स्मार्ट सिटी का 'स्मार्ट' खेल: 45 करोड़ की बर्बादी के बाद अब 30 करोड़ के नए टेंडर की तैयारी, किसका भरेगा पेट?
एक तरफ छत्तीसगढ़ सरकार अपनी महत्वकांक्षी योजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए लगातार कर्ज के दलदल में डूबती जा रही है, वहीं दूसरी तरफ टैक्सपेयर्स (जनता) की गाढ़ी कमाई के पैसों को किस बेरहमी से सफेद हाथी योजनाओं में फूंका जा रहा है, इसका सबसे घिनौना और जीता-जागता उदाहरण देखना हो तो नया रायपुर चले आइए। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की महत्वकांक्षी '100 स्मार्ट सिटी योजना' के तहत रायपुर में विकास के नाम पर जो तमाशा चल रहा है, वह अब पूरी तरह आईने की तरह साफ हो चुका है। सवाल उठने लगा है कि क्या स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट सिर्फ अफसरों और रसूखदारों के लिए 'पैसा उगाहने और भ्रष्टाचार का जरिया' बनकर रह गया है?
सात समुंदर पार 'श्रीलंका' से आई थीं साइकिलें, आज कबाड़खाना बना सिस्टम
कहानी शुरू होती है साल 2016-17 में। रायपुर की सड़कों पर 'स्मार्टनेस' का तड़का लगाने के लिए करीब 45 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से 102 किलोमीटर लंबा साइकिल ट्रैक बनाया गया। भारतीय साइकिलों को ठेंगा दिखाकर, भारी कमीशनखोरी के आरोपों के बीच, सात समुंदर पार श्रीलंका से हाईटेक साइकिलें मंगवाई गईं। बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगे, खूब ढिंढोरा पीटा गया।
लेकिन हकीकत क्या है? शुरुआती दो-चार महीनों के बाद ही यह पूरा प्रोजेक्ट फुस्स हो गया। आज नया रायपुर के साइकिल स्टैंड्स पर नजर डालेंगे तो 10 में से 8 स्टैंड पूरी तरह खाली पड़े हैं। जो साइकिलें बची हैं, उनके टायर फट चुके हैं, चेनों में जंग लग चुका है और विदेशी तकनीक से लैस बताया जाने वाला यह पूरा सिस्टम खुद 'पंचर' होकर कबाड़खाने में तब्दील हो चुका है। जनता के 45 करोड़ रुपये सीधे पानी में बह गए।
उल्टा लटकाने के दावे हवा, भ्रष्टाचारियों को अभयदान!
हैरानी की बात यह है कि जब वर्तमान सत्ताधारी दल विपक्ष में था, तब मंचों से चीख-चीखकर बड़े-बड़े दावे किए जाते थे कि 'सत्ता में आते ही भ्रष्टाचारियों को उल्टा लटकाकर सीधा कर देंगे।' लेकिन आज नया रायपुर में जनता के 45 करोड़ रुपये डुबाने वाले उन नीति-निर्माताओं और अफसरों पर कोई आंच नहीं आई। श्रीलंका से कबाड़ साइकिलें मंगवाने का तुगलकी फरमान जारी करने वाले किस रसूखदार अफसर के खिलाफ अब तक कार्रवाई हुई? जवाब है- शून्य। अफसरों को खुला संरक्षण मिला हुआ है और फाइलों पर धूल जम रही है।
डूब चुके प्रोजेक्ट को 30 करोड़ का नया 'ऑक्सीजन', या फिर बंदरबांट की तैयारी?
