सोमवार, 17 मई 2021

नैतिक सत्ता तो बची नहीं!

 

देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी क्या नैतिक सत्ता खो चुके हैं? हालांकि नरेन्द्र मोदी पर पार्टी का भरोसा अब भी कायम है इसलिए सत्ता जाने का सवाल ही नहीं है लेकिन सात साल में इस शख्स की छवि को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जितना पलीता लगा है उतना किसी भी प्रधानमंत्री पर नहीं लगा हैं।

बात-बात पर झूठ और अमर्यादित भाषा शैली और भाजपा के प्रचार में दिन-रात लगे रहने की शैली ने उनके हर काम पर संशय का बादल खड़ा कर दिया है। नेता की ताकत होती है जनता का विश्वास, सक्षमता और दूर दृष्टि पर। लेकिन जब नियत ही साफ न हो या शंकास्पद हो तो फिर वह लाख जतन कर ले इतिहास में वह दर्ज होने लायक नहीं बच सकता है। 

अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पास केवल तीन साल बचे हैं लेकिन बीते बरस में अविश्वास की जो खाई बड़ी है उसके बाद यह कहना कठिन है कि वे कोई नया करिश्मा कर पायेंगे क्योंकि इस कोरोना काल में प्रधानमंत्री की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जितनी आलोचना हुई है उसकी भरपाई हो पाना असंभव सा है। पिछले सात साल के शासन में घोर पक्षपात, अपने पराए का भाव, स्वार्थी भाव और पूरी सरकारी मशीनरी को प्रोपोगेंडा चेम्बर में बदल दिया गया, असहमति के स्वर को ट्रोल करना और सरकार की इसी नीति के चलते बीते सात साल में इस देश की नागरिकता छोड़कर जाने वालों की संख्या सात लाख के पार होने लगी है। असुरक्षा और अशांति के इस दौर में पैसे वालों में जिस तरह की घबराहट बढ़ी है और देश छोडऩे का चलन बढ़ा है वह इस देश की आर्थिक ढांचे को बहुत बड़ा नुकसान पहुंचा चुके हैं।

लोकतंत्र की सबसे बड़ी खासियत विपक्ष या अहसमति के स्वर को तवज्जों देना है। आप नेहरु से लाख चिढिय़े लेकिन याद रखिये कि इस देश को महान लोकतांत्रिक बनाने में उन्होंने अपना पूरा जीवन होम कर दिया था। जब संसद में जनसंघ की चार सीट थी और सेवियत नेता निकिता खुश्वेच भारत आए तो नेहरु ने उम्दा भाषण की वजह से अटल बिहारी वाजपेयी को खुश्वेच से मिलाने न केवल बुला लिये बल्कि वाजपेयी का परिचय देते हुए कहा कि ये हमारे भावी प्रधानमंत्री है, नेहरु जानते थे कि ये तभी होगा जब कांग्रेस हार जायेगी। लेकिन उनमें हीनभावना नहीं थी। परिचय सुनकर खुश्चेन तुरंत बोले फिर ये यहां क्या कर रहे है? हमारे देश में तो हम उन्हें गुलग (राजनैतिक विरोधियों की जेल) में भेज देते हैं।

नेहरु जानते थे कि लोकतंत्र को जीवित रखने के लिए विपक्ष का होना जरुरी है इनके जैसे कांग्रेस मुक्त वाले नेहरु नहीं थे। असहमति के स्वर को बीते सात साल में प्रताडि़त करने के सैकड़ों उदाहरण है और हद तो तब हो गई जब कोरोना के इस भीषण आपदा में मदद करने वालों के हाथ काटने की कोशिश हुई। 

गुजरात में जारी हुए सवा लाख डेथ सर्टिफिकेट और गंगा में कुत्ते नोचते लाश का जवाब मोदी सत्ता को इसलिए भी देना चाहिए क्योंकि गुजरात, उत्तराखंड, बिहार और उत्तरप्रदेश में भाजपा की ही सरकार है। मोहन भागवत जब कहते हैं कि सत्ता से लापरवाही हुई है तब भी यदि हिन्दुस्तान में आएगा तो मोदी ही गूंज सुनाई देने लगे तो मान लीजिए कि इस देश को अभी और नीचे जाना है, और भी लाशें गिननी है और बौद्धिक और उद्यमशीनों का देश से पलायन जारी रहना है।

रविवार, 16 मई 2021

देश को मझधार में खड़ा कर दिया...

