मंगलवार, 15 जुलाई 2025

स्त्रियों पर रूह कंपा देने वाली कविता

 स्त्रियों पर रूह कंपा देने वाली कविता  


एक बेहद  शर्मनाक सच...

ईरान की मशहूर शायरा शाहरूख हैदर की कविता ने स्त्रियों का वह सच सामने लाया जो शर्मनाक है।


मैं एक शादीशुदा औरत हूँ!

मैं एक औरत हूँ ईरानी औरत

रात के आठ बजे हैं

यहां ख़्याबान सहरूरदी शिमाली पर

बाहर जा रही हूँ रोटियां खरीदने को

न मैं सजी धजी हूँ न मेरे कपड़े खूबसूरत हैं

मगर यहां सरेआम

ये सातवीं गाड़ी है...

मेरे पीछे पड़ी है

कहते हैं शौहर है या नहीं

मेरे साथ घूमने चलो

जो भी चाहोगी तुझे ले दूँगा।


यहाँ तंदूरची है...

वक़्त साढ़े आठ हुआ है

आटा गूँथ रहा है मगर पता नहीं क्यों

मुझे देखकर आँखे मार रहा है

नान देते हुए अपना हाथ मेरे हाथ से मिस कर रहा है!!


ये तेहरान है...

सड़क पार की तो गाड़ी सवार मेरी तरफ आया

गाड़ी सवार कीमत पूछ रहा है, रात के कितने?

मैं नहीं जानती थी रातों की कीमत क्या है!!


ये ईरान है...

मेरी हथेलियाँ नम हैं

लगता है बोल नहीं पाऊँगी

अभी मेरी शर्मिंदगी और रंज का पसीना

खुश्क नहीं हुआ था कि घर पहुँच गई।

इंजीनियर को देखा...

एक शरीफ मर्द जो दूसरी मंजिल पर 

बीवी और बेटी के साथ रहता है

सलाम...

बेग़म ठीक हैं आप ?

आपकी प्यारी बेटी ठीक है ?

वस्सलाम...

तुम ठीक हो? खुश हो?

नजर नहीं आती हो?

सच तो ये है आज रात मेरे घर कोई नहीं

अगर मुमकिन है तो आ जाओ

नीलोफर का कम्प्यूटर ठीक कर दो

बहुत गड़बड़ करता है

ये मेरा मोबाइल है

आराम से चाहे जितनी बात करना

मैं दिल मसोसते हुए कहती हूँ

बहुत अच्छा अगर वक़्त मिला तो जरूर!!


ये सर ज़मीने इस्लाम है

ये औलिया और सूफियों की सरजमीन है

यहां इस्लामी कानून राएज हैं

मगर यहां जिन्सी मरीज़ों ने

मादा ए मन्विया (वीर्य) बिखेर रखा है।

न दीन न मज़हब न क़ानून

और न तुम्हारा नाम हिफाज़त कर सकता है।


ये है इस्लामी लोकतंत्र...

और मैं एक औरत हूँ

मेरा शौहर चाहे तो चार शादी करे

और चालीस औरतों से मुताअ

मेरे बाल मुझे जहन्नुम में ले जाएंगे

और मर्दों के बदन का इत्र

उन्हें जन्नत में ले जाएगा

मुझे कोई अदालत मयस्सर नहीं

अगर मेरा मर्द तलाक़ दे तो इज्ज़तदार कहलाए

अगर मैं तलाक़ माँगू तो कहें

हद से गुजर गई शर्म खो बैठी

मेरी बेटी को शादी के लिए

मेरी इजाज़त दरकार नहीं

मगर बाप की इजाज़त लाज़िमी है।


मैं दो काम करती हूँ

वह काम से आता है आराम करता है

मैं काम से आकर फिर काम करती हूँ

और उसे सुकून फराहम करना मेरा ही काम है।


मैं एक औरत हूँ...

मर्द को हक़ है कि मुझे देखें

मगर गलती से अगर मर्द पर मेरी निगाह पड़ जाए

तो मैं आवारा और बदचलन कहलाऊँ।


मैं एक औरत हूँ...

अपने तमाम पाबंदी के बाद भी औरत हूँ

क्या मेरी पैदाइश में कोई गलती थी ?

या वह जगह गलत था जहाँ मैं बड़ी हुई?

मेरा जिस्म मेरा वजूद

एक आला लिबास वाले मर्द की सोच

और अरबी ज़बान के चंद झांसे के नाम बिका हुआ है।


अपनी किताब बदल डालूँ या

यहां के मर्दों की सोच

या कमरे के कोने में क़ैद रहूँ?

