छत्तीसगढ़ को राख, महाराष्ट्र को चकाचौंध: एनजीटी के 'अंतरराष्ट्रीय' बहाने और तमनार के जलते सवाल!
गारे पेलमा सेक्टर-2 कोयला खदान को हरी झंडी मिलने से रायगढ़ के 14 आदिवासी गाँव विनाश के कगार पर। 2024 में जनसुनवाई को 'धांधली' बताने वाली एनजीटी ने अब रूस-यूक्रेन युद्ध और खाड़ी संकट का हवाला देकर आदिवासियों के वजूद का ही गला घोंट दिया। क्या कॉर्पोरेट मित्रों के दबाव के आगे बौनी हो गई 'डबल इंजन' सरकार?
जिस जमीन, महुआ के पेड़ों और पुरखों के जंगलों को बचाने के लिए रायगढ़ के तमनार क्षेत्र के आदिवासी सालों से अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे थे, उसे नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के एक ही फैसले ने उजाड़ कर रख दिया है। यह सिर्फ एक सरकारी मंजूरी नहीं है, बल्कि उन हजारों आदिवासियों के लोकतांत्रिक अधिकारों का कत्ल है, जो संविधान की पांचवीं अनुसूची और पेसा (PESA) कानून को अपनी ढाल मानते आए हैं।
तमनार और रायगढ़ की माटी आज अपनों के छल पर रो रही है, लेकिन सत्ता के गलियारों और उद्योगपतियों के वातानुकूलित दफ्तरों में जश्न का माहौल है। सवाल यह उठ रहा है कि क्या एनजीटी ने यह हरी झंडी पर्यावरण संरक्षण के नियमों के तहत दी है, या फिर यह देश के सबसे बड़े कॉर्पोरेट घराने 'अडानी समूह' के सीधे दबाव का नतीजा है?
पर्दे के पीछे का खेल: सीधे अडानी को नहीं, वाया महाराष्ट्र रूट!
गारे पेलमा सेक्टर-2 (Gare Palma Sector-2) नाम की इस विशालकाय कोयला खदान की क्षमता हर साल 23.6 मिलियन टन कोयला उत्पादन की है। सरकार और कॉरपोरेट तंत्र का खेल इतना शातिर है कि बदनामी से बचने के लिए राज्य और केंद्र सरकार ने यह खदान सीधे अडानी समूह को आवंटित नहीं की।
रणनीति के तहत, पहले यह खदान 'महाराष्ट्र राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी' (Mahagenco) को सौंपी गई। फिर, महाराष्ट्र की इस सरकारी कंपनी ने बेहद सफाई से खनन और विकास (MDO) का ठेका देश के प्रधानमंत्री के सबसे करीबी मित्र कहे जाने वाले अडानी समूह को सौंप दिया। यानी छत्तीसगढ़ की छाती चीरकर कोयला निकाला जाएगा, उजाला महाराष्ट्र के शहरों और सड़कों पर चमकेगा, और छत्तीसगढ़ के हिस्से आएगी सिर्फ राख, प्रदूषण, बीमारी और विस्थापन का दंश।
विनाश के कगार पर खड़े वो 14 गाँव: जहाँ पसरेगा अंधेरा
इस खदान को हरी झंडी मिलने का सीधा मतलब है तमनार क्षेत्र के 14 आदिवासी गाँवों का नक्शे से पूरी तरह मिट जाना। सरकारी आंकड़ों में इन गाँवों में 10,679 परिवार दर्ज हैं, लेकिन जमीनी हकीकत पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं का दावा है कि यहाँ प्रभावित परिवारों की वास्तविक संख्या 15,000 से भी अधिक है। इन गाँवों की आने वाली नस्लें अब अपनी जमीन पर कभी कदम नहीं रख पाएंगी:
झीली, रामपुर, कुंजमेरा, गारे, सरईटोला, मुड़ागाँव, रौंदापाली, पाटा, चितवाही, ढोला, नारा, ढोलनारा, जिंगाबहाड़, डोलेसरा, मालूमरा और सरसमल।
इन गाँवों में रहने वाले हजारों आदिवासियों के बच्चों की किलकारियां अब कॉर्पोरेट मशीनों के शोर में दफन होने जा रही हैं।
एनजीटी का अजूबा तर्क: तमनार के जंगल कटने से थमेगा वैश्विक संकट?
एनजीटी (NGT) के जस्टिस शिव कुमार सिंह और विशेषज्ञ सदस्य सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने जो फैसला सुनाया है, वह पर्यावरण इतिहास के सबसे हास्यास्पद और डराने वाले बहानों में गिना जाएगा। अपने आदेश में ट्रिब्यूनल ने तर्क दिया है कि:
"वर्तमान में रूस-यूक्रेन युद्ध और खाड़ी देशों (ईरान-अमेरिका) के बीच वैश्विक तनाव चल रहा है।"
"इस वैश्विक संकट के कारण आने वाले दिनों में देश में ऊर्जा सुरक्षा का भारी संकट आ सकता है।"
लिहाजा, राष्ट्रीय और वैश्विक महत्व को देखते हुए स्थानीय पर्यावरण और नियमों की कुछ अनदेखी की जा सकती है!"