 

मोदी सरकार ने कोरोना वैक्सीनेशन के मामले में देश को मझधार में खड़ा कर दिया है। हर तरफ हाहाकार है, मौत के आकड़े छुपाये जा रहे है। वैक्सीन की पहली और दूसरी डोज को लेकर बार-बार नीतियों में परिवर्तन किया जा रहा है। हालत बदतर होते जा रहा है और प्रधानमंत्री की अभी भी प्राथमिकता सेन्ट्रल विस्टा में महल बनाने की है।

याद कीजिए तो मोदी सरकार का हर निर्णय लोगों में भ्रम फैलाने और जान लेने वाला रहा है। नोटबंदी के समय 8 नवम्बर 2016 से लेकर 31 दिसम्बर 2016 तक सौ तरह के आदेश जारी हुए इसका परिणाम क्या हुआ 150 से अधिक लोग मारे गए। फिर जीएसटी को नयी आर्थिक आजादी का सूरज के रुप में पेश किया गया और इसकी वजह से भी सैकड़ों व्यापारी बर्बाद हो गए। न नोटबंदी के मास्टर स्टोक का फायदा मिला न जीएसटी के मास्टर स्ट्रोक से फायदा हुआ।

भारत के कोविड वर्किंग ग्रुप के चेयरमेन डॉक्टर एन.के. अरोरा ने कुछ दिन पहले कहा था कि दो डोज के अंतराल को बढ़ाने से बेहतर परिणाम का कोई सबूत नहीं है ऐसा वही देश कर रहे है जहां वैक्सीन की कमी है। देश में वैक्सीनेशन को लेकर सत्ता ने बार-बार नियम बदले 60 वर्ष से 45 फिर 18 वर्ष किया गया पिछले चार माह में सरकार का बयान देखे तो या तो वह विरोधाभाषी है या अस्पष्ट है। ऐसा लगता है कि सरकार ने इस देश में नरसंहार का फैसला ही कर लिया है ताकि जनसंख्या के कथित समस्या से मुक्ति मिल सके। यह इसलिए कहना पड़ रहा है क्योंकि मोदी सरकार ने अगस्त 2020 में निर्णय लिया कि कोई भी राज्य सरकारे, अपने स्तर पर वैक्सीन के संबंध में कोई भी प्रयास न करें। जितनी भी जरूरत होगी, वह केन्द्रीय स्तर पर भारत सरकार खरीदेगी। जबकि इस समय पूरी दुनिया के देश अपनी-अपनी जरूरत के हिसाब से ग्लोबल टेंडर दे रहे थे तब मोदी सरकार केवल सीरम इंस्टीट्यूट को आर्डर देकर अपने चेहते टीवी चैनलों पर वैक्सीन गुरु का खिताब बटोर रहे थे।

अचानक मोदी सरकार के इस भ्रमित निर्णय के चलते वैक्सीनेशन में कमी आ गई तो फिर राज्य सरकारों के सामने ग्लोबल टेंडर जारी करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा। उत्तरप्रदेश, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, राजस्थान की सरकारें ग्लोबल टेंडर जारी कर रही है या कर दी है। सवाल यही है कि जब ग्लोबल टेंडर राज्यों को ही जारी करना था तब यह काम पर पहले क्यों मना किया गया। इस सरकार के सारे फैसले आग लगने के बाद कुआं खोदने वाली होने की वजह से देश की हालत हर मोर्चे पर खराब होते जा रही है और कोरोना ने तो भयावह तबाही मचाई है।

इस सरकार की आदतों में शुमार भ्रमित निर्णय के बाद भी यह सरकार श्रेय लेने की होड़ में भी लगी रहती है जबकि हकीकत में देखा जाए तो इस सत्ता ने 6 साल में देश को इतना पीछे ढकेल दिया है, लोगों के जीवन को नरक बना दिया है जिसकी कल्पना ही बेमानी है। देश में टीकाकरण का इतिहास उपलब्धियों से भरा रहा है, पोलियों, चेचक, टीवी, हेपेटाईटिस बी जैसे मामले में नि:शुल्क टीकाकरण सफलतापूर्वक होता रहा है। और उसके परिणाम भी सुखद रहे हैं लेकिन इस सत्ता ने वर्तमान वैक्सीनेशन अभियान के काला अध्याय बना दिया।

शनिवार, 15 मई 2021

नीच कर्म...

