शनिवार, 12 अक्टूबर 2024

संघ पर नेहरू की भविष्य वाणी…

 राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ अपने सौ वी स्थापना दिवस मनाने की ओर अग्रसर है। २७ सितंबर १९२५ को स्थापित यह संगठन कैसा काम करता है, हिंदू राष्ट्र को लेकर इसकी सोच और संस्कार देने के दावे सब कुछ हम आपको किश्तों में पढ़वायेंगे, कोशिश करेंगे कि आप तक रोज़ कुछ न कुछ पठनीय सामग्री पहुँच सके….

संघ को जानने समझने की कोशिश इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि संघ के अपने दावे है जिसका एक पहलू अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाकर अपने एजेंडे को देश पर थोपना है तो दूसरा दावा सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के तराज़ू में संस्कार देना ।

शुरुआत देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की संघ को लेकर की गई भविष्यवाणी से-

आरएसएस की १००वें स्थापना दिवस पर पढ़िए पंडित नेहरू की भविष्यवाणी:

संघ पर नेहरू की भविष्य वाणी…


हमारे पास इस बात के ढेरों सबूत हैं, जिससे यह पता चलता है कि आरएसएस अपने स्वभाव से निजी सेनाओं के जैसा संगठन है, जो नीति और संगठन के मामले में साफ़ तौर पर नाज़ियों का अनुसरण कर रहा है....

मुझे जर्मनी में शुरू हुए नाज़ी आंदोलन की कुछ जानकारी है. इसने अपने ऊपरी दिखावे और सख्त अनुशासन से लोगों को आकर्षित किया. इसमें बड़ी संख्या में लोअर मिडिल क्लास के नौजवान पुरुष और महिलाएं शामिल थे. यह लोग सामान्य तौर पर बहुत ज़्यादा योग्य नहीं थे और न ही इनके लिए जीवन में बहुत सारी संभावनाएं थीं. इसलिए ये लोग नाज़ी पार्टी की ओर मुड़ गए, क्योंकि इसकी नीति और प्रोग्राम बहुत सरल थे. वह नेगेटिव थे और उनमें दिमाग़ के सक्रिय इस्तेमाल की कोई ज़रूरत नहीं थी. नाज़ी पार्टी ने जर्मनी को तबाह कर दिया और मुझे बिल्कुल संदेह नहीं है कि अगर यह प्रवृत्तियां इसी तरह भारत में बढ़ती रहीं, तो वह भी भारत को बहुत ज़्यादा नुक़सान पहुंचाएंगी. इसमें कोई संदेह नहीं है कि भारत फिर भी रहेगा, लेकिन उसे बहुत गहरा घाव लग जाएगा और इससे उबरने में लंबा वक़्त लगेगा.'

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2024

उस रावण से इस रावण तक…

 उस रावण से इस रावण तक…


इतिहास में एक निर्णय होता है, राम को राज्य नहीं वन मिलेगा राम खुशी-खुशी स्वीकार कर लेते हैं इस निर्णय को।


मां का विलाप, जन‌मानस के आंसू और चित्रकूट आते आते भाई का प्यार,  कोई भी राम के वन जाने के निर्णय में बाधा नहीं बनता है। तब कहीं जाकर अत्याचारी उस रावण का अंत होता है जो महान शिवभक्त थे, महान विद्वान ब्राम्हण भी थे ।


तब जाना था कि जीवन में उसूल कितना जरूरी है। उसूल हमें मनुष्यता की ओर ले जाते है। सिहांन्त या उसूल के बग़ैर व्यक्ति जानवर बन जाता है।


तब से हर साल रावण दहन की परम्परा चल पड़ी। और यह अब सिर्फ परम्परा बनकर रह गई। उसूल ग़ायब होते चले गए यानी मनुष्यता भी! और अब इस टेक्नालाजी के युग ने तो संवेदना भी छिनने लगी है, तब रावण दहन की परम्परा को ढोने के औचित्य पर भी सवाल उठने लगे हैं।


हर साल रावण दहन के पहले अपने भीतर के रावण को मारने की सीख के साथ सोशल मीडिया में पोस्ट चेप दिया जाता है, सिर्फ पोस्ट… ।


