भी
जिनके पास जो है वही तो देंगे की तर्ज़ पर मेरा लेखन जारी है
फ़िलहाल आप प्रतिक्रियाएँ देखिए
















शनिवार, 4 अप्रैल 2020

जनआवाज की सुविधानुसार परिभाषा...


मीडिया की विश्वसनियता पर जब सवाल उठने लगे हैं तब यह सवाल मौजूदा वक्त में बेहद जरूरी हो जाता है कि आखिर यह सब हो क्या रहा है? मीडिया की भूमिका में कहा चूक हो रही है। क्या उसने सचमुच जन सरोकार की तरफ से आंख मूंद लिया है? या फिर वह अपनी सुविधानुसार खबरें छापने लगा है? सवाल यह भी है कि क्या सरकार की पसंद नापसंद पर मीडिया की भूमिका सिमटता चला जा रहा है? तब फिर जन सरोकार की पैरवी कौन करें।
सवाल यह नहीं है कि मीडिया की विश्वसनियता क्यों समाप्त हो रही है बल्कि सवाल यह है कि मीडिया अपनी भूमिका निभाने में कहां चूक कर रही है। अपना प्रचार बढ़ाने या टीआरपी बढ़ाने की अंधी दौड़ में वह कहां चली जायेगी। मीडिया की भूमिका विवाद बढ़ाने की है या विवाद को समाप्त करने की है।
मौजूदा दौर में जब सब कुछ बदल रहा है तो मीडिया की भूमिका के बदलाव पर चर्चा जरुरी हो गया है। राजनीति के रंग से दूर जन सरोकार में मीडिया क्योंं पीछे होते चली जा रही है। क्या राजनेताओं की बयानबाजी और भ्रष्टाचार ही मीडिया का एकमात्र हथियार हो गया है या शिक्षा स्वास्थ्य बेरोजगारी बिजली-पानी भी पत्रकारिता का ह्स्सिा है?
राज्य बनने के पहले छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता को जिन उंचाईयों पर देखा जन सरोकार के मुद्दों ने जिस तरह से सरकार की चूलें हिला दी थी। क्या वैसी खबरें राज्य बनने के बाद देखने को मिल रही है। इसका जवाब में ही मीडिया की विश्वासनियता का पैमाना जुड़ा हुआ है।
राज्य बनने के बाद पत्रकारिता ने नई करवट ली। चूंकि छत्तीसगढ़ की राजधानी में मीडिया की बाढ़ आ गई तो पत्रकारिता भी यहीं से चलने लगी। राजधानी में नेताओं अफसरों और माफियाओं के गठजोड़ ने सबसे पहले तो मीडिया को घेरना शुरु किया और विज्ञापन के दबाव तले पत्रकारिता को दबाने की कोशिश होने लगी। नेताओं की बयानबाजी और भ्रष्टाचार की खबरों ने अखबारों या चैनलों की जह को घेरना शुरु किया तब स्कूल में टीचरों या अस्पतालों में दवाओं का अभाव पर खबरें कम होती चली गई। रिपोर्टिंग जैसी चीज तो लुप्त प्राय: होने लगी और यह किसी से नहीं देखा कि कांक्रीट में तब्दिल होते शहर में प्रदूषण का स्तर कहां जा रहा है।
पत्रकारिता के रवैये में आई इस तब्दिली के इस दौर में एक खास बात और हुई कि मीडिया सत्ता केन्द्र के आगे मंडराने लगी और यह सब इतना खुला होने लगा कि आम जन भी इसे आसानी से देखने लगे और यहीं से उनकी विश्वसनियता पर सवाल उठने लगे और जब सवाल उठेंगे तो निशाना भी वहीं होंगे इसलिए जैसे ही सोशल मीडिया का दौर आया सबसे पहले निशाने पर मीडिया ही आया।
मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रहार करने की कोशिश में वे लोग भी जुड़ गए जो माफियागिरी चला रहे थे। भ्रष्टाचार में लिप्त थे और अनैतिक कार्य कर रहे थे। यह सब साजिशन भी हुआ क्योंकि उनके खिलाफ मीडिया में खबरें आने पर जनआक्रोश बढ़ सकता था तो जनआक्रोश को दबाने के लिए ही मीडिया की विश्वसनियता पर सवाल उठाये गए।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

पैदा होते ही चर्चा में आ गए दोनों बच्चे



रायपुर के मेडिकल कालेज अस्पताल में लगभग एक सप्ताह पहले प्रीति वर्मा ने जुड़वा बच्चों को जन्म दिया था | डॉ. भीमराव आम्बेडकर मेमोरियल अस्पताल के डाक्टरों ने ऑपरेशन कर दोनों बच्चों का जन्म कराया। अस्पताल की जनसंपर्क अधिकारी शुभ्रा सिंह ने बताया कि महिला को लॉक डाउन की स्थिति में जब लेबर पैन की शिकायत हुई तो उसे यहां लेकर आया गया था ।