 

दान, दया, प्रेम, सत्य, तप ये धर्म के मूल आधार है, और यह समाज का भी महत्वपूर्ण अंग है। हम कितने सामाजिक और धार्मिक है यह व्यक्ति के इन्ही गुणों से पता चलता है। कोरोना ने हमारी सामाजिक और धार्मिक आस्था पर प्रहार भी किया है। बावजूद इस संकट की घड़ी में दान और दया ने ही हमारे जीवन में नया आशा का संचार किया है।

लोक एक दूसरे के मदद करने नहीं आते और सत्ता के भरोसे रहते तो कितनी ही जाने चली जाती क्योंकि वर्तमान सत्ता को अपनी रईसी और सेन्ट्रल विस्टा में महल बनाने की चिंता है। उसका हर निर्णय रईसी और महल में केन्द्रित है। वे अपनी रईसी कब तक बरकरार रखेंगे, इसकी चौतरफा आलोचना होने लगी है। लेकिन सवाल यह है कि सत्ता अब क्या नहीं चाहती कि लोगों के मदद के हाथ उठे। कालाबाजारी जैसे नीच कर्म करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने से असहाय सत्ता यदि मदद करने वालों के हाथ रोकने की कोशिश करे तो यह कौन सा कर्म कहलायेगा? आप खुद सोचिये?

इस देश में आपदा से पहले भी दान देने वालों ने अभूतपूर्व कार्य करके लोगों की जिन्दगी बचाई है, कितने ही बच्चों की पढ़ाई, कितने ही लोगों का ईलाज और कितने ही लोगों के भोजन की व्यवस्था की है और अब भी कर रहे हैं। और यह पूरी दुनिया में होता है, खुद इस देश ने आपदा में दूसरे देशों के लोगों की मदद की है तब इस कोरोना के दौर में मदद करने वालों के पीछे पुलिस लगाना कौन सा हिन्दू ग्रंथ में लिखा है। 

दिल्ली पुलिस के क्राईम ब्रांच ने युवा कांग्रेस के अध्यक्ष श्रीनिवास के अलावा भाजपा के सांसद गौतम गंभीर और हरीश खुराना से भी पूछताछ  की है कि वे लोगों की मदद कैसे कर रहे हैं। भले ही इस मामले को खुद भाजपा के लोग हल्के में लेने की बात कर रहे हैं लेकिन खुद कुछ भी नहीं करने वाली सरकार का यह कृत्य हैरान ही नहीं उन लोगों के लिए परेशानी का सबब बन गया है जो दिन रात सड़कों, अस्पतालों में घुम-घुम कर भोजन दवाई या दूसरी मदद कर रहे है।

सवाल यही तक नहीं है, सबसे दुखद और पाशविक तो मोदी सरकार का वह निर्णय की वजह से सामे आ रहा है जिसके तहत किसी भई स्वयंसेवी एनजीओ के सीधे विदेशी मदद को अपराध बना दिया गया था, यह तो हाथ में जख्म हो तो हाथ ही काट देने वाला कानून है यह बात इस कोरोना में स्पष्ट हो गया। इस कानून की वजह लोगों तक आक्सीजन कॉन्सटेटर्स की आपूर्ति तो बाधित हुई है दूसरी जरूरत भी बाधित हुई है।

याद कीजिए पिछले वर्ष जब कोरोना की पहली लहर चल रही थई तब मोदी सरकार ने फॉरेन कन्ट्रीब्यूशन रजिस्ट्रेशन एक्स यानी एफसीआर में संशोधन किया था, तब इसकी कई संस्थाओं ने इसका विरोध भी किया था लेकिन मोदी सत्ता ने इसे पारदर्शी होने की बात कहकर सबको चुप करा दिया था। अब कहा जा रहा है कि यह संशोधन लोगों की जान बचाने में बन रही है एक एनजीओ के सह संस्थापक जेनीफर लियांत कहती है कि विदेशी कई दानदाता आक्सीजन कान्सेटेटर्स और जरूरी सामान मुहैया करा रहे हैं लेकिन इस कानून की वजह से जरुरतमंदों तक पहुंचाने में देर हो रही है।

शुक्रवार, 14 मई 2021

कनक-कनक तै सौ गुनी...

