शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

ये लोग आते कहाँ से हैं…

 ये लोग आते कहाँ से हैं…


एमपी के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने वैसे तो कुछ भी अलग नहीं कहा, नाम बदलनेवाला संस्कार आरएसएस से लिए लोगों से और कोई उम्मीद करनी भी नहीं चाहिये हालाँकि अभी तो और भी मुग़ल और अंग्रेज़ी नाम की फ़ेहरिस्त है जिसे बदले जाने का संस्कार बाक़ी है लेकिन मोहन यादव नाम बदलने के फेर में ये भूल गये कि प्रभु कृष्ण का यह नाम भारतीय जनमानस में भीतर तक बैठा है…

मध्यप्रप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव को शायद यह बात मालूम नहीं है कि उनके इस अभियान से वो भजन झूठा पड़ जाएगा

"मैया मोरी मैं नहीं माखन खाओ"

इसकी पंक्तियां बदलेगी अगले चरण में मोहन सरकार। वो क्या होगी अभी राय शुमारी की जाएगी भक्त मंडल से फ़िर तय  किया जाएगा। 

एक फिल्मी गाना है "मच गया शोर सारी नगरी रे आया बिरज का बांका सम्हाल तेरी गगरी रे।" इस गाने पर प्रतिबंध लगाया जाएगा, इंटरनेट से इसे हटाने का आदेश दिया जाएगा।

भक्ति कालीन कवियों जैसे सूरदास, रसखान, मीरा आदि के भजनों की समीक्षा की जाएगी जिसके लिए एक कमेटी बनाई जाएगी। वाट्सअप यूनिवर्सिटी से Phd योग्यता प्राप्त विशेषज्ञों की भर्ती की जाएगी इस कमेटी के लिए।

सबसे बड़ा सवाल यह आएगा कि माखन का आविष्कार ही श्री कृष्ण के कारण हुआ है। इसके पहले किसी ग्रन्थ या पुराण में उल्लेख नहीं मिलता माखन का। अब अगर कृष्ण जी माखन चोर नहीं हैं तो इसे खायेगा कौन? भगवान श्री कृष्ण ने जब भी माखन खाया चुराकर ही खाया, चाहे वह मां यशोदा से हो या गोपियों की मटकी से। यह अलग बात है कि मथुरा जाने के बाद उन्होंने बंसी और माखन दोनों का त्याग कर दिया था। 

पता नहीं सरकारें किस प्रकार से ऐसे निर्णय लेती है जिससे इतिहास बदलने की आवश्यकता पड़ जाती है। अब कोई वामपंथी यह न कह दे कि कृष्ण ने माखन के माध्यम से, गरीब गुरबे को वो वस्तु जो साधारण तो हो लेकिन आसानी से उपलब्ध न हो, उसे चुराकर उपयोग करने की सीख दी है। इसलिए सरकार उन्हें माखन चोर कहने से बचना चाहती है ताकि जनता उनके बताए रस्ते पर न चले। एक जातिवादी भाई यह कह रहे थे कि भगवान कृष्ण यादव कुल दीपक हैं इसलिए उन्हें सरकार माखन चोर की पदवी से हटाना चाहती है। अगर वहीं भगवान ब्राह्मण या क्षत्रिय होते तो ऐसा कदम नहीं उठाती। इस खबर के सामने आने से जितने मुँह उतनी बातें सुनाई पड़ रही हैं।

इसी माखन की चोरी के बाद माता यशोदा ने भगवान के मुख में त्रिलोक दर्शन किए थे  सरकार इसीलिए तो नहीं डर रही है कि वोट चोरी मामले में केचुआ का मुँह खोल कर विपक्ष सारा कुछ साफ़ साफ़ देख न ले।

बड़ी विकट विपदा है सरकारें धर्म में घुस रही हैं और धर्माचार्य सरकार में। वो अपनी गद्दी से राजनीतिक जुमले उछालते हैं तो सरकारें भी क्यों पीछे रहे। मंदिर मस्जिद के अलावा भक्तों की भावनाओं को हवा देने का काम इनके विधायक मंत्री भी बेहतर तरीके से अंजाम दे सकते हैं।

मोहन सरकार का यह कदम निश्चित ही स्वागतेय है। इस आंदोलन को पूरा करने के बाद इन्हें भगवान राम के लिए भी कोई योजना बनानी चाहिए। जैसे भगवान राम ने सीता की अग्नि परीक्षा नहीं ली थी। या फ़िर रावण ने सीता हरण नहीं किया था। या फ़िर हनुमान कनिष्क के नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश में मिले थे। ऐसे कई विषय हो सकते हैं। 

सरकारें चाहें तो बुद्ध, नानक, महावीर, आदि पर भी शोध कर इस तरह के प्रयास कर सकती है। हर अवतार हर भगवान के साथ कुछ न कुछ ऐसी बात या घटना जुड़ी है जिसे उठाकर सरकारें अपने आप को सुरक्षित रखने और जनता को उलझाए रखने का काम कर सकती हैं। फ़िर उनकी आईटी सेल को इससे रोज़गार भी मिल जाता है। 

मोहन सरकार को इस अनोखे विषय पर चिंतन करने और संवेदन शीलता दिखने के लिए किसी श्री पुरस्कार से सम्मानित किया जाना चाहिए।(साभार)

गुरुवार, 21 अगस्त 2025

भारत पर 50 फ़ीसदी टैरिफ़ क्यों..

 भारत पर 50 फ़ीसदी टैरिफ़ क्यों..

