बुधवार, 3 जुलाई 2024

लाल-बत्ती के लिए लार...

 लाल-बत्ती के लिए लार...


वैसे तो सत्त्रा मिलते ही कई भाजपाई लाल बत्ती के लिए लार टपकाते घूम रहे हैं, जिसमें रमन राज में पूरे पन्द्रह साल मलाई खाने वाले नेता शामिल है तो पार्षद तक का चुनाव नहीं जीत पाने वाले छगन-राजीव जैसे नेता है या वसूलीबाजी में माहिर संजय का नाम गिन लो या शराब में नंदन वंदन  करने वाले नेताओं का नाम शामिल कर लो लेकिन इन सबसे इतर प्रदेश भाजपा में अपने को सबसे होशियार समझने वाले शिवरतन शर्मा की अपनी ही कहानी है।

कहा जाता है कि रायपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले विधानसभा क्षेत्रों में से इकलौता यही एक क्षेत्र है जहां से भाजपा बुरी तरह हारी आठ सीट भाजपा जीत गई और सिर्फ यही सीट माथे में कलंक जैसा रह गया। क्योंकि यहाँ से शिवरतन शर्मा की वजह से भाटापारा की सीट कांग्रेस जीत गई।

हकलौते इसी सीट से हारने के बावजूद शिवरतन यदि लालबत्ती यानी निगम मंडल में नियुक्ति के लिए जोर आजमाईश कर रहे हैं तो इसकी वजह को लेकर पार्टी के भीतर भी कई तरह की चर्चा है। और हारने की वजह तो किती से छिपा नहीं है, वजह सिर्फ राईस मिल वाला मामला होता तो उतनी चर्चा नहीं होती लेकिन अब तो उनकी जुबान को लेकर भी कई तरह के किस्से सामने आने लगे है । कोई कोई तो यहाँ तक  कहने लगे हैं कि जुबान खुलते ही की... टपकने लगते हैं तो कोई कुछ और..

लेकिन शिवरतन शर्मा को लगता है कि भाजपा की जीत की कहानी लिखकर और भूपेश बघेल के खिलाफ विषवमन करने का  लाभ पार्टी लालबत्ती  के रूप में दे ही देगा, भले ही भाटापारा के कार्यकर्ता कितने ही खिलाफ होकर चुनाव हरवा दे।

मंगलवार, 2 जुलाई 2024

धार्मिक आयोजनों में भगदड़ से मौत का वीभत्स चेहरा…

 धार्मिक आयोजनों में भगदड़ से मौत का वीभत्स चेहरा…


उत्तरप्रदेश के हाथरस में धार्मिक आयोजन में भगदड़ से हुई मौत ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया , हृदय विदारक इस घटना ने कई ऐसे सवाल छोड़ गये जो सत्ता को ही नहीं शासन प्रशासन को भी इस घटना का गुनहगार साबित करते हैं।

यही नहीं इस आधुनिक दौर में सूचना के विलंब को लेकर विकसित भारत की जुमलेबाज़ी पर भी सवाल उठाते है कि आख़िर प्रधानमंत्री तक खबर पहुँचते घंटों कैसे लग गये, वही प्रधानमंत्री जो वर्तमान समय को अमृतलाल ही नहीं कहते बल्कि विकसित भारत का भी सपना दिखाते घूम रहे है।

किसी भी आयोजन की स्वीकृति देते वक्त अधिकतम भीड़ की संख्या निर्धारित नही होती क्या। ये सवाल अब क्या मायने रखता है?

