शुक्रवार, 25 जून 2021

मोदी का कद नापते योगी...

 

उत्तरप्रदेश में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर राजनैतिक दलों की सक्रियता बढ़ गई है। देश व प्रदेश की सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी के लिए सत्ता में वापसी बढ़ी चुनौती है। लेकिन जिस तरह से उत्तरप्रदेश और दिल्ली में ठन गई है वह हैरान करने वाली इसलिए है क्योंकि भाजपा को अनुशासन वाली पार्टी कही जाती है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चाहते हैं कि उत्तरप्रदेश में भाजपा उसके ईशारे पर चले लेकिन उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की नजर 2024 है। ऐसे में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित पूरे गुजरात गैंग की नींद उड़ गई है। दरअसल उत्तरप्रदेश में योगी आदित्यनाथ का कद इतना बढ़ गया है कि वहां नरेन्द्र मोदी का कद छोटा पडऩे लगा है। और उत्तरप्रदेश में जो कुछ चल रहा है वह सिर्फ कद की लड़ाई है।

हालांकि उत्तरप्रदेश की राजनीति को जानने वाले बताते है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उत्तरप्रदेश में अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया है, संगठन से लेकर सत्ता तक अपने लोगों को बिठा दिया है यहां तक कि राज्यपाल आनंदी बेन को बिठाया गया लेकिन योगी आदित्यनाथ काबू में नहीं रह गया। दरअसल यह हर कोई जानता है कि दिल्ली का सफर उत्तरप्रदेश से होकर जाता है और जब पूरी भाजपा में मोदी के बाद योगी का प्रचार हो तो गुजरात गैंग की बेचैनी स्वाभाविक है।

कहा जाता है कि नरेन्द्र मोदी की ताकत और रवैये को लेकर संघ की बेहद नाराज है और अब तो संघ ने भी योगी का खुलकर समर्थन कर दिया है लेकिन पार्टी में पूंजी के सहारे पकड़ रखने वाले गुजरात गैंग को पूरा विश्वास है कि वह आगे भी अपनी मनमानी चलाएगी। ऐसे में टकराव भले ही ऊपर से कम दिखाई दे रहा हो लेकिन भीतर खाने में यह बड़े रुप में महसूस किया जा सकता है।

बताया जाता है कि जिस तरह का खेल हो रहा है या सरकार की अक्षमता सामने आई है उसे लेकर संघ बेहद नाराज है और योगी का समर्थन इसी नाराजगी का नतीजा  है। हालांकि मोदी गुट इससे अनजान नहीं है इसलिए वह योगी को कमजोर करने या अपने दबाव में रखने का उपाय कर रही है यानी मोदी की नजर 2022 है तो योगी की नजर 2024 है।

बुधवार, 23 जून 2021

नासमझ सत्ता निष्ठुर सत्ता!

 

अभी महिने भर भी नहीं हुआ है जब केन्द्र की मोदी सरकार ने न्यायालय से कहा था कि सेन्ट्रल विस्टा में बन रहे प्रधानमंत्री के महल (आवास) के लिए पैसे की कोई कमी नहीं है और कोरोना से निपटने, टीकाकरण के लिए पर्याप्त पैसे है लेकिन महिना भी नहीं बीता कि उसने कोरोना से मृत लोगों को मुआवजा के लिए चार लाख नहीं होने का रोना रो दिया।

ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि मोदी सत्ता की प्राथमिकता क्या है, सचमुच उसे इस देश की समझ नहीं है या फिर वह इतनी निष्ठुर हो चुकी है कि उसे आम लोगों की तकलीफे से कोई लेना देना नहीं है।

