शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

नववर्ष का रंग!


वर्तमान में तय किये

जा रहे हैं जो रंग

बचपन में समझे अर्थों

से भिन्न है क्यों रंग

चाहता रहा फिजा में

बिखर जाये हर रंग

लेकिन बवाल के डर से

सिमट रहे हैं रंग

समय बदल रहा

रंगों की परिभाषा

और हम बेबस देख

रहे हैं आशा-निराशा

कोई कहता है ये नववर्ष

हमारा नहीं है

कोई कहता है ये रंग

तुम्हारा नहीं है

रंगों के इस दिगभ्रमित

जंाल में

रंगों को ही धूमिल

कर दिया है

और सतरंगी इन्द्रधनुष

की सत्यता पर

कोई नहीं बोलता

सबको चिंता है अपने

रंग को चटख करने की

गाढ़ा होता रंग

गहरा काला होता जा

रहा है

पर सत्ता के

लिए जरूरी है

रंगों का गहरा और काला

होना

खुद के रंग को चटखाने

की कोशिश में

बदरंग होते रंगों की

ओर किसका ध्यान है

जीवन में रंग आते

जाते रहेंगे

पर रंगों का जीवन

में ठहरना उचित नहीं।

किसी एक रंग का गुलाम

होना खुद को मारना है।

हर रंग को जो पकडऩे

की कोशिश करता है

वही जीवन ही नहीं

समाज में रंग भरता है

जो रंग भटकाने

निकल पड़े है

वह नफरत की दीवार

खड़ी करता है

और फिर आदमी

हो जाता है गुलाम

इसलिए मुझे सभी रंग

पसंद है

क्योंकि मैंने देश की

आजादी से जोड़

रखा है रंगों को।

गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

सत्ता की ताकत से असहाय किसान...


कृषि कानून को लेकर सरकार और किसानों के बीच सातवें दौर की बैठक का जो नतीजा आया है वह पहले से तय था। क्योंकि सरकार न कृषि कानून को वापस लेने तैयार है और न ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही कानून बनाने तैयार है। मोदी सत्ता की मंशा स्पष्ट है इसके बावजूद जिन लोगों को लगता है कि तीनों कानून सही है तो वे जान ले कि यदि कानून सही होते तो सरकार स्वयं संशोधन की बात नहीं करती?

सरकार के द्वारा संशोधन की बात करना ही बताता है कि ये तीनों कानून किसानों के लिए नहीं कार्पोरेट जगत के लिए बनाये गए हैं। ऐसे में सरकार केवल वही कर रही है जिससे आंदोलनकारी थक कर वापस चला जाए और चुनाव के समय पूंजी और हिन्दू मुस्लिम के दम पर सत्ता हासिल तो हो ही जायेगी?

सरकार की इस रणनीति को किसान भी समझने लगे है। मोदी सत्ता के आने के बाद जिस तरह से एफसीआई को दिवालिया करने की कोशिश की गई है यह किसी से छिपा नहीं है। एक तरफ एफसीआई को दिवालिया घोषित कर दी जायेगी और दूसरी तरफ इन तीनों कानून से कार्पोरेट जगत को मनमानी की छूट मिल जायेगी।

यह सब कोई जानता है कि व्यापार में मुनाफा ही ईमानदारी है ऐसे में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कौन व्यापारी कहां उपज खरीदता है यह सब जानते हैं फिर भी खरीदी और स्टॉक को लेकर इस तरह का कानून बनाना बेईमानी के अलावा और कुछ नहीं है।

इसलिए जब आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन करना बाजार में लूट की छूट देना है। लेकिन न सत्ता इसे स्वीकार करेगी और जब सत्ता स्वीकार नहीं करेगी तो हिन्दू-मुस्लिम के जहर से जहरीले हो चुके अंधभक्त कब इसे स्वीकार करेंगे।

इसी तरह दूसरा कानून कान्टेक्ट खेती का है। इसमें भी इतनी विसंगति है जो सीधे-सीधे व्यापारियों को ही फायदा पहुंचायेंगे।

