मंगलवार, 19 अगस्त 2025

ये कौन आ गया…

 ये कौन आ गया…


स्वतंत्रता दिवस पर मोदी सरकार के ऑरवेलियन पोस्टर में गांधी, सुभाष और भगत सिंह से बड़ा सावरकर को बड़ा दिखाने का मतलब क्या सिर्फ़ संघी कुंठा है या फिर रेज़िम से लड़ना सीखा रहे राहुल गांधी से डरी सत्ता है, तय लोगो को करना है, राम मंदिर की पूजा कर चार सौ पार का दंभ भरने वाली सत्ता जब २४० पर अटक गई तो भी वह नहीं समझ रहा है कि आप कितनी भी होशियारी कर लो प्रकृति के न्याय से बच नहीं सकते…

स्वतंत्रता दिवस पर मोदी सत्ता की पोस्टर पर चर्चा करने से पहले हम याद दिलाना चाहते हैं कि  जिस दिन राममंदिर का कार्यक्रम हो रहा था 22 जनवरी को उस दिन तो ये माहौल था कि विपक्ष को एक भी सीट नहीं आयेगी ऐसा अंधी फौज वातावरण बना रहीं थी पर अब तो ये हालत हैं कि चुनाव आयोग की बेईमानी नहीं होती तो सत्तापक्ष 150 पर सिमट जाता। पर परिवर्तन आया राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा से। लोगो ने फिर से कांग्रेस को नोटिस करना शुरू कर दिया। अब राहुल गांधी फिर से आंध्र प्रदेश वाली स्टाईल में लगे हैं और चुनाव आयोग से दो दो हाथ कर रहे हैं तो अब एक काम और होगा कि लोगो की चर्चा में अब ये बात आ जायेगी कि मोदी का विकल्प राहुल गांधी ही हैं। वास्तव में भारत को बहुत दिनो बाद कोई मिला हैं जो रेजिम से लड़ना सीखा रहा सबको। दुसरा गांधी आ गया हैं और आज के युवा का ओर हम सबका ये सौभाग्य हैं कि फिर से रेजिम को घुटने टेकते हम लोग देखेंगे । क्योकिं उस गांधी के सामने रेजिम झुका था ये हम देखे नहीं थे परंतु तरीका वहीं लेकर दुसरा गांधी आज रेजिम को झुका रहा है तो इतिहास की ये पुनरावृत्ती आनंददायक हैं और लगता हैं नियती हमारी कल्पना से बाहर आगे बढ़ गई हैं।

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर वो सवाल जो केंचुआ कल की प्रेस कांफ्रेंस में पूछे गए लेकिन जिनका कोई सीधा जवाब नहीं मिल पाया :

* राहुल गांधी से एफिडेविट मांगा तो अनुराग ठाकुर से क्यों नहीं?

* समाजवादी पार्टी ने जो एफिडेविट दिया था उसकी जांच क्यों नहीं?

* वोटर लिस्ट डिफेक्टिव थी तो क्या पुराने चुनाव में घपला था?

* SIR से पहले पार्टियों से राय मशविरा क्यों नहीं हुआ?

* चुनाव वाले साल में इंटेंसिव रिवीजन ना करने की स्थापित मर्यादा क्यों तोड़ी गई?

* इतनी हड़बड़ी में बारिश बाढ़ के बीच SIR क्यों?

* कितने लोगों ने फॉर्म के साथ कोई दस्तावेज नहीं जमा करवाया ?

* BLO ने कितने फॉर्म को “नोट रिकमेंडेड” श्रेणी में डाला? किस आधार पर?

* बिहार में SIR के दौरान जून-जुलाई के बीच कितने नाम जोड़े गए?

* SIR के ज़रिए पुरानी वोटर लिस्ट में कितने विदेशी घुसपैठिए निकले?

लेकिन यदि मक्कारी हो तो जवाब सन्नाटा ही रहेगा।

ख़ैर आज बात उस कुंठा की…

स्वतंत्रता दिवस पर मोदी सरकार के 'ऑरवेलियन' पोस्टर में गांधी और सुभाष चंद्र बोस,भगत सिंह से ऊपर सावरकर को दिखाया गया, जिसकी जितनी भी निंदा की जाए कम है। जिस महात्मा गांधी को पूरी दुनिया पूजती है, मार्टिन लूथर किंग जू. से लेकर नेल्सन मंडेला तक।

बराक ओबामा जब राष्ट्रपति थे तो उनसे एक विद्यालय में स्टूडेंट द्वारा पूछा गया था कि: 

जीवित या दिवंगत में से,यदि मौका मिले तो किसके साथ  आप डिनर लेना चाहेंगे? उन्होंने तुरंत कहा " महात्मा गांधी "

महात्मा गांधी के हत्यारे गोडसे, षड्यंत्रकर्ता सावरकर जो इन संघियों, भाजपाइयों, के आदर्श हैं, के द्वारा इस महान सपूत की हत्या की गई, क्या यह भारतीय संस्कृति के सहिष्णुता पर कलंक नही है...??

फोटो और दुस्साहस देखिए, आखि़र कितने निर्लज्ज एवं गद्दार हैं ये संघी, भाजपाई...!!

 कौन है यह सावरकर....??

 जिन्ना के मुस्लिम लीग से 3 वर्ष पूर्व ही सावरकर ने हिन्दू राष्ट्र की मांग कर दी थी...