इसे एकदम सरल भाषा में समझिये…


यह बात आपको कोई बड़ा मीडिया नहीं बताएगा कि ORF यानी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेंशन क्या है और न ही ये बात कोई बताएगा कि ट्रंप ने रुस से तेल ख़रीदने पर भारत पर चीन से ज़्यादा टैरिफ़ क्यों लगा रहा है…

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने बताया कि भारत पर क्यों लगाया गया 50% टैरिफ.....!! उन्होंने कहा कि भारत रूस के सस्ते तेल खरीदकर 16 बिलियन से ज्यादा मुनाफा कमा चुका है. इसमें कुछ भारत के अमीर परिवार हैं।बेसेन्ट ने आगे कहा कि भारत का रूसी तेल आयात पहले 1% से भी कम था और अब यह 42% तक पहुंच गया है।

उन्होंने कहा, " जबकि चीन का अलग मामला है। क्योंकि रूस की ओर से यूक्रेन पर किए गए हमले से पहले चीन अपनी जरूरत का 13 फीसदी तेल रूस से खरीद रहा था और अब 16 फीसदी तेल खरीद रहा है। साथ ही बीजिंग का तेल आयात अलग-अलग स्थानों से है इसलिए उनकी स्थिति अलग है."

 रूस से तेल खरीदने को लेकर ट्रंप ने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाया है तो वहीं चीन पर 30 फीसदी टैरिफ ही है।

अब इसे समझना जरूरी है, यदि भारत सरकार इस तेल को रूस से सस्ते दाम में खरीदता तो भारत की जनता को लाभ मिलता।

पर ऐसा नहीं हो रहा है।

क्योंकि ये तेल रूस से अंबानी की कंपनी रिलायंस और नायरा खरीदती है और फिर उसे 45% जैसे भारी भरकम मुनाफा लेकर अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में बेचती है।

राहुल गांधी भी देश की जनता को इसी मिलीभगत को बता रहे हैं कि मोदी देश के लिए नही अपने दोनों आकाओं अदानी, अंबानी की नौकरी, प्रॉफिट में देश के भविष्य को विगत ग्यारह वर्षों से दांव पर लगा रहे हैं।

तब ओआरएफ़ को भी ऐसे समझिए…

2011 के बाद की बात है। उस वक्त मैं सेंटर फॉर बजट एंड गवर्नेंस अकाउंटेबिलिटी नाम की एक संस्था में बजट एनालिसिस का काम करता था। 

CBGA को फोर्ड फाउंडेशन का सपोर्ट था। 

हम गरीबों और वंचितों के लिए सरकारी बजट में आबंटन पर नजर रखते और सरकार से ज्यादा राशि देने की मांग करते। 

इसके पीछे हमारे पास बदहाली का पूरा रिसर्च डेटा होता और तब के प्लानिंग कमीशन को हमारी बात माननी पड़ती। 

खैर, वह "आजादी" से पहले की बात थी। अब मोदी के कुल 5 कॉरपोरेट मित्रो का राज है। 

इनमें दो को सभी जानते हैं–अंबानी और अदानी। 

आपको पता नहीं होगा कि पिछले 11 साल से यही दोनों भारत की संसद को चलाते हैं। 

ज्यादा पुरानी नहीं, 2024 की बात है, जब संसद ने ऑयल फील्ड्स बिल पास करवाया। 

मकसद था, पेट्रोलियम क्षेत्र में बड़ी कंपनियों को ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का फायदा देना। 

इस बिल को पास करने के बाद विंडफॉल टैक्स जैसे नए टैक्स को लागू करना मुश्किल हो गया। 

एग्जॉनमोबिल जैसी दुनिया की बड़ी कंपनियों ने भारत में तेल निकालने में दिलचस्पी दिखाई और गोदी मीडिया ने इसे निवेश की संभावना बताया। 

निवेश तो धेले भर का नहीं हुआ, लेकिन अंबानी की झोली में रूसी तेल आने लगा। 

संसद से बिल पास करवाने का काम पर्दे के पीछे ORF ने करवाया था। जाहिर है करोड़ों फूंके गए। 

अंबानी 5 से 30 डॉलर तक सस्ता रूसी तेल खरीदकर जामनगर की फैक्ट्री तक लाता और साफ कर यूरोप को बेच देता। 

अंबानी ने इस गोरखधंधे में 16 बिलियन डॉलर कमाए। भारत की एक तेल कंपनी ने 86 हजार करोड़ तो भारत पेट्रोलियम ने 1300% ज्यादा मुनाफा कमाया। 

भारत की जनता अभी भी 110 रुपए लीटर तेल खरीद रही है। 

रिलायंस और नायरा एनर्जी ने पूरी दुनिया को इस मुनाफे के कारोबार का सबक सिखाया। 

मोदी सत्ता को भी तेल के बहुत ज्यादा बेस प्राइस का फायदा सालाना करीब 5 लाख करोड़ के टैक्स के रूप में मिला। 

अब अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कल खुलेआम इस बात को दुनिया के सामने रख दिया। 

ORF की अभी 65% फंडिंग अंबानी करता है। इस संस्था को उसी ने थिंक टैंक के नाम से खड़ा किया और 95% तक फंडिंग की। 

ORF में फेसबुक का भी पैसा लगा है और गूगल, जापान बैंक का भी। 

ये इतनी ताकतवर है कि रायसीना डायलॉग के नाम से सालाना जलसा करवाती है, जिसमें जयशंकर का विदेश मंत्रालय भी भागीदार होता है। 

यानी ORF भारत की विदेश नीति में सीधे तौर पर शामिल है। मोदी सत्ता 11 साल से इसे पालती रही। 

ORF के वॉशिंगटन चैप्टर का मुखिया जयशंकर का बेटा है। 

कॉरपोरेट्स की फंडिंग से चल रहे इस कथित थिंक टैंक ने अमेरिका से भारत के रिश्ते बिगाड़े, क्योंकि रूस से उसे फायदा था। 

विदेश मंत्री पर जानबूझकर ब्रिक्स से दूरी बनाने का आरोप है। 

लेकिन, इस बीच ट्रंप का टैरिफ आ गया और सारी ड्रामेबाजी की पोल खुल गई। 

नरेंद्र मोदी ने चीन और रूस से रिश्ते सुधारने के लिए डोभाल को लगाया। जयशंकर को नापसंद करने वाले डोभाल ने रूस और चीन से रिश्ते सुधारे। 

अब अदानी लाला ने भी चिंतन रिसर्च फाउंडेशन के नाम पर  CRF नाम की संस्था बनाई है और नीति आयोग के पूर्व मुखिया अमिताभ कांत को बिठा दिया है। 