इन पोस्ट में न संवेदना होती है न मनुष्यता की आहट ही सुनाई देती 

है। राम-रावण के युद्ध भी उसूलों के साथ हुए। लेकिन उस युद्ध के बाद  उसूलों से किनारे करने और अपनी सुविधानुसार हर क्षेत्र में परिभाषा गढ़े जाने लगे। किसी झूठ को सौ  बार बोलकर सच का एहसास कराने जैसे छद्‌म के इस दौर में राम और रावण को अपने  स्वार्थ के लिए याद किया जाने लगा। उसूल थे तब बेईमान भी किसी का नमक नहीं खाते थे, फिर  यह भी दौर आया जब कहा जाने लगा कि ईमानदारी तो बेईमानों में ही बची है।

  अजेय रावण को राम हरा सके तो सिर्फ अपने उसूल से । और इसे धर्म या संस्कृति से जोड़ने की प्रमुख वजह उन उसूलों को रेखांकित करना था जो आदमी को मनुष्यता की और ले जाता है ।


लेकिन रावण के अत्याचार को बड़ा बताने के फेर में हमने राम के उसूलों  को इतना छोटा कर दिया कि रावण का अत्याचार  ही याद रह गया, राम के उन उसू‌लों को विस्मृत  कर दिया गया जो रावण के अंत का प्रमुख  हथियार रहा। 

प्रेम और युद्ध में सब जायज को इतना प्रचारित किया गया जो हमें मनुष्यता से दूर कर गया।

इसलिए कब रावण वध केवल परम्परा निभाने, राजनीति साधने तक सीमित हो गया। और घर-घर में रावण ने अपनी जगह बना ली।

लेकिन इससे भी एक कदम आगे बढ़कर भौतिक सुख - सुविधा के लोभियों ने युद्ध में सब जायज़  की प्रवृति को इस तरफ़ दिलो दिमाग़ पर थोप दिया कि ख़ान पान पहनावा को लेकर कुतर्क भी हमे मनुष्यता से दूर करने लगे । और यह सब राजनैतिक गिरोह बंदी कि अपनी लंका थी जो सत्ता और स्वर्ण से निर्मित करने का मोह…!

बिटिया अपने ही घरों में, परिवार में कितनी सुरक्षित है यह बताने की जरूरत नहीं है तब उस रावण के दहन से लेकर आज तक मनुष्यता की कसौटी  को अब  एआई या रोबोट के साथ मापने की कोशिश में उसूलों का समाप्त होना रावण को और विकराल बनाता है । तो राम को लाने का दावा एक नये प्रकार के रावण को जन्म देता है। 

जहां हर कोई अपने घर को सोने की लंका बनाने आमदा है। अजेय बनना चाहता है, सुख सुविधा बटोरने में उसूलों से समझौता करता है । 

तब भी रावण दहन की शुभकामनाएँ क्या दी जानी चाहिए।


गुरुवार, 10 अक्टूबर 2024

महादेव सट्टा वाले सौरभ की गिरफ़्तारी से उड़े होश…


 महादेव सट्टा एप के कर्ता धर्ता सौरभ चंद्राकर की गिरफ़्तारी की खबर ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में उथल पुथल मचा दिया है, कहा जाता है कि सौरभ के कांग्रेस और बीजेपी के बड़े नेताओ से सीधे संबंध हैं।

इस मामले में भूपेश बघेल पर जब आरोप लगे थे तो कांग्रेस ने भी पत्रकार वार्ता लेकर सौरभ के साथ संबंध को लेकर बीजेपी के दिग्गज नेताओ रमन सिंह, प्रेम प्रकाश पांडे, रमेश बैस सहित कई नेताओ की तस्वीर जारी की थी ।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक़ जूस दुकान खोलकर सौरभ चंद्राकर ने बहुत बड़े काम को अंजाम दे दिया। छोटे स्तर से लेकर बॉलीवुड और नेता, अधिकारी तक इसमें शामिल पाये गये। अब महादेव ऐप का मुख्य सरगना सौरभ चंद्राकर दुबई में गिरफ्तार कर लिया गया है। ED के अनुरोध पर जारी इंटरपोल के रेड कॉर्नर नोटिस के तहत गिरफ्तारी की कार्यवाही की गई है। प्रवर्तन निदेशालय (ED), विदेश मंत्रालय (MEA) और गृह मंत्रालय (MHA) की संयुक्त कार्रवाई में उसे पकड़ा गया है। यूएई के अधिकारियों ने भारत सरकार और CBI को सौरभ चंद्राकर की गिरफ्तारी के बारे में जानकारी दी है। सभी औपचारिकताओं को पूरा करने की प्रक्रिया पूरा करने के बाद “प्रोविजनल अरेस्ट” पर उसे भारत लाया जायेगा। जल्द ही वह भारत की जमीन पर होगा।