उन्होंने 1943 को लिखा कि " मि. जिन्ना के " दो राष्ट्र " सिद्धांत से मेरा कोई झगड़ा नही है, हम हिंदू अपने आप में राष्ट्र हैं, और यह ऐतिहासिक तथ्य है कि हिंदू और मुस्लिम दो अलग राष्ट्र है "  

ये वही सावरकर है जिन्होंने  " द इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेंस -1857 " लिखी थी। साथ ही यह वही सावरकर हैं जिन्होंने लिखा है कि:  यह राष्ट्र उन्हीं का है जिसका यह पितृभूमि है, पुण्यभूमि है, अर्थात इनकी माने तो मुस्लिम और पारसी , ईसाई को बाहरी मानतें हैं ...

 जेल में जीवन गुजारे किन्तु अंत मे अंग्रेजों के प्रति ईमानदार स्वामी भक्ति का माफीनामा भी लिखे। एवं अंग्रेजों से पेंसन लेते रहे...

 " 1942 के " अंग्रेजों भारत छोड़ो " आंदोलन का विरोध करते हुए अपने संगठन हिंदू महासभा द्वारा अंग्रेजों का साथ देने की घोषणा की..

 अंग्रेजों का साथ देने के लिए नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आजाद हिन्द फौज का विरोध किया, एवं आजाद हिन्द फौज के खिलाफ लड़ने के लिए जगह जगह जाकर युवाओं से अंग्रेजी सेना में भर्ती  होने को कहा ....

 क्या देश का इससे बड़ा भी कोई गद्दार हो सकता है....?? 

भक्तों को नही पता कि सावरकर नास्तिक था क्योंकि भक्तों के नजर में नास्तिक दुश्मन होते हैं ....

इसीलिए सावरकर ने हिन्दूधर्म में जिस  गाय को पूज्यनीय माता का दर्जा दिया गया है, उसे काटने एवं गाय के गोश्त खाने की भी पैरोकारी की । साथ ही गाय के गोबर एवं मुत्र को गंदा कहकर निकृष्ट जानवर बताया है। सावरकर गाय को पूज्यनीय मानने से इंकार कर देते हैं । इसपर गाय, गोबर वाले संघी भक्त चुप रहते हैं ...

 बहरहाल गांधी के हत्या के आरोप हिन्दू महासभा के इस नेता सावरकर पर भी लगता है , संलग्नता होने के बावजूद पर्याप्त सबूतों के अभाव में सावरकर को बरी कर दिया जाता है । ये भी एक रहस्य है...

 इनके द्वी राष्ट्र सिद्धांत पर भारत और पाकिस्तान नाम से दो राष्ट्र हो चुका है । इनके विचारों को मानने वालों की केन्द्र में सरकार है जो इन्हें भारत रत्न देने पर विचार कर रही हैं...(साभार)

 


सोमवार, 18 अगस्त 2025

सुभाष बाबू का सच और पूरा एक झूठा जमात…

 सुभाष बाबू का सच और पूरा एक झूठा जमात…


वैसे भी कहा जाता है कि जिसका पूरा इतिहास कलंक से भरा हो वह इतिहास पुरुषों  के पीछे छिपकर अपना पाप छुपाने की कोशिश करता है , जिनका पूरा कुनबा अंग्रेजों की वफ़ादारी और नफ़रत से सराबोर हो उन लोगों से उम्मीद बेमानी है , उनकी निष्ठा न तो भगत सिंह, सरदार पटेल के प्रति है और न ही सुभाष बाबू के प्रति, वे तो केवल झूठ फैलाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते है ऐसे में सुभाष बाबू को लेकर फैलाए गए भ्रम का पर्दाफ़ाश ज़रूरी है…

नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय जनमानस में एक अमर वीर नायक हैं। कई अन्य नेताओं की तरह नेताजी कभी विस्मृति में नहीं डूबे। उनका असाधारण जीवन, संघर्ष और मृत्यु आज भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। यदि भारतीय मन में अदम्य, निडर और साहसिक देशभक्ति का कोई मनोहारी चेहरा है, तो वह निश्चित रूप से नेताजी ही हैं।

उनके लक्ष्य प्राप्ति के लिए अपनाए गए रास्ते, उसकी व्यावहारिकता की कमी और फासीवादियों का समर्थन लेने जैसे कदमों की आलोचना के बावजूद, उनके देशभक्ति पर किसी को संदेह नहीं था। यही कारण है कि नेताजी की रहस्यमयी मृत्यु को आज भी हम गहरे दुख के साथ याद करते हैं।

हालांकि, हाल के समय में नेताजी की स्मृति को उनके महान विरासत को हड़पने और गांधीजी, नेहरू सहित राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं को उनके प्रतिनायक के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृत्ति देखी जा रही है। लेकिन अहिंसा पर आधारित स्वतंत्रता संग्राम की राजनीतिक प्रभावशीलता पर मतभेद, नेताजी के उत्साहपूर्ण रवैये पर असहमति, और हिटलर व मुसोलिनी के प्रति उनके रुझान के विरोध के बावजूद, गांधीजी और नेहरू के साथ नेताजी का परस्पर स्नेह और सम्मान का एक अनुपम बंधन था। नेताजी, गांधीजी, नेहरू और जिन्ना द्वारा एक-दूसरे को लिखे गए पत्रों को पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाता है। सुगाता बोस की पुस्तक (Subhash Chandra Bose: Speeches, Articles and Letters) और रुद्रांशु मुखर्जी की पुस्तक (Nehru and Bose: Parallel Lives) में इसका स्पष्ट उल्लेख है।