 

जिस तरह से रुदन और वेदना के स्वर दिनों दिन आकाश से ऊंचा होने लगा है, यकीन मानिये ये किसी नरमेघ से कम नहीं है। और इन लाशों को देखकर भी यदि हम को उसके अपराध के लिए बचा रहे हैं तो फिर हमारे भीतर का मानव मर चुका है और हम वापस जानवर बन रहे हैं।

हम यहां मोदी सरकार की पिछली लापरवाही के इस त्रासदीपूर्ण दुष्परिणाम को नहीं गिना रहे हैं बल्कि वर्तमान में मोदी सत्ता को क्या करना चाहिए पर चर्चा कर रहे हैं। सत्ता ने पूर्व में जो गलतियां की वह अक्षम्य है लेकिन इस देश में कब सत्ता ने अपनी जिम्मेदारी मानी है, ईलाज के अभाव में दम तोड़ती जिन्दगी, भूख से मौत और सत्ता की रईसी को बरकरार रखने की कोशिश में आम जनों का खून निचोडऩे वाला टैक्स।

ऐसे में जो हुआ सो हुआ लेकिन अब क्या आगे भी ऐसा ही चलता रहेगा। क्या आगे भी ऐसी लाशें नदी में बहती रहेगी, इतनी रुदन और वेदना के बाद भी यदि करुणआ न जगे और भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति न हो इस पर क्या सचेत रहने की जरूरत नहीं है। बड़े शौक से नेहरु और गांधी को गली देने वाले जरा सोचिये इस भीषण महामारी में यदि वे होते तो क्या वे घरों में दुबके बैठे होते, आजादी के भीषण त्रासदी के बाद क्या वे चुप िबैठे थे? इसलिए जब बात इस त्रासदी की हो रही है और देश का प्रधानमंत्री मुंह में दही जमाकर अपने निवास पर बैठा हो तब जिम्मेदारी को लेकर सवाल उठेंगे और जिन्हें ये सवाल पसंद नहीं वे अपने भीतर झांके और पूछे यदि उन्हें आक्सीजन, दवाई और खाना न मिले तब भी क्या वे अपनी किस्मत को ही कोसेंगे?

जब कांग्रेस ने सेंट्रल विस्टा का शिलान्यास किया था तब भी मैं इसका विरोध कर रहा था और आज जब सेंट्रल विस्टा में प्रधानमंत्री का महल बनाया जा रहा है तब हमें सोचना चाहिए कि क्या हम उस राजतंत्र को वापस देखना चाहते है जो राजमहल के बगैर अकल्पनीय था। लोकतंत्र में हम प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की जरूरत इसलिए महसूस नहीं की गई थी कि वे महलों में रहे, बल्कि यह व्यवस्था इसलिए की गई थी ताकि हर व्यक्ति को मूलभूत सुविधा मिले, उनके जीवन जीने का संघर्ष कम हो सके लेकिन आम आदमी के जीने का संघर्ष बढ़ गया और जनप्रतिनिधियों की सुविधा में बढ़ोत्तरी हो गई।

जनप्रतिनिधियों की सुविधा बढऩी चाहिए लेकिन वह लाशों के महल में कदापि स्वीकार नहीं है। क्या देश के प्रधानमंत्री सहित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और तमाम जनप्रतिनिधियों को अस्पतालों का दौरा नहीं करना चाहिए? इस त्रासदी के शिकार लोगों की पीड़ा जानकर भविष्य के हिसाब से व्यवस्था करने में ध्यान नहीं देना चाहिए।

सेन्ट्रल विस्टा में महल तो कदापि नहीं बनना चाहिए और यह बनता है तो कांग्रेस सहित तमाम विपक्ष को यह घोषणा कर देना चाहिए कि जब तक इस देश में भूख से एक भी व्यक्ति की मौत होती है, ईलाज के अभाव में कोई दम तोड़ देता है तब तक वे इस महल में सत्ता आने के बाद भी नहीं रहने वाले। कांग्रेस तो महात्मा गांधी की पार्टी कहलाती है फिर इस तरह की घोषणा से परहेज क्यों? 

