शुक्रवार, 9 जुलाई 2021

कुछ भी नहीं बदला न चाल चेहरा न चरित्र...

 

मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार को लेकर चल रही चर्चाओं में सत्ता का अहंकार, अपराधियों को पनाह, झूठ-नफरत और अफवाह की राजनीति और हिन्दुत्व पर जोर की बात एक बार फिर सामने निकलकर आया है। तब तीन दशक पहले अटल-आडवानी की जोड़ी के चाल चेहरा और चरित्र बदलने की आवाज किसके लिए थी? क्या ये बात संघ के लिए थी या भारतीय जनता पार्टी के लिए थी? क्योंकि जिस तरह की राजनीति वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी ने मोदी-शाह के नेतृत्व में शुरु की है उसका अंत होते फिलहाल तो नहीं दिख रहा है।

तब सवाल यह है कि क्या चाल-चेहरा और चरित्र बदलने की बात क्या केवल जनता को भ्रमित करने का वैसे ही जुमला था जैसे कालाधन और खातों में लाखों चले जाने, पेट्रो-डीजल की कीमतकम कर देने का था। मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार को लेकर चल रही बहस में भले ही हटाये गये लोगों को लेकर चर्चा ज्यादा है लेकिन चर्चा इस बात पर होनी चाहिए कि आखिर ज्योतिरादित्य सिंधिया को धूल चटाने वाले के.पी. यादव कहां है, एक दौर था जब विद्याचरण शुक्ल जैसे दिग्गज को हराने वाले रमेश बैस, मोतीलाल वोरा को हराने वाले रमन सिंह को मंत्री बनाया गया था ताकि वहां भाजपा का आधार बना रहे लेकिन लगता है मोदी सत्ता के लिए ये बातें महत्वपूर्ण नहीं है उनके लिए महत्वपूर्ण है स्वयं की ताकत का प्रदर्शन।

तब इस बात का क्या मतलब रह जाता है कि किसे हटाया गया किसे रखा गया क्योंकि पिछले सात सालों में हर क्षेत्र में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की ही चली है। ऐसे में यदि चेहरा बदलने पर चाल और चरित्र बदलने का भ्रम खड़ा किया जा रहा है तो इस भ्रम को समझना होगा। नहीं तो देश की बदहाली को नारकीय तक जाने से नहीं रोका जा सकता। तीन दशक पहले जिस तरह से पार्टी विद डिफरेंस और  चाल चेहरा चत्रि का जुमला फेंका गया था उसका परिणाम क्या हुआ। क्या ऐसा है। संघ और भाजपा का देश में विस्तार हुआ लेकिन न झूठ की राजनीति का खात्मा हुआ न नफरत या अफवाह की राजनीति का ही खात्मा हुआ। हिन्दुत्व के नाम पर अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के उदाहरण आप गिनते थक जायेंगे। 

जिस मोहन भागवत ने अपने ज्ञान चक्षु खोलकर एक डीएनए की वकालत की है क्या वे संघ में अपने ही हिन्दू समाज के दलित आदिवासी और पिछड़ों को वह स्थान देंगे जो सम्मानजनक माना जायेगा। सत्ता की भूख के लिए बने मंत्रिमंडल के आरोप को भले ही खारिज कर दिया जाए लेकिन सच तो यही है कि स्वदेशी भी जुमला हो चुका है और मंत्रियों का काम केवल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निजीकरण को अमलीजामा पहनाना है तब अमित शाह और सहकारिता की जिम्मेदारी देने का मतलब आला निशाना सहकारिता ही है।

गुरुवार, 8 जुलाई 2021

देश की बजाय चुनाव संभालने वाला मंत्रिमंडल

 

हर क्षेत्र में पिट चुकी मोदी सरकार की प्राथमिकता अब भी चुनाव है कहा जाए तो कुछ लोगों को यकीन नहीं होगा लेकिन यकीन मानिये मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार की वजह देश संभालना नहीं बल्कि जिन ग्यारह राज्यों में चुनाव हो रहे हैं वहां भारतीय जनता पार्टी को संभालना है।

मंत्रिमंडल का बहुप्रतिक्षित विस्तार को लेकर जिस तरह का खेल खेला गया, असफलता के लिए बलि का बकरा ढूंढा गया और राज्यों में होने वाले चुनाव में जीत के सपने देखे गए उसके बाद तो यही लगता है कि आने वाले दिन आम लोगों के लिए ज्यादा मुसिबत भरा होने वाला है। तब सवाल यही है कि क्या मोादी सत्ता की प्राथमिकता केवल चुनाव जीतना है, तब आम लोगों के हितों का क्या होगा?

आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन सच यही है कि विभिन्न मंत्रालयों में खाली पड़े आठ लाख पदों की वजह से सरकार का कामकाज बुरी तरह प्रभावित है लेकिन उनमें भर्ती इसलिए नहीं की जा रही है क्योंकि कर्मचारियों-अधिकारियों के वेतन की दिक्कत है। अकेले रक्षा विभाग में ढाई लाख से ज्यादा पद रिक्त होने की चर्चा है।

देश की हालत किसी से छिपी नहीं है, आर्थिक बदहाली ने महंगाई को चरम पर पहुंचा दिया है और सत्ता अपनी रईसी बरकरार रखने और आर्थिक स्थिति सुधारने के नाम पर जिस तरह से आम लोगों पर टैक्स का बोझ बढ़ा रही है वह गब्बर सिंह टैक्स से कम नहीं है। लेकिन निर्मल सीतारमण को इसके लिए नहीं हटाया गया क्योंकि वह मोदी सत्ता के लिए सुविधाजनक है। महामारी में असफलता के लिए बलि का बकरा भले ही डॉ. हर्षवर्धन को बना दिया गया है लेकिन सच तो यह है कि महामारी प्रबंधन नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट अथारिटी का चेयरमेन तो खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी है। रविशंकर प्रसाद, प्रकाश जावड़ेकर, बाबूल सुप्रियों जैसे कितने ही नाम है जिन्हें मंत्रिमंडल से हटाकर मोदी सत्ता ने न केवल अपनी ताकत दिखाई है बल्कि यह संदेश भी दिया है कि सत्ता का चेहरा बनने की कोशिश फिजूल है।

संतोष गंगवार तो शायद सिर्फ इसलिए हटाये गये क्योंकि उन्होंने अपने संसदीय क्षेत्र बरेली में स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली पर योगी सरकार की आलोचना की थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया और नारायण राणे को पुरस्कार देकर दूसरे दलों के नेताओं को आमंत्रित करने की शैली भाजपा की नई नहीं है तब सवाल यही है कि पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमत का असर मंत्री को नहीं जनता को भुगतना है। कुल मिलाकर केन्द्रीय मंत्रिमंडल  के विस्तार का ध्येय सिर्फ और सिर्फ 11 राज्यों में चुनाव जीतना है।

मंगलवार, 6 जुलाई 2021

एडीजी की ताकत के पीछे भ्रष्ट राजनीति...

 

एडीजी जीपी सिंह की कहानी को समझने से पहले सत्ता माफिया और अफसरों के गठजोड़ में पनप रहे अपराध को समझना होगा। सत्ता माफिया और अफसर के इस गठजोड़ ने छत्तीसगढ़ में नया इतिहास रचा है। और यह सब खुलासा एडीजी सिंह के यहां छापे से सामने आया है। 

सवाल यह नहीं है कि एडीजी सिंह के घर से क्या-क्या मिला क्योंकि छत्तीसगढ़ में ऐसे अफसरों की लंबी फेहरिश्त हैं जिन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए अरबों-खरबों की संपत्ति अर्जित की और जिन्हें आज भी सत्ता का संरक्षण मिला हुआ है।  एसीबी यानी एंटी करप्शन ब्यूरों के पास अभी भी उन 90 अफसरों की सूची है जिनके पास अनुपातहीन संपत्ति जब्त की गई लेकिन वे आज भी महत्वपूर्ण और मलाईदार पदों पर विराजमान है तो यह सब सत्ता के संरक्षण के बगैर संभव नहीं है। 