कथित तौर पर तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली को नेहरू द्वारा लिखा गया एक जाली पत्र, जिसमें नेहरू ने नेताजी को "आपका युद्ध अपराधी" कहा, सोशल मीडिया पर नेहरू की नेताजी के प्रति "कट्टर शत्रुता" के सबूत के रूप में व्यापक रूप से प्रचारित किया जा रहा है। लेकिन, 26 और 27 दिसंबर 1945 को अलग-अलग तारीखों के साथ इस पत्र की कई प्रतियां इंटरनेट पर उपलब्ध होने के कारण, यह स्पष्ट है कि यह पत्र जाली है। नेहरू की भाषा शुद्धता और शैली को जानने वाले इस पत्र को, जो व्याकरण और वर्तनी की गलतियों से भरा है, हंसी में उड़ा देंगे। फिर भी, यह सोचने की बात है कि भारत में लाखों लोग इस तरह के फोटोशॉप निर्मित पत्र को उत्साहपूर्वक प्रचारित करते हैं। दावा किया जाता है कि नेहरू ने दिल्ली में अपने स्टेनोग्राफर श्यामलाल जैन को यह पत्र लिखवाया था। लेकिन, समकालीन समाचार पत्रों से स्पष्ट है कि 25 से 29 दिसंबर तक नेहरू बिहार और इलाहाबाद में थे।

25 दिसंबर 1945 को बिहार के बांकीपुर में एक सार्वजनिक सभा में, नेहरू ने आईएनए का प्रेरणादायक युद्ध गीत "कदम कदम बढ़ाए जा, खुशी के गीत गाए जा..." को उत्साहपूर्वक गाया और जनता से इसे जोश के साथ दोहराने का आह्वान किया। यह खबर अगले दिन इंडियन एक्सप्रेस में प्रमुखता से प्रकाशित हुई थी। यह कल्पना करना कितना हास्यास्पद है कि एक दिन पहले नेताजी के युद्ध गीत को उत्साह से गाने वाले नेहरू ने अगले ही दिन उन्हें "युद्ध अपराधी" कहकर ब्रिटिश प्रधानमंत्री को पत्र लिखा!

जिन्हें अब कुछ लोग "नेताजी के शत्रु" कहते हैं, वही इंडियन नेशनल कांग्रेस थी, जिसने 1945-46 में आईएनए अधिकारियों के सार्वजनिक मुकदमे में उनकी पैरवी के लिए आगे बढ़कर वकीलों की एक मजबूत टीम बनाई, जिसमें नेहरू स्वयं शामिल थे। इसके लिए नेहरू ने 25 साल बाद वकील का चोगा फिर से पहना। भूलाभाई देसाई, आसफ अली, तेज बहादुर सप्रू, और होरीलाल वर्मा जैसे प्रख्यात वकीलों ने आईएनए अधिकारियों के लिए मजबूती से अदालत में पैरवी की और उन्हें भारतीय जनता के सामने वीर नायकों के रूप में स्थापित किया। यह काम कांग्रेस ने किया, न कि हिंदू महासभा के नेताओं ने।

कांग्रेस और आईएनए रिलीफ कमेटी ने 12 नवंबर 1945 को कोलकाता के देशप्रिय पार्क में आयोजित आईएनए दिवस समारोह में नेताजी के भाई शरत बोस, नेहरू और सरदार पटेल ने लाखों लोगों को संबोधित करते हुए नेताजी की साहसिक देशभक्ति की भावुक बातें कीं। प्रधानमंत्री बनने के बाद लाल किले में अपने पहले भाषण में भी नेहरू ने गांधीजी के साथ केवल नेताजी का ही उल्लेख किया।

भारतीय संविधान के मूल स्वरूप में केवल दो स्वतंत्रता सेनानियों की तस्वीरें शामिल की गईं: पहली, राष्ट्रपिता गांधीजी की, और दूसरी, नेताजी की, जिन्हें गांधीजी को "राष्ट्रपिता" कहने वाले पहले व्यक्ति के रूप में जाना जाता है।

आईएनए की चार ब्रिगेडों के नाम गांधी, नेहरू, आजाद और सुभाष थे, साथ ही झांसी रानी रेजिमेंट भी थी। इन नामों को चुनते समय नेताजी के दिमाग में सावरकर या गोलवलकर का नाम कभी नहीं आया। यह स्पष्ट है कि नेताजी का विश्वदृष्टिकोण धर्मनिरपेक्ष और बहुलवादी था, और वे अपनी कांग्रेस विरासत पर गर्व करते थे।

इतिहास में कई सबूत हैं जो नेहरू और बोस के बीच गहरे भावनात्मक बंधन को दर्शाते हैं। जब नेहरू की पत्नी कमला नेहरू यूरोप में बीमार थीं, तो बोस ने एक भाई की तरह उनकी हर संभव मदद की। जून 1935 में, पित्ताशय की सर्जरी के बाद वियना से चेकोस्लोवाकिया की यात्रा के दौरान, गंभीर अस्थमा से पीड़ित और अत्यंत कमजोर कमला नेहरू के साथ बोस प्राग गए। उस समय नेहरू भारत में जेल में थे।

