सोमवार, 3 मई 2021

मोदी की मात...

 

सवाल यह नहीं है कि पश्चिम बंगाल चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार के लिए कौन दोषी है, जबकि पार्टी ने जीत के लिए कोई कसर बाकी नहीं रखा था? बल्कि सवाल यह है कि क्या कोई प्रधानमंत्री एक राज्य में जीत हासिल करने पूरे देश को दांव पर कैसे लगा सकता है। हर मोर्चे में बुरी तरह विफल रहने के बाद भी यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता बरकरार रखने का दावा किया जा रहा है तो इसका मतलब साफ है कि छल-प्रपंच, झूठ-नफरत के इस खेल को चंद पैसों की लालच में बढ़ावा देने वालों की रणनीति सफल हो रही है।

जिस ढंग से संघ का मैनेजमेंट काम कर रहा है, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में घृणा की खाई और चौड़ी होगी और देश में तरक्की बात बेमानी हो जानी है। कोविड के पहली लहर में जिस तरह से तबगिली जममात को निशाने पर लेकर नफरत फैलाई गई ुसका भांडा फूट जाने के बाद भी यदि देश के लोग सचेत होने की बजाय नफरत के रास्ते को ही चुन रहे हैं तो इसका मतलब साफ है कि संघ ने अपनी ताकत ही नहीं बढ़ाई है बल्कि उसने अपने मैनेजमेंट को भी इतना तगड़ा कर लिया है कि उससे निपटना आसान नहीं है।

बंगाल चुनाव में भले ही ममता बैनर्जी ने उम्दा प्रदर्शन किया है लेकिन भाजपा के तीन से करीब 80 सीट हासिल करना भी किसी उपलब्धि से कम नहीं है और यह एक तरह से समूचे देश को चेतावनी है कि आने वाले दिनों में नरेन्द्र मोदी को मात देना आसान नहीं है। बंगाल के चुनाव परिणाम के बाद समूचा विपक्ष ममता बैनर्जी की ओर देख रहा है। यह ठीक है कि ममता ने बंगाल बचा लिया लेकिन फिल्म तारिका कंगना रनौत के ट्वीट ने भविष्य का संकेत दे दिया है। रनौत ने जिस तरह से ममता की जीत पर ट्वीट किया है क्या वह नफरत का सैलाब नहीं है, कंगना अपने ट्वीट में कहती है कि अब वहां बहुमत में हिन्दू नहीं बचे हैं, एक और कश्मीर जन्म ले रहा है?

भले ही लोग इसे भाजपा का हार का झल्लाहत बता रहे हैं लेकिन यह झल्लाहत नहीं संघ की रणनीति का हिस्सा है, हिन्दुओं में खौफ पैदा करने का तरीका है, बहुसंख्यक समाज को उत्तेजित करने का कार्यक्रम है। बंगाल चुनाव से पहले ही जिस तरह से ममता बैनर्जी पर हमला हुआ है वह कम खतरनाक नहीं है। एक ब्राम्हण महिला पर जिस तरह से नफरती बाण चलाए गए, विष वमन किया गया यदि कोई धर्मनिरपेक्ष दल के लोग किसी दक्षिणपंथी विचारधारा के नेता पर इस तरह का दुष्प्रचार करते तो अभी तक उसका समाज जाग जाता। लेकिन सूती साड़ी और हवाई चप्पल पहनकर भी ममता ने क्षत्राणी जैसा रुप दिखला कर भाजपा को करारी शिकस्त दी।

जो लोग बंगाल चुनाव के दुरगामी परिणाम की आशा में डूबे है उनके लिए यह जानना जरूरी है कि प्रेम और घृणा की लड़ाई आसान नहीं होती, और जिन्हें लगता है कि प्रेम की जीत तो होनी ही है वे महाभारत फिर से पढ़ लें क्योंकि धर्मराज की जीत के बाद भी क्या बचा रह गया था। इसलिए सच की जीत जो चाह रहे हैं वे त्याग, कुर्बानी और दुनिया भर के आक्षेप के लिए खुद को तैयार कर लें।

रविवार, 2 मई 2021

पागलपन का फटना...