कोरोना की वजह से बर्बाद हुए परिवार और अनाथ बच्चों के लिए जो काम देश के प्रधानमंत्री को करना चाहिए वह छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने किया है। यह एक तरह से उस केन्द्रीय सत्ता के मुंह में तमाचा है जो अपने को देश की सरकार कहती है। हालांकि जिस तरह से चुनावी रैलियों में प्रधानमंत्री का झूठ, अमर्यादित भाषा रही है, उसके बाद तो वे भाजपा के संघ संस्कारित प्रधानमंत्री ही ज्यादा रहे हैं। तब लोकतंत्र में जनता की जिम्मेदारी है कि वे सरकार को मजबूर करे। क्योंकि सत्ता का मतलब रईसी हो गया है।

गुरुवार, 13 मई 2021

घोर लापरवाही का ब्लैक फंगस...

 

कोरोना से जंग जीत चुके लोगों में ब्लैक फंगस का कहर साफ बतलाता है कि ईलाज के दौरान अस्पतालों में घोर लापरवाही हुई है, इतने बड़े सबूत के बाद भी अस्पतालों को एक नोटिस तक नहीं दिया जाना साफ बतलाता है कि सत्ता किस कदर लापरवाह है और अस्पतालों में मरीजों के साथ किस तरह की लापरवाही हो रही है।

भिलाई में एक अधेड़ की ब्लैक फंगस से मौत हो गई। आज के अखबारों में यह खबर सुर्खियों में है जबकि ब्लैक फंगस का शिकार 15 मरीजों का एम्स में ईलाज चल रहा है। यह कई राज्यों में कहर बरपा चुका है। दरअसल कोरोना के ईलाज के दौरान सिस्टमिक स्टेरॉयड का प्रयोग किया जाता है। मरीजों को जल्दी ठीक करने के चक्कर में कई बार इसका गलत प्रयोग कर दिया जाता है। एम्स के डायरेक्टर डॉ. रणदीप गुलेरिया ने प्रेस कांफ्रेंस करके कहा भी था कि कोविड के उपचार के शुरुआती चरणों में ही स्टेरॉयड लेने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं लेकिन इसे नजरअदांज कर शुरुआती दौर में ही स्टेरॉयड के हाई डोज दिए गए। दिक्कत यह है कि कोविड के ईलाज के लिए सरकार द्वारा जारी गाईड लाईन का यह हिस्सा है जिसकी वजह से कई अस्पतालों में इसका मनमाने ढंग से उपयोग हुआ। रिकवरी ट्रायल में कोविड के कारण हास्पिटलाईज्ड मरीजों में तथा रेस्पिरेट्री फैल्योर के कारण जिनकों बाहरी आक्सीजन या मेकेनिकल वेंटीलेटर की जरूरत पड़ती है उनमें ब्लैक फंगस बेहद ही प्रभावशाली है। विशेषज्ञों की चेतावनी के बाद भी स्टेरॉयड का जिस तरीके से अंधाधुंध प्रयोग किया गया जबकि कई लोग तो सीधे मेडिकल स्टोर्स में जाकर दवाईयां खी ली।

ब्लैक फंगस को लेकर सबसे बड़ी चेतावनी तो यह है कि इसकी चपेट में आने वाले मरीजों की आंखे तो जाती ही है जान भी चली जाती है। मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र में ब्लैक फंगस से मरने वालों की तादात बहुत ज्यादा हैं। छत्तीसगढ़ में ब्लैक फंगस से मौत का भिलाई का यह पहला मामला है।

हालांकि अभी तक स्टेरॉयड के प्रयोग से होने वाली इस नई तरह की मौत को लेकर किसी तरह की कानून नियम नहीं है जबकि विशेषज्ञों का दावा है कि यह ईलाज के दौरान हुई चूक का ही नतीजा है। हालांकि विशेषज्ञों इसे लापरवाही नहीं बता रहे हैं लेकिन छत्तीसगढ़ में जिस तरह से ब्लैक फंगस के मामले बढ़ते जा रहे हैं वह गंभीर मामला है।