सितंबर में, बोस ने जर्मनी के बैडनवीलर सैनिटोरियम में इलाजरत कमला को फिर से देखा। तब तक मरणासन्न कमला से मिलने की अनुमति पाकर नेहरू वहां पहुंच चुके थे। बोस ने एक स्नेहपूर्ण भाई की तरह दोनों के साथ समय बिताया। मानसिक रूप से टूट चुके नेहरू के लिए बोस की उपस्थिति एक बड़ा सहारा थी।

जब कमला को स्विटजरलैंड के लुसाने में एक रिसॉर्ट में भर्ती किया गया, तो बोस वहां भी पहुंचे। 26 फरवरी 1936 को बोस लुसाने पहुंचे। कमला की गंभीर स्थिति को समझकर बोस ने रोमेन रोलैंड से मिलने की अपनी यात्रा रद्द कर दी और अपने प्रिय मित्र के साथ अस्पताल में रहे। तब तक नेहरू की बेटी इंदिरा भी वहां पहुंच चुकी थीं। अंततः, 28 फरवरी को कमला के अंतिम सांस लेने के समय बोस नेहरू और इंदिरा को गले लगाकर सांत्वना दी। शव के अंतिम संस्कार की व्यवस्था भी बोस ने ही की (कृष्णा बोस, Emilie and Subhash: A True Love Story)।

बोस की दुखद मृत्यु के बाद भी नेहरू उन्हें नहीं भूले। कांग्रेस द्वारा नेताजी के नाम पर बनाए गए ट्रस्ट में नेहरू भी सदस्य थे, और उनकी सरकार ने नेताजी की बेटी और पत्नी को प्रतिवर्ष छह हजार रुपये भेजे। 1961 में जब नेताजी की बेटी अनिता बोस निजी यात्रा पर भारत आईं, तो नेहरू ने उनका भव्य स्वागत किया। अठारह साल की उस लड़की को कई राज्यों में आतिथ्य और भोज दिया गया, और दिल्ली में वह नेहरू के आधिकारिक निवास पर रहीं।

कई लोग मानते हैं कि अगर नेहरू की जगह नेताजी प्रधानमंत्री होते, तो भारत का भविष्य कुछ और होता। लेकिन नेताजी नेहरू से भी अधिक स्पष्ट समाजवादी थे। जब वे कांग्रेस अध्यक्ष बने, तो उन्होंने पहली बार प्लानिंग कमीशन बनाया और नेहरू को इसका अध्यक्ष बनने के लिए आमंत्रित किया। साथ ही, वे आधुनिकता, धर्मनिरपेक्षता और समानता में दृढ़ विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे।

उन्होंने मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा जैसे धार्मिक संगठनों के सदस्यों को कांग्रेस में शामिल होने से रोक दिया था। आईएनए में उन्होंने सभी धर्मों के लोगों को शामिल किया। उन्होंने कभी भी हिंदू प्रतीकों या हिंदू पहचान पर आधारित राष्ट्रवाद में विश्वास नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने "विविधता भरे भारत" के विचार में विश्वास किया और इसे बढ़ावा दिया।

उन्होंने स्वतंत्र भारत में सभी धार्मिक और भाषाई समुदायों को समान रूप से सत्ता में हिस्सेदारी देने की वकालत की। एक बार सिंगापुर के एक चेट्टियार मंदिर के पुजारियों ने उन्हें मंदिर में आने का निमंत्रण दिया, लेकिन गैर-हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश न देने के नियम के कारण उन्होंने पहले इसे ठुकरा दिया। जब उन्हें सभी जातियों और धर्मों को शामिल करने वाले एक सार्वजनिक समारोह का आश्वासन मिला, तभी वे मंदिर गए। उस समय उनके साथ आईएनए के मुस्लिम सहयोगी आबिद हसन और मोहम्मद समयम कियानी भी थे।

संक्षेप में, नेताजी ने एक धर्मनिरपेक्ष, स्वतंत्र और समतामूलक लोकतांत्रिक भारत के लिए जिया और मरा। उनकी विचारधारा और कार्यशैली एकरूप और धार्मिक उग्र दक्षिणपंथ के बिल्कुल विपरीत थी। इसलिए उनकी विरासत को बहुसंख्यक राष्ट्रवाद के पैरोकार आसानी से हड़प नहीं सकते।

नेताजी ने साम्राज्यवाद का प्रतिरोध आत्मबलिदान के माध्यम से किया, न कि धर्मनिरपेक्षता और स्वतंत्रता संग्राम को धोखा देकर। इसलिए नेहरू को बाहर रखकर पोस्टर में फोटो लगाकर नेताजी को आसानी से अपना बनाने की कोशिश न करें।

(मेरी पुस्तक "इंडिया का विचार" का एक प्रिय अध्याय - सुधा मेनन)

रविवार, 17 अगस्त 2025

प्रेस कांफ्रेंस का खेल करते पकड़े गये चुनाव आयोग

 प्रेस कांफ्रेंस का खेल करते पकड़े गये चुनाव आयोग 


यह तो चोरी और सीना ज़ोरी की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना वोट चोरी के मामले में चुनाव आयुक्त इस तरह से खेल नहीं करते कौन है ये ज्ञानेश कुमार गुप्ता आप भी जान ले…

देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार गुप्ता जी राजनैतिक प्रेस कॉन्फ्रेंस करने आए थे और धमका कर चले गए।तो क्या यह सब नौटंकी सिर्फ़ राहुल को धमकाने के लिए थी जबकि राहुल को लेकर पूरी दुनिया जान चुकी है कि राहुल किसी से डरने वाले नहीं हैं 

शायद चुनाव आयुक्त में इतनी भी समझ नहीं है कि संघर्ष, बाधा, परिस्थिति की एक ब्राइट एस्पेक्ट होता है, यह लीडर पैदा करता है ।

राहुल गांधी को मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे, पर तब वो एक परिपक्व राजनेता नहीं बन पाते। आज वो पीएम नहीं हैं, पर लोक नेता बन चुके हैं !जो कि उन्होंने उनका माखौल, IT ED CBI दबाव , पार्टी की  हार के बीच ,पद यात्रा, संघर्ष, ईमानदारी,त्याग, प्यार से प्राप्त किया है।

आज अमित शाह के सहकारिता मंत्रालय में सचिव के रूप में कार्य कर चुका सीईसी ज्ञानेश गुप्ता के प्रेस कॉन्फ्रेंस से राहुल गांधी द्वारा लगाए गए आरोप और पुख़्ता हो गए, 

देश की जनता एवं प्रबुद्ध नागरिक, पत्रकारों ने राहुल गांधी को हीरो बता रहे हैं। जबकि ज्ञानेश गुप्ता को खलनायक, सोशल साइट इंस्टा, x आदि पर ज्ञानेश गुप्ता से लोग सवाल पूछ रहे हैं, ट्रोल कर रहे हैं।

बिहार का विधानसभा चुनाव एनडीए के लिए आखिरी कील साबित होगी।

ज्ञानेश कुमार गुप्ता गृहमंत्री अमित शाह के आंख कान रहें हैं। वह गृहमंत्री अमित शाह के सबसे विश्वसनीय अधिकारी रहे हैं जिन्हें समय पूर्व रिटायर कराकर देश‌ का चुनाव आयुक्त बनाया गया है। इसके पूर्व ज्ञानेश कुमार गुप्ता धारा 370 और राममंदिर निर्माण का नेतृत्व कर चुके हैं..

ज्ञानेश कुमार गुप्ता के पिता डॉ. सुबोध कुमार गुप्ता, पेशे से चिकित्सक थे और आगरा में चीफ मेडिकल ऑफिसर (CMO) के पद से सेवानिवृत्त हुए। 

ज्ञानेश कुमार गुप्ता के भाई मनीष कुमार 1991 बैच के भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी हैं।

ज्ञानेश कुमार गुप्ता के बहनोई उपेंद्र कुमार जैन 1992 बैच के मध्य प्रदेश कैडर के IPS अधिकारी हैं और वर्तमान में अपर पुलिस महानिदेशक (ADG) के पद पर कार्यरत हैं।

ज्ञानेश कुमार गुप्ता की बड़ी बेटी मेधा रूपम 2014 बैच की IAS अधिकारी हैं और वर्तमान में उत्तर प्रदेश के नोएडा जिले की जिलाधिकारी (DM) हैं। 

ज्ञानेश कुमार गुप्ता की इस बेटी के पति‌ मनीष बंसल भी 2014 बैच के IAS अधिकारी हैं और सहारनपुर के जिलाधिकारी हैं। 

ज्ञानेश कुमार गुप्ता की छोटी बेटी अभिश्री, भारतीय राजस्व सेवा (IRS) अधिकारी हैं, जिन्होंने 2017 में UPSC सिविल सेवा परीक्षा पास की। 

अभिश्री के पति, अक्षय लाबरू, 2018 बैच के त्रिपुरा कैडर के IAS अधिकारी हैं और वर्तमान में जम्मू-कश्मीर में सूचना विभाग के निदेशक और लेफ्टिनेंट गवर्नर के सचिवालय में अतिरिक्त सचिव के रूप में कार्यरत हैं।


बेटा: अरनव, जो अभी पढ़ाई कर रहा है वह भी जल्दी ही IAS बनेगा.. 


बाकी लोगों को 5 किलो मुफ्त अनाज मिल ही रहा है...(साभार)

शनिवार, 16 अगस्त 2025

छत्तीसगढ़ की बेटी श्वेता चौबे आईपीएस ने छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया

 छत्तीसगढ़ की बेटी श्वेता चौबे आईपीएस ने छत्तीसगढ़ का नाम रोशन किया 



झारखंड में शेरनी आईपीएस श्वेता चौबे छत्तीसगढ़ की बेटी है, उन्होंने अपने पिता के पदचिह्नों पर चलकर न केवल छत्तीसगढ़ को गौरान्वित किया बल्कि ऐसा मुक़ाम हासिल किया जो हर आईपीएस का सपना होता है, मूलतः सारंगढ़ की श्वेता चौबे ने साबित कर दिया कि यदि ईमानदारी से कर्तव्य निभाया जाय तो कोई कार्य असंभव नहीं है, श्वेता की माँ पुष्पा चौबे सेमरा परिवार की बेटी है।

