गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

सूरज की चमक पर अंधत्व छाया है

(एक)

सूरज साफ़ चमक रहा है

अपनी ही रौ में

रात का वक़्त नहीं है यह,


फिर भी कुछ लोग अपने

अंधत्व का दोष

थोप रहें हैं अंधेरे पर!


राजा अपने में मग्न है

किसान मज़दूर परेशान 

जनमानस हलकान


ठिठुरता ठंड है

सत्ता का दभ है

मुखौटे पर मुखौटा है 

असली , बदरंग है


(दो)

राजधानी की तो सीमा है 

सत्ता की ताक़त असीमित है

किसानो की हड़ताल है

अंधेरे का आग़ाज़ है 


चैनल है , अख़बार है

लेकिन गीत दरबार है

ट्रोल आर्मी का साथ है 

सच यहाँ बेकार है 


ये क्या हो रहा है 

प्रहरी क्यों सो रहा है


(तीन)

विजय मद में मदमस्त 

ये कौन चीख़ रहा है 

मन की बात वह 

किसे सुना रहा है 


कभी वह हँसता है 

बनावटी रोता है

हर जीत के बाद 

अपनी ही पीठ ठोकता है 


अचानक विजय रथ के 

सामने कोई आता है 

सारथी भी अब 

ज़ोर से चिल्लाता है


दूर करो इसे 

ये विरोधी है 

सिर्फ़ धर्म का नहीं

देश का विरोधी है


पीछे पीछे भागते क़लमकार

अपनी जादुई भाषा बिखेरते है

सत्ता के पैसों से नोच देते हैं 

विरोधियों के चेहरे 


सच दूर चला जाता है 

सत्ता इतराता है 

जय जय की चीत्कार है 

तुम्हारी ही जयकार है 


(अंत)

सार्वजनिक उपक्रम बिके 

रेल बिके , प्लेन बिके 

विरोधियों का पाप भी बिक रहा


नोटबंदी से लॉकडाउन

कृषि बिल का ये क़ानून 

हर फ़ैसले पर मौत 

का साया है 


कोई नहीं सुनता 

कोई ध्यान नहीं देता 

अजब ग़ज़ब फ़ैसले पर

कोई कान नहीं देता 


झूठ की सत्ता है 

सूरज की चमक पर 

अंधत्व छाया है ।


( किसान आंदोलन को समर्पित )

बुधवार, 23 दिसंबर 2020

किसानों की मौत पर बेशर्म ट्रोल आर्मी...

 

किसानों की मौत पर बेशर्म ट्रोल आर्मी...

क्या चुनावों में लगातार जीत के बाद कोई सत्ता इस तरह हो जाती है कि वह किसी की नहीं सुने? या फिर चुनाव में जीत जाने का अर्थ कुछ भी करे? झूठ पर झूठ बोलता जाये और विरोधियों को कटघरे में खड़ा करने झूठ का सहारा ले।

आप कहेंगे नहीं, ऐसा नहीं हो सकता? लेकिन जब ऐसा होने लगे तो आप क्या कहेंगे? लेकिन सच यही है कि तीनों कृषि कानून को लेकर एक तरफ तीन दर्जन किसानों की जान चली गई लेकिन सत्ता को  इससे कोई सरोकार नहीं रह गया है। संवेदनहीनता की सीमाएं तो तब लांघ दी गई जब सत्ता में बैठे लोग इसे विरोधियों की साजिश और पैसे वाले किसानों का आंदोलन कहकर दुष्प्रचार करने लगे लेकिन क्या किसी ने सोचा भी है कि किसान आंदोलन के दौरान जिन तीन दर्जन किसानों की मौत हुई है उनकी आर्थिक स्थिति क्या है। क्या सत्ता बताएगी कि बीते सालों में पंजाब के बीस हजार से अधिक गरीब किसानों ने आत्महत्या की है।

