शुक्रवार, 28 जून 2024

फ़कत् ला-ला ने कर दिया बेड़ा-गर्क

 फ़कत् ला-ला ने कर

दिया बेड़ा-गर्क


महापौर से लेकर विधायक बनने का सपना संजोने वाले भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता संजय श्रीवास्तव को तो पार्टी ने वह सब कुछ दिया जिसने वे लायक थे या नहीं उसे लेकर पार्टी के भीतर भी सवाल उठते रहे हैं।

एलआई सी एजेंट से राजनीति में आये संजय श्रीवास्तव भी राजीव अग्रवाल की तरह हर चुनाव में टिकिट की लाईन में लग जाते हैं, पार्षद हो या कोई भी चुनाव ।  कहा जाता है कि उन्हें टिकिट चाहिए। यही वजह है कि अब पार्टी के नेता भी उन्हें गंभीरता से नहीं लेते।

गौरी की सीढ़ी चढ़कर भजायुमों  की राजनीति करते करते ला-ला वाले खेल खेलने लगे और उनके खेल की चर्चा तो इतनी है कि ख़ुद भाजपा के नेता भी उनके निचोड़ने वाले गुण से नहीं बच पाये हैं, शंकरनगर के एक कॉम्प्लेक्स वाले ज़मीन को लेकर पार्टी के नेताओ से विवाद की चर्चा  तो इतना तूल पकड़ा था कि महापौर की टिकिट की ईच्छा चकवाचूर हो गया।

रमन सिंह के असली गृहमंत्री से संबंध बनाते बनते  संबंध प्रसाद तक जा पहुंचा लेकिन ला-ला प्रेम के चलते विधानसमा की टिकिट से वंचित होना पड़ा।यानी जो इन्हें जान गया वह टिकिट कभी नहीं देगा।

और कहा जाता है कि रायपुर दक्षिण की सीट खाली होते ही एक बार फिर जीभ लपलपाने लगा है। लेकिन सवाल तो वही है कि टिकिट  दिलायेगा कौन? क्योंकि सीढ़ी को ही तोड़ने में माहिर संजय श्रीवास्तव की  यह आदतें छूटती नहीं। और छूटे भी कैसे, इंदौरी चटोरापन कभी छूटता है क्या ?

अपराधी चला रहे थाना फिर पुलिस से डर कैसा...

 अपराधी चला रहे थाना 

फिर पुलिस से डर कैसा...


रमन राज में जब पूर्व गृह‌मंत्री ननकी राम कंवर ने कहा था कि दस - दस हजार में थाने बिकते हैं और कलेक्टर- एस पी वसूलीबाज़ हो गये हैं, तब विधानसमा में इस बात को लेकर खूब हल्ला मचा तो क्या छत्तीसगढ़ में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आते ही यही स्थिति बन गई है और बढ़ते अपराध की एक बड़ी वजह साँठ-गाँठ है, या फिर शराब के धंधे में लिए नेताओं को ऐसे ही लोग चाहिए जो उनके अवैध शराब के धंधे को फलने-फूलने का अवसर दें।

छत्तीसगढ़ में बढ़ते अपराध की खबर ने आम आदमी की चिन्ता बड़ा‌ दी है, हत्या - बलात्कार के बढ़‌ते मामलो के बीच अपराधियों को पकड़ने की बजाय शिकायत करने वालों को ही परेशान करने का मामला भी बढ़‌ता ही जा रहा है। और अपराधी कॉलर उठाये बेखौफ़ घूम रहे हैं।




राजधानी में अपराधियों के हौसले इतने बुलंद है कि वे थाने में ही गवाहों पर हमला करने लगे हैं।मीडिया रिपोर्ट के अनुसार थाने महिला आरोपी ने गवाह पर ब्लेड से हमला कर दिया। मामला शहर के संवेदनशील क्षेत्र माने जाने वाले मौदाहापारा का है, जहां उपद्रवियों ने जमकर उत्पात मचाया था। कांकेर सहित दूसरे स्थानो के हिस्टरी शिटर यहां रह रहे थे। गिरफ्तार उपद्र‌वियों में दो महिलाएं भी है। जिन पर आर्म एक्ट का मामला भी दर्ज हैं।

