रविवार, 28 जून 2026

जनता की जान से खिलवाड़ कर रहे रसूखदारों पर किसका वरदहस्त?

 जनता की जान से खिलवाड़ कर रहे रसूखदारों पर किसका वरदहस्त?


 मेडिकल घोटाला: ईओडब्ल्यू के पूरक चालान ने खोले राज, लेकिन 'अदृश्य शक्ति' के दबाव में 'बड़ी मछलियों' को बचाने का खेल जारी!


छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली के बीच, जनता की जिंदगी और सेहत से खिलवाड़ करने वाले करोड़ों रुपये के छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विस कॉरपोरेशन (CGMSC) घोटाले ने एक बार फिर तूल पकड़ लिया है। आर्थिक अपराध शाखा (EOW) द्वारा विशेष न्यायालय में पेश किए गए पूरक चालान के बाद पूरे प्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में एक ही चर्चा है—आखिर भ्रष्टाचारियों और रसूखदार अधिकारियों को बचाने के लिए कौन सी 'अदृश्य शक्ति' सरकार और जांच एजेंसियों पर दबाव बना रही है? विधानसभा में जिन नामों की गूंज उठी थी, वे अचानक चालान की फाइलों से गायब कैसे हो गए?

₹50 करोड़ की सरकारी क्षति और 'पूल टेंडरिंग' का खेल

ईओडब्ल्यू (EOW) के आधिकारिक बयानों और जांच में यह तथ्य सामने आया है कि राज्य की गरीब और आम जनता को मुफ्त डायग्नोस्टिक जांच (हमार लैब योजना) उपलब्ध कराने के नाम पर भारी जालसाजी की गई। जिला अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHCs) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) के लिए खरीदे जाने वाले मेडिकल उपकरणों, रीएजेंट्स और कंज्यूम बेस की खरीदी में नियमों को ताक पर रख दिया गया।

जांच के अनुसार, 'पूल टेंडरिंग' के जरिए साठगांठ करके मोक्षित कॉरपोरेशन जैसी कंपनियों को फायदा पहुंचाया गया। तय एमआरपी (MRP) दरों से कई गुना अधिक कीमत पर मेडिकल उपकरण खरीदे गए, जिससे सरकारी खजाने को सीधे तौर पर ₹50 करोड़ से अधिक का चूना लगा। ईओडब्ल्यू ने अपनी विवेचना में इसे एक गहरी आपराधिक साजिश और षड्यंत्र का हिस्सा माना है।

छोटे मोहरों पर गिरी गाज, असली 'मगरमच्छ' अब भी आजाद?

मामले में अब तक 10 आरोपियों के खिलाफ चालान पेश किया जा चुका है। हालिया पूरक चालान में अभिषेक कौशल (डायरेक्टर, रिकॉर्ड्स एंड मेडिकल सिस्टम प्रा. लि.), राकेश जैन (शारदा इंडस्ट्रीज), प्रिंस जैन (लायजनिंग एजेंट और शशांक चोपड़ा का सगा जीजा), और कुंजल शर्मा (मार्केटिंग हेड, डायसिस इंडिया प्रा. लि.) जैसे कारोबारियों और दलालों के नाम शामिल हैं। इसके अलावा पांच अधिकारियों—बसंत कौशिक, कमलकांत पाटनकर, डॉक्टर अनिल परसाई, रुद्र रावटिया और दीपक कुमार बांधे की गिरफ्तारियां भी दिखाई गई हैं।

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह पूरी कार्रवाई सिर्फ 'चेहरे देखकर' और छोटे मोहरों को फंसाकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश है?

विधानसभा का वो वादा और गायब हुए बड़े नाम

विधानसभा के पटल पर सरकार के मंत्रियों ने खुद दावा किया था कि इस महाघोटाले में स्वास्थ्य विभाग के 14 बड़े अधिकारी आरोपी हैं और किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। लेकिन जब ईओडब्ल्यू की अंतिम चार्जशीट और पूरक चालान सामने आया, तो स्वास्थ्य विभाग के उन शीर्ष नीति-निर्माताओं, सचिवों और अनुमोदन (Approval) देने वाले वरिष्ठ अधिकारियों के नाम गायब मिले, जिनकी कलम के बिना यह घोटाला मुमकिन ही नहीं था।

सूत्रों और प्रशासनिक गलियारों में चर्चा है कि आईएएस अधिकारियों और शीर्ष प्रबंधन के कुछ चेहरों को बचाने के लिए जांच की दिशा को सीमित कर दिया गया है। जिन बड़े नामों को जेल की सलाखों के पीछे होना चाहिए था, वे आज भी रसूख के दम पर व्यवस्था के 'नाक के बाल' बने हुए हैं। जनता पूछ रही है कि क्या इन रसूखदारों से कोई गुप्त 'सेटिंग' हो चुकी है या फिर उन पर किसी भारी राजनीतिक संरक्षण का हाथ है?

इतिहास खुद को दोहरा रहा है: क्या सबक सीखेगी सरकार?

छत्तीसगढ़ में स्वास्थ्य और चिकित्सा विभाग में घोटालों का इतिहास पुराना है। पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान भी गर्भाशय कांड, नसबंदी कांड और आंखफोड़वा कांड जैसे अमानवीय और शर्मनाक हादसे हो चुके हैं। उस दौर में हुए घोटालों और बदइंतजामी के कारण तत्कालीन सत्ता को जनता के भारी आक्रोश का सामना करना पड़ा था। क्या वर्तमान सरकार भी उसी ढर्रे पर चल रही है, जहां दो-तीन दर्जन से अधिक दवाइयों के सैंपल लगातार फेल हो रहे हैं और कार्रवाई के नाम पर केवल मामूली जुर्माना या ब्लैकलिस्टिंग का नाटक किया जा रहा है?

पीपीपी (PPP) मॉडल या भ्रष्टाचार का नया जरिया?

घोटाले की जड़ें केवल उपकरणों की खरीदी तक सीमित नहीं हैं। राज्य में 'पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप' (PPP) मॉडल के नाम पर जो नया खेल शुरू हुआ है, वह भी संदेह के घेरे में है। अस्पताल सरकार का, मशीनें सरकार की, जगह सरकार की, बिजली-पानी सरकार का और जांच की फीस का भुगतान भी सरकार करेगी—तो फिर लैब चलाने का ठेका किसी निजी कंपनी को क्यों सौंपा जा रहा है? क्या छत्तीसगढ़ में प्रशिक्षित पैथोलॉजी वर्कर्स या बेरोजगार युवाओं की कमी है? जानकारों का मानना है कि यह पीपीपी मॉडल कुछ और नहीं, बल्कि चहेती कंपनियों और अपने लोगों को उपकृत करने और भ्रष्टाचार की नई राहें खोलने की सोची-समझी रणनीति है।

अंतिम सवाल: क्या मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री इस बात का जवाब देंगे कि विधानसभा में किए गए दावों के बावजूद बड़े अधिकारियों पर शिकंजा क्यों नहीं कसा गया? क्या दिल्ली तक गूंजने वाले इस घोटाले की निष्पक्ष जांच होगी या फिर ₹50 करोड़ का यह दवा-उपकरण घोटाला फाइलों के नीचे हमेशा के लिए दफन हो जाएगा?

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