हमने कल ही इसी जगह पर नगरनार संयंत्र को लेकर केन्द्र सरकार की नियत पर सवाल उठाये थे कि किस तरह सरकार किसानों की जमीन को अधिग्रहण कर पिछले दरवाजे से पूंजीपतियों की मदद करने आमदा है।

कल की बैठक को लेकर जो खबरें छनकर आ रही हैं उस पर वीरेन्द्र भाटिया लिखते हैं ये आंदोलन तीस दिन और चल गया तो न मोदी का एजेंडा चलेगा न आरएसएस का खेल। क्योंकि यह आंदोलन भाईचारा का सबसे बड़ा मिसाल है और नफरत की जितनी भी पढ़ाई कराई गई है वह सब खत्म हो जायेगी। 

30 दिसम्बर की बैठक में मन्त्री जी ने किसान संगठनो से कहा कि आपने हमारा बहुत नुकसान कर दिया है। इस वाक्य के बाद मीटिंग में तल्खी आ गयी और काफ़ी देर तक गतिरोध बना रहा। गोकि सरकार का नुकसान 26 मौतों से ज्यादा है, गोकी 33 दिन से घर से दूर सड़क पर पड़े किसान देश की सरकार के लिए कोई मायने नही रखते। गोकी किसानों का करोड़ो रुपया जो आंदोलन पर लग रहा है और करोड़ो का उनका पीछे नुकसान  हो रहा है उसकी कोई गणना सरकार की इस नुकसान की गणना में नही है। 

किसान आंदोलन से सरकार बता रही है कि उनका ट्रांसपोर्ट ठप्प है, दिल्ली के आसपास की फैक्टरियाँ बन्द हैं, रोजगार ठप्प है आदि। क्या सच मे यह सरकार इन चीजों से चिंतित होती है? जवाब है कदापि नही। नोटबन्दी और लोकबंदी वाली सरकार पूरा देश बन्द करके भी किसी बन्द होने की परवाह नही करती। सरकार की चिंता दरअसल दूसरे नुक्सान की है।

बुधवार, 30 दिसंबर 2020

यह भी तो एक तरह की चोरी है साहेब!


 

छत्तीसगढ़ के नगरनार स्थित संयंत्र को निजी हाथों में सौंपने को लेकर बवाल मचा हुआ है। संयंत्र के निजीकरण का चौतरफा विरोध हो रहा है, इसे देखते हुए राज्य सरकार ने नगरनार संयंत्र के निजीकरण के खिलाफ विधानसभा में प्रस्ताव पारित करते हुए इसे खरीदने की घोषणा कर दी है।

दरअसल बीते 6 सालों में जिस तरह से मोदी सरकार ने देश के रत्न माने जाने वाले सार्वजनिक उपक्रमों को एक के बाद एक बेचा है उसके बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सार्वजनिक उपक्रम क्यों बेचे जा रहे हैं। यदि कोई उपक्रम घाटे में चल रहा है तो उसे सुधारने की बजाय निजी हाथों को सौंप देना कौन सी शासन व्यवस्था है। फिर सवाल यह भी है कि उन सार्वजनिक उपक्रमों को क्यों बेचा जा रहा है जो फायदे में चल रहे हैं। क्या यह सब सरकार की नाकामी नहीं हैं। सिर्फ 23 सार्वजनिक उपक्रम की नहीं बेचे गए बल्कि रेलवे, एयरपोर्ट से लेकर उन तमाम चीजों को निजीकरण किया जा रहा हैं जो वेलफेयर के तहत आते हैं और यही हाल रहा तो देश के पास अपना कहने को क्या रह जायेगा?