 

कहते हैं जब सत्ता अचानक मिल जाती है तो फिर उनके भीतर का पागलपन फट पड़ता है और उसकों तबाही और अपने मन की बात करने के अलावा कुछ नहीं सुझता? वह अपनी करतूत को छुपाने सब-कुछ आग के हवाले कर देना चाहता है? और सब तरफ जलती लाशों का धुंआ होता है? यह धुंआ भी उसे विषैला नहीं लगता बल्कि वह आखरी दम तक बड़ी मासूमियत और भोलेपन से यही कहता है कि उसने तो जो कुछ किया देश हित में किया जबकि वह अपने भीतर के नफरत को तबाही में बदल रहा होता है।

आज के दौर में सच को पकडऩा कितना दुश्वार हो गया है, पहली बार संसद भवन की सीढ़ी में माथा टेकना सच था या उसके बाद उस संसद भवन को ही नेस्तनाबूत कर देने की कोशिश सच है? पहली बार हिन्दू प्रधानमंत्री बनने का उद्घोष सच था या अब्दुल कलाम आजाद को राष्ट्रपति बनाना सच था। न्यायालय के फैसले से बन रहा राम मंदिर सच था या सत्ता की ताकत से बन रहा राम मंदिर सच है? नोट बंदी की वजह से लाईन में मर रहे लोग सच था या नोटबंदी की वजह से कालाधन की वापसी, आतंकवाद की कमर टूट जाना सच था?

मॉब लिचिंग, हिन्दू राष्ट्र, जीएसटी के अव्यवहारिक होने से आत्महत्या को मजबूर व्यापारी, कोरोना की चेतावनी को नजर अंदाज करते नमस्ते ट्रम्प, एमपी की सत्ता लोभ, कुंभ, चुनावी भीड़, आक्सीजन की कमी से मरते लोग, रेमडेसिविर का 25 हजार में बिकना, किसान बिल, सीएए, आप ऐसे कितने ही सच को पकड़ते-पकड़ते थक जाओगे लेकिन सत्ता न अपनी जिम्मेदारी मानेगी और न ही लापरवाही?

आज तक के एंकर रोहित सरदाना के दुखद निधन को लेकर किस तरह की प्रतिक्रिया सोशल मीडिया में आती रही, वह हैरान और परेशान कर देने वाला है! मेरा दावा है कि ये देश ऐसा कभी नहीं रहा, किसी की मौत पर ऐसी प्रतिक्रिया सभ्य समाज, या विश्व गुरु के लिए लालायित देश का नहीं हो सकता लेकिन आप पायेंगे कि शुरुआत उन्हीं से हुई है।

मैं उदाहरण के साथ कह सकता हूं कि सिने अभिनेता ऋषि कपूर के निधन पर कुंठित हिन्दुओं की प्रतिक्रिया थी, गौ मांस खाने वालों का यही हश्र होना था, मॉब लिचिंग के प्रवक्ता को काहे की श्रद्धांजलि। सिने अभिनेता इरफान खान को लेकर भी नफरत भरी टिप्पणी और आजकल चर्चित एक साधु ने तो अब्दुल कलाम आजाद की देश के प्रति वफादारी पर तो सवाल उठाये ही है उन्हें गद्दार तक कह डाला। 

