बुधवार, 6 जनवरी 2021

दृढ़ निश्चय


 

रोज सुबह अब

सूर्योदय के पहले

नींद खुल जाती है

और कंपकपाती ठंड

में मुंह धोने

पानी को हाथ से

छूता हूं

तो याद आते हैं

अपने हक के लिये

दिल्ली बार्डर में

जुटे किसान

सर्द हवा और

बारिश में भीगते

गीले बिस्तर में

सोते किसान।

मैं जानता हूं कि

सरकार इतनी आसानी

से नहीं झूकने वाली

और मैं यह भी जानता हूं

कि अपने हक की

लड़ाई लडऩी पड़ती है

घर छोडऩा पड़ता है

इंतजार करते बच्चों

का मन मारना पड़ता है

गांव की सुंगध को

छोड़ शहर में

भटकना पड़ता है।

फिर यदि सत्ता

का अभिमान चरम पर हो

तो स्वाभिमान बचाने

की लड़ाई और भी

लम्बी होती है

आखिर गुरु गोविन्द

सिंह ने यूं ही नहीं

कहा था

कोई किसी को कुछ न देहै

जो ले है निजबल से लेहै।

पानी के छिंटे ने

जगा दिया और

मैं फिर चल पड़ता हूं

सुबह की सर्द हवा में

टहलने

आखिर दृढ़ निश्चक के

आगे ठंड भी हार

जाता है

सत्ता की क्या बिसात।

(किसान आंदोलन को समर्पित)

मंगलवार, 5 जनवरी 2021

बात कैसे बनेगी साहेब !

 



किसानों के साथ 8वें दौर की बैठक फिर बेनतीजा रहा। और फिर 9वें दौर की बैठक 8 जनवरी को होगी। किसान जब तीनों कानून को वापस लेने की मांग पूरी हुए बिना आंदोलन को समाप्त नहीं करने वाले हैं तब सरकार का अडियल रूख हैरान कर देने वाला है।

वैसे तो इस तीनों कानून को लेकर सरकार की नियत तब ही स्पष्ट हो गई थी जब सिे संसद में पास करने का जो तरीका अपनाया गया था, बगैर बहस और बगैर वोटिंग के यहां कानून कैसे पास हुआ यह किसी से छिपा नहीं है। भले ही कुछ लोग इसे चोर दरवाजा कहने पर आपत्ति उठाये लेकिन सच तो यही है कि इस कानून को लेकर सरकार की नीयत पहले ही दिन से खराब थी।

और खराब हो भी तो क्या फर्क पड़़ता है क्योंकि ये तीनों कानून सिर्फ और सिर्फ पूंजीपतियों के हितों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।

इसलिए आज जब विज्ञान भवन में सरकार के नुमाईदों और किसानों के बीच चर्चा के दौरान जब लंच का समय हुआ तो किसान अपने लंगर में मस्त थे और सत्ता के नुमाईदें फाईव स्टार होटल अशोका का खाना खा रहे थे। यकीन मानिये इस आठ दौर की बैठकों में सरकार का जितना खर्च हुआ है वह टिहरी बार्डर में धनारत या आंदोलनरत किसानों के एक दिन के भोजन से ज्यादा रुपये खर्च हुआ है। और ये पैसा किसका है। हमारा-तुम्हारा टैक्स का पैसा है।

स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना विज्ञान भवन का अपना इतिहास है लेकिन इससे सरकार को कोई सरोकार नहीं है वह तो आंदोलनरत किसान को थका देने की सोच के साथ बैठक पर बैठक यानी तारीख पर तारीख की घोषणा करते जा रही है लेकिन ुसे न किसानों के हितों की चिंता है न आंदोलनरत मरते-बिलखते किसानों की ही चिंता है। यदि उसकी चिंता में किसान होते तो कानून पास कराने का तरीका गलत नहीं होता और समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी होती।

जिन्हें ये तीनों कानून गलत लगते हैं उन्हें हम एक और जानकारी दें दे कि दुनिया के चावल उत्पादन करने वाले 103 देशों में भारत ऐसा देश है जो सबसे ज्यादा चावल एक्सपोर्ट करता है और यहां के उद्योगपति हो या सरकार सबसे ज्यादा पैसा कमाते हैं और आप हैरान होंगे कि जापान से लेकर कोरिया सहित ऐसे कितने ही देश हैं जहां प्रति किलो चावल तीन सौ रुपये प्रति किलो से ज्यादा कीमत पर बिकते हैं। यहां तक कि कनाडा में भी दो सौ रुपये किलो से अधिक कीमत है। और ऐसे में एमएसपी को कानून की गारंटी मिल जाएगी तो चावल एक्सपोर्ट करने वालों की कमाई कम हो जायेगी।

एक बात और हर बात में पाक को लेकर राजनीति करने वाले यह भी जान ले कि पाकिस्तान के किसानों की आर्थिक स्थिति भारत के किसानों की आर्थिक स्थिति से बेहतर है। इसलिए जो लोग कृषि रिफार्म के नाम से लाये गये इन तीनों कानून की वकालत कर रहे है वे जान ले कि जब तक एमएसपी को कानूनी गारंटी में नहीं लाया जायेगा तब तक किसानों की आय नहीं सुधरने वाली।

और हां, 8 जनवरी को भी बात बन जायेगी यह कभी नहीं सोचना? क्योंकि नियत में बरकक्त है और नियत में ही खोट हो तो सफलता मुश्किल है। बनेगी साहेब!

किसानों के साथ 8वें दौर की बैठक फिर बेनतीजा रहा। और फिर 9वें दौर की बैठक 8 जनवरी को होगी। किसान जब तीनों कानून को वापस लेने की मांग पूरी हुए बिना आंदोलन को समाप्त नहीं करने वाले हैं तब सरकार का अडियल रूख हैरान कर देने वाला है।

वैसे तो इस तीनों कानून को लेकर सरकार की नियत तब ही स्पष्ट हो गई थी जब सिे संसद में पास करने का जो तरीका अपनाया गया था, बगैर बहस और बगैर वोटिंग के यहां कानून कैसे पास हुआ यह किसी से छिपा नहीं है। भले ही कुछ लोग इसे चोर दरवाजा कहने पर आपत्ति उठाये लेकिन सच तो यही है कि इस कानून को लेकर सरकार की नीयत पहले ही दिन से खराब थी।

और खराब हो भी तो क्या फर्क पड़़ता है क्योंकि ये तीनों कानून सिर्फ और सिर्फ पूंजीपतियों के हितों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।

इसलिए आज जब विज्ञान भवन में सरकार के नुमाईदों और किसानों के बीच चर्चा के दौरान जब लंच का समय हुआ तो किसान अपने लंगर में मस्त थे और सत्ता के नुमाईदें फाईव स्टार होटल अशोका का खाना खा रहे थे। यकीन मानिये इस आठ दौर की बैठकों में सरकार का जितना खर्च हुआ है वह टिहरी बार्डर में धनारत या आंदोलनरत किसानों के एक दिन के भोजन से ज्यादा रुपये खर्च हुआ है। और ये पैसा किसका है। हमारा-तुम्हारा टैक्स का पैसा है।

स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना विज्ञान भवन का अपना इतिहास है लेकिन इससे सरकार को कोई सरोकार नहीं है वह तो आंदोलनरत किसान को थका देने की सोच के साथ बैठक पर बैठक यानी तारीख पर तारीख की घोषणा करते जा रही है लेकिन ुसे न किसानों के हितों की चिंता है न आंदोलनरत मरते-बिलखते किसानों की ही चिंता है। यदि उसकी चिंता में किसान होते तो कानून पास कराने का तरीका गलत नहीं होता और समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी होती।

जिन्हें ये तीनों कानून गलत लगते हैं उन्हें हम एक और जानकारी दें दे कि दुनिया के चावल उत्पादन करने वाले 103 देशों में भारत ऐसा देश है जो सबसे ज्यादा चावल एक्सपोर्ट करता है और यहां के उद्योगपति हो या सरकार सबसे ज्यादा पैसा कमाते हैं और आप हैरान होंगे कि जापान से लेकर कोरिया सहित ऐसे कितने ही देश हैं जहां प्रति किलो चावल तीन सौ रुपये प्रति किलो से ज्यादा कीमत पर बिकते हैं। यहां तक कि कनाडा में भी दो सौ रुपये किलो से अधिक कीमत है। और ऐसे में एमएसपी को कानून की गारंटी मिल जाएगी तो चावल एक्सपोर्ट करने वालों की कमाई कम हो जायेगी।

एक बात और हर बात में पाक को लेकर राजनीति करने वाले यह भी जान ले कि पाकिस्तान के किसानों की आर्थिक स्थिति भारत के किसानों की आर्थिक स्थिति से बेहतर है। इसलिए जो लोग कृषि रिफार्म के नाम से लाये गये इन तीनों कानून की वकालत कर रहे है वे जान ले कि जब तक एमएसपी को कानूनी गारंटी में नहीं लाया जायेगा तब तक किसानों की आय नहीं सुधरने वाली।

और हां, 8 जनवरी को भी बात बन जायेगी यह कभी नहीं सोचना? क्योंकि नियत में बरकक्त है और नियत में ही खोट हो तो सफलता मुश्किल है।

सोमवार, 4 जनवरी 2021

मरते किसान का दम !


 

लगता है आन्दोलनरत किसानों के साहस की परीक्षा ईश्वर भी लेने लगा है तभी तो सर्द ठंड के बीच बारिश का हमला हुआ है। बार्डर पर तीन और किसान मर गये और यह मौत का सिलसिला शतक तक पहुंच जाये तो उन लोगों को कोई फर्क नहीं पडऩे वाला है जो सत्ता की मस्ती में डूबे हुए हैं, जो नफरत की राजनीति में सराबोर जहर उगल रहे हैं जिनके लिए सियासत सिर्फ पेशा हो और हर पेशा सिर्फ अपना मुनाफा देखती है और यही मुनाफा ही उनकी इमानदारी है।

कहना मुश्किल है कि सरकार तीनों कानून को वापस ले लेगी क्योंकि कृषि की अर्थव्यवस्था पर पिछले कई सालों से सत्ता की नजर लगी हुई है। जब सारे उद्योग धंधे गर्त में जाते जा रहे हैं, बड़े-बड़े उद्योगपति दिवालिया हो रहे हैं, बैंक दिवालिया हो रहा है, रिजर्व बैंक का रिजर्व फंड भी नहीं बच रहा है, सत्ता को अपनी रईसी बरकरार रखने सार्वजनिक उपक्रमों को बेचना पड़ रहा है, रेल-हवाई जहाज से लेकर वेलफेयर के सारे साधनों को निजी क्षेत्रों को सौंपे जा रहे हैं तो फिर सरकार इस देश की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था कृषि को कैसे छोड़ सकती है।

देश के हर क्षेत्रों की बिगड़ती स्थिति के बाद भी इस देश की अर्थव्यवस्था को केवल कृषि क्षेत्र ही संभाल कर रखी है और यह बात सत्ता से ज्यादा उद्योगपतियों को मालूम है इसलिए कान्टेक्ट फार्मिंग की अवधारणा से ही किसानों की जमीन हड़पी जा सकती है ऐसे में सरकार क्यों भला तीनों कानून को वापस लेगी।

लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुर्गण यही है कि सत्ता में जो भी दल बैठता है उसकी रूचि अपनी पार्टी को मजबूत करना प्रथम ध्येयय होता है इसलिए यदि किसान चंदा नहीं देते तो जमीन उन्हें सौंपी जायेगी जो चंदा देते हैं।

जिन लोगों को किसानों को आयकर की छूट को लेकर गलतफहमी है वे अपनी गलत फहमी दूर कर लें क्योंकि आयकर में छूट की सीमा 5 लाख रुपये तक की है और कितने किसान हैं जो पांच लाख से ऊपर सालाना कमाई करते हैं इसलिए वे जान ले कि किसानी में आयकर की छूट का फायदा भी वही उद्योगपति और व्यापारी उठाते हैं और यह छूट का कानून भी उन्हीं के लिए बना है।

हमने इसी जगह पर पहले ही लिखा है कि ये तीनों कानून किसानों से ज्यादा उद्योगपतियों, पूंजीपतियों के लिए बना है क्योंकि भंडारण करने की स्थिति में किसान होते तो वे अपनी उपज बेचने समर्थन मूल्य के मोहताज नहीं होते। भंडारण केवल व्यापारी करेगा। इसलिए आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन केवल जमाखोरी और कालाबाजारी करने वालों के लिए बनाया गया है और जिन लोगों को लगता है कि किसान गलत रुप से आंदोलन कर रहे हैं तो वे समझ ले हर संकट में इस देश को सिर्फ और सिर्फ किसानों ने बचाया है।

रविवार, 3 जनवरी 2021

सौगन्ध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं बिकने दूंगा!

सौगन्ध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं बिकने दूंगा!

याद है यह किसने कहा था! जी हां सभी को याद है। नरेन्द्र मोदी ने 25 मार्च 2014 को जब यह बात कही थी तो भाजपा सहित उसके सारे आनुवांशिक संगठन के लोग झूम उठे थे। लेकिन आज जैसे ही यह लाईन देश नहीं बिकने दूंगा जेहन में आता है तो जेहन में यह भी आता है कि कैसे पिछले 6 बरसों में इस देश की 23 सार्वजनिक कंपनियां एक-एक करके बिकते चली गई और यह संयोग ही है कि इन बिकने वाली कंपनियों के नाम भारत, हिन्दुस्तान, भारतीय या इंडिया नाम से जानी पहचानी जाती थी, भारतीय कोल, कोल इंडिया, भारतीय संचार निगम, भारतीय पेट्रोलियम, एयर इंडिया किस तरह से बेचने की स्थिति में आई है और इसे खरीद कौन रहा है। बिकने के इस दौर में भारतीय रेल भी कतार में है जिनके 151 रेल और 109 मार्ग बिक चुका है। 

अब कुछ लोग कह सकते हैं कि निजीकरण का मतलब बेच देना क्यों कह रहे हो लेकिन भारत की आजादी के बाद से यह तय हुआ था कि सरकार की जिम्मेदारी इस देश के नागरिकों के प्रति है ऐसे में एक-एक कर सबका निजीकरण करने का मतलब सहज ही लगाया जा सकता है। सरकार का मतलब क्या है यदि सब कुछ निजी हाथों में सौंप दिया जाए।

हमने पहले भी कहा था कि हम निजीकरण के विरोधी नहीं है लेकिन सवाल अब भी वही है कि आखिर हम सरकार इसलिए चुनते है कि हमारी मूलभूत जरूरतों की पूर्ति कम कीमत पर हो! आसानी से हो। लेकिन बीते 6 बरसों में जिस तरह से सत्ता ने आम लोगों के हितों की अनदेखी करते हुए मनमाने फैसले लिये हैं उससे देश का ताना-बाना छिन्न भिन्न होने लगा है। और कई बार तो ऐसा लगने लगा है कि इस देश का लोकतंत्र निजी हाथों में चला गया है।

आर्थिक हालात तो बदत्तर हुए है भूखमरी में भी हम दुनिया में सबसे उपर आ गये हैं। बेरोजगारी दर बदतर स्थिति में है और जीडीपी का हाल किसी से छिपा नहीं है। राज्य सरकारों को उनके जीएसटी का हिस्सा समय पर नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में देश के सामने जो संकट खड़ा होने लगा है वह इस देश के लिए गंभीर चिंता का विषय है। चिंता का विषय तो किसान आंदोलन भी बनता जा रहा है, जिस तरह से किसान आंदोलन खिंचता चला जा रहा है और देशभर के दूसरे राज्यों से किसान जिस तरह से आंदोलन में शरीक होते जा रहे है वह आम जन के लिए बेचैन कर देने वाला है।

सर्द रात में परिवार सहित आंदोलित किसान कहीं कहीं आक्रोशित भी हो रहे हैं और यह शांतिपूर्ण प्रदर्शन को मोदी सत्ता की जिद और भड़काने का काम कर रही है ऐसे में भले ही सत्ता इसे गलत बता रही हो, आंदोलन के खिलाफ भ्रामक प्रचार कर रही हो लेकिन मोदी सत्ता के निजीकरण का लोभ वह कैसे छुपा पायेगी। जिसके हित के लिए कानून बनाने की बात कही जा रही हो वही इसके खिलाफ हो तो कानून सही कैसे हो सकता है।

बहरहाल सत्ता की निजीकरण के लोभ और एक-एक कर बिकते सरकारी उपक्रम ने 'ये देश नहीं बिकने दूंगाÓ वाली बात को एक बार फिर जेहन में लगा दिया। जेहन में तो यह भी है कि बिजनेस मेरे खून में है।

 

शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

नववर्ष का रंग!


वर्तमान में तय किये

जा रहे हैं जो रंग

बचपन में समझे अर्थों

से भिन्न है क्यों रंग

चाहता रहा फिजा में

बिखर जाये हर रंग

लेकिन बवाल के डर से

सिमट रहे हैं रंग

समय बदल रहा

रंगों की परिभाषा

और हम बेबस देख

रहे हैं आशा-निराशा

कोई कहता है ये नववर्ष

हमारा नहीं है

कोई कहता है ये रंग

तुम्हारा नहीं है

रंगों के इस दिगभ्रमित

जंाल में

रंगों को ही धूमिल

कर दिया है

और सतरंगी इन्द्रधनुष

की सत्यता पर

कोई नहीं बोलता

सबको चिंता है अपने

रंग को चटख करने की

गाढ़ा होता रंग

गहरा काला होता जा

रहा है

पर सत्ता के

लिए जरूरी है

रंगों का गहरा और काला

होना

खुद के रंग को चटखाने

की कोशिश में

बदरंग होते रंगों की

ओर किसका ध्यान है

जीवन में रंग आते

जाते रहेंगे

पर रंगों का जीवन

में ठहरना उचित नहीं।

किसी एक रंग का गुलाम

होना खुद को मारना है।

हर रंग को जो पकडऩे

की कोशिश करता है

वही जीवन ही नहीं

समाज में रंग भरता है

जो रंग भटकाने

निकल पड़े है

वह नफरत की दीवार

खड़ी करता है

और फिर आदमी

हो जाता है गुलाम

इसलिए मुझे सभी रंग

पसंद है

क्योंकि मैंने देश की

आजादी से जोड़

रखा है रंगों को।

गुरुवार, 31 दिसंबर 2020

सत्ता की ताकत से असहाय किसान...


कृषि कानून को लेकर सरकार और किसानों के बीच सातवें दौर की बैठक का जो नतीजा आया है वह पहले से तय था। क्योंकि सरकार न कृषि कानून को वापस लेने तैयार है और न ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर ही कानून बनाने तैयार है। मोदी सत्ता की मंशा स्पष्ट है इसके बावजूद जिन लोगों को लगता है कि तीनों कानून सही है तो वे जान ले कि यदि कानून सही होते तो सरकार स्वयं संशोधन की बात नहीं करती?

सरकार के द्वारा संशोधन की बात करना ही बताता है कि ये तीनों कानून किसानों के लिए नहीं कार्पोरेट जगत के लिए बनाये गए हैं। ऐसे में सरकार केवल वही कर रही है जिससे आंदोलनकारी थक कर वापस चला जाए और चुनाव के समय पूंजी और हिन्दू मुस्लिम के दम पर सत्ता हासिल तो हो ही जायेगी?

सरकार की इस रणनीति को किसान भी समझने लगे है। मोदी सत्ता के आने के बाद जिस तरह से एफसीआई को दिवालिया करने की कोशिश की गई है यह किसी से छिपा नहीं है। एक तरफ एफसीआई को दिवालिया घोषित कर दी जायेगी और दूसरी तरफ इन तीनों कानून से कार्पोरेट जगत को मनमानी की छूट मिल जायेगी।

यह सब कोई जानता है कि व्यापार में मुनाफा ही ईमानदारी है ऐसे में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर कौन व्यापारी कहां उपज खरीदता है यह सब जानते हैं फिर भी खरीदी और स्टॉक को लेकर इस तरह का कानून बनाना बेईमानी के अलावा और कुछ नहीं है।

इसलिए जब आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन करना बाजार में लूट की छूट देना है। लेकिन न सत्ता इसे स्वीकार करेगी और जब सत्ता स्वीकार नहीं करेगी तो हिन्दू-मुस्लिम के जहर से जहरीले हो चुके अंधभक्त कब इसे स्वीकार करेंगे।

इसी तरह दूसरा कानून कान्टेक्ट खेती का है। इसमें भी इतनी विसंगति है जो सीधे-सीधे व्यापारियों को ही फायदा पहुंचायेंगे।

हमने कल ही इसी जगह पर नगरनार संयंत्र को लेकर केन्द्र सरकार की नियत पर सवाल उठाये थे कि किस तरह सरकार किसानों की जमीन को अधिग्रहण कर पिछले दरवाजे से पूंजीपतियों की मदद करने आमदा है।

कल की बैठक को लेकर जो खबरें छनकर आ रही हैं उस पर वीरेन्द्र भाटिया लिखते हैं ये आंदोलन तीस दिन और चल गया तो न मोदी का एजेंडा चलेगा न आरएसएस का खेल। क्योंकि यह आंदोलन भाईचारा का सबसे बड़ा मिसाल है और नफरत की जितनी भी पढ़ाई कराई गई है वह सब खत्म हो जायेगी। 

30 दिसम्बर की बैठक में मन्त्री जी ने किसान संगठनो से कहा कि आपने हमारा बहुत नुकसान कर दिया है। इस वाक्य के बाद मीटिंग में तल्खी आ गयी और काफ़ी देर तक गतिरोध बना रहा। गोकि सरकार का नुकसान 26 मौतों से ज्यादा है, गोकी 33 दिन से घर से दूर सड़क पर पड़े किसान देश की सरकार के लिए कोई मायने नही रखते। गोकी किसानों का करोड़ो रुपया जो आंदोलन पर लग रहा है और करोड़ो का उनका पीछे नुकसान  हो रहा है उसकी कोई गणना सरकार की इस नुकसान की गणना में नही है। 

किसान आंदोलन से सरकार बता रही है कि उनका ट्रांसपोर्ट ठप्प है, दिल्ली के आसपास की फैक्टरियाँ बन्द हैं, रोजगार ठप्प है आदि। क्या सच मे यह सरकार इन चीजों से चिंतित होती है? जवाब है कदापि नही। नोटबन्दी और लोकबंदी वाली सरकार पूरा देश बन्द करके भी किसी बन्द होने की परवाह नही करती। सरकार की चिंता दरअसल दूसरे नुक्सान की है।

बुधवार, 30 दिसंबर 2020

यह भी तो एक तरह की चोरी है साहेब!


 

छत्तीसगढ़ के नगरनार स्थित संयंत्र को निजी हाथों में सौंपने को लेकर बवाल मचा हुआ है। संयंत्र के निजीकरण का चौतरफा विरोध हो रहा है, इसे देखते हुए राज्य सरकार ने नगरनार संयंत्र के निजीकरण के खिलाफ विधानसभा में प्रस्ताव पारित करते हुए इसे खरीदने की घोषणा कर दी है।

दरअसल बीते 6 सालों में जिस तरह से मोदी सरकार ने देश के रत्न माने जाने वाले सार्वजनिक उपक्रमों को एक के बाद एक बेचा है उसके बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर सार्वजनिक उपक्रम क्यों बेचे जा रहे हैं। यदि कोई उपक्रम घाटे में चल रहा है तो उसे सुधारने की बजाय निजी हाथों को सौंप देना कौन सी शासन व्यवस्था है। फिर सवाल यह भी है कि उन सार्वजनिक उपक्रमों को क्यों बेचा जा रहा है जो फायदे में चल रहे हैं। क्या यह सब सरकार की नाकामी नहीं हैं। सिर्फ 23 सार्वजनिक उपक्रम की नहीं बेचे गए बल्कि रेलवे, एयरपोर्ट से लेकर उन तमाम चीजों को निजीकरण किया जा रहा हैं जो वेलफेयर के तहत आते हैं और यही हाल रहा तो देश के पास अपना कहने को क्या रह जायेगा?

सवाल यह भी नहीं है कि निजीकरण के इस दौर में किसे फायदा पहुंचाने की कोशिश हो रही है। सवाल तो यह है कि इस निजीकरण से किस तरह से सरकार धोखाधड़ी कर रही है? क्या यह सब लोकतंत्र का हिस्सा है। 

सरकारें इसलिए बनाई जाती है ताकि व्यवस्था को सुचारु रुप से चलाया जा सके और आम लोगों के हित में बेहतर सुधार हो लेकिन जिस तरह से मोदी सत्ता ने बीते 6 सालों में आर्थिक सुधार के नाम पर निजीकरण को प्राथमिकता दी है, उससे यह नहीं भूलना चाहिए कि अंग्रेजों ने इस देश पर राज्य इस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से ही शुरु किया था।

ऐसे में नगरनार संयंत्र को निजी हाथों में सौंपने को लेकर जब विरोध शुरु हुआ तो इसके पीछे का सच भी जानना जरूरी है। और छत्तीसगढ़ के हित की बात करने वाले भाजपाई नेतृत्व क्यों इसका विरोध नहीं कर रहा यह भी समझना होगा।

नगरनार संयंत्र के लिए जमीन किसानों ने दी। जमीन इसलिए दी गई ताकि एक सरकारी संयंत्र लग सके यदि निजी संयंत्र के लिए जमीन मांगी जाती तो बहुत से किसान तैयार ही नहीं होते। एनएमडीसी से अपने भविष्य में बेहतरी आने की उम्मीद में दी गई इस जमीन पर लगने वाले संयंत्र को निजी हाथों में सौंपने की कोशिश न केवल बेईमानी है बल्कि किसानों के साथ धोखाधड़ी भी है।

इसलिए जब केन्द्र सरकार ने इसे निजी हाथों में सौंपने की दिशा में कदम उठाया तभी से इसका विरोध शुरु हो गया।

चूंकि निजी संयंत्र की स्थापना में किसानों से सीधे जमीन लेना आसान नहीं होता इसलिए सरकार यदि जमीन अधिग्रहण के बाद निजी हाथों को उसे सौंप दे तो यह जनता के साथ धोखा नहीं तो और क्या है? यह जमीनों की चोरी नहीं तो और क्या है? ऐसे में स्थानीय भाजपाईयों की  चुप्पी भी उन्हें गर्त में ले जायेगी।