सवाल यह भी नहीं है कि निजीकरण के इस दौर में किसे फायदा पहुंचाने की कोशिश हो रही है। सवाल तो यह है कि इस निजीकरण से किस तरह से सरकार धोखाधड़ी कर रही है? क्या यह सब लोकतंत्र का हिस्सा है। 

सरकारें इसलिए बनाई जाती है ताकि व्यवस्था को सुचारु रुप से चलाया जा सके और आम लोगों के हित में बेहतर सुधार हो लेकिन जिस तरह से मोदी सत्ता ने बीते 6 सालों में आर्थिक सुधार के नाम पर निजीकरण को प्राथमिकता दी है, उससे यह नहीं भूलना चाहिए कि अंग्रेजों ने इस देश पर राज्य इस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से ही शुरु किया था।

ऐसे में नगरनार संयंत्र को निजी हाथों में सौंपने को लेकर जब विरोध शुरु हुआ तो इसके पीछे का सच भी जानना जरूरी है। और छत्तीसगढ़ के हित की बात करने वाले भाजपाई नेतृत्व क्यों इसका विरोध नहीं कर रहा यह भी समझना होगा।

नगरनार संयंत्र के लिए जमीन किसानों ने दी। जमीन इसलिए दी गई ताकि एक सरकारी संयंत्र लग सके यदि निजी संयंत्र के लिए जमीन मांगी जाती तो बहुत से किसान तैयार ही नहीं होते। एनएमडीसी से अपने भविष्य में बेहतरी आने की उम्मीद में दी गई इस जमीन पर लगने वाले संयंत्र को निजी हाथों में सौंपने की कोशिश न केवल बेईमानी है बल्कि किसानों के साथ धोखाधड़ी भी है।

इसलिए जब केन्द्र सरकार ने इसे निजी हाथों में सौंपने की दिशा में कदम उठाया तभी से इसका विरोध शुरु हो गया।

चूंकि निजी संयंत्र की स्थापना में किसानों से सीधे जमीन लेना आसान नहीं होता इसलिए सरकार यदि जमीन अधिग्रहण के बाद निजी हाथों को उसे सौंप दे तो यह जनता के साथ धोखा नहीं तो और क्या है? यह जमीनों की चोरी नहीं तो और क्या है? ऐसे में स्थानीय भाजपाईयों की  चुप्पी भी उन्हें गर्त में ले जायेगी।

मंगलवार, 29 दिसंबर 2020

तब लोकतंत्र का पाठ और ज़रूरी हो जाता है

तब लोकतंत्र का पाठ           और जरूरी हो जाता है...

किसान आंदोलन को लेकर जिस तरह का बवाल खड़ा हुआ है उसके बाद सत्ता के अडिय़ल रुख को लेकर कई तरह के सवाल खड़ा होने लगा है, सत्ता और उनसे जुड़े लोगों ने आंदोलन को बदनाम करने की जो रणनीति अपनाई वह पूरी तरह असफल हो गई और इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि किसान और भड़क गये। अडानी-अंबानी के बहिष्कार के साथ ही अब जिस तरह से आंदोलन का रुख जा रहा है वह देश के लिए चिंता का सबब बनता जा रहा है।

निजीकरण के प्रति सरकार की बढ़ती रूचि की एकमात्र वजह सत्ता की रईसी को बरकरार रखने के अलावा कुछ नहीं है। ऐसे में सवाल यह नहीं है कि किसान आंदोलन का परिणाम क्या होगा? बल्कि सवाल यह है कि यदि कृषि जैसे क्षेत्रों में भी इस तरह के कानून आ जाए तो किसानों का भला कैसे हो पायेगा? जबकि आज भी किसानो को अपनी उपज समर्थन मूल्य से कम में बेचना पड़ रहा है। जबकि इन्हीं अन्नदाताओं के भरोसे देश मजबूत हुआ है।

भले ही सत्ता और उनसे जुड़े लोग यह तथ्य न माने कि किसानों की वजह से ही भारत की समृति और आत्मनिर्भरता कायम है लेकिन सच यही है। किसानों ने हमेशा ही इस देश को आत्मनिर्भर बनाने में खूब मेहनत की है।

याद कीजिए वह दौर जब कम उपज की वजह से अमेरिका ने अनाज देने के नाम पर दादागिरी की थी तब इन्हीं किसानों के हरित क्रांति कर देश को अनाज के उत्पादन में न केवल आत्मनिर्भर किया बल्कि निर्यात के माध्यम से विदेशी मुद्रा भी दिलाई। श्वेत क्रांति से लेकर सहकारिता में किसानों की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। जब भी देश में संकट आया है, इन्हीं किसानों ने सबसे अग्रणी भूमिका निभाई है।