मोदी सत्ता आगे अदानी लाला के इशारे पर संसद चलाने वाली है। 

तो यह खेल अब नरेंद्र मोदी की सत्ता, भारत की विदेश और रक्षा नीति के लिए खतरा बन चुका है। 

मोदी सत्ता ने विदेश और रक्षा नीति को उन कंपनियों के हवाले कर दिया है, जिन्हें देश हित की परवाह नहीं।

उन्हें सिर्फ मुनाफा चाहिए। उधर, मोदी सत्ता का एक मंत्री एथेनॉल मिलाकर मोदी सत्ता के समानांतर अपनी सत्ता बना रहा है। 

उससे मुकाबले के लिए इंडियन ऑयल ने 2 दिन पहले 160 रुपए लीटर का बिना एथेनॉल वाला पेट्रोल लॉन्च किया है। (साभार)


बुधवार, 20 अगस्त 2025

ये होता है आँख में आँख डाल कर बात करना…

 ये होता है आँख में आँख डाल कर बात करना…


जुमलेबाज़ी, और आत्ममुग्धता के इस दौर में यदि सत्ता सौ सौ चूहे खाकर हज को चली की कहावत को चरितार्थ करते हुए संविधान का 130 वा बिल सदन में ला रही है तो इसका मतलब क्या सहयोगियों को डराना नहीं है, अल्पमत या बैसाखियों की सरकार के करतूत नया नहीं है, ट्रंप की धमकी और अविश्वसनीय चीन से गलबहियाँ के बीच वोट चोरी के सबूत के आगे सरेंडर चुनाव आयोग के बीच आज एक ऐसे शख़्स की कहानी को याद करना ज़रूरी है जिसने मोदी सरकार से आँख से आँख मिलाने कि सज़ा पिछले कई सालों से भुगत रहा है, जेल में है लेकिन उनकी पत्नी और बच्चे इस लड़ाई को आगे ले जा रहे, लड़े जा रहे है अंजाम से बेपरवाह…

बात की शुरुआत चुनाव आयोग गुप्ता की फूहड़ता से की जा सकती है जो राहुल के सवालों का जवाब देने की बजाय बेशर्मी पर उतर आया है, तो दूसरी तरफ़ Ed सीबीआई का डर दिखाकर दूसरे दलों के नेताओं को अपने पाले में कर लेने का खेल करने वाले अब १३० वा बिल लाकर नैतिकता की दुहाई दे रहे है तब उस शख़्स को याद कर लेते हैं , मोदी के आंख में आंख डालकर कोई शख्स लड़ा और उसकी कीमत चुका रहा है तो वे आईपीएस संजीव भट्ट हैं।1245 दिन से संजीव भट्ट पालनपुर जेल में हैं।उन्हें पहले 23 साल पुराने ड्रग्स केस में फंसाया गया,फिर 32 साल पुराने हिरासत में मौत मामले में फंसाया गया है। 

गुजरात दंगों के वक़्त 27 फरवरी 2002 की रात को एक क्लोज मीटिंग में मोदी ने संजीव भट्ट सहित 8 आईपीएस को मुस्लिमों को सबक सिखाने की बात कही थी।बाकी सब आईपीएस ने हां कह दिया पर संजीव भट्ट ने मना कर दिया।उन्होंने कहा लॉ एंड ऑर्डर हमारी ड्यूटी है और एक आईपीएस के रूप में हिंदुओं के साथ मुस्लिमों की सुरक्षा करना मेरी जिम्मेदारी है।

यह बात मोदी को नागवार गुजरा ।2011 में आईपीएस संजीव भट्ट को निलंबित कर दिया गया।उन्हें मोदी ने साबरमती जेल में डाल दिया,फिर केंद्र में आने पर 2015 में पुलिस अधिकारी के रूप में उनकी सेवा भी खत्म कर दिया।संजीव भट्ट हार मानने की जगह लगातार लड़ते रहे।

मोदी को यह बर्दाश्त नहीं हुआ इसलिए पुराने मामलों में संजीव को जेल में डाल दिया। संजीव भट्ट के लिए जोर से सत्ता से टकराती उनकी पत्नी श्वेता पर हमला भी हुआ,उन्हें सुरक्षा मांगने पर भी नहीं दिया गया।संजीव भट्ट को हाई कोर्ट,सुप्रीम कोर्ट कहीं से भी न्याय नहीं मिल रहा है। 

संजीव भट्ट उनकी पत्नी श्वेता, उनके बेटे शांतनु और बेटी आकाशी बहुत बहादुर हैं।ये अलग ही मिट्टी के बने लोग हैं।मोदी इस परिवार की बहादुरी से गुजरात से डरता आया है।इस बहादुर परिवार का साथ देश के सभी लोगों को देना चाहिए।आज संजीव भट्ट और उनकी पत्नी श्वेता भट्ट के विवाह को 35 वर्ष पूरे हो गए हैं। उन्हें बहुत- बहुत शुभकामनाएं।उम्मीद है जल्द ही संजीव भट्ट आज़ाद होंगे(साभार)

मंगलवार, 19 अगस्त 2025

ये कौन आ गया…

 ये कौन आ गया…


स्वतंत्रता दिवस पर मोदी सरकार के ऑरवेलियन पोस्टर में गांधी, सुभाष और भगत सिंह से बड़ा सावरकर को बड़ा दिखाने का मतलब क्या सिर्फ़ संघी कुंठा है या फिर रेज़िम से लड़ना सीखा रहे राहुल गांधी से डरी सत्ता है, तय लोगो को करना है, राम मंदिर की पूजा कर चार सौ पार का दंभ भरने वाली सत्ता जब २४० पर अटक गई तो भी वह नहीं समझ रहा है कि आप कितनी भी होशियारी कर लो प्रकृति के न्याय से बच नहीं सकते…