दूसरी तरफ कोरोना से मौतों का रफ्तार थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। कई राज्यों में वैक्सिन की से टिकाकरण की रफ्तार में कमी आना केन्द्र की मोदी सत्ता की लापरवाही को ही उजागर करता है। इधर गंगा नदी के अलावा मध्यप्रदेश की नदी में भी लाशें बहते देखे जाने के बाद इसकी विभिषिका का अंदाजा लगाया जा सकता है। सत्ता की चूक को लेकर उठ रहे सवालों से बचने भाजपा और संघ जिस तरह से फेक न्यूज और अफवाह का सहारा लेने लगी है वह आने वाले दिनों में घातक है।

बुधवार, 12 मई 2021

महानिद्रा में मोदी


बिस्तरा है न चारपाई है,

सत्ता हमने खूब पाई है।

आदमी जी रहा है मरने को

क्या यही इस सत्ता की सच्चाई है।।

क्या सत्ता सचमुच बड़ी मुश्किल से हाथ आने वाली दुधारु गाय हो चुकी है जिसे केवल दुहना है। जनता तो अपना बचाव कर रही ही लेगी, अपने जीवन के लिए संघर्ष कर ही लेगी। सत्ता की घोर लापरवाही का असर नदियों में बहती लाशें, चिताओं के ढेर, अस्पताल की अव्यवस्था और अब लॉकडाउन में परिवार पालने की समस्या के रुप में सामने आ चुकी है। इतनी त्रासदी देखने के बाद भी सत्ता में बैठे लोगों की प्राथमिकता सेन्ट्रल विस्टा इसलिए है क्योंकि वहां महल जैसे प्रधानमंत्री आवास में इसी कार्यकाल में रहना है।

हालांकि यह रोने का समय नहीं है, हम पर लादी गई मुसिबत से छुटकारा पाने मार्ग ढंंढूने का समय है, रूदन और वेदना के इस दौर में भी जो लोग नफरत की भाषा में प्राणघातक आ लगा रहे हैं वह उनके आदमी होने पर सवाल खड़ा करता है। यह ठीक है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पास भाषण देने की अद्भूत कला है, मानसिक रुप से सामने वाले व्यक्ति को अस्त-व्यस्त करने की इस अद्भूत कला ने ही उन्हें सत्ता में पहुंचाया है, लेकिन यह समय जागने का है और महानिद्रा में सोए सत्ता को झकझोर देने का है।

न्यायालय ने जिस तरीके से नरसंहार की बात कही है, जिस तरह से नदियों में लाशें बह रही है, जिस तरह से सदन का स्वर आकाश को छूने लगा है यह किसी सत्ता की लापरवाही का पाशविक  कार्य है। गांधी और बुद्ध के देश में नफरत का विषवमन से पूरी दुनिया हैरान ही नहीं है बल्कि लोकतंत्र के लिए घातक बता चुकी है।

कोरोना की त्रासदी को पूरी दुनिया ने मोदी सत्ता की लापरवाही कहा है, भारत में हो रही मौतों के लिए केन्द्र को दोषी माना है तब भी महानिद्रा टूटने का नाम नहीं ले रहा है। क्षणभर पहले ही आनंदित होती जिन्दगी का प्रवाह लाशों का रेला बन जा रहा है। इस भयावह त्रासदी से धरती वेदना से चित्कार उठी है, आकाश धुंधला-नीला हो गया है, हवा में सन्नाटा है। लेकिन सत्ता से जुड़े लोग अब भी इस त्रासदी के लिए नए-नए तरीके ढूंढ रहे हैं। शब्दों के जहरीले बम फेंके जा रहे हैं, वह फट भी रहा है और उसके तीक्षण टुकड़े हवा में उड़कर विनाश को आमंत्रित कर रहे हैं।

सिर्फ महीनेभर में कितनी-कितनी जिन्दगियों का अंत, अस्तित्व समाप्त हो गया वेदना पिघले बिना ही जम गई और विरोध के स्वर ऐसे गूंजने लगे मानों हरी-भरी, देवभूमि इस कोरोना से ही नहीं इस सत्ता से भी मुक्त होने तड़प रही है। सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो गया, अंतिम संस्कार समाज की जिम्मेदारी हुआ करती थई, लेकिन कोरोना ने वह भी छिन ली। मेरी बात सत्ता में बैठे लोगों को बुरी लग सकती है क्योंकि मेरा मानना है सत्ता की पहली जिम्मेदारी थी कि वह अपने कार्यकर्ताओं को लोगों की सेवा में झोंक दे लेकिन सत्ता ने आपदा में अवसर तलाशने की बात कही, तब यह कहना उचित है कि आदमी तो कब का मर गया भीतर केवल जानवर है, जानवर!