लेकिन हैरान करने वाली बात तो यह है कि सरकार कभी सोच ही नहीं सकती कि किसानों के हालात क्यों खराब है जबकि कृषि से जुड़े उद्योग हो या बीमा कंपनियां रातो रात अमीर हो जाते हैं, खाद बीज दवा बेचने वाली कंपनी अरबों कमा लेती है।

सच तो यही है कि जब तक किसानों की उपज का एक-एक दावा समर्थन मूल्य पर नहीं बिकेगा तब तक किसानों की आर्थिक स्थिति सुधर ही नहीं सकती।

ऐसे में प्रधानमंत्री जब लोकतंत्र की पाठ की बात करते है तो उन्हें अपनी पार्टी और अपने सांसद और विधायकों की तरफ झाकनी चाहिए कि कितने बड़े-बड़े अपराधी जमा हो गये हैं। उन्हें खुद की सुरक्षा में होने वाले खर्च की तरफ देखनी चाहिए जो रोज एक करोड़ रुपये खर्च किये जा रहे हैं।

खुद की सुरक्षा में हर रोज करोड़ों रुपये खर्च करने वाला यदि किसानों को रोज का 17 रुपये देने के बाद उसे सम्मान कहे तो लोकतंत्र का सबक याद करने की किसे जरूरत है। अपराधियों के भरोसे जब सत्ता चलती है, पार्टियां चलती है तो लोकतंत्र का सबक तो याद दिलाना ही पड़ेगा।

संवैधानिक संस्थाओं पर जब सत्ता की नकेल कसते चली जाएगी तो लोकतंत्र क्या सिर्फ नाम का नहीं रह जायेगा। तब भला लोकतंत्र का पाठ को लेकर तंज कसकर तालियां भी बटोरी जायेगी और पूंजीपतियों की गोद में बैठकर चुनाव भी जीते जायेंगे।

ऐसे में लोकतंत्र के लिए शबीना अदिम का यह शेर जरूरी सबक है...

यही बात खुद समझना,

यही बात आम करना।

जो गुरूर में हो डूबा,

उसे मत सलाम करना।


 

सोमवार, 28 दिसंबर 2020

लोकतंत्र का पाठ !

 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के द्वारा अपने विरोधियों पर तंज कसना नई बात नहीं है ऐसे में उनका यह कहना कि कुछ लोग उन्हें लोकतंत्र का पाठ सीखा रहे हैं, हैरान कर देने वाला है। क्योंकि बीते 6 सालों में जिस तरह से देश के हालात हुए हैं उसके बाद भी कोई लोकतंत्र का पाठ पर तंज कसे तो यह जरूरी हो जाता है कि लोकतंत्र को नये सिरे से समझने की कोशिश हो।

क्या वर्तमान सत्ता के लिए सिर्फ चुनाव कराना ही लोकतंत्र नहीं रह गया है? देश के प्रधानमंत्री ने क्या किया है यह देखना भी जरूरी है। बीते 6 साल में देश के इस हालात के लिए कौन जिम्मेदार है? चुनाव दर चुनाव जीतना और सत्ता हासिल करने के लिए छल प्रपंच करना ही लोकतंत्र है तो फिर लोकतंत्र का पाठ नये सिरे से पढऩे की जरूरत है।

लोकतंत्र की विद्वानों ने कई तरह की परिभाषा दी है, उन परिभाषाओं में प्रधानमंत्री कहां फिट बैठते हैं इस पर भी बहस की जा सकती है। जबकि लोकतंत्र को लेकर जितने भी परिभाषाएं गढ़ी गई हैं उनमें जनता का जनता के लिए शासन ही महत्वपूर्ण है और जनता जब लोकतंत्र में महत्वपूर्ण है तब सत्ता क्यों अपने को महत्वपूर्ण समझती है। सारी योजनाएँ सत्ता के अनुकूल ही क्यों बनती है?