नहीं सत्ता यह कभी नहीं बताएगी कि दिल्ली बार्डर में ठिठुरते ठंड में मरने वाले किसान गरीब हैं वह तो आंदोलन को तोडऩे उसी झूठ और नफरत का सहारा लेगी जिस झूठ और नफरत के दम पर वह सत्ता हासिल करने में सफल हुई है। न काला धन आया न भ्रष्टाचारी जेल ही गए। क्या हुआ राबर्ट वाड्रा के जमीन घोटाले का या शारदा चिटफंड कंपनी का प्रमुख आरोपी भाजपा में आते ही पाक साफ हो गया? नोट बंदी के दौरान मरे डेढ़ सौ लोगों के परिजनों को ही वह बता पायेगी कि इससे न कालाधन कम हुआ और न ही आतंकवाद का कमर टूटा।

इसलिए किसान आंदोलन को रौदने पूरी सत्ता और उसका ट्रोल आर्मी रोज नये झूठ के साथ सोशल मीडिया में खड़ा है। बेशर्मी के साथ। उसे बंगाल की चिंता है न कि किसानों की।

सच तो यह है कि तीनों कानून किसानों के लिए नहीं पूंजीपतियों के लिए बनाया गया हैं और सत्ता हासिल करने जब पूंजी महत्वपूर्ण साधन हो तो फिर इसे बचाने झूठ का सहारा लेना जरूरी है।

किसानों ने सरकार के सामने नहीं झुकने का फैसला लेते हुए आंदोलन को तेज करने की घोषणा कर दी है। हर एक किसान संगठन बारी-बारी से भूख हड़ताल पर बैठने लगे हैं ऐसे में सत्ता के सामने ट्रोल आर्मी एक नया हथियार बनकर सामने आने लगा है। झूठ और अफवाह की इस राजनीति से भले ही शहरी तपका प्रभावित हो जाए लेकिन किसानों के रुख से स्पष्ट है कि वे पीछे नहीं हटेंगे।

ऐसे में बाघ में केदारनाथ सिंह की यह पंक्ति याद आती है-

कि इस समय मेरी जिव्हा पर

जो एक विराट झूठ है

वही है - वही है मेरी सदी का

सबसे बड़ा सच।

सोमवार, 21 दिसंबर 2020

भक्ति में शक्ति...

बाजारवाद की आंधी में पूंजी के निरंतर बढ़ रहे प्रभाव के बीच मूल्य कहां बच पाता है और मूल्य ही नहीं बचेगा तो फिर सब झूठ या फिर बेईमानी-ईमानदारी में फर्क करना मुश्किल तो होगा ही। ऐसे में सच के साथ खड़ा होने का मतलब साहस दिखाना है।

श्रीकांत वर्मा ने कभी कहा था कि वास्तविकता का अनुभव हमेशा उसमें अवश्य रहेगा। इन दिनों लोकतांत्रिक व्यवस्था में भ्रम की स्थिति बन गई है या बना दी जा रही है, ऐसे में जब सत्ता की ताकत एक नये तरह का झूठ लिखने लगा हो तो उसके सामने कौन टिक पायेगा।

वैसे भी वास्तविकता और पूंजीवाद सत्ता के सबसे महत्वपूर्ण साधन है जो सच से दूर एक ऐसा भ्रम जाल बुन लेता है जिसके जाल में उलझ जाना आसान है और यही इस दौर का भक्तिकाल है।

वास्तव में हमारी सामान्य बुद्धि साम्प्रदायिकता और पूंजीवाद के छल को समझ पाने में नाकाम है और यर्थात कहीं दूर हो जाता है। पिछले 6 साल में जिस तरह से साम्प्रदायिक शक्तियों ने सत्ता में बने रहने पूंजीवाद को बढ़ावा दिय.ा वह भविष्य के आसन्न खतरों का संकेत है।