यह सवाल इसलिए उठाये जा रहे हैं क्योंकि मोदी सत्ता की करतूत से हम देश के लोगों को अनेकों बार परेशानियों का सामना करना पड़ा है, लोगों की बेहिसाब मौते हुई है और कोरोना तो सीधे-सीधे मोदी सत्ता की लापरवाही का नरसंहार साबित हो चुका है। नासमझी और निष्ठुरता को सिलसिलेवार ढंग से देखना हो तो नोटबंदी की लाईने और इसकी वजह से डेढ़ सौ मौतों से शुरु हुआ सफर अब भी जारी है कोरोना को लेकर लापरवाही का नमस्ते ट्रम्प और मध्यप्रदेश में सरकार बनाने का लोभ को कोई कैसे भूल सकता है, फिर अचानक लॉकडाउन की नासमझी भरे फैसले से सड़कों में भूखे-प्यारे चलते मजदूर और सड़कों में उनकी मौत क्या सत्ता की नासमझी और निष्ठुरता नहीं है। दूसरी लहर में मौतों का तांडव, चिताओं की लम्बी लाईन, ऑक्सीजन की कमी, गंगा में बहती लाशे, सार्वजनिक क्षेत्र की बीस कंपनियों को बेच देना, रिजर्व बैंक के रिजर्व फंड का इस्तेमाल और सेन्ट्रल विस्टा, तीन हजार करोड़ की मूर्ति, आठ हजार करोड़ का खुद का विमान, प्रधानमंत्री के काफिले की गाडिय़ों का बदलाव से लेकर मोदी सरकार के किसी भी फैसले को देख लीजिए उसके पीछे सत्ता की नासमझी, लापरवाही और निष्ठुरता ही नजर आयेगी।

तब क्या मोदी सत्ता ने यह जान लिया है या मान लिया है कि हिन्दू-मुस्लिम और राष्ट्रवाद का रोग इतना भयावह है कि वह चार लाख मुआवजा न दे और कुछ भी करे तब भी सत्ता उसकी जाने वाली नहीं है। कोरोना का नरसंहार और कोरोना के मृतकों को चार लाख नहीं देने की बात क्या सत्ता का अत्याचार नहीं है। मोदी सरकार के लिए भले ही चार लाख रुपया कोई मायने नहीं रखता हो लेकिन इस बात को समझना होगा कि जिनके परिवार में कोरोना से मौत हुई है उनके लिए चार लाख रुपए क्या मायने रखते हैं, जिन्होंने ईलाज में लाखों रुपए गंवा देने के बाद भी जान नहीं बचा पाये उनके लिए चार लाख क्या मायने रखते हैं। शायद नरेन्द्र मोदी को परिवार और उसके दुख और परेशानी का अंदाजा नहीं होगा कि उनके लिए चार लाख के क्या मायने है।

ऐसे में सवाल यही है कि अपनी रईसी और अपना अहंकार बरकरार रखने करोड़ों-अरबों रुपए खर्च करने को तैयार सत्ता आखिर चार लाख  रुपए के लिए मना क्यों कर रही है जबकि लोकतंत्र में सत्ता तो जनता के हित के लिए बनी होती है।

मंगलवार, 22 जून 2021

श्री राम मंदिर चंदा का बंदरबाँट

 https://youtu.be/_1XJRSl-0ME

संघ का करतूत अयोध्या में दिखा...?

 

श्रीराम के नाम पर ठेकेदारी करने वालों को प्रभु राम ने पूंजी-सत्ता सब सौंप दी है लेकिन उनकी नियत अब भी साफ नहीं है और अब तक श्रीराम मंदिर निर्माण के नाम पर जिस तरह की धोखाधड़ी, छल, चंदाखोरी और दूसरे मामले सामने आने लगे हैं उसके बाद तो यह कहना मुश्किल हो गया है कि श्री राम के नाम पर लूट की प्रतिस्पर्धा नहीं चल रही है।

ताजा मामला तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट द्वारा खरीदी जा रही जमीनों की वैधानिक और राशि को लेकर मामला सामने आया है। पहले मामले में अयोध्या  के मेयर शामिल है तो दूसरे मामले में मेयर का भांजा शामिल है। संघ के चंपत राय की भूमिका तो किसी से छिपी ही नहीं है। हालत यह है कि संघ, भाजपा से जुड़े लोग कम कीमत पर जमीन खरीद कर मंदिर ट्रस्ट को ज्यादा कीमत में जमीन धड़ल्ले से बेच रहे है और राम के नाम पर सत्ता में काबिज लोगों को इसमें कुछ भी गलत नहीं दिखता। तब यह पैसों का बंदरबांट नहीं तो और क्या है।

अयोध्या के मेयर ऋषिकेश उपाध्याय के भांजे दीप नारायण ने दशरथ महल बड़ास्थान के महंत से जो जमीन बीस लाख में खरीदी उस जमीन को ट्रस्ट को ढाई करोड़ में बेच दी। दस्तावेज देखते ही पहली नजर में सब गड़बड़झाला दिख रहा है। राजस्व विभाग के अधिकारी भी इस रजिस्ट्री पर खुलेआम उंगली उठा रहे है लेकिन न ट्रस्ट की बेशर्मी रुक रही है और न ही सत्ता की बेशर्मी।