मंगलवार, 11 मई 2021

विचारधारा की शून्यता...

 

भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से असम में कांग्रेस से आए हिमत बिस्वा सरमा को मुख्यमंत्री और बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर आये शुभेन्द्रु अधिकारी को नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी सौंपी है उसके बाद तो साफ हो गया है कि सत्ता के लालच में भाजपा बुरी तरह फंस चुकी है और अब संघ या भाजपा के सिद्धांतों की बजाय सत्ता के सिद्धांत पर चलना होगा।

हालांकि भारतीय जनता पार्टी की केन्द्र में सरकार कभी भी अपने दम पर नहीं बनी है, वह दर्जनों दलों के गठबंधन के साथ ही चलती है तो  इसकी वजह उस पर लगने वाले साम्प्रदायिकता का वह आरोप है जो समय-समय पर परिलक्षित होता रहता है। 2014 में नरेन्द्र मोदी सत्ता में आये तब भी दूसरे दलों से भाजपा में आये सांसदों की संख्या ही वजह थी।

दरअसल भाजपा अब भी नहीं समझ पा रही है कि इस देश का मिजाज क्या है, यदि देश का मिजाज संघ के मिजाज से मेल खाता तो भाजपा या जनसंघ बहुत पहले ही सत्ता में आ गई होती। यह देश पूरी दुनिया को अनेकता में एकता का सिर्फ संदेश ही नहीं देता, बल्कि उसे जीता भी है। कुंठित हिन्दु  और कुंठित मुस्लिम लीग को हवा देकर अंग्रेजों ने भले ही देश का विभाजन धर्म के आधार पर कर दिया हो लेकिन भारत आज भी धर्म निरपेक्ष को जीता है।

यही वजह है कि संघ या भारतीय जनता पार्टी केन्द्र की सत्ता पर काबिज होने उन दलों की बैसाखी पर सवार होते हैं जो महत्वाकांक्षी होते है, भाजपा ऐसे दलों से भी समझौता करने से परहेज नहीं करती जो मुश्किल से एक-दो सीट ही जीत सकते हैं। भले ही संघ या भाजपा के समर्थक यह दावा करे कि वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी है या सबसे बड़ा संगठन है उनके सदस्य करोड़ों में है लेकिन सच तो यह है कि संघ या भाजपा के सिद्धांत पर चलने वालों की संख्या दहाई तक भी नहीं पहुंची है।

यही वजह है कि आजादी के सालों बाद पहली बार अटल बिहारी वाजपेयी सत्ता तक पहुंचे तो 23 दलों का सहयोग था और अब मोदी सत्ता में आये है तब भी दर्जनभर दल के सहयोग के अलावा ऐसे लोगों के कारण सत्ता पर पहुंचे है जो अपने दलों से बगावत कर भाजपा में आये हैं। ताजा उदाहरण मध्यप्रदेश का है यदि ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस से बगावत नहीं करते तो मध्यप्रदेश में भाजपा सत्ता से बाहर थी।

हिन्दू राष्ट्र का सपना देखने वाले शायद भूल गए हैं कि इस देश में दूसरे धर्म के लोग भी रहते हैं और भारतीय संविधान उन्हें वो सारे अधिकार देता है जो हिन्दुओं को देता है। ऐसे में यदि कुछ लोग सोचते है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हिन्दू राष्ट्र का निर्माण कर देंगे तो यह बचकानी सोच है क्योंकि अब तो भाजपा में इतनी बड़ी संख्या में दूसरे दलों से लोग आ गए हैं जो कभी भी संघ के लिए मुसिबत खड़ी कर सकते हैं।

आखिर असम में पूरी भाजपा को सरमा के सामने झुकना पड़ा हालांकि बंगाल में शुभेन्द्रु अधिकारी को नेता प्रतिपक्ष बनाना भाजपा की रणनीति हो सकती है लेकिन शुभेन्द्रु अधिकारी को संघ के विचारधारा में ढाल लेना नामुमकिन है और कोई बड़ी बात नहीं कि भाजपा इस मामले में धोखा खा जाए।