क्या इस भक्तिकाल में सच को किनारे कर दिया गया है। क्या सच यह नहीं है कि वर्तमान सत्ता ने या सीधे कहे तो मोदी सत्ता ने अपनी सुरक्षा के नाम पर अब तक के जितने भी प्रधानमंत्री रहे हैं उससे अधिक खर्च किया है। सत्ता की रईसी को बरकरार रखने के उपक्रम में आम लोग महंगाई से कराह रहे हैं। देश के गौराव माने जाने वाले सार्वजनिक उपक्रमों को लगातार बेचा जा रहा है और सरकारी संस्थानों को मजबूत करने की बजाय निजी संस्थानों को मजबूत किया जा रहा है। सरकारी बैकों का दिवालिया निकल रहा है और रिजर्व बैंक सहित तमाम संवैधानिक संस्थाओं के प्रति भरोसा समाप्त होने लगा है। और रेलवे से लेकर हवाई अड्डों को भी निजी हाथों में दिया जा रहा है।

देश में विरोध के स्वर को देशद्रोही और अराजकता का नाम दिया जा रहा है ऐसे में आम आदमी की चुप्पी क्या भक्तिकाल के प्रवाह का संकेत है।

जो लोग समझते है कि व्यवस्था के खिलाफ बोलने से बेहतर चुप रहना है। जबकि यह हमारी आदत बन चुकी है और यही आदत की वजह से सत्ता मनमानी पर उतारू है।

अब तक साम्प्रदायिकता और पूंजी ने एक मजबूत गठजोड़ बनाकर भक्ति की शक्ति को रेखांकित किया है उसे महत्वपूर्ण बना दिया है ऐसे में न केवल परिवार का ताना-बाना टूट रहा है बल्कि आम आदमी का जीवन नारकीय होता जा रहा है, साम्प्रदायिकता की आग में ्अपनी बुद्धि भ्रष्ट कर भक्ति में लीन लोगों ने जीस तरह से भक्ति की शक्ति को प्रदर्शित किया है। वह एक बात जान लें भक्ति जब अंधविश्वास की सीढ़ी पर पहुंचता है तो वह केवल देश समाज का ही नुकसान नहीं करता बल्कि स्वयं पर भी आघात करता है। अंधविश्वास से मरते लोगों के कितने ही उदाहरण है।

रविवार, 20 दिसंबर 2020

मौत से बड़ी होती है भूख

हजार बार सोचना पड़ेगा

अपनी खेती के बदले

तुम्हारा प्रस्ताव!

तुम्हारे हर प्रस्ताव को

कई कई बार गौर किया

और समझने की कोशिश की

तुम्हारे समझाने के तरीके

पर भी गौर किया।

आंदोलन के सिवाय और

क्या बचा है हमारे पास,

आपदा से घिरे लोग

कब मृत्यु से डरते हैं?

क्योंकि मौत से बड़ी

होती है भूख

तब वास्तविकता का

अनुभव अलग होता है

जो वास्तविक है।

दर असल तुम मेरी जगह

हो ही नहीं,

मेरी जगह होते तो

देखते, कैसे बिक जाते

है मेरी उपज

समर्थन मूल्य के बिना।

तुम्हे बेचना पड़ता

समर्थन मूल्य से कम कीमत

पर अपनी उपज

तब तुम देखते

पढ़ाई छूटते बच्चे,

मिट्टी में सने

हाथ-पांव ही नहीं मिल

कोस भर दूर से

दो पैसे बचाने के लिए

जाते बाजार घिसाते पांव।

तुम्हारे प्रस्ताव पर

मैं कैसे समझ

सकता हूं।

ये दर्द है किसानों का। लेकिन सरकार को यह दर्द कभी नहीं दिखने वाला है और न ही वह समझने तैयार है। ये सच है कि जब कोरोना की विपदा आई तब सिर्फ धान ही सहारा था,. लोगों ने जब लॉकडाउन में सब कुछ बंद कर रखा था, यहां तक कि धार्मि स्थल भी बंद हो चुके थे तब इन्हीं किसानों की बदौलत सब कुछ चल रहा था।