धार्मिक आयोजनों में लोग बढ़ चढ़कर भाग लेते हैं लेकिन उनका रहना खाना पीना भेड़ बकरियों की तरह होता है। धार्मिक संस्थाओं को ये हिदायत क्यों नही हो कि पहले पर्याप्त इंतजाम करो फिर भीड़ बुलाओ।

हाथरस में हुई मौत का जिम्मेदार कौन होगा। धार्मिक टूरिज्म बढ़ाने वाली सरकार ने अपने नागरिकों की सुरक्षा के क्या इंतजाम किये हैं। 

ऐसे कितने ही सवाल हर घटना के बाद होते रही लेकिन कभी इस पर ध्यान नहीं दिया गया।

अब जब यह भयावह घटना हुई तो क्या आयोजकों पर कड़ी कार्रवाई होगी कहना मुश्किल है…


धार्मिक आयोजनों में भगदड़ से मौत का इतिहास…


12 श्रद्धालुओं की जान चली गई थी 2022 में माता वैष्णो देवी मंदिर में, श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के कारण मची थी भगदड़


250 लोगों की मौत हो गई थी 2008 में राजस्थान के जयपुर शहर स्थित चामुंडा मंदिर में बम की अफवाह से मची भगदड़ में


36 लोगों की मौत हो गई थी इंदौर में रामनवमी के मौके पर एक मंदिर में हो रहे हवन कार्यक्रम में, पुरानी बावड़ी पर बना स्लैब टूट गया था।


39 लोगों की मौत हुई थी महाराष्ट्र के नासिक जिले में कुंभ मेले में भगदड़ मचने से 2003 में


340 से अधिक लोगों की जान गई थी


महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित मंधारदेवी मंदिर में भगदड़ में कुचल जाने की वजह से 2005 में


पिछले दो दशक के दौरान मंदिरों और धार्मिक आयोजनों में मची भगदड़ में सैकड़ों लोगों की मौत हुई है। 2000 के बाद देश में भगदड़ मचने से हुए बड़े हादसों पर एक रिपोर्ट।


146 लोगों की मौत हुई थी हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले में नैना देवी मंदिर में अफवाह के कारण मची भगदड़ से 2008 में


27 तीर्थ यात्रियों की जान चली गई थी आंध्र प्रदेश के राजमुंदरी में गोदावरी नदी के किनारे घाट पर भगदड़ मचने के कारण 2015 में


20 श्रद्धालुओं को जान गंवानी पड़ी थी हरिद्वार में हरकी पैड़ी घाट पर भगदड़ मचने की वजह से 2011 में


63 लोगों की मौत हुई थी 2010 में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में स्थित कृपालु महाराज के राम जानकी मंदिर में मची भगदड़ के दौरान


32 लोगों की जान गई थी पटना के गांधी मैदान में भगदड़ मचने से 2014 में, दशहरा मेला खत्म होने के बाद हुई थी घटना


115 लोगों की मौत हो गई थी 2013 में मध्य प्रदेश के दतिया जिले में स्थित रतनगढ़ मंदिर के नजदीक । पुल गिरने की अफवाह से मची थी भगदड़


पुलिसकर्मी से कथित बाबा बने सूरज पाल को जान लीजिए…


सूरजपाल ने सत्संग के लिए ही एसआइ की नौकरी छोड़ी थी। वह अक्सर वर्दी में ही प्रवचन देने लगता था। महकमे में सवाल उठे तो उसने सत्संग में ही रमने का मन बना लिया। वह कोट-पैंट पहन कर ही पहुंचता था। साथ में पत्नी भी होती थी। उत्तर प्रदेश में कासगंज जिले के बहादुरनगर गांव के रहने वाले सूरजपाल के पिता किसान थे। प्रवचन के प्रति बचपन से ही उसकी रुचि थी। पुलिस में सिपाही के रूप में भर्ती हुआ और पदोन्नत होकर एसआइ बना। उत्तर प्रदेश के 12 थानों के अलावा एसआइयू में भी तैनात रहा। नौकरी के दौरान भी वह प्रवचन देता रहता था। इस बात की चर्चा काफी होने लगी तो 18. वर्ष नौकरी करने के बाद पिछली सदी के नौवें दशक में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली। इसके बाद प्रवचन- सत्संग शुरू कर दिया। इसके साथ ही नाम बदलने का निर्णय लिया। नया नाम रखा नारायण साकार विश्व हरि । उत्तर प्रदेश के साथ ही राजस्थान और मध्य प्रदेश में बड़ी संख्या में उसके अनुयायी हैं। बाबा और उनके अनुयायी मीडिया से दूरी बनाकर रखते हैं।