ये सच है कि बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय लेकिन हम अपने देश को किस रास्ते पर ले जा रहे हैं। क्या नफरती लोगों को ये नहीं लगता कि ये हालात हमारी आने वाली पीढ़ी को कैसा जीवन देगी। इस पागलपन के दौर में कोरोना संक्रमण से निपटने जिस तरह से हर धर्म, हर जाति के लोग कंधा से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं उसके बाद भी यदि किसी को लगता है कि ये छलावा है तो इसका मतलब साफ है कि राजनीति में बैठे लोग अपनी कुर्सी के लिए इस देश को बेच देना चाहते हैं, अपने पागलपन से तबाही मचाकर कुर्सी बचाना चाहते है। सिर्फ एक रेल दुर्घटना से व्यथित रेल मंत्री का इस्तीफा सच है या गिरते लाशों के बीच सत्ता का अट्टाहास सच है। एक मिनट रुक कर सच को पकडऩे की कोशिश जरुर कीजिएगा।

शनिवार, 1 मई 2021

लाशें ही तो हैं !


 लाशें ही तो हैं!


वे आते हैं,

अपने साथ लाते हैं,

नफरत का बीज

और रोप देते हैं

हमारे दिमाग में,

और हमारा दिल

दिमाग हो जाता है।


वे आते हैं

ढूंढते है कुछ ज्ञानी, कुछ नामी गिरामी,

पैसे वाले रईस,

या बदमाशों की टोली

और रोप देते हैं 

नफरत के बीज।


धीरे धीरे पनपने

लगता है बीज

दंगे के रुप में

फुटता है अंकुर

खाद पानी के

रुप में मिलता 

रहता है झूठ

अफवाह!


फिर एक दिन

हां एक दिन

पौधा फूटता है

उस बीज से

हम श्रेष्ठ हैं

कुंठित होता पौधा

बड़ा होता है।

पौधों को अब नहीं

चाहिए रोजगार

बढ़ती महंगाई से भी

उसे फर्क नहीं पड़ता


वह तो आतुर है

एक ऐसा फल देने

जिनमें, हमारी भावना हो,

आस्था हो,

सपने हो।

और यह फल ही सत्ता है।

जिसे वे तब तक

खाते रहेंगे

जब तक हम जल

न जाये 

मर न जाये

फना न हो जाये

क्योंकि हम लाशें ही तो हैं। (केटी)

(रोहित सरदाना और उन जैसे पढ़े-लिखे को समर्पित)

शुक्रवार, 30 अप्रैल 2021

दोगली शख्सियत...

 कोई भी शख्सियत जब नफरत के मसाले से पकी हो तो वह आम आदमी कहां रह पाता है, उसमें मानवीय संवेदनाओं का तो अभाव होता ही है अपने घर परिवार के प्रति भी निष्ठुर हो जाता है, ऐसेलोग घडिय़ाली आंसू बहाने में तो माहिर होते ही हैं प्रमुख पदों पर बैठते ही इनकी ताकत खौफनाक हो जाती है। वे बात-बात पर झूठ और गुमराह करने वाली तस्वीरें पेश करते रहते हैं। और यह दोगली शख्सियत अचानक रुप नहीं लेता बल्कि यह सालों की मेहनत का नतीजा है। 

खैर इन सब बातों को अब कहने का कोई मतलब ही नहीं है क्यों यह समय कोविड से निपटने का है, इस देवभूमि को पिछली लाशों से मुक्त करने का है, आप इस समय सत्ता से न इस्तीफा मांग सकते हैं और न ही उनसे इस्तीफे की उम्मीद ही कर सकते है। हां उनकी लापरवाही और गैर जिम्मेदारी को चुपचाप किसी तमाशाबीन की तरह देख सकते हैं, जिनके अपने चले जा रहे हैं उनकी हिम्मत बढ़ा सकते हैं ताकि जो सत्ता की इस लापरवाही के बाद भी बच गये हैं वे कम से कम अच्छे से जी तो सके।