महादेव बेटिंग ऐप का मुख्य सरगना सौरभ चंद्राकर भिलाई शहर का रहने वाला है। उसके पिता नगर निगम में पंप ऑपरेटर थे और सौरभ एक जूस की दुकान चलाता था। वर्ष 2019 में वो दुबई गया और उसने यहां अपने एक दोस्त रवि उप्पल को भी बुलाया। इसके बाद उसने वहां महादेव ऐप लॉन्च किया और ऑनलाईन सट्टा खिलाना शुरू कर दिया। फिर धीरे-धीरे ऑनलाईन सट्टा बाजार का बड़ा नाम बन गया। वहीँ राज्य चुनाव के समय शुभम सोनी का विडियो भी वायरल हुआ, जिसने एप्प का मुखिया खुद को बताया और उसने तत्कालीन मुख्यमंत्री को पैसे पहुचाने की भी बात कही।

दरसअल, महादेव बेटिंग ऐप को कई वेबसाईट के जरिए ऑपरेट किया जाता है, यह अलग-अलग नामों से भी चलाई जाती है। इस बेटिंग ऐप में लोगों को पैसे लगाने के लिए कहा जाता है। महादेव बुक की वेबसाईट के जरिए देश में पोकर, कार्ड गेम्स, क्रिकेट, बैडमिंटन, टेनिस, फुटबॉल के मैच पर पैसे लगाए जाते हैं। हर जुए की तरह इस ऐप में भी लोग ज्यादा कमाई करने के लालच में पैसे लगाते हैं।


21 अक्टूबर, 2023 को ईडी ने इस मामले में अपनी पहली चार्जशीट दाखिल की, जिसमें सौरभ चंद्राकर और रवि उप्पल सहित 14 आरोपियों को नामजद किया गया है। जांच एजेंसी ने अपराध की 41 करोड़ रुपये की आय को अस्थायी रूप से कुर्क किया है। प्राथमिक प्रमोटरों में एक प्रमुख व्यक्ति रवि उप्पल को प्रवर्तन निदेशालय के कहने पर इंटरपोल द्वारा जारी रेड कॉर्नर नोटिस के बाद दुबई पुलिस ने गिरफ्तार किया गया है। इसके अलावा, ईडी ने विभिन्न शहरों में हवाला ऑपरेटरों से जुड़े कई परिसरों पर छापे मारे हैं, जिसके परिणामस्वरूप 417 करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क हुई है। कई बैंक खाते सीज करवाये गये है और कईयों की जानकारी निकाली गई है।


महादेव बेटिंग ऐप मामले में पिछले साल बॉलीवुड के कई सेलिब्रिटी, सिंगर्स, एक्टर और कॉमेडियन ED के राडार पर थे। इन सेलिब्रिटीज का नाम इस ऐप को को-प्रमोटर सौरभ चंद्राकर के साथ रिश्ते होने की वजह से सामने आए थे। ED के मुताबिक, सौरभ चंद्राकर की शादी में इवेंट मैनेजमेंट कंपनी को हवाला के जरिए 112 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था। वहीं, होटल की बुकिंग के लिए 42 करोड़ रुपये की रकम नगद के जरिए भुगतान किया गया था। सरकार ने इस बेटिंग ऐप पर बैन लगाने से पहले 2023 में कुल 138 ऑनलाईन बेटिंग ऐप और 94 डिजिटल लोन ऐप पर बैन भी लगाया था। वहीँ महादेव एप की कई वेबसाइटें भी ब्लॉक की गई, लेकिन फिर भी यह अब तक जारी है।

बुधवार, 9 अक्टूबर 2024

मोदी का काम - संघ का नाम

 मोदी का काम - संघ का नाम 


पिछले दो दिनों से, यानी हरियाणा चुनाव के परिणाम के बाद से ही अचानक, हरियाणा की जीत को लेकर उठते सवालों के बीच यह खबर बड़े मीडिया घरानों की तरफ से उछाली जा रही है कि हरियाणा में संघ ने बाजी पलट दी।