स्वतंत्रता दिवस पर मोदी सत्ता की पोस्टर पर चर्चा करने से पहले हम याद दिलाना चाहते हैं कि  जिस दिन राममंदिर का कार्यक्रम हो रहा था 22 जनवरी को उस दिन तो ये माहौल था कि विपक्ष को एक भी सीट नहीं आयेगी ऐसा अंधी फौज वातावरण बना रहीं थी पर अब तो ये हालत हैं कि चुनाव आयोग की बेईमानी नहीं होती तो सत्तापक्ष 150 पर सिमट जाता। पर परिवर्तन आया राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा से। लोगो ने फिर से कांग्रेस को नोटिस करना शुरू कर दिया। अब राहुल गांधी फिर से आंध्र प्रदेश वाली स्टाईल में लगे हैं और चुनाव आयोग से दो दो हाथ कर रहे हैं तो अब एक काम और होगा कि लोगो की चर्चा में अब ये बात आ जायेगी कि मोदी का विकल्प राहुल गांधी ही हैं। वास्तव में भारत को बहुत दिनो बाद कोई मिला हैं जो रेजिम से लड़ना सीखा रहा सबको। दुसरा गांधी आ गया हैं और आज के युवा का ओर हम सबका ये सौभाग्य हैं कि फिर से रेजिम को घुटने टेकते हम लोग देखेंगे । क्योकिं उस गांधी के सामने रेजिम झुका था ये हम देखे नहीं थे परंतु तरीका वहीं लेकर दुसरा गांधी आज रेजिम को झुका रहा है तो इतिहास की ये पुनरावृत्ती आनंददायक हैं और लगता हैं नियती हमारी कल्पना से बाहर आगे बढ़ गई हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वो सवाल जो केंचुआ कल की प्रेस कांफ्रेंस में पूछे गए लेकिन जिनका कोई सीधा जवाब नहीं मिल पाया :

* राहुल गांधी से एफिडेविट मांगा तो अनुराग ठाकुर से क्यों नहीं?

* समाजवादी पार्टी ने जो एफिडेविट दिया था उसकी जांच क्यों नहीं?

* वोटर लिस्ट डिफेक्टिव थी तो क्या पुराने चुनाव में घपला था?

* SIR से पहले पार्टियों से राय मशविरा क्यों नहीं हुआ?

* चुनाव वाले साल में इंटेंसिव रिवीजन ना करने की स्थापित मर्यादा क्यों तोड़ी गई?

* इतनी हड़बड़ी में बारिश बाढ़ के बीच SIR क्यों?

* कितने लोगों ने फॉर्म के साथ कोई दस्तावेज नहीं जमा करवाया ?

* BLO ने कितने फॉर्म को “नोट रिकमेंडेड” श्रेणी में डाला? किस आधार पर?

* बिहार में SIR के दौरान जून-जुलाई के बीच कितने नाम जोड़े गए?

* SIR के ज़रिए पुरानी वोटर लिस्ट में कितने विदेशी घुसपैठिए निकले?

लेकिन यदि मक्कारी हो तो जवाब सन्नाटा ही रहेगा।

ख़ैर आज बात उस कुंठा की…

स्वतंत्रता दिवस पर मोदी सरकार के 'ऑरवेलियन' पोस्टर में गांधी और सुभाष चंद्र बोस,भगत सिंह से ऊपर सावरकर को दिखाया गया, जिसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है। जिस महात्मा गांधी को पूरी दुनिया पूजती है, मार्टिन लूथर किंग जू. से लेकर नेल्सन मंडेला तक।

बराक ओबामा जब राष्ट्रपति थे तो उनसे एक विद्यालय में स्टूडेंट द्वारा पूछा गया था कि: 

जीवित या दिवंगत में से,यदि मौका मिले तो किसके साथ  आप डिनर लेना चाहेंगे? उन्होंने तुरंत कहा " महात्मा गांधी "

महात्मा गांधी के हत्यारे गोडसे, षड्यंत्रकर्ता सावरकर जो इन संघियों, भाजपाइयों, के आदर्श हैं, के द्वारा इस महान सपूत की हत्या की गई, क्या यह भारतीय संस्कृति के सहिष्णुता पर कलंक नही है...??

फोटो और दुस्साहस देखिए, आखि़र कितने निर्लज्ज एवं गद्दार हैं ये संघी, भाजपाई...!!

 कौन है यह सावरकर....??

 जिन्ना के मुस्लिम लीग से 3 वर्ष पूर्व ही सावरकर ने हिन्दू राष्ट्र की मांग कर दी थी...

उन्होंने 1943 को लिखा कि " मि. जिन्ना के " दो राष्ट्र " सिद्धांत से मेरा कोई झगड़ा नही है, हम हिंदू अपने आप में राष्ट्र हैं, और यह ऐतिहासिक तथ्य है कि हिंदू और मुस्लिम दो अलग राष्ट्र है "  

ये वही सावरकर है जिन्होंने  " द इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेंस -1857 " लिखी थी। साथ ही यह वही सावरकर हैं जिन्होंने लिखा है कि:  यह राष्ट्र उन्हीं का है जिसका यह पितृभूमि है, पुण्यभूमि है, अर्थात इनकी माने तो मुस्लिम और पारसी , ईसाई को बाहरी मानतें हैं ...

 जेल में जीवन गुजारे किन्तु अंत मे अंग्रेजों के प्रति ईमानदार स्वामी भक्ति का माफीनामा भी लिखे। एवं अंग्रेजों से पेंसन लेते रहे...

 " 1942 के " अंग्रेजों भारत छोड़ो " आंदोलन का विरोध करते हुए अपने संगठन हिंदू महासभा द्वारा अंग्रेजों का साथ देने की घोषणा की..

 अंग्रेजों का साथ देने के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आजाद हिन्द फौज का विरोध किया, एवं आजाद हिन्द फौज के खिलाफ लड़ने के लिए जगह जगह जाकर युवाओं से अंग्रेजी सेना में भर्ती  होने को कहा ....

 क्या देश का इससे बड़ा भी कोई गद्दार हो सकता है....?? 

भक्तों को नही पता कि सावरकर नास्तिक था क्योंकि भक्तों के नजर में नास्तिक दुश्मन होते हैं ....