किसानों के आंदोलन को लेकर जो लोग सरकार की तरफदारी कर रहे हैं उन्हें सोचना होगा कि आखिर सरकार समर्थन मूल्य पर कानून क्यों नहीं बनाती। सिर्फ एक कानून से किसानों की हालत सुधर सकती है।

जिन तीन कानूनों का विरोध हो रहा है वह कानून वास्तविकता की धरातल से परे है। पूंजीवाद का वास्तविक चेहरा है और इसमें न किसानों का भला होने वाला है और न ही देश का ही भला होगा। हां, इस कानून को वापस लेने से सत्ता की रईसी पर फर्क पड़ेगा। इसकी रईसी को बरकरार रखने के लिए आवश्यक पूंजी जुटाने में तकलीफें आयेंगी लेकिन किसानों का भला, कतई नहीं होने वाला है।

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

सरकार के अडऩे का अर्थ...

किसान आंदोलन के बढ़ते प्रभाव के बाद भी यदि मोदी सत्ता अड़ी हुई है तो इसका मतलब साफ है कि उसे किसानों की कोई परवाह नहीं है। दरअसल मोदी सरकार के पास सत्ता में बने रहने का जो विकल्प है उससे जनआन्दोलन कोई मायने नहीं रखता? उसके पास सत्ता में बने रहने केलिए जो आवश्यक साधन चाहिए वह उसने जुटा लिये है। ऐसे में कोई भई मांग सिरे से खारिज किया जा सकता है।

सत्ता में बने रहने के लिए सबसे जरूरी साधन पैसा है और भारतीय जनता पार्टी इस देश में सबसे पैसे वाली पार्टी है, दूसरा साधन उसका हिन्दू-मुस्लिम है और तीसरा साधन विरोधी दलों का बिखराव और खरीद फरोख्त या दबाव की राजनीति है। इन सभी में साधन सम्पन्न सत्ता कब जनहित की परवाह करती है।

यही वजह है कि 2014 के चुनाव के बाद मोदी सत्ता ने ऐसे कई निर्णय लिये जो देश या आम लोगों के हितों के विपरित थी लेकिन 2019 के चुनाव परिणाम उसके पक्ष में गये, यही नहीं राज्य दर राज्य जीत, पंचायत से लेकर नगरीय निकायों में उसे सफलता मिलते रही। और उसका पूरा ध्यान इसी पर लगा रहा। 

नोटबंदी का परिणाम क्या हुआ? किसी से नहीं छिपा है। डेढ़ सौ के लगभग मौत क ेबाद भी न कालाधन खत्म हुआ और न ही आतंकवाद की कमर टूटी लेकिन मोदी सत्ता के इस दावे के बिखर जाने के बाद भी उसकी जीत चलते रही। जीएसटी लागू करने का परिणाम भी उसके पक्ष में रहा ऐसे में जब मोदी सत्ता ने सार्वजनिक उपक्रमों को बेचने का काम शुरु किया तब भी वहां काम करने वालों की पीड़ा का कहीं असर नहीं दिखा, रेलवे से लेकर एयर पोर्ट और लालकिला तक गिरवी रखने के बाद भी वह चुनाव जीतते रही तब भला किसान आंदोलन से उसे क्या फर्क पडऩा है।

वह जानती है कि लोकतंत्र में चुनाव जीतना ही सभी अपराधों की माफी है और चुनाव जीतने के लिए पूंजी सबसे अहम हथियार है और पंूजी से औवेसी खड़ा किया जा सकता है। पूंजी से कट्टर हिन्दू की नींव रखी जा सकती है, पूंजी से जमीन ही नहीं आकाश-पाताल सब पर कब्जा किया जा सकता है और जब विरोध के स्वरों के अपने राजनैतिक स्वार्थ हो तो सत्ता की मनमानी को कोई कैसे रोक सकता है।

यही वजह है कि कड़कड़ाती ठंड में किसानों की मौत के बढ़ते आकड़े हमें अब नहीं झकझोरते है क्योंकि हमने तय कर लिया है कि बाबर से लेकर औरंगजेब ने जो अत्याचार किया है उससे मुक्ति यही सत्ता दिलायेगी।

अरे साहेब किसानों का हित सिर्फ समर्थन मूल्य पर धान खरीदी से है। इसे ही कानून बना दो किसानों को और कुछ नहीं चाहिए?