हालांकि पुलिस का कहना है कि काले धागे में बंधी ताबिज जैसी चीज से वार किया गया है। जबकि घायल युवक ब्लेड से वार करना बता रहा है। वह भी थाने के भीतर।


इधर पुलिस पर, चाकू से वार या हमले के मामले को धारदार नुकीले  चीजों से मारने का रिपोर्ट लिखकर या  लूट को चोरी, डकैती को चोरी बताकर मामले को कमजोर करने का आरोप भी लगता रहा है। तो अपराधियों को नहीं पकड़‌ने की बात आम है।

शहर के प्रतिष्ठित अख़बार नवभारत ने तो बकायदा इस शीर्षक के साथ समाचार प्रकाशित भी किया कि “पुलिस घेरे के बीच नजर आए कई फ़रार आरोपी' बाकायदा तस्वीर के साथ प्रकाशित इस रिपोर्ट  में बताया गया है कि जिन लोगों को पुलिस तलाश कर रही है या जिनके ख़िलाफ़ थाने में वारंट है वैसे लोग खुले-आम थाना आते जाते हैं और  पुलिस उन्हें गिरफ्तार नहीं करती।

सूत्रों की माने तो राजनैतिक पहुंच के चलते ही पुलिस अपराधियों को बख्श रही है।

लता की छटपटाहट...

 लता की छटपटाहट...


विष्णुदेव साय मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए मरे जा रहे लोगों की कमी नहीं हैं, कई दिग्गज नेता साम-दाम की राजनीति में लगे हैं तो कोई अपने आकाओं के भरोसे है। कहा जा रहा है कि एक तरफ़ मंत्री बनने राजेश मूणत ने पूरा दांव खेल दिया है तो दूसरी तरफ सबसे ज्यादा छटपटाहट जिसमें दिखाई दे रही है वह लता उसेंडी है।

रमन सरकार में मंत्री रह चुनी लता उसेडी को लेकर कई चर्चे है और कहा जाता है कि ऐसे ही एक चर्चे ने रमन सरकार की किरकिरी तक करा दी थी, मीडिया प्रेम से ओत प्रोत लता उसेंडी ने प्रेसक्लब में बैडमिंटन कोर्ट बनाने में भी मदद की तो पार्टी  के मीडिया संभालने वालों की मदद को लेकर भी वे चर्चा में थी…।

कहा जाता है कि इस बार भी वे मंत्री बनने के लिए पूटी ताकत लगाई हुई है, और  अब उन्हें उड़ीसा चुनाव में किये मेहनत  पर ही ज्यादा भरोसा है, क्योंकि पिछली बार वे जिस सीढ़ी में चढ़‌कर मंत्री बनी वी, वह सीढ़ी से इन दिनों किनारे कर दी गई है।

लेकिन लता की दिक़्क़त यह है कि  साय सरकार ने महिला कोटे से पहले ही लक्ष्मी राजवाड़े को मंत्री बना रखा है तब क्या इस बार महिला मंत्री की संख्या बढ़ाई जायेगी। और क्या कोई नई सीढ़ी तैयार हो गई है..!

गुरुवार, 27 जून 2024

भारतीय बच्चों की दशा पाक से भी ख़राब

 भारतीय बच्चों की दशा पाकिस्तानी बच्चों से भी ख़राब, ठीक से ख़ाना भी नसीब नहीं 

यूनिसेफ़ की ताज़ा रिपोर्ट में भारत के बच्चों कि जो स्थिति है वह निचले पायदान से आठवें नंबर है भारत से बेहतर पाकिस्तान नेपाल श्रीलंका और बंगलादेश की स्थिति है

भारत इस मामले में अफ़ग़ानिस्तान से थोड़ा ही बेहतर है  


एक तरफ़ जब देश के प्रधानमंत्री भारत को आर्थिक रूप से मज़बूत बनाने का दावा कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ़ भारत के चालीस फ़ीसदी बच्चों को पोषित आहार नहीं मिल पा रहा है। तब सवाल ये है कि क्या आर्थिक मज़बूती सिर्फ़ कारपोरेट प्रगति से गिनी जा रही है ।


 