कल तक हर जीत का श्रेय मोदी को देने वाली मीडिया का इस सूर के मायने क्या है । जबकि संघ प्रमुख मोहन भागवत बग़ावती सूर में थे।

कल तक यानी चुनाव परिणाम के एक दिन पहले तक संघ प्रमुख मोहन भागवत की नाराजगी की खबरें अचानक गायब कर मोदी के समर्थन में स्वयं सेवकों को हरियाणा में कूदा देने का मतलब जानने  की कोशिश होगी ही चाहिए ?


संघ को श्रेय देने  की वजह के बाद जो सवाल उठ रहे है उनमें से 

पहला सवाल - क्या संघ को श्रेय देकर ईवीएम की कथित गड़बड़ी के मुद्दों से ध्यान भटकाने की कोशिश की जा रही है ताकि मोदी सत्ता पर ईवीएम को लेकर लगने वाले आरोप को कमतर किया जा सके। 

दूसरा सवाल - हरियाणा की जीत से ताकतवर बने मोदी को भाजपा अध्यक्ष बनाने में मनमानी से रोका जा सके ?

ये दोनों सवाल का जवाब आप सोचें और तय करें कि आख़िर  हर चुनाव के पहले नाराजगी का शिगुफा और जीत पर पीठ थपथपाने  के खेल के बीच ईवीएम में गड़‌बड़ी की शिकायतों का इस खबर से कितना संबंध है कि संघ के सोलह हज़ार स्वयंसेवकों ने बाजी पलट दी।

हम शीघ्र ही आपको इस सवाल का जवाब देंगे…

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2024

हरियाणा और साँई बाबा

 पता नहीं बेटा - 2



बेटा - पिताजी, हरियाणा में मोदी ने फिर जादू चला दिया..


पिताजी- हाँ बेटा, 12 फीसदी वोट बढ़ने के बाद भी कांग्रेस सत्ता से दूर रह गई।


बेटा - फिर गाँव-गांव से कपड़े फाड़ने, भाजपाईयों को भगाने की खबर क्या थी, पिताजी?


पिताजी - पता नहीं बेटा ?

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बेटा. साई बाबा को मंदिरों से हटा रहे है…


पिताजी- हाँ बेटा हिन्दुवादियों को यह पसंद नहीं आ रहा।


बेटा- तो फिर क्या अब ये हिन्दूवादी बतायेंगे कि किसकी पूजा करना है


पिताजी - पता नहीं बेटा?

रविवार, 6 अक्टूबर 2024

पता नहीं बेटा ! -१

पता नहीं बेटा !


बेटा - क्या इस बार संघ प्रमुख मोहन भागवत भाजपा मैं अपना आदमी बिठाकर ही रहेंगे ।

पिताजी - हाँ बेटा चर्चा तो यही है 

बेटा- पिताजी, आख़िर भागवत को मोदी से इतनी नाराज़गी क्यों है, जबकि मोदी ने संघ को भरपूर खाद-पानी दिया, संघ का का जगह जगह कार्यालय भी बनवाया।

पिताजी- पता नहीं बेटा ।

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बेटा - बलात्कारी राम रहीम ने भाजपा को जीताने की अपील की है।


पिताजी - हाँ बेटा, इसे लेकर भाजपा की थू-थू  भी हो रही है।


बेटा - पिताजी, आख़िरकार भाजपा को बलात्कारियों से इतना प्रेम क्यों है


पिताजी - पता नहीं बेटा।

शनिवार, 5 अक्टूबर 2024


 

सत्ता से समृद्धि...