गुरुवार, 17 दिसंबर 2020

आंदोलन से उपजे सवाल

 

मोदी सरकार सत्ता में आते के लिए जब किसानों की आय 2022 तक दो गुनी करने का दावा कर रही थी, तब उसी समय कार्पोरेट की आय कई गुना करने की नीति पर काम चल रहा था, यही वजह है कि इस कानून के आने के पहले ही एक तरफ जहां अडानी पूरे देश में गोदाम बनाने में जुट गया था तो अंबानी के द्वारा शहर दर शहर रिटेल शॉप खोल रहा था।

सवाल यह नहीं है कि अडानी-अंबानी क्या कर रहे हैं, सवाल यह है कि सरकार की मंशा क्या सचमुच किसानों की आय दो गुनी करने की है? यह सवाल इसलिए भी उठाये जा रहे हैं क्योंकि किसानों ने सरकार के हर प्रस्ताव को नकार दिया है और तो और कानून को वापस लेने की मांग पर अड़े हुए है।

आंदोलन का रुख क्या होगा? क्या आंदोलन दिल्ली बार्डर पर ही सिमट कर रह जायेगा? या इसका विस्तार देशभर में फैलेगा? ये तमाम सवाल इसलिए गैर जरूरी है क्योंकि किसान कड़कड़ाती ठंड में भी एक पग पीछे हटने तैयार नहीं है ऐसे में आंदोलन का असर देश भर में होने लगा है।

क्या बगैर समर्थन मूल्य पर खरीदी से किसानों की आय दो गुना हो सकती है, बिल्कुल नहीं हो सकती इसलिए सरकार यदि किसानों की आमदनी बढ़ाना चाहती है तो वह समर्थन मूल्य से कम खरीदी पर प्रतिबंध क्यों नहीं लगाती? इस पर कानून बना दे कि समर्थन मूल्य के नीचे खरीदी पर जेल होगी? किसानों का दावा है कि सिर्फ इस एक कानून से न केवल किसानों की हालत सुधर जायेगी बल्कि आमदनी भी बढ़ जाएगी।

लेकिन मोदी सत्ता जिस तरह से तीनों कानून को लेकर अड़ी हुई है वह उसकी नियत ही नहीं अहंकार को भी प्रदर्शित करता है। क्योंकि चुनाव जीतने में माहिर हो चुकी इस सत्ता को इस बात की परवाह ही नहीं है कि विरोध कितना जायज है। इसलिए वह आंदोलन को तोडऩे हर संभव कोशिश में लगी है।

आंदोलन के दौरान एक तरफ जब किसान चर्चा कर रहे थे तो दूसरी तरफ सत्ता इस कानून को सही बताने में लगी रही ऐसे में चर्चा का नतीजा क्या होना है स्पष्ट था।

अब भी सत्ता और उसकी पूरी टीम कानून को जायज ठहराने में लगी है जबकि सच तो यह है कि इस कानून से केवल कार्पोरेट की आय बढऩी है। आंदोलन को तोडऩे की साजिश पर भी सवाल उठने लगे है ऐसे में आंदोलन का विस्तार देशभर में होने लगा है।

कल ही छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने दो टूक कह दिया है कि बगैर एमएसपी के किसानों की आय दो गुना हो ही नहीं सकती। भूपेश बघेल किसान हैं वे किसानों का दर्द समझते हैं इसलिए वे जानते हैं कि किसान किस तरह से अपनी उपज बेचने मजबूर होते हैं।

छत्तीसगढ़ में एक कहावत है करम फूटहा खेती करय, अकाल पडय़ नहीं त भाव गिरय। इस कहावत को भूपेश सरकार ने तोडऩे की कोशिश की है। मोदी सत्ता भी इस मॉडल को अपना ले।

बुधवार, 16 दिसंबर 2020

मोदी सत्ता का अहंकार...