मिठलबरा के बाद डर‌पोक-चापलूस का तमगा…

 मिठलबरा के बाद डर‌पोक-चापलूस का तमगा…


शोले फिल्म का एक मशहूर डॉयलाग है,गब्बर का नाम मिट्टी में मिला दिया… यह डायलॉग कांग्रेस नेता रविन्द्र चौबे पर कितना फिट बैठता है यह तो उनके अपने ही तय करेंगे, लेकिन कांग्रेस के दिग्गज नेताकों में शुमार रविन्द्र चौबे की राज्य बनने के बाद से ही पोल खुलने लगी थी।

समाज से जुड़े लोगों ने तो रवींद्र चौबे को पहले ही मिठलबरा का तमगा दे रखा था, और अजीत जोगी की चापलूसी का तमगा भी जुडेते जुड़ते इसलिए रह गया क्योंकि,  राज्य बनने के बाद सत्ता तीन साल ही चल पाया, लेकिन नेता प्रतिपक्ष बनते ही जिस तरह से चौदहवें मंत्री के रूप में गिनती हुई, रहा सहा साख भी जाता रहा। और इस करनी का फल यह हुआ कि कांग्रेस का गढ़ तो ढहा ही परिवार की साख भी जाते रही । हद तो तब हुआ जब बाफना की इस पटखनी के बाद भी उनका रवैया नहीं बदला।

इसके बाद भूपेश सरकार में मंत्री बनने के बाद भी मोहन सेठ से पिछले दरवाजे से संबंध ने कई तरह के गुल खिलाने की चर्चा को ही हवा नहीं दी बल्कि मंत्री बने रहने की चाह ने अब उन पर चापलूसी ही नहीं बलि डरपोक होने का भी तमगा लगा दिया।

अब तो इस बात की हवा तब और फैलने लगी जब कथित लेटर बम के हर पन्ने में रवींद्र चौबे को डरपोक - चापलूस बताया गया।

एक तो पहले ही ईश्वर साहू जैसे अनजान चेहरे से हार जाने का दर्द वे भूल नहीं पा रहे हैं उपर से हप्पोक और चापलूस का यह तमगा उनकी राजनीति को किस दिशा में ले जाएगा कहना मुश्किल है।

सोमवार, 1 जुलाई 2024

दिल्ली से भी छुट्टी...

 दिल्ली से भी छुट्टी...


यह तो बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाय की कहावत को ही चरितार्थ करती है वरना कोरबा की सीट से  लोकसभा का  चुनाव हारने के बाद भाजपा नेत्री सरोज पांडे की यह स्थिति कभी नहीं बनती कि उनकी दिल्ली में भी न केवल पूछ-परख कम हो जाए बल्कि बड़े नेता मिलने का समय ही न दे।

महापौर , विधायक से लेकर संसद तक के सफर में सरोज पाण्डे को खूब पापड़ बेलना पड़ा। पार्टी ने भी तब उनके जोश को देखते हुए खूब तवज्जो दी। रमन सिंह के विरोध के बावजूद सौदान सिंह से लेकर दिल्ली दरबार हो भाजपा आईटी सेल सब जगह उनकी खूब चली। और यही वजह है कि पार्टी ने उन्हें राज्यसभा तक पहुंचा दिया।

मिलाई से राजनैतिक सफर शुरू करने वाली सरोज पाण्डे  पहली बार चर्चा में आई, जब छिदवाड़ा में लोकसभा का उपचुनाव हुआ था। वहां उनकी प्रचार शैली के चलते ही वे बड़े नेताकों की नजर में आई, और प्रेमप्रकाश पाण्डे के टक्कर में खड़ी भी हो गई।

लेकिन कहा जाता है कि अपने इसी प्रचार शैली के चलते वे राज्यसभा भी पहुंच गई और जब दुर्ग से टिकिट नहीं मिला तो चुनाव लड़‌ने कोरबा जा पहुंची और यही धोखा खा गई क्योंकि उन्हें यहां रमन समर्थकों ने घेर लिया बल्कि उनकी शैली से डरे सत्ता ने ऐसा प्रचार किया कि वह चुनाव बुरी तरह हार गई। जीतने पर नौकर बना देने के प्रचार ने पुरानी याद ताजा कर दी। 