अखबार का तीखा सवाल: रूस और यूक्रेन की लड़ाई की कीमत छत्तीसगढ़ का आदिवासी अपनी जमीन और फेफड़े देकर क्यों चुकाए? क्या पर्यावरण अदालत का काम पर्यावरण बचाना है या युद्ध का बहाना बनाकर जंगलों को काटने का रास्ता साफ करना?
2024 में 'धांधली' तो 2026 में 'सच्ची' कैसे हो गई जनसुनवाई?
इतिहास गवाह है कि इसी गारे पेलमा सेक्टर-2 के खिलाफ जब 2024 में गाँव वालों ने एनजीटी का दरवाजा खटखटाया था, तब कोर्ट ने माना था कि खदान के लिए की गई पर्यावरणीय जनसुनवाई में भारी धांधली हुई थी। पर्यावरण नियमों को ताक पर रखा गया था।
मात्र दो सालों के भीतर ऐसा क्या बदल गया? क्या पर्यावरण सुधर गया या फिर राज्य में बैठी 'डबल इंजन' सरकार का दबाव बढ़ गया? जानकारों का कहना है कि सूबे के कद्दावर नौकरशाह से नेता बने वित्त मंत्री और रायगढ़ के स्थानीय रसूखदारों ने परदे के पीछे ऐसा चक्रव्यूह रचा, जिसने आदिवासियों की आवाज को दिल्ली के ट्रिब्यूनल तक पहुँचने ही नहीं दिया।
उबल रहा है जन-आक्रोश: नेताओं के खिलाफ तीखी भाषा और आक्रोश
इस फैसले के बाद से पूरे तमनार क्षेत्र में तनाव और दहशत का माहौल है। बस्तर से लेकर सरगुजा और रायगढ़ तक, आदिवासियों का गुस्सा फूट पड़ा है। आंदोलनकारियों का सीधा आरोप है कि सरकार जनप्रितिनिधियों को बंधक बनाकर उद्योगपतियों की दलाली कर रही है।
हाल ही में प्रभावित क्षेत्रों में जाने से विपक्ष के जनप्रतिनिधियों और आदिवासी नेताओं को पुलिस बल का दुरुपयोग करके रोका गया। आंदोलन की अगुवाई कर रहे स्थानीय नेताओं का कहना है, "छत्तीसगढ़ में मुख्यमंत्री भले ही आदिवासी चेहरा (विष्णुदेव साय) हों, लेकिन पूरी कमान उद्योगपतियों के इशारे पर काम करने वाले चंद कद्दावर मंत्रियों और नौकरशाहों के हाथ में है। आदिवासियों के संवैधानिक और पेसा कानून के अधिकारों को पैरों तले रौंदा जा रहा है।"
तीखे सवाल, जिनका जवाब सरकार को देना होगा:
1. पेसा (PESA) और ग्राम सभा की 'ना' का क्या हुआ? जब आदिवासियों की ग्राम सभा ने इस खनन योजना को सिरे से खारिज कर दिया था, तो क्या दिल्ली और रायपुर की सरकारें ग्राम सभा से ऊपर हैं?
2. मुआवजा तो दे दोगे, पुरखों की पहचान कहाँ से लाओगे? आदिवासियों को कुछ लाख रुपए का मुआवजा देकर शहरों की झुग्गियों में धकेल दिया जाएगा। उनके जल, जंगल, जमीन और संस्कृति की भरपाई कौन सा कॉरपोरेट घराना करेगा?
3. छत्तीसगढ़ सिर्फ दोहन के लिए क्यों? हसदेव से लेकर तमनार तक, छत्तीसगढ़ के फेफड़ों (जंगलों) को काटा जा रहा है। क्या छत्तीसगढ़ की नियति सिर्फ देश को रोशन करना और खुद प्रदूषण के अंधेरे में डूब जाना है?
निष्कर्ष: अभी लड़ाई खत्म नहीं हुई है...
कोयला तो कुछ सालों में जलकर राख हो जाएगा और अडानी की तिजोरियां भर जाएंगी, लेकिन एक बार अगर तमनार का यह समृद्ध पर्यावरण और आदिवासियों का वजूद हाथ से निकल गया, तो उसे कोई वैज्ञानिक या सरकार दोबारा वापस नहीं ला पाएगी।
एनजीटी ने भले ही कागजों पर उद्योगपतियों के लिए रास्ते साफ कर दिए हों, लेकिन तमनार की धरती पर आदिवासियों की 'ग्राम सभा' अभी भी जिंदा है। जल-जंगल-जमीन की यह लड़ाई अब ट्रिब्यूनल के कमरों से निकलकर रायगढ़ की सड़कों और जंगलों में लड़ी जाएगी। सरकार को यह याद रखना होगा कि इतिहास में आदिवासियों ने कभी भी अपनी माटी का सौदा आसानी से नहीं होने दिया है।

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