तब सवाल यही है कि जो संघ अपने को संस्कार, चरित्रनिर्माण और पता नहीं किस-किस तरह की नैतिकता सिखाने का दावा करता है वह क्या ऐसा ही संस्कार और चरित्र निर्माण करता है। हालांकि हमने पहले भी कहा है कि संघ ने जिस तरह से इस देश को धर्म के नाम पर नफरत में झोका है, राष्ट्रपिता की हत्या में शामिल होने क आरोपों के अलावा कितने ही आरोप संघ पर है और आजादी के बाद से अब तक संघ की गतिविधियों पर चार बार बंदिश भी लग चुका है तब सवाल यही है कि देश के लिए जरूरी क्या है।

श्रीराम जन्मभूमि के नाम पर चंदा हजम करने का आरोप न तो नया है और न ही भाजपा का झूठ ही नया नहीं है। पहले के चंदे का हिसाब आज तक नहीं हुआ और अब नये चंदे में जिस तरह के घपले सामने आ रहे है उसके बाद तो संघ के संस्कार पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

रविवार, 20 जून 2021

हिन्दू-मुस्लिम के अलावा कोई मुद्दा नहीं...

 

जिस काला धन को विदेश से वापस लाने का दावा कर सत्ता में आई भारतीय जनता पार्टी अब खामोश है और काला धन दो गुना हो गया, जिस महंगाई को कम करने का दावा था वह भी लगभग दो गुना हो गया, दो करोड़ लोगों को रोजगार देने का दावा ने तो कितनो की ही नौकरी छीन ली। न आतंकवादियों का कमर टूटा न भ्रष्टाचार का खेल ही खत्म हो रहा है उसके बाद भी भाजपा यदि चुनावों में जीत का दावा कर रही है, आयेगा तो मोदी ही का दावा कर रही है तो इसका मतलब साफ है कि धर्म अब जहर बन चुका है और राष्ट्रवाद कोढ़।

देश में सबका साथ सबका विकास का नारा जब जुमला बन जाए और जनता से किये वादों पर सत्ता की चुप्पी हो तो फिर चुनाव जीतने का सशक्त माध्यम झूठ-नफरत और अफवाह के अलावा कुछ हो भी नहीं हो सकता। पिछले 90-95 साल से या यूं कहें कि आजादी के बाद से धर्म को लेकर नफरत का जो बीज बोया गया वह परवान चढ़ चुका है और जब तक आदमी स्वयं धोखा नहीं खायेगा तब तक यह परवान उतरने वाला भी नहीं है।

यही वजह है कि इस देश में चल रहा किसान आंदोलन अपने रिकार्ड दिन गितने आगे बढ़ रहा है और सत्ता इस आंदोलन से इसलिए भी विचलित नहीं है क्योंकि वह जानती है धर्म का जहर फैल चुका है। हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति सत्ता तक पहुंचने के लिए ज्यादा सुविधाजनक रास्ता है तब वह किसान की नाराजगी से क्यों विचलित हो। विचलित तो वह पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दाम और इसे लेकर चल रहे विरोध प्रदर्शन से भी नहीं है क्योंकि अब भी ऐसे जहर बुझे लोग हैं जो साफ कहते हैं कि हिन्दु धर्म को बचाने वे दो सौ रुपए लीटर या उससे अधिक में भी खरीदी कर सकते हैं। यानी महंगाई भी इस हिन्दू-मुस्लिम के आगे बौनी है। आप चिखते रहे महंगाई डायन खाय जात हे और डायन धर्म की राजनीति के सहारे सत्ता तक पहुंचा देगी।

ऐसे में राहुल गांधी को छोड़ शेष कांग्रेसी अब भी सिर्फ प्रदर्शन के नाटक पर निर्भर है तो इसका मतलब साफ है कि सत्ता की मनमानी को रोकने का कोई कारगर न तो उपाय है और न ही नफरत की राजनीति का कोई तोड़ ही है। इस खेल में इन दिनों पूंजी महत्वपूर्ण हो चला है और यदि पूंजी भी सत्ता के साथ है तब बर्बादी का नया अध्याय लिखा जायेगा। यही वजह है कि सत्ता अब विदेशी बैंक में बढ़ रहे पूंजी के प्रति लापरवाह है, उन्हें उन लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं करनी है और न ही नाम ही सार्वजनिक करने हैं क्योंकि चुनाव में बांटे जाने वाले काले धन विदेशों से ही आयेंगे। 