इसीलिए सावरकर ने हिन्दूधर्म में जिस  गाय को पूज्यनीय माता का दर्जा दिया गया है, उसे काटने एवं गाय के गोश्त खाने की भी पैरोकारी की । साथ ही गाय के गोबर एवं मुत्र को गंदा कहकर निकृष्ट जानवर बताया है। सावरकर गाय को पूज्यनीय मानने से इंकार कर देते हैं । इसपर गाय, गोबर वाले संघी भक्त चुप रहते हैं ...

 बहरहाल गांधी के हत्या के आरोप हिन्दू महासभा के इस नेता सावरकर पर भी लगता है , संलग्नता होने के बावजूद पर्याप्त सबूतों के अभाव में सावरकर को बरी कर दिया जाता है । ये भी एक रहस्य है...

 इनके द्वी राष्ट्र सिद्धांत पर भारत और पाकिस्तान नाम से दो राष्ट्र हो चुका है । इनके विचारों को मानने वालों की केन्द्र में सरकार है जो इन्हें भारत रत्न देने पर विचार कर रही हैं...(साभार)

 


सोमवार, 18 अगस्त 2025

सुभाष बाबू का सच और पूरा एक झूठा जमात…

 सुभाष बाबू का सच और पूरा एक झूठा जमात…


वैसे भी कहा जाता है कि जिसका पूरा इतिहास कलंक से भरा हो वह इतिहास पुरुषों  के पीछे छिपकर अपना पाप छुपाने की कोशिश करता है , जिनका पूरा कुनबा अंग्रेजों की वफ़ादारी और नफ़रत से सराबोर हो उन लोगों से उम्मीद बेमानी है , उनकी निष्ठा न तो भगत सिंह, सरदार पटेल के प्रति है और न ही सुभाष बाबू के प्रति, वे तो केवल झूठ फैलाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते है ऐसे में सुभाष बाबू को लेकर फैलाए गए भ्रम का पर्दाफ़ाश ज़रूरी है…

नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय जनमानस में एक अमर वीर नायक हैं। कई अन्य नेताओं की तरह नेताजी कभी विस्मृति में नहीं डूबे। उनका असाधारण जीवन, संघर्ष और मृत्यु आज भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। यदि भारतीय मन में अदम्य, निडर और साहसिक देशभक्ति का कोई मनोहारी चेहरा है, तो वह निश्चित रूप से नेताजी ही हैं।

उनके लक्ष्य प्राप्ति के लिए अपनाए गए रास्ते, उसकी व्यावहारिकता की कमी और फासीवादियों का समर्थन लेने जैसे कदमों की आलोचना के बावजूद, उनके देशभक्ति पर किसी को संदेह नहीं था। यही कारण है कि नेताजी की रहस्यमयी मृत्यु को आज भी हम गहरे दुख के साथ याद करते हैं।

हालांकि, हाल के समय में नेताजी की स्मृति को उनके महान विरासत को हड़पने और गांधीजी, नेहरू सहित राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं को उनके प्रतिनायक के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति देखी जा रही है। लेकिन अहिंसा पर आधारित स्वतंत्रता संग्राम की राजनीतिक प्रभावशीलता पर मतभेद, नेताजी के उत्साहपूर्ण रवैये पर असहमति, और हिटलर व मुसोलिनी के प्रति उनके रुझान के विरोध के बावजूद, गांधीजी और नेहरू के साथ नेताजी का परस्पर स्नेह और सम्मान का एक अनुपम बंधन था। नेताजी, गांधीजी, नेहरू और जिन्ना द्वारा एक-दूसरे को लिखे गए पत्रों को पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाता है। सुगाता बोस की पुस्तक (Subhash Chandra Bose: Speeches, Articles and Letters) और रुद्रांशु मुखर्जी की पुस्तक (Nehru and Bose: Parallel Lives) में इसका स्पष्ट उल्लेख है।

कथित तौर पर तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली को नेहरू द्वारा लिखा गया एक जाली पत्र, जिसमें नेहरू ने नेताजी को "आपका युद्ध अपराधी" कहा, सोशल मीडिया पर नेहरू की नेताजी के प्रति "कट्टर शत्रुता" के सबूत के रूप में व्यापक रूप से प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन, 26 और 27 दिसंबर 1945 को अलग-अलग तारीखों के साथ इस पत्र की कई प्रतियां इंटरनेट पर उपलब्ध होने के कारण, यह स्पष्ट है कि यह पत्र जाली है। नेहरू की भाषा शुद्धता और शैली को जानने वाले इस पत्र को, जो व्याकरण और वर्तनी की गलतियों से भरा है, हंसी में उड़ा देंगे। फिर भी, यह सोचने की बात है कि भारत में लाखों लोग इस तरह के फोटोशॉप निर्मित पत्र को उत्साहपूर्वक प्रचारित करते हैं। दावा किया जाता है कि नेहरू ने दिल्ली में अपने स्टेनोग्राफर श्यामलाल जैन को यह पत्र लिखवाया था। लेकिन, समकालीन समाचार पत्रों से स्पष्ट है कि 25 से 29 दिसंबर तक नेहरू बिहार और इलाहाबाद में थे।

25 दिसंबर 1945 को बिहार के बांकीपुर में एक सार्वजनिक सभा में, नेहरू ने आईएनए का प्रेरणादायक युद्ध गीत "कदम कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाए जा..." को उत्साहपूर्वक गाया और जनता से इसे जोश के साथ दोहराने का आह्वान किया। यह खबर अगले दिन इंडियन एक्सप्रेस में प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी। यह कल्पना करना कितना हास्यास्पद है कि एक दिन पहले नेताजी के युद्ध गीत को उत्साह से गाने वाले नेहरू ने अगले ही दिन उन्हें "युद्ध अपराधी" कहकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री को पत्र लिखा!