मैं नहीं जानती...

मैं नहीं जानती कि क्या मैं दुनिया में

बुरे  मुकाम पर पैदा हुई हूँ?

या बुरे मौके पर पैदा हुई हूँ?

....Cpd

सोमवार, 14 जुलाई 2025

भारत रत्न के कामराज

भारत रत्न के कामराज  



कामराज का जन्म 15 जुलाई 1903 को तमिलनाडु के विरूधुनगरमें हुआ था। उनका मूल नाम कामाक्षी कुमारस्वामी नादेर था लेकिन बाद में वह के कामराज के नाम से ही जाने गये। स्वतंत्रता के बाद कामराज 1952 के संसदीय चुनावों में श्रीविल्लीपुतुर संसदीय सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में लोकसभा के सदस्य चुने गए।

12 अप्रैल 1954 को चक्रवर्ती राजगोपालाचारी जी के मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद कामराज ने मुख्यमंत्री पद की कमान संभाली। (13 अप्रैल 1954 से 2 अक्टूबर 1963 तक) उन्होंने मद्रास राज्य के मुख्यमंत्री के रूप कार्य किया। सीएम बनने के बाद उन्हें संसद की सदस्यता से इस्तीफा देने पड़ा।

1964 में नेहरू की मृत्यु के समय, कामराज भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष थे। नेहरू की मृत्यु के बाद अशांत समय में पार्टी को सफलतापूर्वक संचालित किया।  कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में, उन्होंने खुद अगला प्रधान मंत्री बनने से इनकार कर दिया और दो प्रधानमंत्रियों, 1964 में लाल बहादुर शास्त्री और 1966 में नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी को सत्ता में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस भूमिका के लिए, उन्हें 1960 के दशक के दौरान "किंगमेकर" के रूप में व्यापक रूप से सराहा गया। 

(1964 से 67) तक उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में नेतृत्व किया। 1969 में उन्होंने नागरकोइल संसदीय सीट से कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में उपचुनाव लड़ा, और संसद पहुंचने में कामयाब रहे।

1969 के अंत में कुछ कांग्रेसी नेताओं की इंदिरा गांधी से मतभेद हो गए। मोरारजी देसाईकुमारस्वामी कामराजएस निजलिगंप्पातथा अन्य नेताओं ने कांग्रेस को अलविदा कह दिया। असंतुष्ट धड़े ने कामराज के नेतृत्व में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (संगठन) के नाम से राजनीतिक दल का गठन किया।

1971 के संसदीय चुनावों में उन्होंने नागरकोइल संसदीय सीट से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (संगठन) के उम्मीदवार के रूप में लोकसभा पहुंचे।

1971 के चुनावों में विपक्षी दलों द्वारा धोखाधड़ी के आरोपों के बीच पार्टी का प्रदर्शन खराब रहा। वह 2 अक्टूबर 1975 में अपनी मृत्यु तक कांग्रेस (ओ) के नेता बने रहे।

उन्हे वर्ष 1976 में भारत रत्न से सम्मनित किया गया, तथा उनकी स्मृति में भारत सरकार द्वारा डाक टिकट जारी किया गया।

महत्वपूर्ण योगदान

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कामराज ने साठ के दशक की शुरुआत में महसूस किया कि कांग्रेस की पकड़ कमजोर होती जा रही है। उन्होंने सुझाया कि पार्टी के बड़े नेता सरकार में अपने पदों से इस्तीफा दे दें और अपनी ऊर्जा कांग्रेस में नई जान फूंकने के लिए लगाएं। उनकी इस योजना के तहत उन्होंने खुद भी इस्तीफा दिया और लाल बहादुर शास्त्रीजगजीवन राममोरारजी देसाई तथा एस. के. पाटिल जैसे नेताओं ने भी सरकारी पद त्याग दिए। यही योजना कामराज प्लान के नाम से विख्यात हुई। कहा जाता है कि कामराज प्लान की बदौलत वह केंद्र की राजनीति में इतने मजबूत हो गए कि नेहरू के निधन के बाद लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्रीबनवाने में उनकी भूमिका किंगमेकर की रही। 