आईपीएस श्वेता चौबे की स्मार्ट पुलिसिंग के बारे में कौन नहीं जाता है। वर्तमान में पौडी में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात श्वेता चौबे अपनी विशिष्ठ कार्यशैली के लिए पहचानी जाती है। इससे पहले पुलिस अधीक्षक चमोली के पद पर कार्यरत रही है। कोरोना काल में बतौर एसपी सिटी उनके कार्यकाल की हर किसी ने सराहना की है। देहरादून में लोग आज भी उनको याद करते हैं। इसके अलावा 2021 के महाकुंभ के दौरान उन्होंने जिस तरह से कार्य किया है वह किसी से छिपा नहीं है। एसआइटी में रहते हुए उन्होंने शिक्षक भर्ती घोटाले का भंडाफोड़ किया तो विजिलेंस में रहते हुए बड़े-बड़े भ्रष्टाचारियों को जेल भेजने का काम किया है। अंकिता भंडारी कांड के बाद पौड़ी जिले के बिगड़ते हालत को देखते हुए उनको पौड़ी के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की जिम्मेदारी मिली थी। उनके नेतृत्व में पौड़ी पुलिस ने कई बड़ी सफलता हासिल की है। इस बार के कांवड़ मेले के दौरान नीलकंठ महादेव मंदिर में उमड़ी भीड़ एवं खराब मौसम के बीच वह लगातार पुलिसकर्मियों का उत्साहवर्धन करती रही। 

इससे पहले महिला सुरक्षा के लिए चलाए गए ऑपरेशन पिंक प्रोजेक्ट के लिए आईपीएस श्वेता चौबे स्कोच अवार्ड से सम्मानित। नई दिल्ली में आयोजित समारोह में उन्हें यह सम्मान मिला। चौबे ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक पौडी गढवाल के कार्यकाल के दौरान कुशल नेतृत्व और उत्कृष्ट कार्य प्रणाली के तहत जनपद में बालिकाओं व महिलाओं की सुरक्षा को गंभीरता से लेते हुए ऑपरेशन पिंक प्रोजेक्ट चलाया गया था। इसके तहत जनपद में वृहद स्तर पर प्रशिक्षण देकर महिला दरोगा व महिला कांस्टेबल को महिला सुरक्षा से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर प्रशिक्षित किया गया। उसके उपरांत उन्हें जनपद के विभिन्न थाना क्षेत्रों में ऑपरेशन पिंक के अन्तर्गत पिंक यूनिट टीम का गठन कर तैनात किया गया। पिंक यूनिट टीम का कार्य अपने थाना क्षेत्रों में पड़ने वाले स्कूल कालेज परिसर के बाहर मौजूद रहकर शान्ति एवं कानून व्यवस्था बनाने, मनचलों, शरारती, अराजक तत्वों पर कड़ी नजर रखने, छात्राओं को गुड टच बैड टच की जानकारी देने, साइबर सुरक्षा, पोक्सो एक्ट व सोशल मीडिया में ट्विटर, इस्टाग्राम, फेसबुक का सुरक्षित उपयोग सम्बन्धी जानकारी देना रहा। स्कूल-कॉलेज, नौकरीपेशा लड़कियों, महिलाओं की सुरक्षा के लिए पिंक यूनिट ने सुरक्षा कवच का काम किया।

दुर्ग जिले में बिता है IPS श्वेता चौबे का बचपन
इसके बाद वे सन 2000 में विशिष्ट पुलिसिंग सेवा के लिए भी राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजे गए थे। आपको बता दें कि श्वेता चौबे का पूरा बचपन छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में ही बीता है और उनका दादिहाल सारंगढ़ है। श्वेता ने सन 2005 में बतौर डीएसपी राज्य पुलिस सेवा में अपने करियर की शुरुआत की थी और अपने दबंग अंदाज के चलते उन्हें धीरे-धीरे पूरे उत्तराखंड में उत्तराखंड की शेरनी के नाम से जाना जाने लगा। सन 2019 में उन्हें आईपीएस अवार्ड हुआ और वे देहरादून में बतौर एसपी पदस्थ हुई, कोरोना काल में बतौर एसपी सिटी उनके कार्यकाल की हर किसी ने सराहना की। इसके अलावा 2021 के महाकुंभ के दौरान उन्होंने जिस तरह से कार्य किया वह किसी से छिपा नहीं है।

श्वेता चौबे ने बताया कि उनके पिता  विजय शंकर चौबे को बचपन से ही उन्होंने पुलिस में सेवा देते हुए देखा है जिसके चलते वे भी बचपन से ही एक बड़ी पुलिस अधिकारी बनना चाहती थी और उनका यह सपना तब पूरा हुआ जब वे उत्तराखंड राज्य पुलिस सेवा में बतौर डीएसपी पदस्त हुईं। श्वेता ने बताया कि इस पुरस्कार के मिलने से वे बहुत खुश हैं लेकिन उससे भी ज्यादा खुशी उन्हें इस बात की है कि वे अपने पिता के पदचिन्हों पर आगे बढ़ रहीं है और आगे भी इसी तरह वो अपने पिता के आदर्शों के साथ ईमानदारी से पुलिस विभाग में अपनी सेवाएं देती रहेंगी।

श्वेता चौबे के पिता विजय शंकर चौबे दो बार राष्ट्रपति पदक से सम्मानित हुए पहली बार १९८७ और दूसरी बार २००० में। 