ऐसे में एडीजी सिंह के खिलाफ भी कोई बड़ी कार्रवाई होगी या अंजाम सजा तक पहुंच पायेगा यह कहना मुश्किल है। छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के समय जब मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के अफसरों का बंटवारा हुआ तो बहुत से भ्रष्ट अफसर छत्तीसगढ़ आ गये थे। उनमें वे अफसर भी थे जिनका मध्यप्रदेश के समय चर्चित घोटालों में नाम था उनमें से कई अफसर छत्तीसगढ़ में भी भ्रष्टाचार करते हुए मजे से नौकरी बजाते रिटायर्ड हो गए।

तीन साल की जोगी सत्ता में सत्ता, अफसर और माफिया के गठजोड़ के किस्से आज भी हवा में इसलिए तैर रहे हैं क्योंकि जिन डेढ़ दर्जन अफसरों को बर्खास्त करने, उनकी काली करतूत को  उजागर कर सजा दिलाने का दावा कर सत्ता में आई डॉ. रमन सिंह की सरकार में भी उन्हीं अफसरों का बोलबाला रहा। मुकेश गुप्ता, कल्लूरी तो पुलिस विभाग के हैं। आईएएस में आरपी मंडल से लेकर कितने ही नाम थे जो डॉ. रमन सिंह की सरकार में भी मजे से रहे।

डॉ. रमन सिंह की सरकार में एडीजी जीपी सिंह की गतिविधियों के लेकर सत्ता पर सवाल उठे लेकिन गठजोड़ ने सब ध्वस्त कर दिया, बिलासपुर के एसपी राहुल शर्मा के मर्डर केस जिसे आत्महत्या केस भी बताया जाता है उसका परिणाम कौन भूल सकता है। क्लोजर रिपोर्ट पर बवाल मचाने वाली कांग्रेस ने क्या कभी इस केस की फाईल फिर खुलवाई? नान घोटाले से लेकर कितने ही घोटाले का क्या हुआ।

भ्रष्ट अफसर नेता और माफिया का गठजोड़ क्या आज दिखाई नहीं दे रहा है कि वे सत्ता तक किस तरह पहुंच गए है। हाईकोर्ट ने 90 ऐसे  भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की रिपोर्ट भी मांगी है लेकिन क्या सरकार में हिम्मत है कि वे ऐसे भ्रष्ट अफसरों को मलाईदार पद से हटा सके। बल्कि कई अफसर तो भूपेश सरकार की गोद में बैठे है। तब एडीजी जीपी सिंह को लेकर मचा बवाल का क्या अर्थ है जबकि अभी तक उसे निलंबित तक नहीं किया गया है।

सोमवार, 5 जुलाई 2021

राफेल : छद्म राष्ट्रवाद का चेहरा...

 

बाफोर्स तोप सौदे में कमीशन जब भ्रष्टाचार है तो राफेल सौदे में कमीशन बिजनेस डील कैसे हो सकता है? क्या छद्म राष्ट्रवाद का ये जीता जागता प्रमाण नहीं है। प्रारंभ से ही राफेल सौदे में हुई गड़बड़ी को मोदी सत्ता नकारते रही है लेकिन जिस तरह फ्रांस में राफेल डील की आपराधिक जांच शुरु हुई है उसके बाद यह साफ हो गया है कि राफेल डील दो सरकार के बीच के सौदे की बाते न केवल बकवास है बल्कि कमीशनखोरी भी जमकर हुई है। 

हालांकि अभी जांच के परिणाम पर कुछ भी बोलना जल्दबाजी होगी लेकिन जिस तरह की जांच फ्रांस में शुरु हुई है वैसी जांच की कल्पना करना भारत में मुश्किल है। चौकीदार चोर है के नारे के साथ शुरु हुआ आरोप-प्रत्यारोप के इस खेल में भले ही सत्ता हावी हो, और वह विरोधियों को देशद्रोह बताता रहा हो लेकिन कालेधन का मामला हो, पनामा पेपर का मामला हो या फिर बड़े उद्योगपतियों या भगोड़े उद्योगपतियों के बैक लोन को बट्टा खाते में डालने का मामला हो मोदी सत्ता की भूमिका संदिग्ध रही है। तब राष्ट्रवाद की बात कितना उचित है अब जनता ही तय करेगी।

