बुधवार, 2 सितंबर 2026

योगी सरकार की हेकड़ी निकली


योगी सरकार की हेकड़ी निकली 

रात के लगभग ग्यारह बज रहे थे। नोएडा के एक छोटे से कमरे में जलती मद्धम रोशनी के बीच आकृति कागज़ों के ढेर में उलझी हुई थी। बाहर सड़क पर सन्नाटा था, लेकिन उसके ज़हन में उन मज़दूरों के चेहरों की चीखें तैर रही थीं—वही मज़दूर, जिनकी महीनों की बची-खुची दिहाड़ी मालिक दबाकर बैठ गए थे।

आकृति के लिए कानून महज़ किताबों में लिखी धाराएं नहीं थीं, वो किसी बेबस के हाथ में थमाया जाने वाला आखिरी हथियार था। जब नोएडा की सड़कों पर हज़ारों मज़दूरों का गुस्सा फूटा, तो आकृति उनके साथ पहली कतार में खड़ी थी। उसके लिए यह हक की लड़ाई थी, लेकिन सत्ता की आंखों में यह सीधे-सीधे 'बगावत' थी।

फिर वही हुआ जो अक्सर होता है। एक रात पुलिस की गाड़ियां हूटर बजाती हुईं आईं, दरवाजा खटखटाया गया और आकृति को उठा लिया गया। एफआईआर में संगीन धाराएं जोड़ी गईं और जब लगा कि जमानत मिल सकती है, तो आकाओं के इशारे पर फाइल पर एक नया ठप्पा लगा दिया गया—राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका)

रासुका यानी एक ऐसा कानून, जहां इंसान बिना किसी पुख्ता सबूत के महीनों तक सलाखों के पीछे सड़ सकता है।

आकृति को जब जेल भेजा गया, तो कई लोगों को लगा कि एक आवाज़ हमेशा के लिए दबा दी गई है। जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) के दस्तखत वाली फाइल पर मुहर लग चुकी थी, थाना प्रभारी अपनी 'कामयाबी' पर पीठ थपथपा रहे थे और खाकी वर्दी की ऐंठ कायम थी। सलाखों के पीछे आकृति के दिन लंबे और रातें ठंडी थीं, लेकिन उसका हौसला टूटने के बजाय और पैना हो रहा था। उसके साथियों ने इस अन्याय के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

महीनों बाद, इलाहाबाद हाईकोर्ट के कोर्टरूम नंबर 4 में सन्नाटा पसरा हुआ था। जज साहब के सामने रासुका की वो फाइल रखी थी, जिस पर पुलिस और प्रशासन ने अपने दस्तखत किए थे।

जब मामले की सुनवाई शुरू हुई, तो सरकारी वकील के पास उन दलीलों का कोई जवाब नहीं था कि एक सामाजिक कार्यकर्ता पर रासुका जैसी सख्त कार्रवाई की जरूरत क्यों पड़ी? क्या हक की आवाज़ उठाना देश की सुरक्षा के लिए खतरा है?

न्यायाधीश ने फाइल पलटी, चश्मा उतारा और जो फैसला सुनाया, उसने यूपी प्रशासन के गलियारों में सन्नाटा खींच दिया।

कोर्ट ने न केवल आकृति चौधरी के खिलाफ रासुका की कार्रवाई को पूरी तरह रद्द कर दिया, बल्कि राज्य की निरंकुशता पर ऐसा चाबुक चलाया जिसकी गूंज बरसों तक सुनाई देगी।

अदालत ने सख्त लहजे में आदेश दिया:

"आकृति चौधरी को बिना किसी ठोस आधार के इतने महीनों तक हिरासत में रखना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है। राज्य सरकार उन्हें 5 लाख रुपये का मुआवजा दे।"

लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई। सबसे बड़ा झटका तो अभी बाकी था।

अदालत ने आगे कहा, "यह मुआवज़े की रकम सरकारी खजाने या करदाताओं की जेब से नहीं जाएगी। यह राशि इस अवैध कार्रवाई में शामिल अधिकारियोंनोएडा के डीएम से लेकर संबंधित थाना प्रभारी तकके वेतन से वसूल की जाएगी।"

फैसले की खबर जब जेल के अंदर पहुंची, तो आकृति की आंखों में आंसू थे—कमजोरी के नहीं, जीत के। बाहर मज़दूरों में खुशी की लहर दौड़ गई।

यह सिर्फ आकृति की रिहाई की कहानी नहीं थी। यह उस व्यवस्था के मुंह पर एक करारा तमाचा था, जहां अफसर कलम की ताकत का गलत इस्तेमाल करके मासूमों की जिंदगी बर्बाद कर देते हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया कि कानून की लाठी अगर गरीब पर पड़ती है, तो वही कानून गलत फैसला लेने वाले अफसरों की जेब और पद की हेकड़ी भी निकाल सकता है।


छत्तीसगढ़ में टैक्स का फरमान और गहराता सियासत का चक्रव्यूह

 छत्तीसगढ़ में टैक्स का फरमान और गहराता सियासत का चक्रव्यूह


महतारी वंदन और धान खरीदी की राहत के बीच 'संपदा ऐप' और भवन कर का झटका: क्या पंचायतों की आत्मनिर्भरता का बोझ गरीबों की जेब पर भारी पड़ रहा है?