महिला प्रीति ने बताया कि जब पेट में दर्द उठा कोई वाहन नहीं मिल रहा था। ऐसे में उसके पति ने यहां उसे मोटरसाइकिल में ही बैठाकर उसे अस्पताल पहुंचाया था। यह आधी रात की बात थी। रास्ते में कई जगह उन्हें पुलिसवालों ने रोककर पूछताछ की थी। डिस्चार्ज होने के बाद घर में जब नामकरण संस्कार हुआ तो घर के बुजुर्गों ने बेटे का नाम कोविड एवं बेटी का नाम कोरोना रखने पर सहमति जताई ।
इस बारे में श्रीमती वर्मा ने कहा कि अभी सभी के दिलो दिमाग में कोरोना छाया है।ऐसे में लोगो में कोरोना का भय दूर करने के लिए बेटे का नाम कोविड एवं बेटी का नाम कोरोना रखने का निर्णय लिया। बच्चों के पिता विनय वर्मा ने बताया कि कोरोना संक्रमण को लेकर लोगों में काफी ज्यादा चिंता देखने को मिल रही है, ऐसे में वह इनका ट्रेंडिंग नामकरण करके लोगों का कुछ तनाव कम करने की कोशिश की है। उधर इन बच्चों की चर्चा लोगों की जुबान पर है |

सच को भ्रमित करता ट्रोल आर्मी

कोई माने या न माने, लेकिन यह सत्य है कि पत्रकारिता इन दिनों बेहद नाजुक दौर में है, आलोचना सहन नहीं करने की बढ़ती प्रवृत्ति का सर्वाधिक शिकार पत्रकार ही हुए है। स्वयं की सत्ता स्थापित करने और पैसों की भूख ने पत्रकारिता को ऐसे अंधेरे कमरे में कैद कर लिया है जहां से रोशनी की किरणें भी बेहद बारिक हो चली है। जहां से निकलना मुश्किल नजर आ रहा है।
हमने इसी जगह पर ट्रोल आर्मी के तेवर और इससे होने वाले खतरे को लेकर विस्तार दिया था लेकिन इस दौर में पत्रकारिता के लिए गंभीर चुनौती खड़ा हुआ है। झूठ की चादर इतनी उजली दिखाई देने लगा है कि सच को लेकर भ्रम होने लगा है।
प्रो सरकारी तंत्र से जिस तरह से मीडिया के सच को ट्रोल करना शुरु किया उससे भ्रम तो फैला ही मीडिया की विश्वसनियता को भी कटघरे में खड़ा करने का काम किया और यह सब इतने सलीके से किया गया कि वह आदमी भी मीडिया को गरियाने लगा जिसे अपने रोजी रोटी के अलावा किसी से मतलब नहीं है। मीडिया न हुआ गरीब की लुगाई हो गई जिसके साथ आप जब चाहे कुछ कर लो।
ऐसा नहीं है कि यह सब हाल के वर्षों में हुआ लेकिन चंद सालों में इसे धारदार तरीके से इस्तेमाल किया जाने लगा। दरअसल बगैर संवैधानिक अधिकार के मीडिया ने जिस तरह से राजनेताओं, अधिकारियों और अपराधियों के गठजोड़ पर प्रहार करना शुरु किया तब से ही इन तीनों के गठजोड़ ने अपनी ईज्जत बचाने मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रहार शुरु किया।
नेताओं, अफसरों और माफियाओं के गठजोड़़ ने जिस तरह से देश में लूट खसोट की परिपाटी शुरु की उस पर मीडिया ने ही बाधा डाली कहा जाए तो गलत नहीं होगा। मीडिया के बढ़ते प्रभाव से लुट खसोट में बाधाओं को बर्दाश्त करना इन गठजोड़ के लिए कठिन काम था इसलिए साजिशन मीडिया की विश्वसनियता पर न केवल सवाल उठाये गये बल्कि पत्रकारों की हत्या तक की जाने लगी है। 
अपनी छवि चमकाये रखने मीडिया की छवि को बिगाडऩे के लिए जिस तरह का षडय़ंत्र किया गया वह शोध का विषय है। ऐसे गठजोड़ ने सत्ता के दम पर सबसे पहले ऐसे मीडिया घराने को अपने जाल में फंसाया जो पैसों के दिवाने थे। उन्हें भय और प्रलोभन से ऐसी खबरों के लिए मजबूर किया गयाजो उनके हितों की रक्षा तो करे ही उनकी छवि को भी चमकाने का काम करे। इसके बाद आपराधिक कमाई से मिले धन से स्वयं का मीडिया हाउस खड़ा करने की कोशिश में ऐसे पत्रकारों को अपने जाल में फंसाया जिसके नाम का इस्तेमाल शार्पशूटर की तरह कर ले।
इन सबके बाद भी जब मीडिया को जब वे प्रभावित नहीं कर पाये तब फेंक न्यूज और ट्रोल आर्मी का इस्तेमाल करना शुरु कर दिया। हालात को इस तरह से वे संचालित करने लगे कि आम आदमी की जरुरतों को नजरअंदाज किया जा सके और आम आदमी अपनी जरुरतों की बजाय उन मुद्दों में भटक जाए जिससे उनका ध्यान सरकार की तरफ से हट जाए और वे जाति, धर्म और देशभक्ति में उलझ कर रह जाए।
जन सरोकार के मुद्दे उठाने वालों को इतना ट्रोल किया जाए कि उसकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर दिया जाए। उसे धर्म विरोधी, देश विरोधी साबित कर दिया जाए। राजनीति, अपराधियों और अफसरों के इन गठजोड़़ की वजह से पत्रकारिता के इस नाजुक दौर में जिस तरह से खबरों की विश्वसनीयता संकट में है वह देश के हित में कतई नहीं है। मीडिया हाउस तो पहले ही बंटे थे और अब पत्रकार भी बंटे नजर आने लगे है।