उस योजना के अंतर्गत करीब आधे दर्जन केंद्रीय मंत्री और करीब इतने ही मुख्यमंत्रियों ने इस्तीफा दिया था। उस योजना का उद्देश्य था, बतौर पार्टी कांग्रेस को मजबूत करना। पर वास्तव में उसने नेहरू को अपनी नई टीम बनाने के लिए स्वतंत्र कर दिया था, जिसकी छवि 1962 के चीनी युद्ध के कारण धूमिल हुई थी।

दक्षिण भारत की राजनीति में कामराज एक ऐसे नेता भी रहे जिन्हें शिक्षा जैसे क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए जाना जाता है। आजादी मिलने के बाद 13 अप्रैल 1954 को कामराज ने अनिच्छा में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पद स्वीकार किया लेकिन प्रदेश को एक ऐसा नेता मिल गया जो उनके लिए कई क्रांतिकारी कदम उठाने वाला था। उन्होंने प्रदेश की साक्षरता दर, जो कभी सात फीसद हुआ करती थी, को बढ़ाकर 37 फीसद तक पहुंचा दिया।

कामराज ने आजादी के बाद तमिलनाडु में जन्मी पीढ़ी के लिए बुनियादी संरचना पुख्ता की थी। कामराज ने शिक्षा क्षेत्र के लिए कई अहम फैसले किए। मसलन उन्होंने यह व्यवस्था की कि कोई भी गांव बिना प्राथमिक स्कूल के न रहे। उन्होंने निरक्षरता हटाने का प्रण किया और कक्षा 11वीं तक निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा लागू कर दी। वह स्कूलों में गरीब बच्चों को मध्याह्न भोजन देने की योजना लेकर आए। उन्हीं के कार्यकाल के बाद से तमिलनाडु में बच्चे तमिल में शिक्षा हासिल कर सके। 

रविवार, 13 जुलाई 2025

इसलिए मिला उज्जवल निगम को राज्यसभा का ईनाम…

 इसलिए मिला उज्जवल निगम को राज्यसभा का ईनाम…

वह झूठ जिसने निगम को हीरो बना दिया, अंधभक्ति की दास्तान 


सार्वजनिक रूप से झूठ बोलना आसान काम नहीं है इसके लिए बेशर्मी चाहिए या संघ का संस्कार। राष्ट्रपति ने जिन चार लोगो को राज्यसभा के लिये मनोनीत किया है उनमे से एक नाम उज्जवल निगम भी है, आज हम बतायेंगे उज्जवल निगम कौन है और उन्होंने राज्यसभा तक सफ़र कैसे किया…

वहीं उज्ज्वल निकम जिसे बीजेपी ने  2024 के लोकसभा चुनाव मे मुंबई नाॅर्थ सेंट्रल से उम्मीदवार बनाया था, जिसमें वे कांग्रेस की वर्षा गायकवाड़ से हार गए थे। तब श्री निकम संसद नहीं पहुंच पाए तो अब भाजपा ने उन्हें दूसरा रास्ता बना लिया। इसका फ़ायदा भाजपा को महाराष्ट्र और ख़ासतौर पर मुंबई में अपनी पकड़ और मजबूत बनाने में मिलेगा। उज्ज्वल निकम ने इस मनोनयन के बाद बताया कि आधिकारिक सूचना आने से एक दिन पहले ही नरेन्द्र मोदी ने उन्हें फोन कर इसकी जानकारी दी थी और इस बातचीत में मराठी में ही पूछा था कि हिन्दी में बात करूं या मराठी में। यह कोई सामान्य सवाल नहीं है, बल्कि इसके गहरे अर्थ भाषा विवाद में देखे जा सकते हैं। प्राथमिक शिक्षा में हिंदी को तीसरी भाषा के रूप में अनिवार्य करने का फ़ैसला फड़नवीस सरकार ने लिया था, लेकिन उद्धव ठाकरे की शिवसेना और राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने इस फैसले का भारी विरोध किया। नतीजा यह हुआ कि फड़नवीस सरकार को फ़ैसला वापस लेना पड़ा। इसे भाजपा की एक बड़ी हार के तौर पर देखा जा रहा है अब शायद नरेन्द्र मोदी हिंदी बोलूं या मराठी, यह सवाल खड़ा करके इस हार की खीझ मिटा रहे हैं।

मोदी के इस तंज भरे सवाल का सीधा जवाब यह है कि ठाकरे  गुट की शिवसेना के आगे भाजपा की घबराहट बरकरार है।

उज्ज्वल निकम का मनोनयन ऐसा ही एक उपाय दिख रहा है। श्री निकम 1991 का कल्याण बम धमाका, 1993 का मुंबई सीरियल ब्लास्ट, 2003 का गेटवे ऑफ इंडिया बम धमाका, 26/11 मुंबई आतंकी हमला, प्रिया दत्त अपहरण कांड और नरेंद्र दाभोलकर हत्याकांड जैसे कई हाई-प्रोफाइल मामलों में अभियोजन का नेतृत्व कर चुके हैं। लेकिन वे सबसे ज्यादा चर्चा में तब आये, जब उन्होंने कहा था कि मुंबई हमलों के दोषी अजमल कसाब को जेल में बिरयानी खिलाई जा रही है। गौरतलब है कि इस हमले में शामिल सारे आतंकवादी मारे गए थे, लेकिन अजमल कसाब को मुंबई पुलिस में बतौर सहायक इंस्पेक्टर तैनात रहे तुकाराम ओंबले ने जिंदा पकड़ा, हालांकि इसमें खुद उनकी जान चली गई, क्योंकि कसाब अपनी एके 47 से अंधाधुंध गोलियां बरसा रहा था, जबकि श्री ओंबले के पास केवल एक लाठी थी, जिससे उन्होंने कसाब को रोके रखा, खुद गोलियां खाईं, लेकिन उसे पकड़ लिया। शहीद तुकाराम ओंबले को मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया है। उनकी बहादुरी और सर्वोच्च त्याग से भारत पर हुए बड़े आतंकी हमले के दोषी को पकड़ा जा सका, जिससे इस हमले के कई भेद सामने आये।

कसाब को पूरी न्यायिक प्रक्रिया के बाद 21 नवंबर 2012 को फांसी दे दी गई। लेकिन इन चार सालों में जब तक कसाब जेल में रहा, यूपीए सरकार के ख़िलाफ़ इस बात को लेकर नाराज़गी बनी कि उसने एक आतंकी को जेल में बिरयानी खिलाई है। जबकि इस झूठ के बारे में 2015 में खुद उज्ज्वल निकम ने खुलासा किया है। जयपुर में आतंकवाद विरोधी अंतररराष्ट्रीय सम्मेलन में हिस्सा लेने आये श्री निकम ने कहा था कि , ‘कसाब ने कभी भी बिरयानी की मांग नहीं की थी और न ही सरकार ने उसे बिरयानी परोसी थी। मुकदमे के दौरान कसाब के पक्ष में बन रहे भावनात्मक माहौल को रोकने के लिए मैंने इसे गढ़ा था।’ श्री निकम के मुताबिक कसाब को आतंकवादी मानने पर कुछ लोग सवाल उठा रहे थे, उसके लिए मीडिया में सहानुभूति बन रही थी। श्री निकम ने कहा कि जब उन्होंने मीडिया से यह सब कहा तो एक बार वहां फिर पैनल चर्चाएं शुरू हो गईं और मीडिया दिखाने लगा कि एक खूंखार आतंकवादी जेल में मटन बिरयानी की मांग कर रहा है, जबकि न उसने बिरयानी मांगी, न सरकार ने उसे बिरयानी खिलाई थी।

उज्ज्वल निकम ने तो बड़ी आसानी से झूठ बोलकर उसका खुलासा भी कर दिया, लेकिन इसके कारण कांग्रेस सरकार और खासकर सोनिया गांधी पर कीचड़ उछालने का मौका भाजपा को मिला और यूपीए सरकार को सत्ता से हटाने में मदद मिली। सियासी स्तर पर तो यह घिनौना खेल भाजपा ने खेला ही, खुद उज्ज्वल निकम ने एक खूंखार आतंकी के लिए ऐसा झूठ बोलकर देश की आतंकविरोधी नीति के साथ खिलवाड़ किया और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को दागदार किया। भाजपा 2014 में सत्ता में आई और 2016 में ही उज्जवल निकम को पद्मश्री से सम्मानित किया गया था, फिर 2024 में चुनाव का टिकट मिला और अब सीधे राज्यसभा का मनोनयन। भाजपा में झूठ बोलने वालों को सम्मानित किया जाता है, यह बात खुद नरेन्द्र मोदी ने इस बार साबित की है।(साभार)


शनिवार, 12 जुलाई 2025

क्या ट्रंप के इशारे पर आया विमान हादसे की यह रिपोर्ट…

 क्या ट्रंप के इशारे पर आया

विमान हादसे की यह रिपोर्ट…


अहमदाबाद में जिस बोईंग ने चार सौ से अधिक लोगों की जान ले ली, उसकी प्रारंभिक रिपोर्ट में बोईंग कंपनी को बचाने का पूरा इंतज़ाम कर लिया गया है, रिपोर्ट में पायलट की भूमिका को लेकर कही गई बात  भारतीयों को बेवक़ूफ़ समझने की कोशिश है, और यह बात तो अंधभक्त भी नहीं पचा सकते कि इतने अनुभवी पायलट फ़्यूल स्विच बंद रखे या बंद कर दें तो क्या यह रिपोर्ट संकेत नहीं दे रहा कि ट्रंप के आगे सत्ता किस कदर नतमस्तक है…

मुझे नहीं मालुम आप लोग इस बात पर क्या प्रतिक्रिया देंगे लेकिन यह सिद्ध हो गया है कि हमारा नेतृत्व एक भीगी बिल्ली कर रही है और ट्रंप हमारे पालन हार बन चुके है।  अहमदाबाद में हुए एयर इंडिया ड्रीमलाइनर के हादसे की एक रिपोर्ट आज लीक हुई है। वैश्विक मीडिया के समझदार एक्सपर्ट बता रहे है कि किसी नतीजे पर पहुँचने में एक साल का समय लगेगा लेकिन भारत ने जो पंद्रह पेज की रिपोर्ट बनाई है उसे वाल स्ट्रीट जर्नल ने लीक कर दिया। 

 रिपोर्ट ने इनडायरेक्ट इशारा किया है कि फ्यूल स्विच पायलट ने ऑफ किया था जिसकी वजह से इंजन को ईंधन नहीं मिला और ड्रीमलाइनर ऊपर नहीं उठ पाया। इस बात  को मोदी के अंधभक्त भी गले नहीं उतारेंगे कि दोनों पायलट इस उड़ान से पहले नौ हजार घंटों की उड़ान का अनुभव रखते हुए काम कर रहे थे। इतने अनुभवी पायलट भला इस तरह की बेवकूफी कैसे कर सकते है ? 

अब आइये इस लेख की शुरूआती लाइन पर।  ड्रीमलाइनर बोईंग का प्रोडक्ट है।  बोईंग आज दस लाख करोड़ की कंपनी है।  जब आप यह पढ़ रहे है तब बोईंग के कम से कम तीन हजार प्लेन कही से उड़ान भर रहे हैं , कहीं उतर रहे है , कहीं हवा में होंगे।  अगर इस रिपोर्ट में एक लाइन भी बोईंग के खिलाफ होती तो बोईंग का स्टॉक मार्किट ओपन होते ही दस परसेंट का गोता लगाता नजर आता। 


सनद रहे। अमेरिका इस समय एक सनकी के हाथ में है , और यह सनकी अपने देश को लेकर अपने वाले से ज्यादा पसेसिव है। उसके देश की किसी कंपनी की गुडविल खराब हो वह बर्दाश्त नहीं करेगा ! बस अपनी भीगी बिल्ली ने उस लकड़बग्घे को खुश करने के लिए सारा दोष अपने निर्दोष पायलटों पर डाल  दिया। शहीद अपनी सफाई देने नहीं आने वाले। पन्दरह दिन बाद किसी को याद भी नहीं रहेगा कि अहमदाबाद ने ऐतिहासिक विध्वंस देखा है।(साभार)

शुक्रवार, 11 जुलाई 2025

थरूर का आपात काल पर लेख और सच्चाई

 थरूर का आपात काल पर लेख और सच्चाई…


कांग्रेस नेता शशि थरूर ने आपात काल पर लेख लिखकर जो तमाशा खड़ा किया है उसकी सच्चाई क्या है। वे कांग्रेस से ख़फ़ा है या बीजेपी से कुछ मिल पाने की उम्मीद कर रहे हैं ये तो वही बता पायेंगे लेकिन आपात काल के जिस दौर का उन्होंने ज़िक्र किया उसकी हक़ीक़त…

आज जनसंख्या दिवस पर जानिये The chief glamour girl of the  Emergency रुखसाना सुल्तान को....

   मेरा मानना है कि जनसंख्या नियंत्रण को इतनी गम्भीरता से किसी और ने नही लिया होगा  देश में ......😊


  संजय गांधी से इनकी मुलाकात इनकी ज्वेलरी शॉप पर हुई थी , कुछ देर की बातचीत के बाद ही संजय इनसे बहुत प्रभावित हुए थे।ये मशहूर लेखक खुशवंत सिंह के भतीजे शिविंदर सिंह की तलाकशुदा पत्नी थीं, जो आर्मी ऑफिसर थे।

   रुखसाना सुल्तान की मौसी बेगम पारा बॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री थीं और उनकी शादी दिलीप कुमार के भाई नासिर खान से हुई थी। इस तरह दिलीप कुमार भी रूखसाना के मौसा थे।

  रुखसाना की बेटी मशहूर अभिनेत्री अमृता सिंह हैं जो सारा अली खान की मां भी हैं।

  निकाह फिल्म के लिए बी आर चोपड़ा कोई नया चेहरा लेना चाह रहे थे तब उनकी मुलाकात रुखसाना से हुई और उन्होंने अमृता सिंह को देखा , पर निकाह के लिये सलमा आगा को लिया गया , जो रुखसाना को बहुत खराब लगा  उन्हें पता लगा कि  बेताब के लिए धर्मेंद्र भी सन्नी के लिए कोई नई फीमेल एक्ट्रैस तलाश रहे थे , वे धर्मेंद्र से मिलीं और अमृता सिंह को इस फिल्म से लांच किया गया।


  शायद ये आपातकाल के दिनों की ही बात है जबकि संजय गांधी ,परिवार नियोजन ,अतिक्रमण जैसे कार्यक्रमों को हर हाल में पूरा कर लेना चाहते थे। रुखसाना काफी तेजतर्रार महिला थीं इसलिए संजय को जम गईं कि वो बहुत कुछ कर सकतीं हैं।

  संजय ने उन्हें नसबंदी के लिए लोगों को बिशेषकर मुस्लिमों को राजी करने का काम सौंप दिया।

  संजय गांधी जानते थे कि देश की सबसे बड़ी समस्या आबादी है और अगर इमरजेंसी के दौरान थोड़ा प्रभाव दिखाकर लोगों को नसबंदी के लिये समझा दिया गया तो देश की आबादी कंट्रोल हो सकती है ,इसकी शुरुआत वो दिल्ली से कराना चाहते थे । उन्ही दिनों रुखसाना से मुलाकात होने पर जब रुखसाना ने उनसे कहा कि मैं पार्टी के लिए क्या कर सकती हूं ? तो संजय ने अपनी दुविधा उनसे शेयर कर दी।


  कहा जाता है उन्होंने टारगेट इतना सीरियसली लिया कि लोगों में उनका खौफ फैल गया।

 उस समय संजय की मित्र मंडली में जगदीश टाइटलर ,सज्जन कुमार ,कमलनाथ और रुखसाना थे।

  वे शिफॉन की साड़ी और बड़ा सा goggles अक्सर पहनती थीं लोग उन्हें खूब पहचानने लगे थे। वे जिस इलाके में जातीं वहां हड़कंप मच जाता था। कहा जाता है कि एक बार पत्रकार तवलीन सिंह उनके लुक में पुरानी दिल्ली के किसी एरिया में किसी स्टोरी को कवर करने गईं तो लोगों ने उन्हें रुखसाना समझ कर दौड़ा लिया था।

  फिलहाल रुखसाना ने अपने काम को येन केन प्रकारेण पूरा किया । सरकारी कर्मचारियों को यहां तक कहा गया कि उन्होंने अगर नसबंदी न कराई तो उनका वेतन रोक दिया जायेगा ।

   अंततः एक साल में 8000  के टारगेट को उन्होंने 13000 के लगभग लोगों की नसबंदी कराकर पूरा किया।

  उसके बाद अतिक्रमण हटाओ अभियान के तहत संजय गांधी ने उन्हें तुर्कमान गेट की झुग्गी बस्तियों को हटाने का काम सौंप दिया और वो बुलडोजर लेकर वहां पहुंच गईं । वहां उस समय मारकाट शुरू हो गई लगभग 6 लोग मारे गये। पुरानी दिल्ली इलाके में रुखसाना सुल्तान के नाम का खौफ छा गया था।

 इन सब घटनाओं से संजय गांधी और इंदिरा जी की इमेज खराब हो गई ,और 1977 का चुनाव कांग्रेस हार गई।

  उन दिनों यूथ कांग्रेस की अध्यक्ष अंबिका सोनी थीं और वो रुखसाना के छा जाने से बहुत परेशान थीं ,इंदिरा जी तक हर बात पंहुचती थी इंदिरा जी और मेनका भी उन्हे नापसंद करती थीं। पर संजय के आगे कोई कुछ नही बोलता था। संजय गांधी का काम कराने का तरीका थोड़ा सख्त था या वे अनुभवी नही थे । जोश में काम करते थे और ऐसे ही लोगों को अपने आसपास रखते थे।

  उन दिनों रुखसाना की लाइफ स्टाइल भी बेहद चर्चित रहती थी। 

  वे "कैमे "  का साबुन  इस्तेमाल करतीं थी जो विदेशों से आता था ,भारत में स्मगलिंग के जरिये ही आता था। एक बार हाजी मस्तान उनसे मिलने गये तो उनकी गाड़ी की पिछली सीट पर बस वही साबुन भरा हुआ था (साभार)

गुरुवार, 10 जुलाई 2025

ये होती है सत्ता का मिज़ाज…

ये होती है सत्ता का मिज़ाज…

 


जापान के बर्फीले उत्तरी इलाके में क्यू-शिराताकी नाम का एक बहुत छोटा सा रेलवे स्टेशन हुआ करता था. आसपास के गाँवों में रहने वालों की कुल आबादी कोई तीस-चालीस होगी. स्टेशन पर हर रोज़ एक रेलगाड़ी आते-जाते दो दफ़ा रुका करती. 


रेलवे डिपार्टमेंट कई बरसों से गौर कर रहा था कि इस स्टेशन से बहुत ही कम यात्रियों का चढ़ना-उतरता होता था. स्टेशन के रखरखाव और रेलगाड़ी के ठहरने में अच्छा खासा पैसा खर्च हो रहा था. इस नुकसान के सौदे को देखते हुए मार्च 2016 से इस स्टेशन को बंद करने का फैसला ले लिया गया. इलाके के लोगों के लिए छः किलोमीटर दूर मौजूद एक दूसरे स्टेशन की सेवाएं लेने का विकल्प पहले से था.


फैसला लिए जाने के कुछ ही दिनों बाद रेलवे अधिकारियों को मालूम पड़ा कि क्यू-शिराताकी स्टेशन से हर सुबह चौदह-पंद्रह साल की एक बच्ची अपने स्कूल जाने और वापस घर लौटने के लिए उसी रेलगाड़ी का इस्तेमाल करती आ रही थी. वह सुबह सवा सात बजे स्टेशन पहुँचती थी, जहाँ से वह पैंतीस किलोमीटर दूर अपने स्कूल जाती थी. एक दूसरी रेलगाड़ी उसे शाम के पांच बजे वापस वहीं छोड़ती थी.


काना हरादा नाम की इस लड़की के बारे में पता चलते ही सरकार ने तय किया कि जब तक उसकी पढ़ाई पूरी नहीं हो जाती, स्टेशन को किसी भी कीमत पर बंद नहीं किया जाएगा. अगले तीन साल तक क्यू-शिराताकी स्टेशन पर वह रेलगाड़ी हर दिन दो दफ़ा ठहरती रही ताकि काना हारादा की पढ़ाई पूरी हो और उसकी एक भी क्लास न छूटे.


इस घटना का 3 फरवरी 2025 के हिन्दुस्तान टाइम्स में छपी इस ख़बर से कोई सम्बन्ध नहीं है जिसके मुताबिक़ साल 2014-15 से 2023-24 के बीच भारत में कुल 89,000 सरकारी स्कूल इस वजह से बंद कर दिए गए कि उनमें पढ़ने वाले बच्चों की तादाद लगातार घट रही थी. 


जापान की काना हरादा की कथा बताती है कि इसी दुनिया में यह भी होता है कि बगैर मेले-तमाशे के कोई-कोई सरकारें अपने नागरिकों से किये गए हर वायदे को पाबंदी के साथ निभाती हैं. बजट की कमी, पैसे का नुकसान वगैरह सिर्फ बातें होती हैं जिन्हें कभी भी, कहीं भी बनाया जा सकता है.(साभार)


(फोटो: क्यू-शिराताकी स्टेशन पर काना हारादा को लेने पहुँच रही रेलगाड़ी)


बुधवार, 9 जुलाई 2025

ऑपरेशन सिंदूर पर राफ़ेल का ये सच मोदी की नींद उड़ा देगा…

 ऑपरेशन सिंदूर पर राफ़ेल का ये

 सच मोदी की नींद उड़ा देगा…


आज फ्रांस से खबर आई है की राफेल विमान बनाने वाली कंपनी द साल्ट ने एक बयान जारी किया और उसमें कहा स्ट्राइक में एक ही राफेल गिरा है और उसकी वजह भी कुछ तकनीकी खामी है! द साल्ट ने यह भी कहा भारत में विमान की देखरेख उपयुक्त तरीके से नहीं हो रही है उल्लेखनीय है विमान की देखभाल का ठेका सरकार ने अनिल अंबानी को दिया था! 

द साल्ट यह भी कहा भारत की  ट्रेनिंग में कमी है इस वजह से उपयुक्त पायलट नहीं है! 


द सॉल्ट ने भारत सरकार से आग्रह किया कि वह एक ऑडिट कंपनी भारत भेजना चाहता है, जो बचे हुए राफेल की जांच करना चाहती है और यह भौतिक रूप से सत्यापित करना चाहती है कितने राफेल धारा शाही हुए लेकिन भारत सरकार ने द साल्ट को पूरी तरह मना कर दिया! सरकार ने कहा यह हमारे आंतरिक मामले में दखल होगा!

इस परिपेक्ष को यूं भी समझा जा सकता है भारत सरकार सच्चाई बताने की इच्छुक नहीं है! 

राहुल गांधी ने एक सवाल पूछा और एक विचारधारा ने उन्हें देशद्रोही करार  दे दिया! अब वही सवाल देश की जनता को परेशान कर रहा है! 

इधर भारत के मुख्य रक्षा अधिकारी सीडीएस चौहान साहब ने सिंगापुर में बयान दिया था, विमान के संदर्भ में सेना के पक्ष पर तकनीकी त्रुटियां हुई थी और फिर उसे हमने सुधारा और पाकिस्तान के ठिकानों पर आक्रमण किया? उन्होंने स्वीकार किया हमारे कुछ विमान गिरे थे! 

इंडोनेशिया में डिफेंस अटैची शिवकुमार ने कहा भारतीय सेना के हाथ सरकार ने बांधे हुए थे इस वजह से हमारे विमान गिरे! 

और 2 दिन पहले उप सेना अध्यक्ष राहुल  के सिंह का बयान भी सुर्खियों में रहा , जिसमें  भी उन्होंने यह सवाल उठाए की सरकार ने हमें पूरी इजाजत नहीं दी इस वजह से हमारे विमानो का नुकसान हुआ! 

भाजपा के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी दावा करते हैं पांच राफेल गिरे! 

अंतरराष्ट्रीय मीडिया में रायटर के , अल जजीरा के अलग-अलग दावे हैं!

एक तरफ हमारे सेना के अधिकारी मान रहे हैं, हमारे एक से अधिक विमान का नुकसान हुआ वही द साल्ट का कहना है की एक ही राफेल गिरा! और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का अलग ही कहना है!

द साल्ट एक विमान कंपनी है और एक राफेल की कीमत ढाई हजार बिलियन डॉलर है ऐसे में यदि यह सिद्ध हो जाता है चीनी मिसाइल ने भारत के राफेल गिरा दिए तो अंतरराष्ट्रीय व्यापार में राफेल की मार्केटिंग बिल्कुल शून्य हो जाएगी क्योंकि इतने महंगे विमान पर लोगों का भरोसा खत्म हो जाएगा!

विश्लेषक यह भी मानते हैं राफेल का स्टैंड इसी के चलते पतली गली निकालने की कोशिश कर रहा है!

 लेकिन क्या सरकार का दायित्व नहीं बनता प्रमाणिकता से देश की जनता को सही बात बताएं ताकि एक तो यह कंट्रोवर्सी बंद हो और दूसरा सेना के पराक्रम को कोई प्रश्न चिन्हित नहीं कर सके?

और जवाब आने के बाद शायद देशद्रोही कौन इसका भी फैसला हो जाएगा! और सबसे बड़ी बात तो यह है कि साल्ट के इस सच ने मोदी सत्ता की करतूत खोल कर रख दी है…


क्योंकि कहीं-कहीं पूरे संदर्भ में और सेना के अधिकारियों के बयान के परिपेक्ष में ऐसा लगता है सरकार अपनी गलतियां सेना के सिर पर कर कर स्वयं बचना चाहती है!


जिस तरह सत्ता के प्रतिनिधियों ने सेना के अधिकारियों का 

अपमानित किया है, उनको आरोपित किया है, सेना के पराक्रम पर सवाल खड़े किए हैं उससे इस बात को और ज्यादा बल मिलता है!