 

खबर यह नहीं है कि किसान आन्दोलन कर रहे है और न खबर यह भी है कि आन्दोलन के दौरान आधा दर्जन से अधिक किसानों की मौत हो गई, खबर यह भी नहीं है कि किसानों ने मोदी सत्ता के मर्म पर प्रहार करते हुए अडानी-अंबानी का बहिष्कार कर दिया है। खबर तो यही है कि सत्ता का अहंकार आसमान छूने लगा है।

कड़कड़ाती ठंड में भी आन्दोलन बेधड़क चल रहा है और सत्ता अब भी यह समझाने में लगी है कि उनके द्वारा बनाये गए तीनों कानून सही है। जबकि हकीकत तो यही है कि ये तीनों कानून किसानों के लिए नहीं उद्योगपतियों के लिए बनाई गई है। यदि कानून किसानों के लिए बनाई जाती तो समर्थन मूल्य में धान की खरीदी अनिवार्य होता। लेकिन सत्ता का मतलब ही जब रईसी हो तो वह मुनाफा से कैसे मुंह मोड़ सकती है।

करोना काल में जब समूची दुनिया की गतिविधियां ठप्प पड़ गई थी, अर्थव्यवस्था का बुरा हाल था और जीडीपी लगातार गिर रही थी तब इकलौता कृषि क्षेत्र ऐसा था जिसने अर्थव्यवस्था को संबल दिया। और सत्ता की निगाह अब इसी पर है। यही वजह है कि सरकार ने कृषि सुधार के नाम पर ऐसे कानून लाये जिससे किसानों से ज्यादा फायदा कार्पोरेट को हो, क्योंकि सत्ता की रईसी के लिए पैसा चाहिए और पैसा किसान नहीं कार्पोरेट देता है।

सत्ता की इस सोच ने ही समर्थन मूल्य से नीचे पर खरीदी को लेकर कानून नहीं बनाया है क्योंकि सिर्फ यही एक कानून किसानों को सुदृढ़ करने के लिए काफी है।

मोदी सरकार के 6 साल में कार्पोरेट घरानों को जो फायदा मिला है उसका दुष्परिणाम दिखने लगा है लेकिन जब सारा कुछ चुनावी जीत पर निर्भर हो तो बुरे फैसले पर सवाल उठाने का मतलब ही कहां बचता है। यही वजह है कि नोटबंदी से लेकर जीएसटी जैसे फैसले में मौत के आंकड़े हिला देने वाले होने के बावजूद सरकार के रुख में कोई परिवर्तन नहीं आया।

किसानों ने आन्दोलन के दौरान जब तीनों कानून को लेकर दो टूक निर्णय लिया तब भी सत्ता को कोई फर्क नहीं पड़ा और वह आने वाले दिनों में बंगाल चुनाव की रणनीति पर व्यस्त है।

विपक्ष भी किसान आन्दोलन का समर्थन तो कर रहे हैं लेकिन किसान नेताओं के फैसले से दूरी बना रहे हैं। किसानों ने जब अडानी-अंबानी के बहिष्कार का निर्णय लिया तो विपक्ष भी इस पर कुछ नहीं बोल पाये क्योंकि राजनैतिक दलों के बाद पानी का सवाल है। यही वजह है कि किसान अपने ढंग से बहिष्कार में लगे है और यह बहिष्कार यदि देशभर के किसानों ने कर दिया तब अडानी-अंबानी का क्या होगा? अडानी-अंबानी को गरियाने वाले विपक्ष भी अब तक इस मामले में चुप है।