अपनों के जाने का दुख वही जानता है जिसका अपना घर-परिवार होता है लेकिन जब व्यक्ति अपने धर्म-जाति को लेकर कुंठित हो जाये तो उसके भीतर की आत्मा कहां जिन्दा रहती है उसे तो बस अपने धर्म को ही श्रेष्ठ बताना है। और इसके एवज में पिछली लाशें उन्हें कभी नहीं दिखाई देगी। कोरोना के शिकार तो फिर भी ठीक हो जा रहे हैं लेकिन सत्ता की लापरवाही के शिकार लोगों का दर्द कोई नहीं समझ सकता। ऐसे मे कल जब रिजाईन मोदी का नारा बुलंद हुआ तो इसे ब्लाक कर दिया गया। सरकार यानी मोदी सत्ता कह रही है कि उसने ब्लॉक नहीं किया? और न ही उसके इशारे पर ही ब्लॉक हुआ है?

लेकिन एक बात सत्ता जान ले किन इस देश की जनता सब-कुछ देख रही है। अब तो पूरी दुनिया में मोदी सत्ता की थू-थू हो रही है और हाईकोर्ट ने जिस तरह से लानत भेजी है उसके बाद तो सत्ता को एक दिन भी बने रहने की नैतिकता नहीं है लेकिन शरम कहां बनती है तब क्या बचा रहता है। अब तो लोगों का भी कहना है कि लानत है सत्ता की आजाद मिजाजी को। मौत के इस मंजर के लिए भले ही कुछ लोग अकेली सत्ता को दोषी मानने से इंकार कर रहे हो। लेकिन सच तो यही है कि यदि उपलब्धि का चोंगा सत्ता अकेले पहनती है तो इन लाशों की साड़ी भी उन्हें ही पहनना है।

प्रख्यात कवि कुमार विश्वास ने जिस ढंग से अपने ट्वीट में कहा है कि उससे तो साफ है कि उनके दिल में कितना गुस्सा है।

यह मंजर क्या गुस्सा दिलाने वाला नहीं है, मां का बच्चों की जिन्दगी के लिए कलपना, पत्नी का मुंह से ही पति को आक्सीजन देने की कोशिश और लाशों को रिक्शा, ठेला, सायकल से ले जाना। क्या सरकार इतनी भी व्यवस्था करने के लायक नहीं बची है तो फिर वह क्यों हैं।

गुरुवार, 29 अप्रैल 2021

सत्ता का तांड़व...

 

क्या आपने उन भेडिय़ा बच्चों के बारे में सुना है जो चांद की तरफ मुंह उठाकर हुंकाती मादा की घातक छातियों से दूध पीते है, और जब उस बच्चे को झुण्ड से अलग कर बचा लिया जाता है तो वह सबसे पहले बचाने वालों को ही काटता है। उनमें न तहजीब होती है और न ही उससे प्रेम की कल्पना ही की जा सकती है।

आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन सत्ता में बैठे लोगों की लापरवाही और गैर जिम्मेदाराना हरकत किसी भेडिय़ा बच्चे से कम नहीं है। बदइंतजामी ने तो जिन्दा लोगों को लाश में तब्दिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ा है। इस माह यानी अप्रैल में ही कोरोना से मरने वालों का आंकड़ा पचास हजार पार कर चुका है और विशेषज्ञों की माने तो आने वाले दिनों में इसमें और तेजी आएगी। लोगों को तो पचास हजार वाले सरकारी आंकड़ों पर यकीन ही नहीं है वे इसे कई गुणा बता रहे हैं।

अपनी नाकामी छुपाने कोई सत्ता किस हद तक निचता पर उतर जाये ये कहना मुश्किल हो गया है। सत्ता की बेशर्मी आप गिनते रह जाएंगे और उससे ज्यादा निचता और बेशर्मी तो उन लोगों की है जो अपनी हिन्दू कुंठा के चलते देश को पहले ही बर्बाद कर देना चाहते हैं। देशभर में जिस तरह से कब्रिस्तान से श्मशान घाट तक लाशों की लाईने दिखाई देने लगी है वह किसी भी संवेदनशील सरकार के मुंह में तमाचा है लेकिन केन्द्र सरकार अभी भी सिर्फ और सिर्फ राजनीति कर रही है। लगता है कि भाजपा शासित राज्य के मुख्यमंत्री तो मोदी-शाह से इस कदर दहशत में है कि न तो वो एक देश एक कीमत पर ही कुछ बोल पा रहे हैं और न टीका को सभी तरह के टेक्स फ्री पर ही कुछ बोल पा रहे हैं। यदि हम महामारी में भी केन्द्र की सत्ता वेक्सीन में टैक्स माफ नहीं कर पा रही है तो इसका मतलब क्या है। 