सत्ता को क्लीन चीट देने, राष्ट्रवादी बताने, इमानदार बताने जिस तरह से मीम फैलाई गई कि उसके तो परिवार भी नहीं है तब किसके लिये भ्रष्टाचार किया जायेगा कि पोल तो शोले फिल्म के गब्बर सिंह से ही समझा जा सकता है जिसका कोई परिवार नहीं था लेकिन तबाही लूट खसोट और आतंक का पर्याय था। तब यदि गब्बर सिंह के तर्ज पर गब्बर सिंह जब कहते है कि इन्हें (जय वीरु) लाए हो रायगढ़ की रक्षा के लिए? तो याद कीजिए ये बात सत्ता पप्पू के संबंध में कहती है और पप्पू अपने कार्य में तल्लीन है।

हम यहां रायगढ़ की रक्षा की बात नहीं कर रहे हैं वह तो फिल्म शोले था लेकिन अभी बात काले धन को लाने की बजाय दो गुना हो जाना, पड़ोसी पाकिस्तान में पनामा पेपर मामले में सजा हो जाना और भारत में जांच रिपोर्ट तक नहीं आना की बात भी हम यहां कहकर राष्ट्रवादी सरकार पर उंगली नहीं उठाना चाहते। हम तो राफेल सौदे में हुई घपलेबाजी और आपराधिक जांच में भारत के नाम, मोदी के चहेते कंपनी जैसी बात के जिक्र पर चर्चा नहीं करना चाहते।

हम तो सिर्फ यही कहते हैं कि राफेल सौदे में यदि सबकुछ ठीक है तो क्यों जांच नहीं होनी चाहिए, भारत की सरकारी कंपनी की बजाय निजी कंपनी को काम देने से लेकर कई सवाल है जिसका जवाब देश को चाहिए। तब सवाल यही है कि राष्ट्रवाद का लबादा ओढ़ कर कुछ भी कर गुजरने का दिन क्या पूरा होने वाला है, क्या रंगा सियार का सच उजागर फ्रांस करेगा या सत्ता बदलने का इंतजार किया जाए।

रविवार, 4 जुलाई 2021

बाबा को गुस्सा क्यों आता है...

 

शीर्षक देखकर बहुत से लोगों को नसरुद्दीन शाह और शबाना आजमी अभिनीत फिल्म अलबर्ट पिंटों को गुस्सा क्यों आता है कि याद ताजा हो गई होगी, लेकिन यकीन मानिये रियल लाईफ और रील लाईफ में ज्यादा अंतर नहीं होता, कुछ लोगों में नाराजगी व्यक्त करने का स्वभाव आदत में तब्दिल हो जाता है और वे ये भूल जाते है कि उनकी नाराजगी का दूरगामी असर क्या पडऩे वाला है।

हम बात कर रहे हैं प्रदेशत के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव यानी बाबा का। उनकी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से नाराजगी जग जाहिर है, नाराजगी की वजह के कई कयास है। ताजा मामला मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के उस बयान के बाद सामने आई हैं जिसमें बघेल ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधा बढ़ाने निजी अस्पतालों को मदद की जायेगी। इस योजना पर काम शुरु किया जा रहा है। वैसे देखा जाए तो इस तरह की योजना बनाना मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार भी है लेकिन राजा साहेब यानी टीएस बाबा को लगता है कि मुख्यमंत्री अनावश्यक हस्तक्षेप कर रहे हैं इसलिए जब इस योजना को लेकर पत्रकारों ने स्वास्थ्य मंत्री बाबा साहेब से सवाल पूछा तो वे सवाल सुनते ही उखड़ गए और इस पर असहमति जताते हुए यहां तक कह दिया कि निजी अस्पतालों को गरीबों को मुफ्त में ईलाज करना चाहिए तभी अनुदान देना चाहिए।