यह सवाल इसलिए उठाए जा रहे हैं क्योंकि वर्तमान सत्ता के लिए चुनाव ही महत्वपूर्ण है। ऐसे में लोकतंत्र का पाठ पढ़ाना और उसे याद रखना कहां महत्वपूर्ण रहेगा।

सवाल जब लोकतंत्र का है तो यह भी समझना होगा कि लोकतंत्र का मतलब सिर्फ चुनाव नहीं है, सिर्फ जनता के हित के फैसले भी लोकतंत्र नहीं है, देश को सुदृढ़ बनाना भी लोकतंत्र का हिस्सा है न कि सार्वजनिक उपक्रमों को बेचकर अपनी रईसी बरकरार रखना।

हमने पहले भी लिखा है कि सत्ता की ताकत ने इस देश में लोकतंत्र का किस कदर रोका है। सत्ता ने कैसे अपनी जीत पर खुद को ईश्वर समझ लिया है। और जनमानस की भावनाओं की अनदेखी की है।

हम अपने पाठकों को याद दिला दें कि आजादी के बाद इस देश में जितने भी प्रधानमंत्री बने हैं उनमें से सभी ने इस देश को सुदृढ़ करने, इस देश में रोजगार देने और संसाधनों का देश हित में इस्तेमाल करने सार्वजनिक उपक्रमों की स्थापना की है। बाजारवाद के बढ़ते प्रभाव और रिफार्म के दौर में भी नरसिन्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर मनमोहन सिंह के दौर में भी दर्जनों सार्वजनिक उपक्रम बनाये गये लेकिन नरेन्द्र मोदी ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने अपने 6 साल की सत्ता में कोई भी सार्वजनिक उपक्रम नहीं बनाये बल्कि तेईस सार्वजनिक उपक्रमों को बेच भी दिया।

ऐसे मे कोई लोकतंत्र के पाठ को लेकर जब सवाल खड़ा करे तो यह साबित नहीं करता कि लोकतंत्र का पाठ पढऩे की जरूरत है। 

फिर इस मजाक को जम्हूरियत का नाम दिया 

हमें डराने लगे हैं वो हमारी ताकत से

-नोमान शौक

मुझसे क्या लिखानी है कि अब मेरे लिये

कभी सोने, कभी चांदी के कलम आते हैं

-बशीर बद्र


रविवार, 27 दिसंबर 2020

लोकतंत्र कहां हैं...!

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जम्मू कश्मीर के लोगों के लिए आयुष्मान भारत की घोषणा करते हुए जब कहते हैं कि कुछ लोग मुझे रोज लोकतंत्र का पाठ पढ़ा रहे हैं तब यह सवाल स्वाभाविक रुप से उठता है कि क्या देश का प्रधानमंत्री लोकतंत्र की परिभाषा भूल गये हैं या वे लोकतंत्र को सबसे ज्यादा जानते है।

हमने पहले भी इसी जगह पर लिखा है कि वर्तमान सत्ता के किसान आंदोलन को लेकर जो अडिय़ल रुख अख्तियार किया है वह किसी भी लिहाज से उचित नहीं है। लोकतंत्र में कानून बनाना या अपने एजेंडे को लागू करना सरकार का ही काम है लेकिन इसका यह कोई मतलब नहीं है कि विरोधियों को पाकिस्तानी या खालिस्तानी करार दिया जाए।

जब से तीनों कृषि कानून के खिलाफ किसानों ने आवाज बुलंद की है तभी से सत्ता और उनसे जुड़े लोगों ने आंदोलनरत किसानों के खिलाफ विषवमन किया है। यहां तक कि इस आंदोलन को विदेशी साजिश तक बता दिया गया। लेकिन सच तो यही है कि ये तीनों कानून को लेकर किसानों के मन में जो शंकाएं हैं उसे दूर करने की कोशिश नहीं की गई।

सरकार को अपनी दिक्कत हो सकती है लेकिन क्या यह सच नहीं है कि किसानों की हालत दिनों दिन बदतर होते जा रही है ऐसे में किसानों को लेकर गठित आयोग कि सिफारिश पर मोदी सत्ता ने पिछले 6 सालों में क्या किया? कुछ भी नहीं न भूमि सुधार न तकनीकी? ऐसे में जब किसानों के लिए मंडी और समर्थन मूल्य महत्वपूर्ण हो जाता है तब उस पर भी कानून नहीं बनाना क्या सरकार का अडिय़ल रुख नहीं है।