कभी राजनीति समाज सेवा का सबसे सशक्त माध्यम हुआ करता था । सादा जीवन उच्च विचार के मूलमंत्र से अभिभूत राजनीति में आने वाले की सेवा भाव देखते ही बनती थी । कांग्रेस हो या भाजपा, समाजवादी हो या कम्यूनिष्ट सबके लिए समाज सेवा प्रथम लक्ष्य रहा । ऐसे कितने ही उदाहरण रहे जब इस देश में नेताओं ने राजनैतिक सुचिता के लिए सत्ता की कुरसी को लात मारने से भी परहेज नहीं किया । खुद छत्तीसगढ़ में बैठी रमन सरकार की पार्टी में ही अटल-आडवानी से लेकर कई नाम लोगों को जुबानी याद हैं जिन्होंने राजनैतिक सुचिता के लिए अपना सब कुछ होम कर दिया । लेकिन क्या अब इसी पार्टी में ऐसा हो रहा है । भाजपा ही क्यों किसी भी पार्टी में ऐसा नहीं हो रहा है । अपराधियों को संरक्षण से लेकर खुद भ्रष्टाचार में डुबे लोग सत्ता का केन्द्र बने हुए है और ऐसे लोग बड़ी बेशर्मी से राजनैतिक सुचिता, ईमानदारी की बात करते नहीं थकते । 
सत्ता के साथ बुराई के घालमेल को स्वाभाविकता की चासनी में पिरोने में भी किसी को शर्म नहीं आती और न ही अपने लिए समृद्धि का टापू बनाने से ही इन्हें कोई दिक्कत होती है । तभी तो छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में शिक्षा-स्वास्थ के अभाव को नजर अंदाज कर नई राजधानी के नाम पर समृद्धि का टापू खड़ा कर दिया जाता है । इस टापू के एक-एक रास्ते के लिए रोशनी का ऐसा इंतजाम किया जाता है ताकि बिजली विहिन गांव की तरफ कभी ध्यान ही न जाए । 
मंत्रियों व अधिकारियों के बैठने के कमरों की भव्यता इतनी बढ़ा दी जाती है कि एक आम आदमी इस चकाचौंध में अपनी पीड़ा व्यस्त करने की हिमामत न कर सके । 
इस भव्यता पर गांधी के विचार पर चलने वाले कांग्रेसियों को भी इसलिए फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वे भी कतार में है । 
ऐसे में राजनीति समाज सेवा का माध्यम की बजाय कार्पोरेट सेक्टरों की भव्यता की तरह व्यवसाय का जरिया बन गया हो तो भला किस पार्टी को आपत्ति होगी ? क्योंकि दूकानें तो किसी न किसी की चलनी ही है और जनता ही ठगी जायेगी । इस राजधानी ने ऐसे बहुत से लोगों को राजनीति में आते ही करोड़ पति अरबपति बनते देखा है जिनकी औकात दो कौड़ी की भी नहीं रही । जिनके घर दो टाईम का चूल्हा बमुश्किल से जलता था वे आज इस शहर के दान दाता बने है । जिनके खुद के मकान नहीं थे वे सैकड़ो एकड़ के मालिक है और जिनकी औकात एक पाव पीने की नहीं थी ओर आधा पाव का पैसा मिलाने शाम से ही टकटकी लगाए बैठे होते थे वे आज सबसे महंगी शराब ही नही पिलाते बल्कि अपने बेटे की शादी भी इतनी भव्यता से करते है कि सब देखते रह जाए । 
सत्ता से आई इस समृद्धि का यह सफर राजनीति को किस मुकाम तक ले जायेगा यह तो पता नहीं लेकिन एक बात तय है कि जनता की हाय लेकर की गई कमाई का एक बड़ा हिस्सा या तो बिगडै़ल औलाद उड़ा देते हें या फिर डाक्टर ले जाते हैं । 
जियो और जीने दो की संस्कृति से ओत प्रोत छत्तीसगढ़ में राज्य बनते ही जो परिवर्तन आया है उसकी कल्पना किसी ने नहीं की रही होगी । सत्ता से आ रही समृद्धि ने संवेदनहीनता को तो बढ़ाया ही हैे नैतिकता और राजनैतिक सुचिता पर भी चोंट की हैे । 
बेलगाम नौकर शाह और बढ़ते भ्रष्टाचार ने इस नये नवेले राज्य के विकास में रोड़ा अटका रहे हैं तो इसकी वजह जनप्रतिनिधियों की तामसी प्रवृति है जो वातानुकूलित कक्ष से ऐसे बुनियाद रखना चाहती है जिसका रास्ता विकास नहीं विनाश की ओर जाता है । क्या भाजयुमों के युवा सम्मेलन में समृद्धि का तामझाम सत्ता के रास्ते से नहीं आया है । और सत्ता की समृद्धि से विकास की सोच नहीं खुद की एय्याशी का बंदोबस्त ही होता है...