इधर चुनाव हरवाने का मामला तूल पकड़‌ता उससे पहले दिल्ली से आने वाली खबर ने सरोज पांडे  की मुसिबत बढ़ा दी।

कहा जाता है कि वे भागे-दौड़े  दिल्ली तो पहुंच गई लेकिन उनकी बात सुनने की बात तो दूर उनसे मिलने  का समय नहीं दिया गया।

अब चर्चा तो कई तरह की है और हम चर्चा में इस बात का हल्ला ज्यादा है कि अब दिल्ली को हारे हुए लोगों की जरूरत नही है।

पैसा दो-काम लो

 पैसा दो-काम लो


कृषि विभाग में खुले आम चल रहे चालीस फीसदी कमीशन की अपनी कहानी है तो कृषि मंत्री राम‌विचार नेताम की अपनी कहानी है। कहा जाता है कि यहां सब कुछ तय न राम‌विचार करते हैं और न ही मुख्यमंत्री की ही इस विभाग में चलती है।

चलती किसी की है तो राकेश अग्रवाल की या फिर भुवनेश यादव की। राकेश और भुवनेश का क्या क़िस्सा है यह भी चर्चा में है। और इनकी  चलेगी भी क्यों नहीं, क्योंकि कृषि मंत्री ने सारी जिम्मेदारी राकेश को सौप दी है। राकेश और भुवनेश यादव की जोड़ी ने ऐसे ऐसे कमाल शुरु कर दिया है कि कोई भरोसा भी नहीं कोगा कि छत्तीसगढ़  जैसे राज्य में डंके की चोट पर कोई सरकार  को ही नहीं आम किसानों को करोड़ों का चूना लगा रहा है।

कहा तो यहां तक जाता है कि रामविचार नेताम जरूरत पड़ने पर राकेश की गाड़ी का इस्तेमाल  ही नहीं अफिस का भी इस्तेमाल कर लेते हैं। और आफिस का इस्तेमाल को लेकर जो चर्चा है वह भी कम चौकाने वाला नहीं है। 

राम विचार नेताम के नाम पर तो रमन सिंह के भी धोखा खाने की चर्चा कम नहीं है। नाम बड़े और दर्शन छोटे की कहावत तो चरितार्थ है ही अंधा बोटे रेवड़ी अपन - अपन को दे का भी क़िस्सा कृषि विभाग के गलियारे से होते हुए एश्वर्या से लकेर अब शहर के चौराहो पर भी सुनाई देने लगा है।

ऐसा रहीं है कि रामविचार पर इस तरह के आरोप पहली बार लग रहे हो या राकेश के खेल की चर्चा पहली बार ही रही हो। रामविचार ने तो तब भी रमन सिंह, अमर अग्रवाल, बृजमोहन अग्रवाल  से बाजी मार ली थी जब इंदिरा प्रियदर्शनी बैंक घोराले के नार्को टेस्ट की कथित सीडी वायरल हुई थी।

लेकिन  सैंया भये कोतवाल तो डर काहे की तर्ज पर राकेश और भुवनेश का कमाल से लोग ज़रूर चौंक जाते हैं।

रविवार, 30 जून 2024

घर को आग लगी अपने ही चिराग से...

घर को आग लगी अपने ही चिराग से...


यह तो घर को आग लगी अपने ही चिराग से की कहावत को ही चरितार्थ करता है वर्ना, कांग्रेस के इस वरिष्ठ नेता ताम्रध्वज साहू की इतनी बुरी स्थिति कभी नहीं आई कि उन्हें अब अपने ही लोग गरियाने लगे, और उनके बैठने के लिए कुर्सी तक नही छोड़ी जाए।

विधायकी से लेकर संसद तक का सफर तय करने वाले ताम्रजध्वज  साहू को लेकर एक समय तो ऐसा भी आया था कि उनके मुख्यमंत्री बनने की खबर मात्र से फटाखे तक फोड़ दिये गये थे, और कहा जाता है कि • इसी फटाखे की वजह से उनके हाथ से मुख्यमंत्री का पद फिसल गया और गृह मंत्री से संतोष करना पड़ा ।