तब सवाल यही है कि आम आदमी क्या करे, क्योंकि सत्ता ने तो विरोध के स्वर को पहले ही पप्पू घोषित कर रखा है और जनता भी उन्हें पप्पू मान चुकी है इसलिए जैसे तैसे परिवार चलायें, मस्त रहें सत्ता तो उन्हीं की रहेगी।

शुक्रवार, 18 जून 2021

विरोध के स्वर...

 

राजनीति जो करा दे वह कम है, और जब सवाल अस्तित्व बचाने का हो तो राजनीति किसी नौटंकी से कम नहीं होता। ये हाल है छत्तीसगढ़ में भाजपा की। छत्तीसगढ़ में 15 साल की सत्ता का सुख भोगने वाली भाजपा लगभग दर्जनभर सीट में सिमट गई है और इन दिनों वह एक बार फिर अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। यह लड़ाई कम नौटंकी ज्यादा है कहा जाए तो कम नहीं होगा। क्योंकि एक तरफ पूरे देश में आम आदमी जिस तरह से केन्द्र सरकार की नीतियों के चलते महंगाई और बेरोजगारी से त्रस्त है केन्द्र की लापरवाही के चलते कोरोना महामारी से जूझ रहे हैं, वैक्सीन की कमी बड़ा मुद्दा  है उसे छोड़ छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी कुछ और ही मुद्दों पर आंदोलन करने जा रही है। ये वे मुद्दे हैं जिसके बारे में डॉ. रमन सिंह की सरकार ने 15 साल कुछ नहीं किया।

दरअसल मोदी सत्ता की लापरवाही से हुए कोरोना नरसंहार के बाद भाजपा के सामने प्रधानमंत्री मोदी की छवि की चिंता है, महामारी के इस दौर में आक्सीजन की कमी और दवा की कालाबाजारी भारतीय जनता पार्टी के लिए कभी मुद्दा नहीं बना, पेट्रोल, डीजल, खाद्य तेलों के अलावा राशन की बढ़ती कीमत भी भाजपा के लिए इन दिनों कोई मुद्दा नहीं है क्योंकि यदि वे इसे मुद्दा बनायेंगे तो फिर प्रधानमंत्री की छवि का क्या होगा।

हैरानी की बात तो यह है कि 15 साल सत्ता में रहने के दौरान जिन पर शराब की नदिया बहाने, दारु वाले बाबा की तोहमत लगने और जिनके राज में शराब ठेकेदारों के हाथों दस-दस हजार में थाना खरीदे जाने का आरोप लगता रहा है वे अब वादा निभाओं और भूपेश सरकार के ढाई साल को असफल बताते हुए आंदोलन कर रहे हैं। असल में यह जनता के लिए आंदोलन के नाम पर राजैतिक नौटंकी है कहा जाए तो गलत नहीं होगा। क्योंकि यह हर व्यक्ति जानता है कि आज जनता के लिए असल मुद्दा महंगाई और बेरोजगारी के साथ कोरोना है ऐसे में मोदी सरकार  की टैक्स नीति के चलते आम आदमी व्यापारी किसान मजबूर किस तरह से परेशान है यह किसी से छिपा नही है।

एक तरफ छत्तीसगढ़ भाजपा अपने अस्तित्व बचाने छटपटा रही है तो दूसरी तरफ देश की सत्ता अपनी छवि चमकाने विरोध के स्वर या असहमति के स्वर को कुचल देना चाहती है। जो ट्वीटर कभी भाजपा के लिए अभिव्यक्ति की आजादी का  सबसे बेहतर हथियार था वही ट्वीट के खिलाफ अब पूरी सत्ता की ताकत लगी है। सत्ता की ताकत तो विरोध में प्रदर्शन करने वालों के खिलाफ भी लगी है। यूएपीए कानून का जिस  तरह से बेजा इस्तेमाल किया गया वह किसी से छिपा नहीं है, पढऩे-लिखने वाले छात्रों, कलाकारों, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों को जेल में डाला गया और इसके बाद कोर्ट ने जो तीखी टिप्पणी की वह कौन नहीं जानता।