मूलतः सारंगढ़ के रहने वाले श्री चौबे का ससुराल सेमरा परिवार है, श्वेता चौबे की माँ पुष्पा चौबे सेमरा परिवार की बेटी है ।

शुक्रवार, 15 अगस्त 2025

मोदी 2035 तक गद्दी नहीं छोड़ना चाहते…

 मोदी 2035 तक गद्दी  नहीं छोड़ना चाहते…


एक तरफ़ जब समूची मीडिया यह बताने में लगी है कि पचहत्तर की उम्र में आरएसएस उन्हें हटा देगी, शाह की ताजपोशी की तैयारी चल रही है तब लालक़िले के प्राचीर से प्रधानमंत्री मोदी का 2035 तक चाहता हूँ कहना किस बात का संकेत है…

हालाँकि लोगों को अक्सर यह कहते सुना जा सकता है कि यह आदमी लाल किले की प्राचीर से बोलने लायक नहीं है ! इनमे  वह गरिमा और गंभीरता नहीं है,  जिसकी अपेक्षा की जाती है  ! इनकी  भाषा चुनावी टोन से आगे नहीं जा पाती  ! कोसना , कलपना चारित्रिक गुणों की तरह व्यक्तित्व में समाये हुए है। सोशल मीडिया पर चर्चा है कि इन्होने आज देश दुनिया को एक सौ तीन मिनिट की यंत्रणा दी , काफी उबाऊ , थकाऊ टाइप का भाषण था , जिसका अंडर  करंट दिमाग में चल रही चुनावी खब्त ( बिहार और फिर बंगाल ) को दर्शा रहा था। देश इनसे ट्रम्प का नाम सुनना चाहता था , चाइना का नाम सुनना चाहता था , वोट चोरी पर स्पस्टीकरण चाहता था लेकिन बड़े मियां पाकिस्तान से आगे नहीं निकल पाए। 

क्षिक्षा , रोजगार , स्वास्थ वैसे भी कभी इनकी प्राथमिकता में नहीं रहे थे , इस बार भी नदारद थे ! हाँ बासी कड़ी में उबाल देने के लिए देश भक्ति थी और बताते है कि इनडायरेक्टली मुस्लिम भी थे। 

राहुल रोजाना ही इनकी छाती पर मुंग दल रहे है , इनके पास जवाब नहीं है तो वह गुस्सा इनके चेहरे का स्थाई भाव बनता जा रहा है , अक्सर वाणी से भी प्रस्फुटित हो ही जाता है। 

जुमले बे असर हो रहे है ! फेक्ट चेकर इनका मुंह खुलते ही सक्रिय हो रहे है , लगभग हर दांव उल्टा पड़ रहा है -शास्त्रों में इसे अंत की शुरुआत भी कहा जाता है !

भाषण में उस आरएसएस का ज़िक्र जिसका आज़ादी के आंदोलन की बजाय अंग्रेजों की तीमारदार और जासूसी पर ज़्यादा भरोसा था उनकी पश्चाताप की झलक कहा जाय तो ग़लत नहीं होगा लेकिन किसी भी बलिदानी का ज़िक्र किए स्वतंत्रता दिवस मनाना भी किसी दुर्भावना से कम नहीं माना जाना चाहिए ।

ऐसे में मोदी के भाषण का सबसे ख़ास बात यह है कि उनके द्वारा गद्दी  नहीं छोड़ने का इंडायरेक्ट एलान है…

पीएम मोदी ने आज लाल किले के प्राचीर से कहा:

2035 तक देश के सभी महत्वपूर्ण स्थलों,सामरिक के साथ सिविलियन क्षेत्र और आस्था के केंद्र को टेक्नोलॉजी के नए प्लेटफॉर्म के जरिये पूरी तरह सुरक्षा का कवच दिया जाएगा।

उन्होंने कहा कि आने वाले 10 साल 2035 तक इस राष्ट्रीय सुरक्षा कवच का विस्तार करना चाहता हूं....!!

इधर मीडिया में चल रहा था कि RSS इन्हें 75 साल पूरे होने के पहले हटा देगी, मोदी अपने प्यादे शाह को पीएम पद पर बिठाने वाले हैं आदि आदि। जबकि आज के भाषण से लग रहा है मोदी गद्दी छोड़ने वाले नहीं..(साभार)


गुरुवार, 14 अगस्त 2025

बदल गया EVM का परिणाम सुप्रीम कोर्ट में हारा हुआ जीता

 बदल गया EVM का परिणाम, सुप्रीम कोर्ट में हारा हुआ जीता 


लगता है कि मोदी सत्ता और चुनाव आयोग के बुरे दिन शुरू हो गये है, उधर हरियाणा में ईवीएम से हारा व्यक्ति पुनर्गणना में जीत गया तो अनुराग ठाकुर ने होशियारी दिखाकर आयोग और पार्टी को ही मुसीबत में खड़ा कर दिया है, सुप्रीम कोर्ट का ६५ लाख वॉटरो को दिया फ़ैसला भी चुनाव आयोग के लिये मुसीबत बढ़ाने वाला है तो २०२४ का चुनाव शून्य घोषित करने की आवाज़ देश भर में गूंजने लगी है…

हरियाणा में ईवीएम का परिणाम सुप्रीम कोर्ट में कैसे बदला उससे पहले बता देते है कि मूर्ख मित्र से विद्वान शत्रु बेहतर, अनुराग ठाकुर की प्रेस कॉन्फ्रेंस से मोदी सरकार बुरी तरह फँस गई है 