हद तो तब हो गई जब इस पूरी तरह फेल हो चुके, मरे हुए प्रोजेक्ट को जिंदा करने यानी 'ऑक्सीजन' देने के नाम पर अब 30 करोड़ रुपये का नया टेंडर लाने का खेल खेला जा रहा है। गजब की जिद है- सब कुछ फेल हो चुका है, फिर भी जनता का पैसा बहाने की सनक बरकरार है।
सवाल यह उठता है कि क्या साय सरकार इस बात की लिखित गारंटी देगी कि जो नए 30 करोड़ रुपये फूंकने की तैयारी है, उसका हश्र भी पहले जैसा नहीं होगा? या फिर यह नया टेंडर भी सिर्फ नई कमीशनखोरी और पैसों की बंदरबांट का एक नया जरिया है?
प्रचार पर करोड़ों का धुआं, जेब में सौ तो दिखावे में एक
स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट की शुरुआत से ही इसके प्रचार-प्रसार के खर्चों पर गंभीर उंगलियां उठती रही हैं। रायपुर, बिलासपुर, रायगढ़ या दुर्ग जैसे शहरों को जितना बजट बुनियादी सुविधाओं के लिए नहीं मिलता, उससे कहीं ज्यादा रकम सिर्फ विज्ञापनों और बुकलेट्स की छपाई में फूंक दी गई। अंदरखाने की चर्चाओं की मानें तो प्रचार के नाम पर '₹1 खर्च कर ₹100 जेब में डालने' का खेल खेला गया। महंगे ब्रोशर और प्रचार सामग्री कागजों पर हजारों-लाखों की संख्या में छपवाकर सरकारी खजाने को जमकर चूना लगाया गया।
असमंजस में सिस्टम: नगर निगम, प्लेसमेंट एजेंसियां और सियासी रंजिश
सिर्फ साइकिल ट्रैक ही नहीं, रायपुर स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत बनी अन्य संरचनाएं भी राजनीतिक रंजिश और अव्यवस्था की शिकार हैं। साइंस कॉलेज के पास करोड़ों की लागत से बनी चौपाटी को सरकार बदलते ही सिर्फ एक विधायक की राजनीतिक जीत की जिद के चलते नेस्तनाबूत (ढहा) कर दिया गया। वहां भी करोड़ों की सीधी बर्बादी हुई। इसके अलावा, नगर निगम और स्मार्ट सिटी प्रबंधन के बीच आपसी खींचतान जगजाहिर है। प्लेसमेंट एजेंसियों के जरिए रखे गए गरीब कर्मचारियों को कम तनख्वाह देकर ज्यादा राशि के वाउचर पर दस्तखत कराने जैसे गंभीर शोषण के आरोप भी इस विभाग पर लगते रहे हैं।
विधानसभा में मंत्रियों के रटे-रटाए जुमले: 'दिखवा लेंगे, अकेले में रिपोर्ट देख लेना'
जब-जब जनप्रतिनिधियों या विधायकों द्वारा सदन में इन घोटालों और फिजूलखर्ची पर तीखे सवाल दागे जाते हैं, तब-तब मंत्रियों के पास वही पुराने, रटे-रटाए तीन जुमले तैयार मिलते हैं:
1. "मामला संज्ञान में आया है, दिखवा लेंगे।"
2. "दोषी पाए जाने पर भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी।"
3. "आपको ज्यादा जानकारी चाहिए या रिपोर्ट देखनी है, तो अकेले में केबिन में आकर देख लीजिए।"
सदन के भीतर की यह लीपापोती साफ बताती है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं। बहरहाल, नया रायपुर की सड़कों पर दम तोड़ चुकी साइकिलें और अब 30 करोड़ का नया टेंडर, चीख-चीखकर गवाही दे रहा है कि विकास की इस 'स्मार्ट' परिभाषा में जनता सिर्फ मूकदर्शक है और मलाईदार अफसरशाहों व ठेकेदारों का नया सिंडिकेट एक बार फिर तिजोरियां भरने की फिराक में है। देखना होगा कि इस नए खेल पर मुख्यमंत्री की जीरो टॉलरेंस की नीति का हंटर चलता है या फिर यह फाइल भी 'दिखवा लेंगे' की भेंट चढ़ जाती है।

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