रिपोर्ट: विशेष मैगज़ीन कवरेज

स्थान: रायपुर / भरतपुर (छत्तीसगढ़)

1. एक तुगलकी चिट्ठी और 24 घंटे का अल्टीमेटम

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में उस समय अचानक खलबली मच गई, जब भरतपुर जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) की ओर से जारी एक पत्र सार्वजनिक हुआ [00:54]। 1 जुलाई 2026 को जारी इस सरकारी फरमान का विषय था—'समर्थ पंचायत पोर्टल' और 'संपदा ऐप' में एंट्री [02:28]।

इस आदेश के प्रमुख अंशों ने प्रशासनिक हलकों से लेकर गांवों की चौपालों तक हलचल मचा दी:

 हर घर पर समान टैक्स: समर्थ पोर्टल पर प्रॉपर्टी रजिस्टर बनाकर प्रत्येक योग्य परिवार से न्यूनतम ₹100 प्रति माह (या 1200 वार्षिक) भवन कर वसूलने और एंट्री करने का निर्देश दिया गया [03:07]।

 24 घंटे की डेडलाइन: पंचायत सचिवों को इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए केवल 24 घंटे का समय दिया गया [03:17]।

 वेतन रोकने की चेतावनी: समय सीमा के भीतर 100% रिकवरी और एंट्री न होने पर 'सिविल सेवा आचरण नियम 1965' के तहत अनुशासनात्मक कार्रवाई और सचिवों का वेतन रोकने का अल्टीमेटम दिया गया [03:30]।

जैसे ही यह चिट्ठी सार्वजनिक हुई, सवाल उठने लगे कि क्या पक्के मकान में रहने वाले और मिट्टी-झोपड़ी में जीवन बसर करने वाले गरीब, दोनों को एक ही तराजू में तौलकर ₹1200 सालाना वसूलना जायज है [02:01]?

2. विपक्ष का करारा हमला: टी.एस. सिंहदेव और कांग्रेस के तीखे सवाल

इस फरमान के सामने आते ही राज्य की राजनीति गरमा गई। पूर्व उपमुख्यमंत्री टी.एस. सिंहदेव (टी.एस. बाबा) ने सरकार के इस कदम पर तीखा प्रहार किया [01:10]।

छत्तीसगढ़ सरकार एक ओर जनोन्मुखी होने का दावा करती है, वहीं दूसरी ओर अधिकारियों के जरिए 24 घंटे के अंदर गरीबों के घरों पर टैक्स थोप रही है। ग्राम सभाओं पर दबाव बनाया जा रहा है कि यदि वे यह टैक्स स्वीकार नहीं करेंगे तो उन्हें विकास कार्यों का पैसा नहीं मिलेगा। महतारी वंदन योजना में ₹1000 देकर दूसरी तरफ से ₹1200 वापस लेना कौन सी कल्याणकारी नीति है?" — टी.एस. सिंहदेव

सिंहदेव ने आरोप लगाया कि बढ़ती महंगाई, खाद की बढ़ती दरों और आपूर्ति में किल्लत के बीच ग्रामीणों पर यह नया बोझ डालना अत्यंत दुखद है [04:50]।

3. नीति बनाम ज़मीनी हकीकत: OSR (ऑन सोर्स रेवेन्यू) का पेच

पंचायती राज अधिनियम और केंद्र सरकार की OSR (Own Source Revenue - ऑन सोर्स रेवेन्यू) नीति का मूल उद्देश्य पंचायतों को वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाना है [05:09]। लेकिन नियम यह भी कहते हैं कि टैक्स निर्धारण में विषमता नहीं होनी चाहिए—कच्चे और पक्के मकानों का मूल्यांकन अलग-अलग होना चाहिए [05:39]।

भरतपुर जनपद के इस फैसले में मापदंडों की इसी अनदेखी ने बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ सरकार महतारी वंदन योजना और ₹3100 प्रति क्विंटल धान खरीदी जैसी योजनाओं का श्रेय ले रही है, वहीं दूसरी तरफ ग्रामीण व्यवस्था में इस तरह की टैक्स रिकवरी से जनता में असंतोष की लहर है [00:28]।

4. स्मार्ट मीटर पर श्रेय और विवाद का नया मोर्चा

प्रॉपर्टी टैक्स विवाद के साथ-साथ प्रदेश में स्मार्ट मीटर को लेकर भी सियासत चरम पर है [00:07]। सत्तारूढ़ दल और विपक्ष एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं।

 विपक्ष का दावा: कांग्रेस नेताओं का स्पष्ट कहना है कि उनके कार्यकाल में एक भी स्मार्ट मीटर नहीं लगाया गया था। उस समय केवल केंद्रीय दिशा-निर्देशों का परीक्षण हुआ था [06:34]।

 टेंडर और अनुबंध पर चुनौती: विपक्ष ने सरकार को खुली चुनौती दी है कि स्मार्ट मीटर के टेंडर, अनुबंध और निजी कंपनियों को दिए गए काम की तारीखों को सार्वजनिक किया जाए, ताकि जनता के सामने सच आ सके कि स्मार्ट मीटर का बोझ किसने डाला [07:07], [07:27]।

5. निष्कर्ष: कल्याणकारी योजनाएं या वित्तीय भरपाई?

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाकों में उठ रहा यह असंतोष आने वाले दिनों में सरकार के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती बन सकता है। एक तरफ जहां ग्रामीण जनता स्मार्ट मीटर के बिजली बिलों और महंगाई की मार झेल रही है [00:07], वहीं ₹100 प्रतिमाह का यह भवन कर उनके बजट को और बिगाड़ सकता है।

क्या सरकार इस फरमान को वापस लेगी, या पंचायतों की आत्मनिर्भरता का यह मॉडल ग्रामीण सियासत को और गरमाएगा? यह देखना आने वाले दिनों में दिलचस्प होगा।

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