यूनिसेफ़ की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में 20 साल पहले जब कुपोषण की बात की जाती थी तो सबसे पहले एक दुबले पतले कमजोर बच्चे की छवि दिमाग में आती थी, जिसे खाने के लिए भरपेट भोजन नहीं मिलता था, पर आज कुपोषित होने के मायने बदल रहे हैं । आज भी करोडो बच्चे कुपोषित हैं पर तस्वीर कुछ और ही है, यदि अफ्रीका को छोड़ दें तो आज सारी दुनिया में ऐसे बच्चों की संख्या कम हो रही है जिनकी वृद्धि अपनी आयु के मुकाबले कम है, जबकि आज ऐसे कुपोषित बच्चों की संख्या बढ़ रही है जिनका वजन बढ़ गया है और जो मोटापे की समस्या से ग्रस्त हैं । यूनिसेफ द्वारा जारी नई रिपोर्ट

 


'द स्टेट ऑफ द वर्ल्डस चिल्ड्रन 2019' के अनुसार, दुनिया में पांच साल से कम उम्र का हर तीसरा बच्चा या दूसरे शब्दों में 70 करोड़ बच्चे कुपोषण का शिकार है ।



बच्चों में बढ़ता मोटापा भी है गंभीर समस्या

सयुंक्त राष्ट्र द्वारा जारी इस रिपोर्ट में चेतावनी दी है कि दुनिया के करोड़ों बच्चे को या तो जरूरत से बहुत कम खाना और पोषण मिल रहा हैं या फिर जितनी जरूरत है वो उससे अधिक मात्रा में भोजन ले रहे हैं, जो की स्पष्ट रूप से आर्थिक असमानता को दर्शाता है। यूनिसेफ के अनुसार बच्चों में पोषण की कमी का सीधा प्रभाव उनके शारीरिक और मानसिक विकास पर पड़ता है । जिसमें दिमाग का पूर्ण विकास न हो पाना, कमजोर याददाश्त, रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी और संक्रमण एवं बीमारियों का खतरा मुख्य है। आंकड़ों के अनुसार वैश्विक रूप से वर्ष 2018 में पांच साल से कम आयु के 14.9 करोड़ बच्चे अविकसित पाए गए । जबकि लगभग पांच करोड़ बच्चे शारीरिक रूप से कमजोर थे। अनुमान के विपरीत इनकी सबसे अधिक संख्या एशिया में देखने को मिली । इसके अलावा, पांच साल से कम आयु के 34 करोड़ बच्चों में जरूरी विटमिनों और खनिज पदार्थों की कमी पायी गयी । जबकि करीब चार करोड़ बच्चे मोटापे या ज्यादा वजन से पीड़ित पाए गए। बच्चे में अधिक वजन के चलते टाइप -2 डायबिटीज, अवसाद जैसी समस्याएं आम बात होती जा रही है वहीं आगे चलकर यह मोटापे में बदल सकती है जिससे रक्तचाप, डायबिटीज, शुगर, ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियां हो सकती है।

जरूरी विटमिनों और खनिज पदार्थों की कमी


यूनिसेफ की कार्यकारी निदेशक हेनरीटा फोर ने बताया कि बेहतर विकल्प न होने के कारण दुनिया भर में करोड़ों बच्चे ऐसा भोजन करने को मजबूर हैं जो उनका पेट तो भर सकता है, पर उन्हें पोषण नहीं दे सकता । वहीं दूसरी ओर बच्चों में जंक फ़ूड के प्रति बढ़ता लगाव भी एक बड़ी समस्या बनता जा रहा है । आज बच्चे अपने भोजन में पोषक तत्वों के स्थान पर जंक फ़ूड को अधिक वरीयता दे रहे हैं और बचपन से ही संतुलित आहार नहीं ले रहे । आंकड़ों के अनुसार 6 से 23 महीने की उम्र के 44 फीसदी बच्चों को भोजन में फल या सब्जियां नहीं मिलती जबकि 59 फीसदी बच्चों दूध, दही, अंडे, मछली और मांस आदि नहीं मिल रहा । छह महीने से कम उम्र के 5 में से केवल 2 शिशुओं को अपनी मां का दूध मिल रहा है । जबकि वैश्विक स्तर पर डिब्बा बंद दूध की बिक्री 41 फीसदी बढ़ गयी है । जो साफ संकेत है की बच्चों को जरुरी स्तनपान नहीं कराया जा रहा । ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीब परिवारों के 6 से 23 महीने की उम्र के केवल 5 में से 1 बच्चे को पोषित आहार नसीब हो सका । स्कूल जाने वाले बच्चों में फ़ास्ट फ़ूड के सेवन का चलन भी बढ़ता जा रहा है । आंकड़ों के अनुसार 42 फीसदी बच्चे दिन में कम से कम एक बार सॉफ्ट ड्रिंक्स (कार्बोनेटेड) का सेवन करते हैं, जबकि 46 फीसदी सप्ताह में कम से कम एक बार फास्ट फूड जरूर खाते हैं । यही वजह है जिसके चलते वैश्विक स्तर पर पांच साल से कम आयु के 34 करोड़ बच्चों में जरूरी विटमिनों और खनिज पदार्थों की कमी पायी गयी ।

कुपोषण, भारत के लिए भी है एक बड़ी समस्या

भारत में हालात और भी बदतर हैं जहां करीब 50 फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं । जिसका परिणाम ने केवल उनके बचपन पर पड़ रहा है बल्कि उनका भविष्य भी अंधकारमय हो रहा है । हाल ही में पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया, आईसीएमआर और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूट्रेशन द्वारा भारत के सभी राज्यों में कुपोषण की स्थिति पर एक रिपोर्ट जारी की थी । जिसके अनुसार वर्ष 2017 में देश में कम वजन वाले बच्चों के जन्म की दर 21.4 फीसदी रही। जबकि जिन बच्चों का विकास नहीं हो रहा है, उनकी संख्या 39.3 फीसदी, जल्दी थक जाने वाले बच्चों की संख्या 15.7 फीसदी, कम वजनी बच्चों की संख्या 32.7 फीसदी, अनीमिया पीड़ित बच्चों की संख्या 59.7 फीसदी और अपनी आयु से अधिक वजनी बच्चों की संख्या 11.5 फीसदी पाई गई थी। हालांकि पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मौत के कुल मामलों में 1990 के मुकाबले 2017 में कमी आई है। 1990 में यह दर 2336 प्रति एक लाख थी, जो 2017 में 801 पर पहुंच गई है, लेकिन कुपोषण से होने वाली मौतों के मामले में मामूली सा अंतर आया है।  1990 में यह दर 70.4 फीसदी थी, 2017 में जो 68.2 फीसदी ही पहुंच पाई। यह एक प्रमुख चिंता का विषय है, क्योंकि इससे पता चलता है कि कुपोषण का खतरा कम नहीं हुआ है।

स्पष्ट है कि हम इस समस्या को जितना समझ रहे है, यह उससे कई गुना बड़ी है । आज हमारी वरीयता सिर्फ बच्चों का पेट भरना न होकर उन्हें एक संतुलित और पोषित आहार देने की होनी चाहिए । जो न केवल राष्ट की जिम्मेदारी है बल्कि परिवार को भी इसमें अपनी भूमिका समझनी होगी ।

https://youtu.be/-jl05KaXTLg?si=EbKclnkAraOCIHaX

साय का संविदा प्रेम...

साय का संविदा प्रेम...


मुख्यमंत्री बनने से चूक गये अरूण साव अब उपमुख्यमंत्री बनने के बाद ऐसा कोई मौका छोड़‌ना नहीं चाहते जो एक मुख्यमंत्री के हिस्से में न आता हो।  भारी भरकम कई विभाग संभाल रहे अरुण साव के किस्से अब बाहर आने लगे हैं तो इनकी वजह उनका संघ प्रेम भी है लेकिन कहा जाता है कि संघ प्रेम के साथ साथ वे संविदा प्रेमी भी बन गये हैं।

हिंग लगे ने फिटकिरी और रंग चोखा की तर्ज पर चल  इस खेल में नियम कायदों को ताक में रखकर  सेवानिवृत कर्मचारियों और अधिकारियों को संविदा नियुक्ति देने की चर्चा है ओर चर्चा तो उन लोगों को संविदा देने की भी है जो लेन-देन में खूब विश्वास रखते हैं, लेकिन अरुण साव का संबंध आरएसएस से है इसलिए वे इसमें कितना माहिर है, समझा जा सकता है।

चुनाव के पहले प्रदेश अध्यक्ष बनकर उन्होंने जो भूमिका निभाई थी, अब उसकी भी परते उघड़‌ने लगी है और अब उपमुख्यमंत्री बनकर वे कितनी सावधानी बरत रहे हैं वह भी काम नहीं आ रहा है।

कहा जाता है कि असल में उनका मुख्यमंत्री नहीं बन पाने की बड़ी वजह वे खुद भी नहीं तलाश पाये हैं, रमन सिंह ओपी चौधरी से लेकर संघ के एक बड़े पदाधिकारी हो या संगठन का काम देखने. चुनाव के दौरान दिल्ली से भेजे गये लोग ।

लेकिन अब अरुण साव किसी को भी कोई मौका देना नहीं चाहते इसलिए वे फूंक फूंक कर कदम तो उठा रहे हैं लेकिन ख़ैर, खून, खाँसी ख़ुशी के साथ प्रेम भी कहां छिपता है।

विरासत सँभाले या खुद को…

 विरासत सँभाले या खुद को…


शुक्ल बंधुओं की राजनीति को आगे बढ़ाने में लगे अमितेष शुक्ल की स्थिति इन दिनों इतनी खराब है कि घर में भी उनकी बातें नहीं सुनी जाने की चर्चा आम हो गई है।

एक समय था जब चाचा विद्याचरण की तूती पूरे देश में बोलती थी तो श्यामाचान शुक्ल का अपना प्रभाव था और उसी प्रभाव के चलते वे जब पहली बार राजिम से विधायक बने तो इस विरासत  को आगे बढ़ाने  का दावा भी किया जा रहा था, बावजूद इसके कि उसमें खाने-खजुआने के अलावा और कोई विशेष गुण नहीं है।

राज्य बनने के बाद तो जिस ताह से अजीत जोगी ने राजनीति की, उसे समझ पानी में अमितेष इस कदर मुश्किल में पड़ गये कि चुनाव ही हार गये। दोहजार अट्ठारह के चुनाव में कांग्रेस की लहर की वजह से पचास हजार वोट से जीत हासिल कर अपने को फिर से तुर्मखां समझने लगे। लेकिन रोहित साहू से फिर वे मात खा गये।

ऐसे में अब प्रतिष्ठा बचाने की बात तो दूर अगले चुनाव में टिकिट भी मिल पायेगी कहना मुश्किल है, तब निष्ठावान कार्यकताओं ने भी पल्ला झाड़‌ना शुरु कर दिया है। इसकी दो तरह की चाय के अलावा भी दूसरी वजह की चर्चा भी खूब जमकर चल रही है।अब अमितेश के सामने दिक़्क़त सिर्फ़ खाने की ही नहीं, निकालने की भी है…!

बुधवार, 26 जून 2024

सीजीपीएससी घोटाला- आरोपियों से साँठ-गाँठ…

 सीजीपीएससी घोटाला

सीजीपीएससी घोटाला- आरोपियों से साँठ-गाँठ…



छत्तीसगढ़ में भूपेश सरकार के दौरान हुए सीजीपीएससी घोटाले को लेकर अब वित्र मंत्री ओपी चौधरी की भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे हैं। वहीं इस मामले को सीबीदाई को सौंप तो दिया गया है लेकिन अभी तक सीबीआई के जांच शुरू नहीं करने को लेकर कई तरह के सवाल भी उठने लगे हैं।

सूत्रों की माने तो इस घोटाले में जिस तरह के  नाम सामने आये हैं उन्हें बचाने की कोशिश अब उच्च स्तर पर भी होने लगी है और कहा जाता है कि सीबीआई को केन्द्र सरकार की हरीझंडी का इंतजार है लेकिन गृह मंत्री अमित शाह ने अभी तक हरिझंडी नहीं दी है तो उसकी वजह छत्तीसगढ़ सरकार के द्वारा किया गया खेल है। और अब चर्चा इस बात की भी बड़ी होने लगी है कि यहां के एक मंत्री ने ही अमित शाह से जांच को लेकर निवेदन किया है।

ज्ञात हो कि सीजीपीएससीघोटाले के मामले को न केवल भाजपा ने तूल दिया था बलि देश के प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने भी विधानसमा चुनाव के दौरान  घोटालेबाजों को सजा दिलाने की गारन्टी दी थी। यही नहीं सत्ता आने के बाद मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और वित्तमंत्री ने तत्परता भी दिखाई थी लेकिन कहा जाता है कि अब इसमें खेल हो गया है । 


इधर सूत्रों का कहना है कि सांठगांठ के आरोप से बचने मीडिया में झूठी खबर भी प्रकाशित कराई गई कि सीबीआई की टीम ने  जांच शुरु कर दी है। जिसका पीएससी को खंडन करना पड़ा। इस खेल में कौन कौन  शामिल है कहना मुश्किल है लेकिन कहा जा रहा है कि आरोपियों ने ज़बरदस्त साँठ गाँठ कर ली है।

क्या है घोटाले की कहानी…

परीक्षा का नोटिफिकेशन साल 2021 में जारी किया था. भर्ती के लिए कुल पद 171 थे। परीक्षा का प्री एग्जाम 13 फरवरी 2022 को कराया गया ।

छत्तीसगढ़ पब्लिक सर्विस कमीशन (CGPSC). जिसका काम राज्य में विभिन्न विभागों में भर्तियां कराने का होता है. इसी में से एक भर्ती राज्य सरकार के प्रशासनिक पदों पर बैठने वालों के लिए आयोजित कराई जाती है. इसके तहत DSP, डिस्ट्रिक्ट एक्साइज ऑफिसर, ट्रांसपोर्ट सब-इंस्पेक्टर, एक्साइज सब-इंस्पेक्टर जैसे पदों के लिए भर्ती होती है. ऐसी ही एक भर्ती में 18 अभ्यर्थियों के सिलेक्शन पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं.

सूत्रों के मुताबिक CGPSC के चेयरमैन टामन सिंह सोनवानी, राजभवन सेक्रेटरी अमृत खलको समेत कई अधिकारियों के बेटे-बेटियों और करीबी रिश्तेदारों को डिप्टी कलेक्टर और DSP जैसे पदों पर नियुक्ति देने के आरोप लगे हैं. मामले को लेकर पूर्व बीजेपी नेता ननकी राम कंवर ने हाई कोर्ट में याचिका भी दायर की है। परीक्षा का प्री एग्जाम 13 फरवरी 2022 को कराया गया. जिसमें कुल 2 हजार 565 पास हुए थे. इसके बाद आई मेंस एग्जाम की बारी. 26, 27, 28 और 29 मई 2022 को मेंस परीक्षा कराई गई. जिसमें कुल 509 अभ्यर्थी पास हुए. इनको इंटरव्यू के लिए बुलाया गया. जिसके बाद 11 मई 2023 को परीक्षा का फाइनल रिजल्ट जारी हुआ. 170 अभ्यर्थियों का इसमें फाइनल सिलेक्शन हुआ. 

छत्तीसगढ़ में सीजीपीएससी का मामला कोर्ट में है और  16 अक्टूबर को इसकी सुनवाई भी हुई है। जिसमें पीएससी ने हाई कोर्ट में जवाब भी पेश किया। वहीं, दूसरी ओर बीजेपी शुरू से लेकर अंत यानि अब चुनाव होने हैं इसे बड़ा मुद्दा बनाने से बिल्कुल भी पीछे नहीं हटी है।

पीएससी ने बीजेपी के आरोप को खारिज किया था


छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में पीएससी ने जो जवाब पेश किया है उसमें आरोपों को सिरे से ख़ारिज कर दिया गया है। आरोप ख़ारिज करते हुए परीक्षा की प्रक्रिया का उल्लेख है। पीएससी ने बताया है कि कॉपी की जांच करने वाले को पता नहीं होता कि किसकी कॉपी है। साथ ही यह भी फिक्स नहीं है कि कौन सी कॉपी कहां जाएगी।

https://youtu.be/7zDegYnq3xQ?si=qJX_4EQju_r1V8pZ