इसके बाद हुए विधानसभा चुनाव में तो उन्हें हार का मुंह देखना तो पड़ा ही महासमुंद से लोकसमा चुनाव में भी बुरी तरह से हार की बेइज्जती भी झेलनी पड़ी। 

कहा जाता है कि दुर्ग छोड़कर महासमुंद का सुझाव भले ही भूपेश ने सुझाया हो लेकिन इस पर मुहर तो छोटे ने ही लगाई थी।

लेकिन मुख्यमंत्री नहीं बन पाने से लेकर सांसद का चुनाव हारने की जो वजह सामने आ रही है वह भी कम पीड़ादायक नहीं है।

हालाँकि समीक्षा बैठक में केवल सत्ता का अहंकार का मामला चर्चा  तक सिमट कर रह  गया लेकिन ताम्रध्वज साहू की इस स्थिति के लिए असली वजह पर कितनी बात हुई कहना मुश्किल है। आख़िर किसी के बेटों को लेकर कौन चर्चा करता है।

लेकिन ताम्रजध्वज साहू के मामले में तो बोला जा सकता था कि पूरे पाँच साल किस तरह से विभाग चलाया गया। और इस स्थिति के लिये उनका अपना ही जिम्मदार है यह बात कोई नहीं बोल पाया क्योंकि मंत्रालय छोटा वाला चला रहा था या बड़ा वाला, यह सबको मालूम है। यानी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन? सब जानने लगे हैं ।

विजय की नासमझी…

 विजय की नासमझी...


दुर्ग लोकसभा क्षेत्र से लगातार दूसरी बार सांसद बनने वाले विजय बघेल को उम्मीद थी कि मोदी मंत्रिमंडल में और नहीं तो राज्यमंत्री बनने का मौक़ा तो मिल ही जायोगा, और इस उम्मीद की वजह पार्टी के निर्देश पर चाचा भूपेश बघेल के खिलाफ विधानसमा चुनाव लड़‌ना है। लेकिन मोदी मंत्रिमंडल में जगह तो दूर प्रदेश सरकार में भी अब उनकी पूछ परख कम हो गई है। संतोष पांडे के निवास में हुई भोज कार्यक्रम में कोई उनसे ठीक से बात करने वाला नहीं था।

लेकिन विजय बघेल ने उम्मीद नहीं छोड़ी है तो इसकी वजह कुर्मी वाद की वह राजनीति है जो उन्हें दुर्ग जिले में मजबूत नेता की छवि के रूप प्रस्तुत करता है। 

लेकिन शायद वे यह भूल गए है कि उनका भाजपा से नाता तो विद्याचरण शुक्ल की वजह से हुआ है और जब पार्टी में मोहन सेठ जैसे संघी - भाजपाईयों की कद्र नहीं है तो किर दूसरी पार्टी से आने वालों का क्या उपयोग करना है यह मोही शाह से बेहतर कौन जान सकता है। और वैसे भी मोदी-शाह को यह गाना खूब पसंद है कि - मतलब निकल गया है तो, पहचानते नहीं…

लोगों का तो यहां तक कहना है कि विजय बघेल ने तो मोदी- शाह उन्हें कभी मंत्री नहीं बनाने वाले हैं और हसका ईशारा तो उन्होंने विधानसभा चुनाव में ही तब कर दिया था, जब विजय बघेल को भूपेश के खिलाफ टिकिट दिया था और समझने  वालों के लिए ईशारा ही काफ़ी होता है। और फिर कल भोज में संगठन से लेकर सत्ता वालों का व्यवहार के बाद तो सब कुछ साफ़ हो जाने की बात कही जा रही हैं, तो अपनी पूछ परख का हवाला दे दे कर सांसद जिस तरह से एक दूसरे का पोल खोल रहे हैं , उसमें भी सब कुछ साफ़ हो गया है।

लेकिन विजय बघेल यह समझने को तैयार नहीं है और उन्हें लगता है कि देर-सबेर मंत्री बना ही दिया जायेगा...!