शुक्रवार, 26 जून 2026

छत्तीसगढ़ की सत्ता में 'भाटिया' ब्रांड की धमक

 छत्तीसगढ़ की सत्ता में 'भाटिया' ब्रांड की धमक: चेहरे बदले, पर क्या बदल पाई व्यवस्था?



छत्तीसगढ़ राज्य गठन के बाद से ही यहां की सियासत में एक यक्ष प्रश्न हमेशा तैरता रहा है कि 'सत्ता का असली रिमोट कंट्रोल किसके हाथ में है?' चाहे अजीत जोगी का दौर रहा हो या डॉ. रमन सिंह के 15 साल, या फिर भूपेश बघेल का कार्यकाल—हर दौर में कुछ रसूखदार नौकरशाहों और करीबियों के नाम चर्चा में रहे जो परदे के पीछे से सरकार चलाते दिखे। वर्तमान में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के कार्यकाल में भी यही सवाल एक बार फिर पूरी शिद्दत के साथ गलियारों में गूंज रहा है।

सियासी और प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि सरकार के बड़े फैसलों और नीतिगत बदलावों के पीछे न तो कद्दावर मंत्रियों की चल पा रही है और न ही आला अफसरों की। इस दौर में जिस एक नाम की धमक मंत्रालय (महानदी भवन) की पांचवीं मंजिल से लेकर दिल्ली के राजनीतिक गलियारों तक महसूस की जा रही है, वह है प्रदेश के दिग्गज शराब कारोबारी और बीसीसीआई (BCCI) के कोषाध्यक्ष प्रभतेज सिंह भाटिया।

ननकीराम कंवर के पत्र ने बढ़ाई सियासी तपिश

इस रसूख को लेकर सुगबुगाहट तब और तेज हो गई जब प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ आदिवासी नेता ननकीराम कंवर ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिख दिया। इस पत्र में उन्होंने वरिष्ठ शराब कारोबारी बलदेव सिंह भाटिया (पप्पू भाटिया) और उनके बेटे प्रभतेज सिंह भाटिया के साथ-साथ वरिष्ठ आईएएस अधिकारी सुबोध सिंह की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कंवर ने अपने पत्र में चेताया है कि जिस तरह 2018 में कुछ चेहरों के अति-प्रभाव और घिराव के कारण भाजपा को सत्ता गंवानी पड़ी थी, वही इतिहास दोहराया जा रहा है। वरिष्ठ नेता का यह कदम साफ करता है कि मामला सिर्फ विपक्ष के आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि पार्टी के भीतर भी इसे लेकर गहरी खींचतान चल रही है।

एक हाथ में अरबों का साम्राज्य, दूसरे में क्रिकेट के खजाने की चाबी

प्रभतेज सिंह भाटिया के रसूख का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके पास न सिर्फ 'सिंबा' (Simba) जैसे बड़े बियर ब्रांड और अरबों रुपये का कारोबारी साम्राज्य है, बल्कि वे दुनिया के सबसे अमीर खेल संगठन बीसीसीआई के संयुक्त सचिव रहने के बाद सितंबर 2025 में इसके कोषाध्यक्ष (Treasurer) की कुर्सी तक पहुंचे हैं। छत्तीसगढ़ क्रिकेट एसोसिएशन से शुरू हुआ उनका यह सफर देश की खेल राजनीति के शीर्ष तक जा पहुंचा है।

दिल्ली का वरदहस्त और साय सरकार की 'मजबूरी'?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रभतेज भाटिया की इस असीमित धमक की असली वजह दिल्ली के शीर्ष नेतृत्व से उनकी नजदीकी है। बीसीसीआई के सचिव और देश के सबसे कद्दावर राजनेता के पुत्र जय शाह से उनकी पटरी इस कदर बैठती है कि प्रादेशिक स्तर पर उनके फैसलों को टालना या उनकी बात को नकारना राज्य सरकार के लिए आसान नहीं रह गया है। आबकारी विभाग से जुड़े नीतिगत फैसले, प्लेसमेंट एजेंसियों की भूमिका से लेकर प्लास्टिक की बोतलों में शराब बेचने तक के निर्णयों के पीछे 'भाटिया सिंडिकेट' की सोच और दखल की चर्चाएं गर्म हैं। इस रसूख के आगे मुख्यमंत्री के खास समझे जाने वाले नौकरशाह राहुल भगत, वित्त मंत्री ओपी चौधरी और दिल्ली से भेजे गए आईएएस सुबोध सिंह भी हाशिए पर नजर आ रहे हैं।

हर दौर में बुलंद रहा 'भाटिया परिवार' का परचम

यह पहली बार नहीं है जब भाटिया परिवार का सिक्का छत्तीसगढ़ की सत्ता पर चल रहा हो। इनका इतिहास हर दौर की सत्ता के साथ कदमताल मिलाने का रहा है। एक जमाने में बलदेव सिंह भाटिया दिग्गज कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल के सबसे करीबी सिपहसालारों में गिने जाते थे। शुक्ल के बाद जब राज्य में डॉ. रमन सिंह का दौर आया, तो भाटिया परिवार भाजपा सरकार के सबसे निष्ठावान और शक्तिशाली करीबियों में शुमार हो गया। दौर बदला, मुख्यमंत्री बदले, लेकिन व्यवस्था और रसूख का केंद्र बिंदु आज भी जस का तस बना हुआ है।

पीएमओ (PMO) की दहलीज तक पहुंचे इस मामले ने अब छत्तीसगढ़ की राजनीति में नए समीकरण बना दिए हैं। देखना दिलचस्प होगा कि अंदरूनी कलह और दिल्ली के रसूख के बीच फंसी साय सरकार इस परदे के पीछे के साम्राज्य से खुद को कितना मुक्त रख पाती है, या फिर यह 'धमक' आने वाले समय में सरकार के लिए कोई बड़ा सियासी संकट खड़ा करेगी।

वीडियो देखें 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें