सोमवार, 5 जुलाई 2021

राफेल : छद्म राष्ट्रवाद का चेहरा...

 

बाफोर्स तोप सौदे में कमीशन जब भ्रष्टाचार है तो राफेल सौदे में कमीशन बिजनेस डील कैसे हो सकता है? क्या छद्म राष्ट्रवाद का ये जीता जागता प्रमाण नहीं है। प्रारंभ से ही राफेल सौदे में हुई गड़बड़ी को मोदी सत्ता नकारते रही है लेकिन जिस तरह फ्रांस में राफेल डील की आपराधिक जांच शुरु हुई है उसके बाद यह साफ हो गया है कि राफेल डील दो सरकार के बीच के सौदे की बाते न केवल बकवास है बल्कि कमीशनखोरी भी जमकर हुई है। 

हालांकि अभी जांच के परिणाम पर कुछ भी बोलना जल्दबाजी होगी लेकिन जिस तरह की जांच फ्रांस में शुरु हुई है वैसी जांच की कल्पना करना भारत में मुश्किल है। चौकीदार चोर है के नारे के साथ शुरु हुआ आरोप-प्रत्यारोप के इस खेल में भले ही सत्ता हावी हो, और वह विरोधियों को देशद्रोह बताता रहा हो लेकिन कालेधन का मामला हो, पनामा पेपर का मामला हो या फिर बड़े उद्योगपतियों या भगोड़े उद्योगपतियों के बैक लोन को बट्टा खाते में डालने का मामला हो मोदी सत्ता की भूमिका संदिग्ध रही है। तब राष्ट्रवाद की बात कितना उचित है अब जनता ही तय करेगी।

सत्ता को क्लीन चीट देने, राष्ट्रवादी बताने, इमानदार बताने जिस तरह से मीम फैलाई गई कि उसके तो परिवार भी नहीं है तब किसके लिये भ्रष्टाचार किया जायेगा कि पोल तो शोले फिल्म के गब्बर सिंह से ही समझा जा सकता है जिसका कोई परिवार नहीं था लेकिन तबाही लूट खसोट और आतंक का पर्याय था। तब यदि गब्बर सिंह के तर्ज पर गब्बर सिंह जब कहते है कि इन्हें (जय वीरु) लाए हो रायगढ़ की रक्षा के लिए? तो याद कीजिए ये बात सत्ता पप्पू के संबंध में कहती है और पप्पू अपने कार्य में तल्लीन है।

हम यहां रायगढ़ की रक्षा की बात नहीं कर रहे हैं वह तो फिल्म शोले था लेकिन अभी बात काले धन को लाने की बजाय दो गुना हो जाना, पड़ोसी पाकिस्तान में पनामा पेपर मामले में सजा हो जाना और भारत में जांच रिपोर्ट तक नहीं आना की बात भी हम यहां कहकर राष्ट्रवादी सरकार पर उंगली नहीं उठाना चाहते। हम तो राफेल सौदे में हुई घपलेबाजी और आपराधिक जांच में भारत के नाम, मोदी के चहेते कंपनी जैसी बात के जिक्र पर चर्चा नहीं करना चाहते।

हम तो सिर्फ यही कहते हैं कि राफेल सौदे में यदि सबकुछ ठीक है तो क्यों जांच नहीं होनी चाहिए, भारत की सरकारी कंपनी की बजाय निजी कंपनी को काम देने से लेकर कई सवाल है जिसका जवाब देश को चाहिए। तब सवाल यही है कि राष्ट्रवाद का लबादा ओढ़ कर कुछ भी कर गुजरने का दिन क्या पूरा होने वाला है, क्या रंगा सियार का सच उजागर फ्रांस करेगा या सत्ता बदलने का इंतजार किया जाए।

रविवार, 4 जुलाई 2021

बाबा को गुस्सा क्यों आता है...

 

शीर्षक देखकर बहुत से लोगों को नसरुद्दीन शाह और शबाना आजमी अभिनीत फिल्म अलबर्ट पिंटों को गुस्सा क्यों आता है कि याद ताजा हो गई होगी, लेकिन यकीन मानिये रियल लाईफ और रील लाईफ में ज्यादा अंतर नहीं होता, कुछ लोगों में नाराजगी व्यक्त करने का स्वभाव आदत में तब्दिल हो जाता है और वे ये भूल जाते है कि उनकी नाराजगी का दूरगामी असर क्या पडऩे वाला है।

हम बात कर रहे हैं प्रदेशत के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव यानी बाबा का। उनकी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से नाराजगी जग जाहिर है, नाराजगी की वजह के कई कयास है। ताजा मामला मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के उस बयान के बाद सामने आई हैं जिसमें बघेल ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधा बढ़ाने निजी अस्पतालों को मदद की जायेगी। इस योजना पर काम शुरु किया जा रहा है। वैसे देखा जाए तो इस तरह की योजना बनाना मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार भी है लेकिन राजा साहेब यानी टीएस बाबा को लगता है कि मुख्यमंत्री अनावश्यक हस्तक्षेप कर रहे हैं इसलिए जब इस योजना को लेकर पत्रकारों ने स्वास्थ्य मंत्री बाबा साहेब से सवाल पूछा तो वे सवाल सुनते ही उखड़ गए और इस पर असहमति जताते हुए यहां तक कह दिया कि निजी अस्पतालों को गरीबों को मुफ्त में ईलाज करना चाहिए तभी अनुदान देना चाहिए।

हालांकि मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने से चूक गए राजा साहेब की नाराजगी नई नहीं है, वे पहले भी अपनी नाराजगी सार्वजनिक तौर पर जाहिर कर चुके हैं, ढाई-ढाई साल वाले फार्मूले को  उनके ही समर्थकों द्वारा हवा देने का आरोप तो उन पर लगा ही है उनका इस मामले में गोल-मोल जवाब भी आशकाएं बढ़ाने वाला साबित हुआ। विभाग के बंटवारे से शुरु हुई नाराजगी की खबर हर किसी को है, कैबिनेट की कई बैठकों में बाबा के तेवर की चर्चा भी बाहर आते रही है ऐसे में ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल को लेकर दिये उनके बयान का क्या मतलब है यह तो वही जाने लेकिन बुरी गत बन चुकी भाजपा नेताओं के लिए यह नाराजगी मुद्दा जरूर बन गया है। 

वैसे अपने सौम्य व्यवहार और खुशमिजाज के लिए राजधानी में छवि बनाने वाले राजा साहेब के बारे में कहा जाता है कि यदि हकीकत पता करना हो तो अंबिकापुर और आसपास जरूर घुमा-देखना चाहिए। फिर अडानी के परसा कोल ब्लॉक में राजा साहेब की भूमिका तो वहां के ग्रामीण पहले ही बता चुके हैं कि परसा कोल ब्लॉक में अडानी के नियम कानून की धज्जियां पर बाबा कुछ नहीं बोलते जबकि यह क्षेत्र उनके विधानसभा में भी पड़ता है, धंधा पानी की चर्चा तो अलग ही मामला है। यानी बाबा को गुस्सा क्यों आता है कुछ-कुछ तो लोग समझने भी लगे हैं।

शुक्रवार, 2 जुलाई 2021

बेटियां हत्यारिन... जिम्मेदार कौन?

 

छत्तीसगढ़ में शराब की बह रही नदियों के लिए जिम्मेदार कौन? शराब ने गांवों की शांति छिन ली है और शराब की वजह से हो रहे अपराध न केवल शर्मसार कर देने वाला है बल्कि सत्ता के लिए चुनौती भी है। अभी लोग महासमुंद में पांच बेटियों सहित सामूहिक आत्महत्या की घटना लोग भूले भी नहीं थे कि अंबागढ़ चौकी के भगवान टोला गांव में फिर एक हृदय विदरक घटना हुई। यह घटना की वजह भी शराब है। शराबी पिता की हरकतों से परेशान नाबालिग बेटियों का गुस्सा इतना बढ़ गया था कि वे तब तक अपने पिता पर टंगिया से वार करते रहे जब तक उनकी मृत्यु नहीं हो गई। मृतक सहदेव नेताम को शराब की लत थी और उसे अवैध शराब कोचियों से आसानी से शराब मिल जाता था, शाम होते ही नशे में धुत्त होकर वह घर पहुंचता और लड़ाई-झंझट करता था, घटना के दिन तो उसने टंगिया से अपनी पत्नी को ही मारना चाहा जिसे देख दोनों नाबालिग बेटियों ने टंगिया छिन कर पिता की हत्या कर दी।

छत्तीसगढ़ में इस तरह की घटनाएं अब रोज की कहानी है और शराबबंदी करने के वादे के साथ सत्ता में आई भूपेश सरकार को यह सब दिखाई सुनाई नहीं पड़ रहा है। गांव-गांव में अवैध शराब की बिक्री जिस तरह से बढ़ी है वह हैरान कर देने वाली है। यदि लोगों की बातों पर भरोसा करें तो अवैध शराब बिक्री के खेल में कई जगह के थाने तक शामिल है और अवैध शराब बिक्री की शिकायत पर भी कोई कार्रवाई नहीं की जाती। कई जगह तो अवैध शराब बेचने वालों के द्वारा थाना खरीद लेने तक की चर्चा है लेकिन सत्ता को यह सब न दिखाई दे रहा है और न ही सुनाई ही दे रहा है।

छत्तीसगढ़ में शराब बंदी की मांग तब शुरु हुई थी जब पिछली सरकार में गांव-गांव में शराब भट्टी खोले जाने लगा था। शाम होते ही ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों का गुजरना दूभर होने लगा था। प्रदेश के तत्कालीन गृहमंत्री कंवर को शराब माफियों द्वारा थाने खरीद लेने की बात कहनी पड़ी थी। तब कांग्रेस ने शराब को लेकर लोगों में व्याप्त नाराजगी को चुनावी मुद्दी बनाया और सत्ता भी हासिल की। लेकिन ढाई साल बीत जाने के बाद भी सत्ता इस तरफ से मुंह फेर कर बैठी हुई है। हालत बदतर होने लगे हैं, यही नहीं छत्तीसगढ़ के सरकारी दुकानों में बिक रही शराब की गुणवत्ता पर भी सवाल उठने लगे हैं। 

ऐसे में जिन बच्चियों ने अपने पिता को मारकर अपराधी बन गई है उसके लिए जिम्मेदार कौन है, क्या इसके लिए सत्ता जिम्मेदार नहीं है? सवाल कई है लेकिन शराब से कई परिवार बर्बाद होने लगे है और सत्ता चुप।

गुरुवार, 1 जुलाई 2021

तुम कुछ भी करो हम मंदिर बनाकर जीतेंगे...

 जब देशभर के किसान अपनी मांगों को लेकर जिले से लेकर हर राज्य की राजधानी में अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे, लोकतंत्र बचाने का नारा लगा रहे थे तब देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राम मंदिर, तीर्थ क्षेत्र और अयोध्या नगरी को सबसे अलग बनाने की योजना बना रहे थे। इसका मतलब साफ है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ये समझते हैं कि चाहे किसान नाराज हो जाये, बेरोजगार नाराज हो जाए, महंगाई चरम पर पहुंच जाए, राम मंदिर निर्माण और हिन्दू-मुस्लिम के सामने कोई भी मुद्दा या जन सरोकार मायने नहीं रखता और वे राम मंदिर के तामझाम के सहारे चुनाव जीतेंगे और इसे कोई रोक नहीं सकता।

तब सवाल यही है कि आखिर किसान आंदोलन कब तक चलेगा, हालांकि सात माह बाद भी किसानों की हिम्मत में कोई कमी नहीं है और वे जान चुके है कि केवल तीन कानूनों की वापसी के मुद्दे पर ही सरकार को नहीं झुकाया जा सकता इसलिए इस बार आंदोलन में तीनों कृषि कानून की वापसी के साथ लोकतंत्र बचाओं का भी मुद्दा जोड़ा गया और आगे जनसरोकार से जुड़े मुद्दे भी किसान आंदोलन का हिस्सा बनेगे तो अचरज नहीं है।

तब क्या मोदी सत्ता ने यह मान लिया है कि आंदोलन का प्रभाव उत्तरप्रदेश के चुनाव में इसलिए नहीं होगा क्योंकि उसने राम मंदिर का निर्माण शुरु कर दिया है और आगे कश्मीर पाकिस्तान और हिन्दू-मुस्लिम का मुद्द जब गहराने लगेगा तो किसानों के मुद्दे गायब हो जायेंगे। हालांकि उत्तरप्रदेश के पश्चिमी उत्तरप्रदेश, अवध और बुदेलखंड के किसान अब जोर-शोर से आंदोलन का हिस्सा बनने लगे है, 26 जून के आंदोलन का हिस्सा तो देश के कमोबेश हर राज्य के किसान बने भले ही कहीं ज्यादा कहीं कम संख्या रही।

पंजाब में भाजपा का वैसे भी कोई वजूद नहीं है और हरियाणा में अभी चुनाव दूर है तब वह ऐसे आंदोलन की अनदेखी भी कर रही है तो इसकी वजह है कि लोगों की याददाश्त बेहद कमजोर है इसलिए वह सत्ता की लापरवाही से कोरोना के नरसंहार, गंगा में बहती लाशे, आक्सीजन की कमी और बेरोजगारी को कैसे याद रखेगी। और जब बड़े-बड़े विद्वानों ने कहा है कि धर्म और राष्ट्रवाद का नशा के आगे कुछ भी मायने नहीं रखता तब राम मंदिर की योजना के सहारे सत्ता में वापसी की उम्मीद को कोई कैसे खत्म कर सकता है।

बुधवार, 30 जून 2021

अमरजीत की अकड़...

 

सत्ता का अपना चरित्र होता है, सत्ता का नशा भी सर चढ़कर बोलता है और कई बार तो सत्ता की कुर्सी में बैठते ही आदमी, अंधा, गूंगा और बहरा भी हो जाता है। लगता है छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार के खाद्य मंत्री अमरजीत भगत ने महात्मा गांधी के तीन बंदरों को कुछ ज्यादा ही पढ़ लिये है या उस सिद्धांत को कुछ ज्यादा ही आत्मसात कर चुके है इसलिए उन्हें अब पत्रकारों के वे सवाल सुनाई नहीं देते जो जनसरोकार से जुड़े होते हैं, हम तीन करोड़ की कहानी की बात को बाद में बतायेंगे अभी तो हम शराब बंदी के सवाल पर खाद्य मंत्री अमरजीत भगत के जवाब पर ही चर्चा करना चाहते हैं।

छत्तीसगढ़ में शराब बंदी का दावा कर सत्ता में आई कांग्रेस सरकार को अब शराब बंदी को लेकर उठ रहे सवाल अच्छे नहीं लगते जबकि शराब की वजह से बढ़ते अपराध के आकड़े नई तरह की चिंता पैदा करने वाली है। औसतन हर महीने 40 से पचास मामले सामने आ रहे हैं, पारिवारिक कलह से लेकर हत्या, बलात्कार के मामले बढ़ते जा रहे है और महासमुंद के रेल पट्टी में अपनी पांच बेटियों के साथ एक महिला का सामूहिक आत्महत्या कोई कैसे भूल सकता है।

हालांकि प्रदेश के मुखिया भूपेश बघेल ने जनजागरण चलाने और प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष मोहन मरकाम ने शराब बंदी के सवाल पर कहा है कि अभी ढाई साल बचा है। ऐसे ही सवाल जब खाद्य मंत्री अमरजीत भगत से पूछा गया, कई बार पूछा गया लेकिन भगत को सुनाई नहीं दिया, उन्होंने सवाल सुनाई देने की बात कहकर अपने कदम आगे बढ़ा दिये। 

जब यह वीडियो वायरल हुआ तो भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने खाद्य मंत्री सहित पूरी सरकार पर हमला बोल दिया लेकिन सत्ता का अपनी चरित्र है। अमरजीत भगत ने जिस तरह से शराब बंदी के सवाल पर प्रतिक्रिया व्यक्त की है उसमें हैरानी की बात नहीं है क्योंकि सत्ता में बैठे व्यक्ति का अपना अलग ही रवैया होता है, फिर अजीत जोगी के करीबी रहे अमरजीत भगत के बारे में कहा जाता है कि उनकी निगाह और महत्वाकांक्षा भी अलग तरह की है जोगी खेमे की राजनैतिक शैली का उन पर असर भी है और वे मौके का फायदा उठाने से चूकते भी नहीं है, यही वजह है कि उन्हें जब कांग्रेस अध्यक्ष की बजाय देर से मंत्री बनाया गया तो इसकी वजह टीएस बाबा का विरोधी बताया गया और कहा जाता है कि बाबा के खिलाफ कदम ताल करने में वे देर भी नहीं करते। अब गांवों में निजी अस्पताल के मामले में ही उनके बयान को देख लीजिए, उन्होंने किस तरह से मुख्यमंत्री को कमांडर बताते हुए बाबा को उसकी हैसियत समझाने की कोशिश की है यह सबके सामने है। तब देखना है कि सत्ता की अकड़ से अभी प्रदेश को और कितना और क्या-क्या देखना है।

मंगलवार, 29 जून 2021

बघेल-बाबा में बढ़ते मतभेद...

 

प्रदेश के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव के बीच सत्ता संघर्ष किसी से छिपा नहीं है लेकिन अब कई मामलों में यह खुलकर सामने आने लगा है तो इसकी वजह ढाई-ढाई साल के फार्मूले का सच है या खुद को बीस साबित करने की रणनीति का हिस्सा है यह तो वक्त ही बतायेगा लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधा बढ़ाने को लेकर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निर्णय पर जिस तरह से उनके ही स्वास्थ्य मंत्री टीएस बाबा ने असहमति जताते हुए सवाल खड़ा किया है वह किस बात का संकेत हैं।

हालांकि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के पास जिस तरह का बहुमत है उसने सारे अंदेशे को विराम दे दिया है लेकिन मुख्यमंत्री के पास जिस तरह का बहुमत है उसने सारे अंदेशे को विराम दे दिया है लेकिन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को लेकर कुछ मंत्रियों की नाराजगी भी खुलकर सामने आने लगी है। मुख्यमंत्री बघेल पर जिस तरह से सबकुछ अपनी मर्जी चलाने का आरोप बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे मंत्रियों के बीच भी तल्खी बढऩे लगी है। यही नहीं संगठन के लोगों को सत्ता में भागीदारी देने में हो रहे विलंब की वजह से भी मुख्यमंत्री के प्रति आक्रोश अब कांग्रेस के भीतर साफ तौर पर महसूस की जा सकती है।

ढाई-ढाई साल के कथित फार्मूले को लेकर जो बवाल काटे जा रहे थे वह भले ही टांय-टांय फिस्स हो गया हो लेकिन जिस तरह से समय-समय पर टीएस बाबा, मोहम्मद अकबर, रुद्र गुरु सहित कई मंत्री और विधायकों का रुख प्रकट होने लगा है उसके बाद ये कहना गलत नहीं होगा कि आने वाला ढाई साल कैसा होगा। 

सत्ता और संगठन में भले ही मतभेद सामने नहीं आया है लेकिन लाल बत्ती की चाह में घेरेबंदी और देर होने की वजह से सत्ता के प्रति नाराजगी भी अब जोर पकडऩे लगा है। हालांकि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष मोहन मरकाम ने सत्ता के कार्यों पर संतोष भी जताया है लेकिन ये कौन नहीं जानता कि मोहन मरकाम पिछले दो साल से किस तरह से कार्य करते रहे हैं। और अब जब शराबबंदी से लेकर दूसरे वादों की बात हो या केन्द्र की मोदी सरकार की आलोचना की बात हो उनके तेवर का कहीं पता नहीं होता।

हैरानी की बात तो यह है कि संगठन से जुड़े लोगों की सत्ता में भागीदारी कब होगी इसका भी पता किसी को नहीं है। पिछले कई महीने से अब-तब की आस में बैठे कांग्रेसियों का सब्र भी जवाब देने लगा है जब सवाल यही है कि बघेल-बाबा के मतभेद की वजह से देर हो रही है या अकबर-रुद्रगुरु के तेवर की वजह से देर हो रही है। ऐसे में यदि संगठन कमजोर नेतृत्व के पास रहा तो सत्ता में बवाल उठना तय है और वर्तमान संगठन का हाल किसी से छिपा भी नहीं है।

सोमवार, 28 जून 2021

वे बेवकूफ बनते रहे और ये धोखा देते रहे...


ये इतना बड़ा सचा है जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि कोई तीन दशक से बेवकूफ बन रहे हैं, ठगे जा रहे है और कोई इन्हें इन तीन दशकों से धोखा दे रहे हैं। हम बात यहां कश्मीरी पंडितों का कर रहे हैं जिनका राजनैतिक शोषण की एक ऐसी कहानी है जो दुनिया में अपनी तरह का अजूबा मामला है। और कहा जाए कि कश्मीरी पंडित अब भी धोखा खाने तैयार है तो गलत नहीं होगा।

यही वजह है कि जब कल कश्मीर को लेकर बैठक हो रही थी तब भी कश्मीरी पंडितों का कोई प्रतिनिधि नहीं था और न ही बैठक में सरकार ने कश्मीरी पंडितों के पुर्नवास के लिए कोई योजना का जिक्र भी नहीं किया लेकिन यदि कश्मीरी पंडितों से पूछा जाए तो वह अब भी भाजपा को ही अपना रहनुमा बतायेंगे तो हैरान होने की बात नहीं है, क्योंकि भाजपा ने कश्मीरी पंडितों के अत्याचार का मुद्दा 1991 से लगातार देश-विदेश के हर मंच से किया है। अपने हर चुनावी घोषणा पत्र में भाजपा ने कश्मीरी पंडितों के पुर्नवास का वादा किया है नौकरी से लेकर दूसरा पैकेज का वादा किया जाता रहा है। लेकिन साढ़े 12 साल की सत्ता में भाजपा ने सिवाय राजनैतिक शोषणा के कश्मीरी पंडितों के लिए कुछ भी नहीं किया इसके बाद भी यदि कश्मीरी पंडितों को भाजपा से उम्मीद है तो इसका मतलब क्या हो सकता है।

कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का इतिहास सिर्फ 31 साल पुराना है और तब केन्द्र में भाजपा के समर्थन में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी रातों रात एक लाख से अधिक कश्मीरी पंडितों को अपना सब कुछ छोड़़कर भागना पड़ा लेकिन भाजपा ने सत्ता नहीं छोड़ी, तब कश्मीर में राष्ट्रपति शासन था और राज्यपाल जगमोहन थे जो भाजपा के पसंद के थे। इसके बाद भी कश्मीरी पंडितों के साथ अत्याचार होते रहा, लेकिन भाजपा तब कुछ नहीं बोली।

हैरानी की बात तो यह है कि इसके बाद जब सत्ता चली गई तब अचानक 1991 में भाजपा कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार का मुद्दा अपनी चुनावी घोषणा पत्र में लेकर आयी और चूंकि यह उसके हिन्दू-मुस्लिम की राजनीति को सूट करती है इसलिए यह मुद्दा देश के हर राज्य में गूंजता रहा और कश्मीरी पंडित यह भूल गए कि यह सब अत्याचार किसके राज में हुआ तब से आज तक भाजपा कश्मीरी पंडितों का मुद्दा उठाते रही और कश्मीरी पंडित भाजपा को अपना रहनुमा मानते रहे।

2014 के बाद मोदी सत्ता ने भी कश्मीर पंडितों का मुद्दा उठाते रही लेकिन आप हैरान हो जायेंगे कि धारा 370 हटने के बाद भी भाजपा ने कश्मीरी पंडितों के लिए वादा के अलावा कुछ नहीं किया उसने कश्मीरी पंडितों के लिए उतनी भी नौकरी नहीं दी जितनी मनमोहन सरकार ने दी। मोदी सत्ता के आने के बाद भी कश्मीर में हालात नहीं सुधरे है और पिछले साल जिस तरह से घाटी में कश्मीर पंडितों की हत्या हुई है वह हैरान कर देने वाली है क्योंकि कश्मीर की पूरी सत्ता मोदी सत्ता के पास ही है।

तब सवाल यही उठता है कि क्या कश्मीरी पंडितों का मुद्दा भाजपा के लिए चुनावी फायदे का जरिया है। कश्मीरी पंडितों का राग अलाप वह पूरे देश में हिन्दू वोटों का ध्र्वीकरण करती है। सवाल तो कई है लेकिन देखना है कि अब कश्मीरी पंडितों की स्थिति क्या बनती है वे क्या सोचते है या क्या करते हैं। क्या वे अब भी खामोशी से अपनी पहचान के लिए तरसते रहेंगे!