हालांकि मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने से चूक गए राजा साहेब की नाराजगी नई नहीं है, वे पहले भी अपनी नाराजगी सार्वजनिक तौर पर जाहिर कर चुके हैं, ढाई-ढाई साल वाले फार्मूले को  उनके ही समर्थकों द्वारा हवा देने का आरोप तो उन पर लगा ही है उनका इस मामले में गोल-मोल जवाब भी आशकाएं बढ़ाने वाला साबित हुआ। विभाग के बंटवारे से शुरु हुई नाराजगी की खबर हर किसी को है, कैबिनेट की कई बैठकों में बाबा के तेवर की चर्चा भी बाहर आते रही है ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल को लेकर दिये उनके बयान का क्या मतलब है यह तो वही जाने लेकिन बुरी गत बन चुकी भाजपा नेताओं के लिए यह नाराजगी मुद्दा जरूर बन गया है। 

वैसे अपने सौम्य व्यवहार और खुशमिजाज के लिए राजधानी में छवि बनाने वाले राजा साहेब के बारे में कहा जाता है कि यदि हकीकत पता करना हो तो अंबिकापुर और आसपास जरूर घुमा-देखना चाहिए। फिर अडानी के परसा कोल ब्लॉक में राजा साहेब की भूमिका तो वहां के ग्रामीण पहले ही बता चुके हैं कि परसा कोल ब्लॉक में अडानी के नियम कानून की धज्जियां पर बाबा कुछ नहीं बोलते जबकि यह क्षेत्र उनके विधानसभा में भी पड़ता है, धंधा पानी की चर्चा तो अलग ही मामला है। यानी बाबा को गुस्सा क्यों आता है कुछ-कुछ तो लोग समझने भी लगे हैं।

शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

बेटियां हत्यारिन... जिम्मेदार कौन?

 

छत्तीसगढ़ में शराब की बह रही नदियों के लिए जिम्मेदार कौन? शराब ने गांवों की शांति छिन ली है और शराब की वजह से हो रहे अपराध न केवल शर्मसार कर देने वाला है बल्कि सत्ता के लिए चुनौती भी है। अभी लोग महासमुंद में पांच बेटियों सहित सामूहिक आत्महत्या की घटना लोग भूले भी नहीं थे कि अंबागढ़ चौकी के भगवान टोला गांव में फिर एक हृदय विदरक घटना हुई। यह घटना की वजह भी शराब है। शराबी पिता की हरकतों से परेशान नाबालिग बेटियों का गुस्सा इतना बढ़ गया था कि वे तब तक अपने पिता पर टंगिया से वार करते रहे जब तक उनकी मृत्यु नहीं हो गई। मृतक सहदेव नेताम को शराब की लत थी और उसे अवैध शराब कोचियों से आसानी से शराब मिल जाता था, शाम होते ही नशे में धुत्त होकर वह घर पहुंचता और लड़ाई-झंझट करता था, घटना के दिन तो उसने टंगिया से अपनी पत्नी को ही मारना चाहा जिसे देख दोनों नाबालिग बेटियों ने टंगिया छिन कर पिता की हत्या कर दी।

छत्तीसगढ़ में इस तरह की घटनाएं अब रोज की कहानी है और शराबबंदी करने के वादे के साथ सत्ता में आई भूपेश सरकार को यह सब दिखाई सुनाई नहीं पड़ रहा है। गांव-गांव में अवैध शराब की बिक्री जिस तरह से बढ़ी है वह हैरान कर देने वाली है। यदि लोगों की बातों पर भरोसा करें तो अवैध शराब बिक्री के खेल में कई जगह के थाने तक शामिल है और अवैध शराब बिक्री की शिकायत पर भी कोई कार्रवाई नहीं की जाती। कई जगह तो अवैध शराब बेचने वालों के द्वारा थाना खरीद लेने तक की चर्चा है लेकिन सत्ता को यह सब न दिखाई दे रहा है और न ही सुनाई ही दे रहा है।