जिन्हें अब कुछ लोग "नेताजी के शत्रु" कहते हैं, वही इंडियन नेशनल कांग्रेस थी, जिसने 1945-46 में आईएनए अधिकारियों के सार्वजनिक मुकदमे में उनकी पैरवी के लिए आगे बढ़कर वकीलों की एक मजबूत टीम बनाई, जिसमें नेहरू स्वयं शामिल थे। इसके लिए नेहरू ने 25 साल बाद वकील का चोगा फिर से पहना। भूलाभाई देसाई, आसफ अली, तेज बहादुर सप्रू, और होरीलाल वर्मा जैसे प्रख्यात वकीलों ने आईएनए अधिकारियों के लिए मजबूती से अदालत में पैरवी की और उन्हें भारतीय जनता के सामने वीर नायकों के रूप में स्थापित किया। यह काम कांग्रेस ने किया, न कि हिंदू महासभा के नेताओं ने।

कांग्रेस और आईएनए रिलीफ कमेटी ने 12 नवंबर 1945 को कोलकाता के देशप्रिय पार्क में आयोजित आईएनए दिवस समारोह में नेताजी के भाई शरत बोस, नेहरू और सरदार पटेल ने लाखों लोगों को संबोधित करते हुए नेताजी की साहसिक देशभक्ति की भावुक बातें कीं। प्रधानमंत्री बनने के बाद लाल किले में अपने पहले भाषण में भी नेहरू ने गांधीजी के साथ केवल नेताजी का ही उल्लेख किया।

भारतीय संविधान के मूल स्वरूप में केवल दो स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरें शामिल की गईं: पहली, राष्ट्रपिता गांधीजी की, और दूसरी, नेताजी की, जिन्हें गांधीजी को "राष्ट्रपिता" कहने वाले पहले व्यक्ति के रूप में जाना जाता है।

आईएनए की चार ब्रिगेडों के नाम गांधी, नेहरू, आजाद और सुभाष थे, साथ ही झांसी रानी रेजिमेंट भी थी। इन नामों को चुनते समय नेताजी के दिमाग में सावरकर या गोलवलकर का नाम कभी नहीं आया। यह स्पष्ट है कि नेताजी का विश्वदृष्टिकोण धर्मनिरपेक्ष और बहुलवादी था, और वे अपनी कांग्रेस विरासत पर गर्व करते थे।

इतिहास में कई सबूत हैं जो नेहरू और बोस के बीच गहरे भावनात्मक बंधन को दर्शाते हैं। जब नेहरू की पत्नी कमला नेहरू यूरोप में बीमार थीं, तो बोस ने एक भाई की तरह उनकी हर संभव मदद की। जून 1935 में, पित्ताशय की सर्जरी के बाद वियना से चेकोस्लोवाकिया की यात्रा के दौरान, गंभीर अस्थमा से पीड़ित और अत्यंत कमजोर कमला नेहरू के साथ बोस प्राग गए। उस समय नेहरू भारत में जेल में थे।

सितंबर में, बोस ने जर्मनी के बैडनवीलर सैनिटोरियम में इलाजरत कमला को फिर से देखा। तब तक मरणासन्न कमला से मिलने की अनुमति पाकर नेहरू वहां पहुंच चुके थे। बोस ने एक स्नेहपूर्ण भाई की तरह दोनों के साथ समय बिताया। मानसिक रूप से टूट चुके नेहरू के लिए बोस की उपस्थिति एक बड़ा सहारा थी।

जब कमला को स्विटजरलैंड के लुसाने में एक रिसॉर्ट में भर्ती किया गया, तो बोस वहां भी पहुंचे। 26 फरवरी 1936 को बोस लुसाने पहुंचे। कमला की गंभीर स्थिति को समझकर बोस ने रोमेन रोलैंड से मिलने की अपनी यात्रा रद्द कर दी और अपने प्रिय मित्र के साथ अस्पताल में रहे। तब तक नेहरू की बेटी इंदिरा भी वहां पहुंच चुकी थीं। अंततः, 28 फरवरी को कमला के अंतिम सांस लेने के समय बोस नेहरू और इंदिरा को गले लगाकर सांत्वना दी। शव के अंतिम संस्कार की व्यवस्था भी बोस ने ही की (कृष्णा बोस, Emilie and Subhash: A True Love Story)।

बोस की दुखद मृत्यु के बाद भी नेहरू उन्हें नहीं भूले। कांग्रेस द्वारा नेताजी के नाम पर बनाए गए ट्रस्ट में नेहरू भी सदस्य थे, और उनकी सरकार ने नेताजी की बेटी और पत्नी को प्रतिवर्ष छह हजार रुपये भेजे। 1961 में जब नेताजी की बेटी अनिता बोस निजी यात्रा पर भारत आईं, तो नेहरू ने उनका भव्य स्वागत किया। अठारह साल की उस लड़की को कई राज्यों में आतिथ्य और भोज दिया गया, और दिल्ली में वह नेहरू के आधिकारिक निवास पर रहीं।

कई लोग मानते हैं कि अगर नेहरू की जगह नेताजी प्रधानमंत्री होते, तो भारत का भविष्य कुछ और होता। लेकिन नेताजी नेहरू से भी अधिक स्पष्ट समाजवादी थे। जब वे कांग्रेस अध्यक्ष बने, तो उन्होंने पहली बार प्लानिंग कमीशन बनाया और नेहरू को इसका अध्यक्ष बनने के लिए आमंत्रित किया। साथ ही, वे आधुनिकता, धर्मनिरपेक्षता और समानता में दृढ़ विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे।

उन्होंने मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा जैसे धार्मिक संगठनों के सदस्यों को कांग्रेस में शामिल होने से रोक दिया था। आईएनए में उन्होंने सभी धर्मों के लोगों को शामिल किया। उन्होंने कभी भी हिंदू प्रतीकों या हिंदू पहचान पर आधारित राष्ट्रवाद में विश्वास नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने "विविधता भरे भारत" के विचार में विश्वास किया और इसे बढ़ावा दिया।

उन्होंने स्वतंत्र भारत में सभी धार्मिक और भाषाई समुदायों को समान रूप से सत्ता में हिस्सेदारी देने की वकालत की। एक बार सिंगापुर के एक चेट्टियार मंदिर के पुजारियों ने उन्हें मंदिर में आने का निमंत्रण दिया, लेकिन गैर-हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश न देने के नियम के कारण उन्होंने पहले इसे ठुकरा दिया। जब उन्हें सभी जातियों और धर्मों को शामिल करने वाले एक सार्वजनिक समारोह का आश्वासन मिला, तभी वे मंदिर गए। उस समय उनके साथ आईएनए के मुस्लिम सहयोगी आबिद हसन और मोहम्मद समयम कियानी भी थे।

संक्षेप में, नेताजी ने एक धर्मनिरपेक्ष, स्वतंत्र और समतामूलक लोकतांत्रिक भारत के लिए जिया और मरा। उनकी विचारधारा और कार्यशैली एकरूप और धार्मिक उग्र दक्षिणपंथ के बिल्कुल विपरीत थी। इसलिए उनकी विरासत को बहुसंख्यक राष्ट्रवाद के पैरोकार आसानी से हड़प नहीं सकते।

नेताजी ने साम्राज्यवाद का प्रतिरोध आत्मबलिदान के माध्यम से किया, न कि धर्मनिरपेक्षता और स्वतंत्रता संग्राम को धोखा देकर। इसलिए नेहरू को बाहर रखकर पोस्टर में फोटो लगाकर नेताजी को आसानी से अपना बनाने की कोशिश न करें।

(मेरी पुस्तक "इंडिया का विचार" का एक प्रिय अध्याय - सुधा मेनन)

रविवार, 17 अगस्त 2025

प्रेस कांफ्रेंस का खेल करते पकड़े गये चुनाव आयोग

 प्रेस कांफ्रेंस का खेल करते पकड़े गये चुनाव आयोग 


यह तो चोरी और सीना ज़ोरी की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना वोट चोरी के मामले में चुनाव आयुक्त इस तरह से खेल नहीं करते कौन है ये ज्ञानेश कुमार गुप्ता आप भी जान ले…

देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता जी राजनैतिक प्रेस कॉन्फ्रेंस करने आए थे और धमका कर चले गए।तो क्या यह सब नौटंकी सिर्फ़ राहुल को धमकाने के लिए थी जबकि राहुल को लेकर पूरी दुनिया जान चुकी है कि राहुल किसी से डरने वाले नहीं हैं 

शायद चुनाव आयुक्त में इतनी भी समझ नहीं है कि संघर्ष, बाधा, परिस्थिति की एक ब्राइट एस्पेक्ट होता है, यह लीडर पैदा करता है ।

राहुल गांधी को मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे, पर तब वो एक परिपक्व राजनेता नहीं बन पाते। आज वो पीएम नहीं हैं, पर लोक नेता बन चुके हैं !जो कि उन्होंने उनका माखौल, IT ED CBI दबाव , पार्टी की  हार के बीच ,पद यात्रा, संघर्ष, ईमानदारी,त्याग, प्यार से प्राप्त किया है।

आज अमित शाह के सहकारिता मंत्रालय में सचिव के रूप में कार्य कर चुका सीईसी ज्ञानेश गुप्ता के प्रेस कॉन्फ्रेंस से राहुल गांधी द्वारा लगाए गए आरोप और पुख़्ता हो गए, 

देश की जनता एवं प्रबुद्ध नागरिक, पत्रकारों ने राहुल गांधी को हीरो बता रहे हैं। जबकि ज्ञानेश गुप्ता को खलनायक, सोशल साइट इंस्टा, x आदि पर ज्ञानेश गुप्ता से लोग सवाल पूछ रहे हैं, ट्रोल कर रहे हैं।

बिहार का विधानसभा चुनाव एनडीए के लिए आखिरी कील साबित होगी।

ज्ञानेश कुमार गुप्ता गृहमंत्री अमित शाह के आंख कान रहें हैं। वह गृहमंत्री अमित शाह के सबसे विश्वसनीय अधिकारी रहे हैं जिन्हें समय पूर्व रिटायर कराकर देश‌ का चुनाव आयुक्त बनाया गया है। इसके पूर्व ज्ञानेश कुमार गुप्ता धारा 370 और राममंदिर निर्माण का नेतृत्व कर चुके हैं..

ज्ञानेश कुमार गुप्ता के पिता डॉ. सुबोध कुमार गुप्ता, पेशे से चिकित्सक थे और आगरा में चीफ मेडिकल ऑफिसर (CMO) के पद से सेवानिवृत्त हुए। 

ज्ञानेश कुमार गुप्ता के भाई मनीष कुमार 1991 बैच के भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी हैं।

ज्ञानेश कुमार गुप्ता के बहनोई उपेंद्र कुमार जैन 1992 बैच के मध्य प्रदेश कैडर के IPS अधिकारी हैं और वर्तमान में अपर पुलिस महानिदेशक (ADG) के पद पर कार्यरत हैं।

ज्ञानेश कुमार गुप्ता की बड़ी बेटी मेधा रूपम 2014 बैच की IAS अधिकारी हैं और वर्तमान में उत्तर प्रदेश के नोएडा जिले की जिलाधिकारी (DM) हैं। 

ज्ञानेश कुमार गुप्ता की इस बेटी के पति‌ मनीष बंसल भी 2014 बैच के IAS अधिकारी हैं और सहारनपुर के जिलाधिकारी हैं। 

ज्ञानेश कुमार गुप्ता की छोटी बेटी अभिश्री, भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी हैं, जिन्होंने 2017 में UPSC सिविल सेवा परीक्षा पास की। 

अभिश्री के पति, अक्षय लाबरू, 2018 बैच के त्रिपुरा कैडर के IAS अधिकारी हैं और वर्तमान में जम्मू-कश्मीर में सूचना विभाग के निदेशक और लेफ्टिनेंट गवर्नर के सचिवालय में अतिरिक्त सचिव के रूप में कार्यरत हैं।


बेटा: अरनव, जो अभी पढ़ाई कर रहा है वह भी जल्दी ही IAS बनेगा.. 