पहले ही सरकार की लापरवाही, बदइंतजामी और लॉकडाउन के चलते कालाबाजारी की मार झेल रही जनता यदि सरकारी स्तर पर भी आपदा में अवसर की शिकार होकर अपने जान-माल को नहीं बचा पा रही है तो इस सरकार को होने का मतलब क्या है। अब तो इस सरकार की लापरवाही और बदइंतजामी को गिनाने का कोई मतलब ही नहीं है क्योंकि इस लापरवाही की लाश पर अब भी कुंठित हिन्दू बेशर्मी से जश्न मनाने का मौका ढूंढते रहते है। संघी नफरत का जज्बा लिये झपट्टा मारने को तत्पर गिद्ध की तरह वे केन्द्र की लापरवाही का ठिकरा राज्यों पर फोडऩा चाहते हैं।

हैरानी तो इस बात की है कि वे पिछली गलतियों से सबक लेने की बजाय नई-नई गलितयां कर अपनी बेशर्मी का परिचय देते हैं। और हद तो यह है कि वे अब भी यह मानने को तैयार नहीं है कि उनकी लापरवाही और अहंकार की वजह से दूसरी लहर में मौत का तांडव मचा है। सबसे शर्मनाक और हैरानी की बात तो यह है कि सत्ता अब भी इस विपदा से निपटने की कोई कारगार कोशिश नहीं कर रही है। जबकि विशेषज्ञों  की राय में आने वाला वक्त बेहद मुश्किल भरा होगा। ऐसे में आत्मा चित्कार उठता है और कहता है-

बस-बस-बस

सत्ता का हवस, बस-बस

झूठ का साहस, बस-बस

कोरोना के कहर से सब बेबस

छाती पे जलती लाश बस-बस

बदइंतजामी, बेरुखी का कॉकस 

सत्ता का अट्हास बस बस बस

सत्ता की रईसी, प्राण वायु की गरीबी

दबता जनता का नस, बस बस बस

कौशल दबा दो सत्ता का नस

न हो सके टस से मस।।

बस बस बस...

बुधवार, 28 अप्रैल 2021

सिस्टम का मतलब...

 

क्या देश की जनता को सत्ता द्वारा इतना बेवकूफ समझा जाता है कि वह कुछ भी कहे मान ले। दरअसल बात सिस्टम के फेल हो जाने की हो रही है। सच तो यह है कि सिस्टम फेल नहीं बल्कि एक्सपोज हो गया। खुद को बचाने जिस बेशर्मी से सत्ता ने सिस्टम पर दोष मढ़ा है वह हैरान ही नहीं उन लोगों के मुंह में करार तमाचा है जो दिन-रात इस देश की तरक्की के लिए काम कर रहे हैं।

इस देश की वह पुलिस जो इस भीषण काल में भी अपनी नींद खराब कर, सड़कों पर पहरेदारी कर रही है, इस देश के डाक्टर, नर्स, नर्सिंग स्टॉप अपने परिवार की चिंता किये बगैर गरीबों की सेवा में लगे है, जाति धर्म का भेद भुलाकर इस महामारी में आम जन एक साथ खड़े हैं क्या ये सभी सिस्टम को कटघरे में खड़े करने का अधिकार सत्ता को है? दरअसल खराबी सिस्टम में नहीं सत्ता में बैठे लोगों में है। जब उसकी लापरवाही गैर जिम्मेदारी सबके सामने आने लगा तो वह सिस्टम को दोष देने लग गया। 