छत्तीसगढ़ में शराब बंदी की मांग तब शुरु हुई थी जब पिछली सरकार में गांव-गांव में शराब भट्टी खोले जाने लगा था। शाम होते ही ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों का गुजरना दूभर होने लगा था। प्रदेश के तत्कालीन गृहमंत्री कंवर को शराब माफियों द्वारा थाने खरीद लेने की बात कहनी पड़ी थी। तब कांग्रेस ने शराब को लेकर लोगों में व्याप्त नाराजगी को चुनावी मुद्दी बनाया और सत्ता भी हासिल की। लेकिन ढाई साल बीत जाने के बाद भी सत्ता इस तरफ से मुंह फेर कर बैठी हुई है। हालत बदतर होने लगे हैं, यही नहीं छत्तीसगढ़ के सरकारी दुकानों में बिक रही शराब की गुणवत्ता पर भी सवाल उठने लगे हैं। 

ऐसे में जिन बच्चियों ने अपने पिता को मारकर अपराधी बन गई है उसके लिए जिम्मेदार कौन है, क्या इसके लिए सत्ता जिम्मेदार नहीं है? सवाल कई है लेकिन शराब से कई परिवार बर्बाद होने लगे है और सत्ता चुप।

गुरुवार, 1 जुलाई 2021

तुम कुछ भी करो हम मंदिर बनाकर जीतेंगे...

 जब देशभर के किसान अपनी मांगों को लेकर जिले से लेकर हर राज्य की राजधानी में अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे, लोकतंत्र बचाने का नारा लगा रहे थे तब देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राम मंदिर, तीर्थ क्षेत्र और अयोध्या नगरी को सबसे अलग बनाने की योजना बना रहे थे। इसका मतलब साफ है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ये समझते हैं कि चाहे किसान नाराज हो जाये, बेरोजगार नाराज हो जाए, महंगाई चरम पर पहुंच जाए, राम मंदिर निर्माण और हिन्दू-मुस्लिम के सामने कोई भी मुद्दा या जन सरोकार मायने नहीं रखता और वे राम मंदिर के तामझाम के सहारे चुनाव जीतेंगे और इसे कोई रोक नहीं सकता।

तब सवाल यही है कि आखिर किसान आंदोलन कब तक चलेगा, हालांकि सात माह बाद भी किसानों की हिम्मत में कोई कमी नहीं है और वे जान चुके है कि केवल तीन कानूनों की वापसी के मुद्दे पर ही सरकार को नहीं झुकाया जा सकता इसलिए इस बार आंदोलन में तीनों कृषि कानून की वापसी के साथ लोकतंत्र बचाओं का भी मुद्दा जोड़ा गया और आगे जनसरोकार से जुड़े मुद्दे भी किसान आंदोलन का हिस्सा बनेगे तो अचरज नहीं है।

तब क्या मोदी सत्ता ने यह मान लिया है कि आंदोलन का प्रभाव उत्तरप्रदेश के चुनाव में इसलिए नहीं होगा क्योंकि उसने राम मंदिर का निर्माण शुरु कर दिया है और आगे कश्मीर पाकिस्तान और हिन्दू-मुस्लिम का मुद्द जब गहराने लगेगा तो किसानों के मुद्दे गायब हो जायेंगे। हालांकि उत्तरप्रदेश के पश्चिमी उत्तरप्रदेश, अवध और बुदेलखंड के किसान अब जोर-शोर से आंदोलन का हिस्सा बनने लगे है, 26 जून के आंदोलन का हिस्सा तो देश के कमोबेश हर राज्य के किसान बने भले ही कहीं ज्यादा कहीं कम संख्या रही।

पंजाब में भाजपा का वैसे भी कोई वजूद नहीं है और हरियाणा में अभी चुनाव दूर है तब वह ऐसे आंदोलन की अनदेखी भी कर रही है तो इसकी वजह है कि लोगों की याददाश्त बेहद कमजोर है इसलिए वह सत्ता की लापरवाही से कोरोना के नरसंहार, गंगा में बहती लाशे, आक्सीजन की कमी और बेरोजगारी को कैसे याद रखेगी। और जब बड़े-बड़े विद्वानों ने कहा है कि धर्म और राष्ट्रवाद का नशा के आगे कुछ भी मायने नहीं रखता तब राम मंदिर की योजना के सहारे सत्ता में वापसी की उम्मीद को कोई कैसे खत्म कर सकता है।