गुरुवार, 28 अगस्त 2025

विपुल पांचोली और न्यायिक विश्वसनीयता…

 विपुल पांचोली और न्यायिक विश्वसनीयता…


सारी संस्थाओं को मुट्ठी में रखने की कोशिश का मतलब ही तानाशाही होता है, यदि सब कुछ सरकार के इशारे पर चले तो आपातकाल की घोषणा की जाय या नहीं कोई मायने नहीं रखता, तब संसद में आवाज़ भी नक्कार खाने की तूती की तरह हो गई है, संवैधानिक संस्थान ही नहीं देश के संसाधनों पर भी मित्रों के ज़रिये क़ब्ज़ा क्या तानाशाह नहीं है, लेकिन आज बात जस्टिस नागरत्ना की हिम्मत और गवई की लाचारी…

राहुल गांधी के दो साल सजा को बरकरार रखने वाले  जस्टिस विपुल पंचोली बने सुप्रीम कोर्ट में जज..!!

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस विपुल पंचोली के विवादास्पद क्रेडिबिलिटी के कारण उन्हें गुजरात से बिहार के पटना हाईकोर्ट में ट्रान्सफर किया गया था। किन्तु पिछले महीने 21जुलाई को वहां का मुख्य न्यायाधीश बनाया गया,

और अब जस्ट एक ही महीने में आज उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बना दिया गया है।

इनके नियुक्ति, न्यायिक इंटीग्रिटी, संवैधानिक एवं विधिक योग्यता पर मीडिया एवं सिविल सोसायटी में सवाल खड़े किए गए हैं।

इस मुद्दे पर 'कैम्पेन फॉर जुडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म्स'  नामक संस्था ने भी बयान जारी किया।

सीजेएआर ने कहा- सीजेआई बीआर गवई की अध्यक्षता वाली पांच जजों के कोलेजियम में जस्टिस पंचोली की नियुक्ति 4-1 के बहुमत से हुई, 

क्योंकि जस्टिस नागरत्ना ने असहमति जताई। और कहा कि इस नियुक्ति से न्याय प्रशासन एवं कोलेजियम प्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल उठेगा।

सीजेएआर के मुताबिक जस्टिस पंचोली गुजरात से सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त होने वाले तीसरे जज हैं, जो गुजरात हाईकोर्ट के आकार की तुलना में असंतुलित प्रतिनिधित्व है। 

साथ ही वे हाईकोर्ट जजों की ऑल इंडिया सीनियरिटी लिस्ट में 57वें नंबर पर हैं।

पर अब इनसे 57 सीनियर जजों को दरकिनार करते हुए इन्हें जज बना दिया गया है। और 2031 में यही महान न्यायमूर्ति हमारे देश के मुख्य न्यायाधीश भी बनेंगे।

यह नियुक्ति जिस सीजेआई द्वारा की गई है वह बाबा साहब डॉ अम्बेडकर को अपना आदर्श मानते हैं, बौद्ध एवं दलित हैं। जिस सिस्टम में की गई है वह कोलेजियम है, जो पूर्ण स्वायत्त है। 

इसलिए सरकारी हस्तक्षेप के आरोप से मोदी सरकार टेक्निकली पूरी तरह बरी एवं फ्री है।(साभार)


Vishwajit Singh

बुधवार, 27 अगस्त 2025

अमेरिकी दादागिरी की असली वजह क्या अदानी से जुड़ा है

 अमेरिकी दादागिरी की असली  वजह क्या अदानी से जुड़ा है…


मोदी सत्ता भी ग़ज़ब है कल तक नियम क़ानून को ताक पर रखकर अंबानी बंधुओं की मदद करते नहीं थकती थी , वह आज उन्हें जाँच एजेंसियों से डराने लगी है, इस छापेमारी को तो लोग जगदीप धनखड़ के इस्तीफ़े और तख्ता पलट की क़वायद से भी जोड़ रहे हैं तब अमेरिकी टैरिफ़ को लेकर चल रही लड़ाई क्या मोदी अदानी का कोई खेल है जिसका भारत को नुक़सान उठाना पड़ रहा है…

अमेरिकी टैरिफ़ का भारत पर क्या प्रभाव पड़ेगा यह सब बताये उससे पहले बता देते हैं कि मोदी ने कभी दावा किया था कि ट्रंप उनके सबसे अच्छे मित्र है और सिर्फ़ दावा नहीं बल्कि उन्हें जीताने ज़मीन आसमान छान दिया था, 

ऐसे में अचानक यह सब क्या हो गया, कहा जाता है कि ट्रंप और अदानी के कुछ व्यापारिक ख़ून्नास या धोखाधड़ी का मामला है, तो क्या अदाणी ने ट्रंप के साथ चिटिंग की, 

ट्रंप के द्वारा अंबानी को तवज्जो देने की यही वजह बताई जा रही है तब अंबानी का धनखड़ के साथ खेल के पीछे क्या ट्रंप है और अब अंबानी धनखड़ के साथ निशाने पर है

यह सब चलता रहेगा तब अमेरिका द्वारा भारत पर लगाया गया 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ आज (बुधवार) से प्रभावी हो जाएगा। इस कदम का सीधा असर भारत के परिधान, टेक्सटाइल, रत्न-आभूषण, लैदर, कालीन और फर्नीचर जैसे श्रम आधारित उद्योगों पर पड़ेगा । 

अमेरिकी प्रशासन द्वारा इसे पहले जुलाई 2025 में 25 प्रतिशत रेसिप्रोकल टैरिफ लगाया गया था। इसके बाद अब दूसरी बार 27 अगस्त 2025 लगाया जा रहा है। अमेरिका का कहना है कि भारत रूस से लगातार तेल की खरीद कर रहा है जिससे रूस यूक्रेन  युद्ध में रूस को आर्थिक मजबूती मिल रही है इसलिए यह टैरिफ रूस यूक्रेन युद्ध रोकने के लिए जरूरी है जिस कारण से यह नया टैरिफ लगाया गया है।

इसके जवाब में गुजरात में प्रधानमंत्री ने एक रैली में अपने भाषण में अमेरिका और ट्रंप का नाम लिए बिना जो  कहा उसके कुछ अंश  

"दुनिया में आर्थिक स्वार्थ वाली राजनीति, सब कोई अपना करने में लगा है, उसे हम भलीभांति देख रहे है और में गांधी की धरती से बोल रहा हूं, दबाव कितना भी आए हम झेलने की अपनी ताकत बढ़ाते जाएंगे"

हालांकि एक तरफ आत्मनिर्भरता के दावे किए  जा रहे है और दूसरी तरफ दबाव को झेलते जाने के भाषण में शब्द एक विरोधाभास है आत्मनिर्भरता के प्रयास के तहत आज भारत में स्वदेशी निर्मित पहली मारुति इलेक्ट्रिक कार को हरी झंडी दिखाई गई यह एक कदम जरूर है लेकिन क्या यह पर्याप्त है जबकि अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त राशन दिया जाता है और बहुत बड़ी जनसंख्या वाले देश में मात्र कुछ फीसद लोग ही महंगी कार को खरीद सकते है ।

भारत को इस वैश्विक व्यापार असंतुलन के दौर में अन्य विकल्पों की तलाश कर अमेरिका की इस व्यापारिक आर्थिक दादागिरी को जवाब देना चाहिए साथ ही ऑपरेशन सिंदूर भारत पाक युद्ध सीजफायर के ट्रंप के दावे को स्पष्ट भाषा में जवाब देना चाहिए ताकि भारत की प्रभुसता अक्षुण्ण रहे । 140 करोड़ नागरिक और भारतीय संसद व्यापारिक और रणनीतिक मामलों में स्वयं निर्णय लेता है और किसी भी अन्य राष्ट्र की दखल को मंजूर नहीं करेगा । भारतीय लोकतंत्र संविधान निश्चित ही असंख्य संघर्षों बलिदानों से अर्जित किया गया है । इसके मूल्यों और संप्रभुता की रक्षा करना हर देशवासी नेता, प्रशासनिक अधिकारी  या नागरिक सबका फर्ज है । भले ही भारत को टैरिफ या सीजफायर के बयान या दबाव से ट्रंप कमजोर करने की कोशिश में है लेकिन भारत एक संप्रभु,लोकतांत्रिक गणराज्य है और गणतांत्रिक राष्ट्र रहेगा यह दुनिया जान ले ।

इसके साथ ही भारत को अपनी विदेश नीति और व्यापार नीति पर पुनर्विचार करने की जरूरत है क्योंकि अमेरिका इस द्विपक्षीय व्यापारिक संबंध में अधिक झुकाव अपनी तरफ चाह रहा है इसके साथ ही ट्रंप के लिए किए गए प्रधानमंत्री मोदी के पूर्व चुनावी दावे और करोड़ों रुपयों के आयोजनों पर भी पुनर्विचार करना चाहिए । और व्यापारिक और रणनीतिक मामलों में नए विकल्पों को तलाशना चाहिए । आत्मनिर्भरता की सिर्फ नारेबाजी से नहीं जमीनी स्तर पर शोध और विकास के साथ कृषि, व्यापार, विज्ञान तकनीकी के साथ मानव संसाधन का सकारात्मक उपयोग कर नए रोजगार सृजन, शिक्षा स्वास्थ्य, सड़क, और  निर्माण क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए नए आयाम तलाश कर आर्थिक मजबूती की तरफ कदम बढ़ाने चाहिए ।(साभार)

सोमवार, 25 अगस्त 2025

पीएम केयर फंड पर उठते सवाल..

 पीएम केयर फंड पर उठते सवाल…


मोदी सत्ता के दौर में देश के प्रधानमंत्री का डिग्री को लेकर उठते सवालों के बीच पीएम केयर फंड को लेकर भी सवाल उठने लगे है, ग़ज़ब पीएम का अज़ब खेल की तर्ज़ पर चल रहे खेला का मतलब सरल भाषा में समझिए…

पीएम केयर फंड को लेकर उठते सवाल के बारे में बताये उससे पहले बता देते हैं कि बहुत सारे लोग सोशल मीडिया पर लिख रहे हैं कि कब तक बचोगे? जब भी दूसरी सरकार बनेगी, डिग्री सार्वजनिक हो जाएगा। पर ऐसे लोग भूल रहे हैं कि शॉर्ट सर्किट से लगी आग,.. पानी में गल जाने...या चूहों के कतरने से कैसे रोक पाओगे?

 याद है न ! यही सरकार है ,जो सुप्रीम कोर्ट में बता चुकी है कि राफेल सौदे की फाइल चोरी हो गई है।

खैर, वर्तमान में हमारी देश की न्यायपालिका, विधायिका ,कार्यपालिका तीनों की लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता स्टेक पर है...!!

या सबसे बड़ा सवाल तो उस पीएम केयर फंड का है जिसे प्रचारित इस ढंग से किया गया मानो यह सरकारी हो ।लेकिन यह भ्रम भी अच्छे दिन की तरह टूट गया क्यों कि सरकार की निगाह में चुनावी नतीजे सरकार की नीतियों का जनता द्वारा अनुमोदन है। सरकार ने 24-03-2020 को लाॅक डाऊन कर दिया और 27-03-2020 प्रधान मंत्री जी ने टीवी पर आकर "पीएम केयर्स फंड" की घोषणा कर दी। इसे कहतें "आपदा में अवसर" आपदा तो जनता के लिए थी पर गुजरात के व्यापारी (डीएनए) ने उसमें मौका तलाश कर लिया। लोगों ने समझा कि शायद यह प्रधान मंत्री जी का जनता की केयर करने के लिए सरकारी फंड है। जबकि प्रधान मंत्री आपदा फंड और प्रधान मंत्री रीलीफ़ फंड पहले से ही मौजूद था। इस नये फंड का औचित्य समझ से बाहर था। लेकिन कहा गया है कि आपातकाल में लोगों की सोचने की शक्ति क्षीण हो जाती है। लोगों ने सरकार के कहने पर अपने वेतन का भी अंशदान किया। बहुत से लोगों ने अपनी पेट काट कर की बचत भी इस फंड में डाल दी ताकि प्रधान सेवक ग़रीब जनता के लिए फंड से मदद मुहैय्या करवा सकें।

लेकिन जब इस फंड के एकाउंट के बारे में पूछताछ की तो सरकार ने कहा," यह सूचना के अधिकार-2005 के दायरे से बाहर है। इसलिए कोई जानकारी देने की ज़रूरत नहीं है।

लेकिन लोग कहां मानते है वह सुप्रीम कोर्ट चले गए।  अब सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा,"यह कोई सरकारी फंड है ही नहीं। यह तो प्राइवेट फंड है।" हम तो समझ रहे थे कि जिस फंड के ट्रस्टी प्रधान मंत्री, गृह मंत्री, रक्षा मंत्री वित्त मंत्री और पीएमओ है और वह सरकारी चिन्ह इस्तेमाल कर रहें हैं वो प्राइवेट कैसे हो सकता है। लेकिन सरकार तो भी सरकार है, वो भी विश्व गुरू की वो कहां जवाब देती है।

पता लगा कि वर्ष 2021 के बाद इस फंड का ऑडिट तक नहीं हुआ। जो थोड़ा-बहुत एक-डेढ़ पेज के ऑडिट से पता लगा कि इस फंड से वेंटिलेटर खरीदे गए थे। कहां से, किस के लिए और कैसे खरीदे गए यह गोपनीय सूचना है। यह भी पक्के तौर पर पता नहीं है कि इस फंड में कितना पैसा है और किसने जमा किया है। यह भी किसी को नहीं पता। उड़ती खबर है कि इसमें बीस हजार करोड़ रुपए जमा हैं।

खैर साधारण आदमी होता तो सारी जांच एजेंसियाँ लग गई होती पीछे टीवी कैमरों समेत, सूत्रों से जानकारियां टीवी पर मिलती और गिरफ्तारियां हो जाती लेकिन सरकार के कामकाज पर कौन सवाल उठा सकता है। प्रधान मंत्री की केयर देखभाल करने के लिए यह प्राइवेट फंड है।

वैसे बदले हालात में जब विपक्ष मजबूत है और सरकार बहुमत के आंकड़े से दूर तो इस पीएम फंड की भी कुछ सुधि यानी केयर होनी चाहिए। पता तो लगे पीएम की कौन-कौन केयर कर रहा था और फंड किसकी केयर में लगा था।(साभार)

रविवार, 24 अगस्त 2025

संघ के फिर एक झूठ का पर्दाफ़ाश…

 संघ के फिर एक झूठ का पर्दाफ़ाश…


कभी सुभाष बाबू तो कभी सरदार पटेल, कभी भगत सिंह तो कभी शास्त्री को लेकर अफ़वाह उड़ाने वाली दुनिया की इस सांस्कृतिक संगठन को प्रधानमंत्री मोदी ने तो उसी दिन घुटने पर ला दिया था जब उनके चेले नड्डा ने कहा था कि बीजेपी को अब संघ की ज़रूरत नहीं है लेकिन संघ और समूची बीजेपी के झूठ की परते उधड़ने लगी है और अब इंदिरा को लेकर करपात्री महाराज के श्राप को लेकर फैलाए झूठ का सच भी सामने आने लगा है…


ये वही करपात्री महाराज हैं जिनके लिए भाजपाई ये कहते नहीं अगाहते कि इन्होंने इंदिरा जी को श्राप दिया था।

दरअसल, ये भी उनके प्रोपोगंडा का हिस्सा हुआ। करपात्री जी द्वारा जिस तिथि और साल की ये घटना बताई जाती है उसके अगले साल करपात्री जी ने ये किताब लिखी। 



इसमें उन्होंने गोलवलकर की वी एंड अवर नेशनहुड डिफाइंड और बंच ऑफ थॉट की समीक्षा की है। इसके अलावा उन्होंने rss के साथ अपने काम के अनुभव को भी बताया है। उन्होंने इसमें rss को जितना कोसा है उतना उस समय में नेहरू जी या इंदिरा जी ने भी नहीं कोसा होगा। 

इसमें उन्होंने rss के हर प्रोपोगंडा को उधेड़ कर रख दिया जो जनसंघ और उसके बाद अब भाजपा चला रही है। उन्होंने rss के दोहरे चरित्र की जिस तरह से व्याख्या की है वो वाकई आंख खोलने वाली है। उन्होंने rss के राष्ट्रवाद के एजेंडे को हिदुओं को पतन की ओर ले जाने का मार्ग बताया। उसका एक अंश यहां दिया है। शास्त्रों के माध्यम से उन्हें Rss और उसके हिंदुत्व के एजेंडे की जो धज्जियां उन्होंने उड़ाई है वो अद्भुत है। (साभार)

शनिवार, 23 अगस्त 2025

गोदी मीडिया क्यों कहलाता है सच आ गया सामने, सुनकर चौंक जाएँगे…

 गोदी मीडिया क्यों कहलाता है सच  आ गया सामने, सुनकर चौंक जाएँगे…


मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद मुख्य धारा की मीडिया क्यों गोदी मीडिया कहलाने लगी। क्या सिर्फ़ इसलिए कि यह नाम रवीश कुमार ने दिया या फिर इसकी कोई और वजह भी है, आख़िर गोदी मीडिया क्यों कहा जाता है , इसे ऐसे समझे….

गौर से देखिए ...... प्रधानमंत्री मोदी जी के सामने हाथ जोड़े, खींसे नूपुर रहे यह लोग कथित तौर पर देश के जाने माने पत्रकार हैं। अब आप ही बताएं क्या इन लोगों में इतना नैतिक साहस है कि यह सरकार या सत्ता से कोई सवाल कर सकें ??? तो क्या इसीलिए इनको गोदी मीडिया कहा जाता है। 

यही लोग 2014 के पहले सरकार से बढ़चढ़ कर सवाल करते थे क्योंकि तब मनमाफिक सरकार नहीं थी। जो सरकार थी वह धार्मिक नफरत फैलाने के इनके एजेंडे को सपोर्ट नहीं करती थी। दरअसल मीडिया के एक बड़े वर्ग पर क़ब्ज़ा की कोशिश उस दिन शुरू हो गया था जब विहीप के आसरे साधु संतों पर क़ब्ज़ा होने लगा था , फिर इन्ही साधु संतों के आसरे मीडिया में काम करने वालो पर क़ब्ज़ा की कोशिश हुई, चूँकि देश के बड़े मीडिया हाउस पर बनियों का कब्जा है। और बनिया और ठाकुर शुरुआत से ही संघ की विचारधारा का समर्थक रहा है, इस वर्ग ने विपरीत परिस्थितियों में भी भाजपा और संघ का साथ दिया है। जबकि ब्राह्मण का एक बड़ा तबका  कभी कांग्रेसी कभी समाजवादी तो कभी बसपाई हुआ है। 

इस गठजोड़ ने ही इंदिरा के खिलाफ वैचारिक रूप से एक दूसरे के विरोधी रहे कम्युनिस्टों, समाजवादियों और संघीयों को एकजुट किया था। इसी गठजोड़ ने वीपी सिंह के बोफोर्स वाले झूठ को सच बताया। इसी गठजोड़ ने मायावती को सीएम बनाया। इसी गठजोड़ ने हिंदू हृदय सम्राट कल्याण सिंह, आडवाणी, तोगड़िया, जसवंत सिंह आदि को ढक्कन किया। इसी गठजोड़ ने देश में हिंदू मुस्लिम का नारेटिव खड़ा किया। 

इसी गठजोड़ ने आजादी के पहले द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत का प्रतिपादन और समर्थन किया।यही गठजोड़ आपको बताता है कि राहुल गांधी के पिता पारसी नहीं मुसलमान थे और स्मृति ईरानी पारसी नहीं हिंदू हैं। यह गठजोड़ भगत सिंह को तिलकधारी और चंद्रशेखर आजाद को जनेऊधारी दिखाता है। यह गठजोड़ आपको नफरत करना सिखाता है और यही आपको "हिंदुत्व" के नाम पर गरीब, पिछड़ा और दलित बनाए रखना चाहता है। यही आपको कट्टर हिंदू और मुझे गद्दार मुसलमान बना रहा है ताकि सत्ता, संसाधनों और संस्थानों पर उसकी पकड़ बरकार रहे। 

एक बार फिर गौर से देखिए इन कथित पत्रकारों को। इनके चेहरे पर खिल रही मुस्कान उस युद्ध में विजय की परिणीति है जो आज से 100 साल पहले गुरु गोलवलकर ने शुरू किया था। इस विजय में इनका भी जबरदस्त योगदान है। चाहे वह मंदिर आंदोलन हो या अन्ना का धरना। यही पत्रकार स्वयंसेवक बनकर नैरेटिव बनाने में जुटे थे। यह एक ऐसा युद्ध था जिसमें बेहद समर्पण, लगन, एकजुटता की जरूरत थी। देश में एक नैरेटिव खड़ा करना था कि विभाजन के लिए दक्षिणपंथ की विचारधारा के कांग्रेस जिम्मेदार है। गांधी जी की हत्या को "वध" बता कर गोडसे को पीड़ित दिखाना था, सावरकर को वीर साबित करना था, नेहरू को अय्याश बताना था, पटेल, सुभाष, से मतभेदों के बावजूद उनको अपना हीरो दिखाना था, मुसलमानों को विलेन और मुसलमानों को अधिकार को तुष्टिकरण कहना था। इतिहास को सिर के बल खड़ा करना था। जातीय भेदभाव को कम करके आंकना था। इस युद्ध में देश की जनता के सिर से धार्मिक सद्भाव का भूत उतार कर उसे हिंदू योद्धा बनाना था। 

यह युद्ध बहुत लंबा चलना था लेकिन विश्वास था कि एक दिन भ्रष्ट सरकारों से ऊबी जनता इन बातों पर विश्वास कर लेगी और अंततः यही हुआ। आज इनकी मेहनत रंग लाई है और यही इनके मुस्कुराने की वजह है। यह हाथ जोड़े खड़े हैं अपने आराध्य के सामने जिसने इस युद्ध का नेतृत्व करके इन्हें विजय दिलाई। इसीलिए मोदी जी भगवान हैं और गोदी  मीडिया भक्त और अपने आराध्य के सामने ऐसे ही हाथ जोड़ कर मुस्कुराते हुए खड़ा हुआ जाता है। सवाल पूछने की धृष्टता करने वाला यूट्यूबर कहलाता है।(साभार)

शुक्रवार, 22 अगस्त 2025

ये लोग आते कहाँ से हैं…

 ये लोग आते कहाँ से हैं…


एमपी के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने वैसे तो कुछ भी अलग नहीं कहा, नाम बदलनेवाला संस्कार आरएसएस से लिए लोगों से और कोई उम्मीद करनी भी नहीं चाहिये हालाँकि अभी तो और भी मुग़ल और अंग्रेज़ी नाम की फ़ेहरिस्त है जिसे बदले जाने का संस्कार बाक़ी है लेकिन मोहन यादव नाम बदलने के फेर में ये भूल गये कि प्रभु कृष्ण का यह नाम भारतीय जनमानस में भीतर तक बैठा है…

मध्यप्रप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव को शायद यह बात मालूम नहीं है कि उनके इस अभियान से वो भजन झूठा पड़ जाएगा

"मैया मोरी मैं नहीं माखन खाओ"

इसकी पंक्तियां बदलेगी अगले चरण में मोहन सरकार। वो क्या होगी अभी राय शुमारी की जाएगी भक्त मंडल से फ़िर तय  किया जाएगा। 

एक फिल्मी गाना है "मच गया शोर सारी नगरी रे आया बिरज का बांका सम्हाल तेरी गगरी रे।" इस गाने पर प्रतिबंध लगाया जाएगा, इंटरनेट से इसे हटाने का आदेश दिया जाएगा।

भक्ति कालीन कवियों जैसे सूरदास, रसखान, मीरा आदि के भजनों की समीक्षा की जाएगी जिसके लिए एक कमेटी बनाई जाएगी। वाट्सअप यूनिवर्सिटी से Phd योग्यता प्राप्त विशेषज्ञों की भर्ती की जाएगी इस कमेटी के लिए।

सबसे बड़ा सवाल यह आएगा कि माखन का आविष्कार ही श्री कृष्ण के कारण हुआ है। इसके पहले किसी ग्रन्थ या पुराण में उल्लेख नहीं मिलता माखन का। अब अगर कृष्ण जी माखन चोर नहीं हैं तो इसे खायेगा कौन? भगवान श्री कृष्ण ने जब भी माखन खाया चुराकर ही खाया, चाहे वह मां यशोदा से हो या गोपियों की मटकी से। यह अलग बात है कि मथुरा जाने के बाद उन्होंने बंसी और माखन दोनों का त्याग कर दिया था। 

पता नहीं सरकारें किस प्रकार से ऐसे निर्णय लेती है जिससे इतिहास बदलने की आवश्यकता पड़ जाती है। अब कोई वामपंथी यह न कह दे कि कृष्ण ने माखन के माध्यम से, गरीब गुरबे को वो वस्तु जो साधारण तो हो लेकिन आसानी से उपलब्ध न हो, उसे चुराकर उपयोग करने की सीख दी है। इसलिए सरकार उन्हें माखन चोर कहने से बचना चाहती है ताकि जनता उनके बताए रस्ते पर न चले। एक जातिवादी भाई यह कह रहे थे कि भगवान कृष्ण यादव कुल दीपक हैं इसलिए उन्हें सरकार माखन चोर की पदवी से हटाना चाहती है। अगर वहीं भगवान ब्राह्मण या क्षत्रिय होते तो ऐसा कदम नहीं उठाती। इस खबर के सामने आने से जितने मुँह उतनी बातें सुनाई पड़ रही हैं।

इसी माखन की चोरी के बाद माता यशोदा ने भगवान के मुख में त्रिलोक दर्शन किए थे  सरकार इसीलिए तो नहीं डर रही है कि वोट चोरी मामले में केचुआ का मुँह खोल कर विपक्ष सारा कुछ साफ़ साफ़ देख न ले।

बड़ी विकट विपदा है सरकारें धर्म में घुस रही हैं और धर्माचार्य सरकार में। वो अपनी गद्दी से राजनीतिक जुमले उछालते हैं तो सरकारें भी क्यों पीछे रहे। मंदिर मस्जिद के अलावा भक्तों की भावनाओं को हवा देने का काम इनके विधायक मंत्री भी बेहतर तरीके से अंजाम दे सकते हैं।

मोहन सरकार का यह कदम निश्चित ही स्वागतेय है। इस आंदोलन को पूरा करने के बाद इन्हें भगवान राम के लिए भी कोई योजना बनानी चाहिए। जैसे भगवान राम ने सीता की अग्नि परीक्षा नहीं ली थी। या फ़िर रावण ने सीता हरण नहीं किया था। या फ़िर हनुमान कनिष्क के नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश में मिले थे। ऐसे कई विषय हो सकते हैं। 

सरकारें चाहें तो बुद्ध, नानक, महावीर, आदि पर भी शोध कर इस तरह के प्रयास कर सकती है। हर अवतार हर भगवान के साथ कुछ न कुछ ऐसी बात या घटना जुड़ी है जिसे उठाकर सरकारें अपने आप को सुरक्षित रखने और जनता को उलझाए रखने का काम कर सकती हैं। फ़िर उनकी आईटी सेल को इससे रोज़गार भी मिल जाता है। 

मोहन सरकार को इस अनोखे विषय पर चिंतन करने और संवेदन शीलता दिखने के लिए किसी श्री पुरस्कार से सम्मानित किया जाना चाहिए।(साभार)

गुरुवार, 21 अगस्त 2025

भारत पर 50 फ़ीसदी टैरिफ़ क्यों..

 भारत पर 50 फ़ीसदी टैरिफ़ क्यों..

इसे एकदम सरल भाषा में समझिये…


यह बात आपको कोई बड़ा मीडिया नहीं बताएगा कि ORF यानी ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेंशन क्या है और न ही ये बात कोई बताएगा कि ट्रंप ने रुस से तेल ख़रीदने पर भारत पर चीन से ज़्यादा टैरिफ़ क्यों लगा रहा है…

अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने बताया कि भारत पर क्यों लगाया गया 50% टैरिफ.....!! उन्होंने कहा कि भारत रूस के सस्ते तेल खरीदकर 16 बिलियन से ज्यादा मुनाफा कमा चुका है. इसमें कुछ भारत के अमीर परिवार हैं।बेसेन्ट ने आगे कहा कि भारत का रूसी तेल आयात पहले 1% से भी कम था और अब यह 42% तक पहुंच गया है।

उन्होंने कहा, " जबकि चीन का अलग मामला है। क्योंकि रूस की ओर से यूक्रेन पर किए गए हमले से पहले चीन अपनी जरूरत का 13 फीसदी तेल रूस से खरीद रहा था और अब 16 फीसदी तेल खरीद रहा है। साथ ही बीजिंग का तेल आयात अलग-अलग स्थानों से है इसलिए उनकी स्थिति अलग है."

 रूस से तेल खरीदने को लेकर ट्रंप ने भारत पर 50 फीसदी टैरिफ लगाया है तो वहीं चीन पर 30 फीसदी टैरिफ ही है।

अब इसे समझना जरूरी है, यदि भारत सरकार इस तेल को रूस से सस्ते दाम में खरीदता तो भारत की जनता को लाभ मिलता।

पर ऐसा नहीं हो रहा है।

क्योंकि ये तेल रूस से अंबानी की कंपनी रिलायंस और नायरा खरीदती है और फिर उसे 45% जैसे भारी भरकम मुनाफा लेकर अंतर्राष्ट्रीय मार्केट में बेचती है।

राहुल गांधी भी देश की जनता को इसी मिलीभगत को बता रहे हैं कि मोदी देश के लिए नही अपने दोनों आकाओं अदानी, अंबानी की नौकरी, प्रॉफिट में देश के भविष्य को विगत ग्यारह वर्षों से दांव पर लगा रहे हैं।

तब ओआरएफ़ को भी ऐसे समझिए…

2011 के बाद की बात है। उस वक्त मैं सेंटर फॉर बजट एंड गवर्नेंस अकाउंटेबिलिटी नाम की एक संस्था में बजट एनालिसिस का काम करता था। 

CBGA को फोर्ड फाउंडेशन का सपोर्ट था। 

हम गरीबों और वंचितों के लिए सरकारी बजट में आबंटन पर नजर रखते और सरकार से ज्यादा राशि देने की मांग करते। 

इसके पीछे हमारे पास बदहाली का पूरा रिसर्च डेटा होता और तब के प्लानिंग कमीशन को हमारी बात माननी पड़ती। 

खैर, वह "आजादी" से पहले की बात थी। अब मोदी के कुल 5 कॉरपोरेट मित्रो का राज है। 

इनमें दो को सभी जानते हैं–अंबानी और अदानी। 

आपको पता नहीं होगा कि पिछले 11 साल से यही दोनों भारत की संसद को चलाते हैं। 

ज्यादा पुरानी नहीं, 2024 की बात है, जब संसद ने ऑयल फील्ड्स बिल पास करवाया। 

मकसद था, पेट्रोलियम क्षेत्र में बड़ी कंपनियों को ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का फायदा देना। 

इस बिल को पास करने के बाद विंडफॉल टैक्स जैसे नए टैक्स को लागू करना मुश्किल हो गया। 

एग्जॉनमोबिल जैसी दुनिया की बड़ी कंपनियों ने भारत में तेल निकालने में दिलचस्पी दिखाई और गोदी मीडिया ने इसे निवेश की संभावना बताया। 

निवेश तो धेले भर का नहीं हुआ, लेकिन अंबानी की झोली में रूसी तेल आने लगा। 

संसद से बिल पास करवाने का काम पर्दे के पीछे ORF ने करवाया था। जाहिर है करोड़ों फूंके गए। 

अंबानी 5 से 30 डॉलर तक सस्ता रूसी तेल खरीदकर जामनगर की फैक्ट्री तक लाता और साफ कर यूरोप को बेच देता। 

अंबानी ने इस गोरखधंधे में 16 बिलियन डॉलर कमाए। भारत की एक तेल कंपनी ने 86 हजार करोड़ तो भारत पेट्रोलियम ने 1300% ज्यादा मुनाफा कमाया। 

भारत की जनता अभी भी 110 रुपए लीटर तेल खरीद रही है। 

रिलायंस और नायरा एनर्जी ने पूरी दुनिया को इस मुनाफे के कारोबार का सबक सिखाया। 

मोदी सत्ता को भी तेल के बहुत ज्यादा बेस प्राइस का फायदा सालाना करीब 5 लाख करोड़ के टैक्स के रूप में मिला। 

अब अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कल खुलेआम इस बात को दुनिया के सामने रख दिया। 

ORF की अभी 65% फंडिंग अंबानी करता है। इस संस्था को उसी ने थिंक टैंक के नाम से खड़ा किया और 95% तक फंडिंग की। 

ORF में फेसबुक का भी पैसा लगा है और गूगल, जापान बैंक का भी। 

ये इतनी ताकतवर है कि रायसीना डायलॉग के नाम से सालाना जलसा करवाती है, जिसमें जयशंकर का विदेश मंत्रालय भी भागीदार होता है। 

यानी ORF भारत की विदेश नीति में सीधे तौर पर शामिल है। मोदी सत्ता 11 साल से इसे पालती रही। 

ORF के वॉशिंगटन चैप्टर का मुखिया जयशंकर का बेटा है। 

कॉरपोरेट्स की फंडिंग से चल रहे इस कथित थिंक टैंक ने अमेरिका से भारत के रिश्ते बिगाड़े, क्योंकि रूस से उसे फायदा था। 

विदेश मंत्री पर जानबूझकर ब्रिक्स से दूरी बनाने का आरोप है। 

लेकिन, इस बीच ट्रंप का टैरिफ आ गया और सारी ड्रामेबाजी की पोल खुल गई। 

नरेंद्र मोदी ने चीन और रूस से रिश्ते सुधारने के लिए डोभाल को लगाया। जयशंकर को नापसंद करने वाले डोभाल ने रूस और चीन से रिश्ते सुधारे। 

अब अदानी लाला ने भी चिंतन रिसर्च फाउंडेशन के नाम पर  CRF नाम की संस्था बनाई है और नीति आयोग के पूर्व मुखिया अमिताभ कांत को बिठा दिया है। 

मोदी सत्ता आगे अदानी लाला के इशारे पर संसद चलाने वाली है। 

तो यह खेल अब नरेंद्र मोदी की सत्ता, भारत की विदेश और रक्षा नीति के लिए खतरा बन चुका है। 

मोदी सत्ता ने विदेश और रक्षा नीति को उन कंपनियों के हवाले कर दिया है, जिन्हें देश हित की परवाह नहीं।

उन्हें सिर्फ मुनाफा चाहिए। उधर, मोदी सत्ता का एक मंत्री एथेनॉल मिलाकर मोदी सत्ता के समानांतर अपनी सत्ता बना रहा है। 

उससे मुकाबले के लिए इंडियन ऑयल ने 2 दिन पहले 160 रुपए लीटर का बिना एथेनॉल वाला पेट्रोल लॉन्च किया है। (साभार)