जो लोग आज अपनी जिम्मेदारी और लापरवाही के चलते इस देश की यह हालत की है वे लोग तब क्यों सिस्टम को दोष नहीं दे रहे थे जब गृहमंत्री के पुत्र जय शाह को पद दे रहे थे, तीन हजार करोड़ की मूर्ति बनवा रहे थे, सिस्टम खुद के लिए 8 हजार करोड़ का प्लेन खरीदता है। चुनाव प्रचार करने बंग्लादेश चला जाता है लेकिन अस्पताल नहीं जाता। देश की सम्पत्ति को यह सिस्टम निजी हाथों में सौपता है, किसान बिल लाता है, सीएए लाता है, नोटबंदी करता है, विधायक खरीदता है, नमस्ते ट्रम्प करता है तब सिस्टम ठीक था लेकिन जब लोग बिलखकर तड़पकर मरने लगे तो सिस्टम फेल हो गया।

दरअसल सिस्टम फेल ही नहीं हुआ है बल्कि एक्सपोज हो गया है। क्योंकि इस सिस्टम ने जिस तरह से बात-बात पर झूठ बोलकर नफरत की दीवार खड़ी की थी और अपनी सुविधानुसार सिस्टम तैयार किया था वह इस महामारी में पूरी तरह एक्सपोज हो गया। हमने पहले ही कहा है कि यह देश दुनिया के किसी भी देश से भिन्न है, इस देश को किसी धर्म या महजब का ही प्रयास है। यह देश बना है प्रेम और सत्य की राह पर चलकर बना है, यहां झूठ-नफरत, छल-प्रपंच का कोई स्थान नहीं है और जिसे भी सत्ता ने इसे अपने इशारे पर हांकने की कोशिश की उसे मुंह की खाना पड़ी है।

जो हिन्दू कुंठा से ग्रसित है वे खुद ही जान ले कि छोटे-छोटे राज्यों में बंटे इस देश को एक करने में क्या कुछ नहीं किया गया, तब भारत बना है। आजादी की लड़ाई में हिन्दु ही नहीं मुस्लिम-सिख सहित सब धर्म के लोगों ने अपना लहू बहाया है। इस देश पर जितना हिन्दुओं का अधिकार है, उतना ही अधिकार दूसरे धर्म के लोगों का है।

लेकिन पिछले सालों में सत्ता ने क्या किया, वह अपनी तरह का सिस्टम तैयार करने लगा, अपनी कुंठा, झूठ और नफरत को सिस्टम का अंग बनाने की कोशिस की गई। जब सत्ता में बैठे लोगों का समूचा ध्यान ही अपनी सत्ता को विस्तार देने में हो तो फिर वह आम लोगों के बारे में कैसे सोच सकता था, उसका सारा सिस्टम सत्ता के लिए था इसलिए महामारी की चेतावनी को नजरअंदाज कर पहली लापरवाही की गई, पहली लहर में हुई लापरवाही ने कितनी ही जाने ली।

मंगलवार, 27 अप्रैल 2021

जिम्मेदारी से दूर...


एक तरफ सत्ता थी जो अपनी गैर जिम्मेदाराना हरकत और लापरवाही से जनता को मुसिबत में डाल दिया था तो दूसरी तरफ जनता अपनी जिम्मेदारी समझ इस संकटकाल में लोगों की मदद के लिए आगे आ रही थी। सोनू सूद तो हीरो बन गये है लेकिन छत्तीसगढ़ की राजधानी में कितने ही लोग हैं जो लोगों की सेवा कर रहे हैं, विधायक सत्यनारायण शर्मा और उनके दोनों बेटे पंकज और विकास तो पीपीई कीट पहनकर दिन रात सेवा में लगे थे तो विधायक बृजमोहन अग्रवाल ने कोविड सेंटर खोल दिया था, शहर कांग्रेस अध्यक्ष गिरीश दुबे, सराफा व्यापारी अशोक  गोलछा, प्रहलाद सोनी, डॉ. राकेश गुप्ता, मनजीत बल्ला, विकास तिवारी कितने ही नाम है जो सहायता के लिए हर पल तत्पर थे और हैं।