बाकी लोगों को 5 किलो मुफ्त अनाज मिल ही रहा है...(साभार)

शनिवार, 16 अगस्त 2025

छत्तीसगढ़ की बेटी श्वेता चौबे आईपीएस ने छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया

 छत्तीसगढ़ की बेटी श्वेता चौबे आईपीएस ने छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया 



झारखंड में शेरनी आईपीएस श्वेता चौबे छत्तीसगढ़ की बेटी है, उन्होंने अपने पिता के पदचिह्नों पर चलकर न केवल छत्तीसगढ़ को गौरान्वित किया बल्कि ऐसा मुक़ाम हासिल किया जो हर आईपीएस का सपना होता है, मूलतः सारंगढ़ की श्वेता चौबे ने साबित कर दिया कि यदि ईमानदारी से कर्तव्य निभाया जाय तो कोई कार्य असंभव नहीं है, श्वेता की माँ पुष्पा चौबे सेमरा परिवार की बेटी है।

आईपीएस श्वेता चौबे की स्मार्ट पुलिसिंग के बारे में कौन नहीं जाता है। वर्तमान में पौडी में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात श्वेता चौबे अपनी विशिष्ठ कार्यशैली के लिए पहचानी जाती है। इससे पहले पुलिस अधीक्षक चमोली के पद पर कार्यरत रही है। कोरोना काल में बतौर एसपी सिटी उनके कार्यकाल की हर किसी ने सराहना की है। देहरादून में लोग आज भी उनको याद करते हैं। इसके अलावा 2021 के महाकुंभ के दौरान उन्होंने जिस तरह से कार्य किया है वह किसी से छिपा नहीं है। एसआइटी में रहते हुए उन्होंने शिक्षक भर्ती घोटाले का भंडाफोड़ किया तो विजिलेंस में रहते हुए बड़े-बड़े भ्रष्टाचारियों को जेल भेजने का काम किया है। अंकिता भंडारी कांड के बाद पौड़ी जिले के बिगड़ते हालत को देखते हुए उनको पौड़ी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की जिम्मेदारी मिली थी। उनके नेतृत्व में पौड़ी पुलिस ने कई बड़ी सफलता हासिल की है। इस बार के कांवड़ मेले के दौरान नीलकंठ महादेव मंदिर में उमड़ी भीड़ एवं खराब मौसम के बीच वह लगातार पुलिसकर्मियों का उत्साहवर्धन करती रही। 

इससे पहले महिला सुरक्षा के लिए चलाए गए ऑपरेशन पिंक प्रोजेक्ट के लिए आईपीएस श्वेता चौबे स्कोच अवार्ड से सम्मानित। नई दिल्ली में आयोजित समारोह में उन्हें यह सम्मान मिला। चौबे ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक पौडी गढवाल के कार्यकाल के दौरान कुशल नेतृत्व और उत्कृष्ट कार्य प्रणाली के तहत जनपद में बालिकाओं व महिलाओं की सुरक्षा को गंभीरता से लेते हुए ऑपरेशन पिंक प्रोजेक्ट चलाया गया था। इसके तहत जनपद में वृहद स्तर पर प्रशिक्षण देकर महिला दरोगा व महिला कांस्टेबल को महिला सुरक्षा से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर प्रशिक्षित किया गया। उसके उपरांत उन्हें जनपद के विभिन्न थाना क्षेत्रों में ऑपरेशन पिंक के अन्तर्गत पिंक यूनिट टीम का गठन कर तैनात किया गया। पिंक यूनिट टीम का कार्य अपने थाना क्षेत्रों में पड़ने वाले स्कूल कालेज परिसर के बाहर मौजूद रहकर शान्ति एवं कानून व्यवस्था बनाने, मनचलों, शरारती, अराजक तत्वों पर कड़ी नजर रखने, छात्राओं को गुड टच बैड टच की जानकारी देने, साइबर सुरक्षा, पोक्सो एक्ट व सोशल मीडिया में ट्विटर, इस्टाग्राम, फेसबुक का सुरक्षित उपयोग सम्बन्धी जानकारी देना रहा। स्कूल-कॉलेज, नौकरीपेशा लड़कियों, महिलाओं की सुरक्षा के लिए पिंक यूनिट ने सुरक्षा कवच का काम किया।

दुर्ग जिले में बिता है IPS श्वेता चौबे का बचपन
इसके बाद वे सन 2000 में विशिष्ट पुलिसिंग सेवा के लिए भी राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजे गए थे। आपको बता दें कि श्वेता चौबे का पूरा बचपन छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में ही बीता है और उनका दादिहाल सारंगढ़ है। श्वेता ने सन 2005 में बतौर डीएसपी राज्य पुलिस सेवा में अपने करियर की शुरुआत की थी और अपने दबंग अंदाज के चलते उन्हें धीरे-धीरे पूरे उत्तराखंड में उत्तराखंड की शेरनी के नाम से जाना जाने लगा। सन 2019 में उन्हें आईपीएस अवार्ड हुआ और वे देहरादून में बतौर एसपी पदस्थ हुई, कोरोना काल में बतौर एसपी सिटी उनके कार्यकाल की हर किसी ने सराहना की। इसके अलावा 2021 के महाकुंभ के दौरान उन्होंने जिस तरह से कार्य किया वह किसी से छिपा नहीं है।

श्वेता चौबे ने बताया कि उनके पिता  विजय शंकर चौबे को बचपन से ही उन्होंने पुलिस में सेवा देते हुए देखा है जिसके चलते वे भी बचपन से ही एक बड़ी पुलिस अधिकारी बनना चाहती थी और उनका यह सपना तब पूरा हुआ जब वे उत्तराखंड राज्य पुलिस सेवा में बतौर डीएसपी पदस्त हुईं। श्वेता ने बताया कि इस पुरस्कार के मिलने से वे बहुत खुश हैं लेकिन उससे भी ज्यादा खुशी उन्हें इस बात की है कि वे अपने पिता के पदचिन्हों पर आगे बढ़ रहीं है और आगे भी इसी तरह वो अपने पिता के आदर्शों के साथ ईमानदारी से पुलिस विभाग में अपनी सेवाएं देती रहेंगी।

श्वेता चौबे के पिता विजय शंकर चौबे दो बार राष्ट्रपति पदक से सम्मानित हुए पहली बार १९८७ और दूसरी बार २००० में। 

मूलतः सारंगढ़ के रहने वाले श्री चौबे का ससुराल सेमरा परिवार है, श्वेता चौबे की माँ पुष्पा चौबे सेमरा परिवार की बेटी है ।