तब भला लोकतंत्र के पाठ को लेकर तंज कसना यह साबित नहीं करता कि प्रधानमंत्री को लोकतंत्र का सम्पूर्ण ज्ञान है और वे लोकतंत्र को लेकर कुछ भी नहीं समझना चाहते जबकि यह सर्व सत्य है कि जीवन के हर क्षेत्र में रोज सीखने का अवसर मिलता है चाहे आप उस क्षेत्र के कितने भी बड़े ज्ञानी हो। रोज कुछ कुछ सीखा जा सकता है।

जहां तक लोकतंत्र का सवाल है तो यह कौन नहीं जानता कि आज भी इस देश में लोकतंत्र सत्ता की ताकत और पूंजी के दबाव में पैरों तले रोज रौदा जाता है। जो व्यक्ति कानून के चक्कर में पड़ता है उससे पूछिये कि न्याय उसे कब मिलता है या तो वह टूट जाता है या जीवन का अंतिम सांस ले रहा होता है। इस न्याय को लोकतंत्र का विजय बताकर सत्ता भले ही खुश हो ले लेकिन सच तो यही है कि सत्ता का हर कदम उसके अपनी रईसी को बरकरार रखने में होता हैं।

ऐसे में आम आदमी का दर्द को लेकर मशहूर शायह राजेश रेड्डी के इस शेर की याद आती है-

शाम को जिस वक्त खाली हाथ घर जाता हूं मैं

मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूं मैं।।

गुरुवार, 24 दिसंबर 2020

सूरज की चमक पर अंधत्व छाया है

(एक)

सूरज साफ़ चमक रहा है

अपनी ही रौ में

रात का वक़्त नहीं है यह,


फिर भी कुछ लोग अपने

अंधत्व का दोष

थोप रहें हैं अंधेरे पर!


राजा अपने में मग्न है

किसान मज़दूर परेशान 

जनमानस हलकान


ठिठुरता ठंड है

सत्ता का दभ है

मुखौटे पर मुखौटा है 

असली , बदरंग है


(दो)

राजधानी की तो सीमा है 

सत्ता की ताक़त असीमित है

किसानो की हड़ताल है

अंधेरे का आग़ाज़ है 


चैनल है , अख़बार है

लेकिन गीत दरबार है

ट्रोल आर्मी का साथ है 

सच यहाँ बेकार है 


ये क्या हो रहा है 

प्रहरी क्यों सो रहा है


(तीन)

विजय मद में मदमस्त 

ये कौन चीख़ रहा है 

मन की बात वह 

किसे सुना रहा है 


कभी वह हँसता है 

बनावटी रोता है

हर जीत के बाद 

अपनी ही पीठ ठोकता है 


अचानक विजय रथ के 

सामने कोई आता है 

सारथी भी अब 

ज़ोर से चिल्लाता है


दूर करो इसे 

ये विरोधी है 

सिर्फ़ धर्म का नहीं

देश का विरोधी है


पीछे पीछे भागते क़लमकार

अपनी जादुई भाषा बिखेरते है

सत्ता के पैसों से नोच देते हैं 

विरोधियों के चेहरे 


सच दूर चला जाता है 

सत्ता इतराता है 

जय जय की चीत्कार है 

तुम्हारी ही जयकार है 


(अंत)

सार्वजनिक उपक्रम बिके 

रेल बिके , प्लेन बिके 

विरोधियों का पाप भी बिक रहा


नोटबंदी से लॉकडाउन

कृषि बिल का ये क़ानून 

हर फ़ैसले पर मौत 

का साया है 


कोई नहीं सुनता 

कोई ध्यान नहीं देता 

अजब ग़ज़ब फ़ैसले पर

कोई कान नहीं देता 


झूठ की सत्ता है 

सूरज की चमक पर 

अंधत्व छाया है ।


( किसान आंदोलन को समर्पित )