दुख की बात तो यह है कि इस विषम परिस्थिति में राजनीति अपनी हरकत से बाज नहीं आ रहा है और ट्रोल आर्मी और वॉट्सअप यूनिर्वसिटी की बेशर्मी तो अब भी हिन्दू-मुस्लिम में लगी हुई है। चारो तरफ मोदी सरकार के प्रति गुस्सा और असंतोष बढ़ रहा है और उसे दबाने ट्रोल आर्मी और आईटी सेल एक बार फिर झूठ का सहारा लेकर नफरत फैलाने में लग गई। वे अब भी मानने को तैयार नहीं है कि केन्द्रीय सत्ता की लापरवाही और कोविड की गंभीरता को नजरअंदाज करने की वजह से ही हालत यहां तक आ पहुंची है।

हैरानी तो तब होती है जब देश के गृहमंत्री अमित शाह या दूसरे केन्द्रीय मंत्रियों का इस पर बयान आता है और राज्य सरकार को दोषी ठहराते हैं। जिन लोगों ने अपनी सत्ता बचाने बार-बार प्रोटोकाल की अवहेलना की हो वे प्रोटोकॉल को मुद्दा बनाने की कोशिश करते हैं। ऐसे में धर्म की राजनीति करने वालों को याद करना चाहिए कि सत्ता को प्रोटोकाल की याद तभी आती है जब संकट में अपनी भूमिका को उजागर होते देखते हैं। महाभारत को याद कीजिए कि प्रोटोकाल की याद कब-कब दिलाई गई वे लोग जिन्हें पांच गांव नहीं देने को राजी थे, भरी सभा में द्रोपदी का चीरहरण कर रहे थे, अभिमन्यु को अकेले घेर कर मार रहे थे। वे जब कर्ण पर बाण चला रहे थे तो प्रोटोकाल बता रहे थे, दुर्योधन के जंघा पर वार के समय प्रोटोकाल बता रहे थे।

हैरानी तो तब होती है कि देश के प्रधानमंत्री जैसे ही प्रधानमंत्री केयर फंड से देश के सभी जिलों में आक्सीजन प्लांट डालने की घोषणा करते हैं उसके कुछ ही घंटों बाद देश के गृहमंत्री इस कदम का स्वागत करते हुए कहते हैं कि अब आक्सीजन की कमी नहीं होगी। यानी आक्सीजन प्लांट न हुआ अलाउद्दीन का चिराग हो गया, बोलते ही प्लांट तैयार होकर आक्सीजन देने लगेगा। आक्सीजन की जरुरत आज है और अभी है ऐसे में इस प्लांट का लाभ तो बाद में ही मिलेगा लेकिन जब देश के एक्सपर्ट और संसद में सांसद आने वाले दिनों में आक्सीजन की जरूरत बता रहे थे तब सत्ता ने क्या किया? तब क्यों नहीं व्यवस्था की। आक्सीजन के निर्यात को क्यों नहीं रोका गया।

दूसरी लहर की चेतावनी को क्यों नजर अंदाज किया गया? और आज भी केयर फंड से जो आक्सीजन प्लांट बनाने की घोषणा की गई है उसका पूरा नियंत्रण केन्द्र के ही हाथ में है। यानी पिछली घोषणा की तरह क्या यह भी हवा हवाई होकर नहीं रह जायेगी। तब जनता के प्रति जिम्मेदारी की बात सत्ता न ही करे तो अच्छा है।