प्राचीन कहावतें अक्सर वर्तमान घटनाओं को आईना दिखाती हैं। "मूर्ख मित्र से विद्वान शत्रु बेहतर" यह उक्ति अनुराग ठाकुर पर बिल्कुल सटीक लागू होती है, सांसद अनुराग "गोलीमारो" ठाकुर ने विपक्ष को घेरने की कोशिश में अपनी ही सरकार और चुनाव आयोग को फंसा दिया। 13 अगस्त 2025 को दिल्ली में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में ठाकुर ने छह लोकसभा सीटों—रायबरेली, वायनाड, कन्नौज, डायमंड हार्बर, अमेठी और एक अन्य—पर फर्जी वोटरों की मौजूदगी का आरोप लगाया, जिसमें लाखों संदिग्ध मतदाता, डुप्लिकेट एंट्रीज, फर्जी पते और आयु में हेरफेर के आंकड़े पेश किए। उनका इरादा कांग्रेस नेता राहुल गांधी के 'वोट चोरी' के आरोपों का जवाब देना था, जहां गांधी ने भाजपा और चुनाव आयोग पर फर्जी वोटों से चुनाव प्रभावित करने का इल्जाम लगाया था।

ठाकुर की यह रणनीति विपक्ष को निशाना बनाने की थी, खासकर राहुल गांधी की वायनाड और रायबरेली सीटों पर, जहां उन्होंने दावा किया कि फर्जी वोटरों ने चुनाव परिणाम प्रभावित किए, लेकिन यह कदम उल्टा पड़ गया। कांग्रेस ने तुरंत पलटवार करते हुए कहा कि अगर सत्ताधारी पार्टी के सांसद खुद मतदाता सूचियों में फर्जीवाड़ा स्वीकार कर रहे हैं, तो केंचुआ पूरी तरह से इसके लिए जिम्मेदार है क्योंकि वोटर लिस्ट तो उसी ने तैयार की, विपक्ष ने मांग कर दी कि पूरा 2024 लोकसभा चुनाव अमान्य घोषित किया जाए, क्योंकि यह फर्जी वोटर लिस्ट पर आधारित था, यह तो  राहुल के आरोपों की पुष्टि करता है, अब यह भी पूछा जा रहा है कि भाजपा को वोटर काकंप्यूटर रीडेबल डेटा कैसे मिला जबकि विपक्ष को नहीं। यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी की वाराणसी सीट पर भी सवाल उठने से शुरू हो गए हैं, आरोप लगाया जा रहा है कि भाजपा-चुनाव आयोग की मिलीभगत से फर्जी लिस्ट तैयार हुई। 

गोली मारो ठाकुर का इरादा विपक्ष को कमजोर करना था, लेकिन उनके आंकड़ों ने चुनाव आयोग की निष्पक्षता को कटघरे में खड़ा कर दिया।  आयोग ने राहुल गांधी को नोटिस जारी किया था, लेकिन ठाकुर को नहीं, जो स्पष्ट पक्षपात का संकेत देता है। परिणामस्वरूप, सरकार फंस गई—एक ओर विपक्ष नए चुनाव की मांग कर रहा है, दूसरी ओर भाजपा को अपनी ही बातों का बचाव करना पड़ रहा है।

अभी बीजेपी बचाव भी नहीं कर पाई थी कि सुप्रीम कोर्ट ने चूना आयोग से साफ कहा है कि बिहार की वोटर लिस्ट से काटे गए 65 लाख लोगों के नाम

1. जिलावार

2. श्रेणीवार

3. EPIC नंबर के साथ 

वेबसाइट पर दिखाना होगा। 

साथ में एक सर्च बॉक्स भी देना होगा, ताकि लोग EPIC नंबर के आधार पर अपने नाम को सर्च कर सके।

चूना आयोग वेबसाइट में हर नाम के साथ वह कारण भी बताएगा, जिसकी वजह से नाम काटे गए। 

चूना आयोग को अब यह भी प्रचारित करना होगा कि आधार कार्ड को मान्य दस्तावेज माना जाएगा।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले से इतर एक और फ़ैसला सुप्रीम कोर्ट में हुआ जो ईवीएम की विश्वसनीयता पर उठते सवाल की पुष्टि ही नहीं करता बल्कि साबित करता है कि ईवीएम से परिणाम बदला जा सकता है 

मामला था हरियाणा के पानीपत जिले के गोहाना लाखु गांव की पंचायत के परिणाम का जिसमें किसी कुलदीप सिंह को मशीनों से वोट की गिनती के बाद विजेता घोषित कर दिया गया था! 

उसके निकटतम प्रतिद्वंदी मोहित कुमार को नवंबर 22 के पंचायत चुनाव में मशीनों पर कुछ शक हुआ कि उससे परिणाम प्रभावित हुआ है!

वह पानीपत के सेशन कोर्ट में इस फैसले के खिलाफ याचिका लगाकर न्याय की मांग लेकर गया विद्वान कोर्ट ने फैसला दिया की सब मशीनों की दोबारा से पुनर्गणना की जाए, और उसके बाद परिणाम घोषित किया जाए! 

लेकिन जीते हुए उम्मीदवार कुलदीप सिंह को यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं था उसने हरियाणा पंजाब हाई कोर्ट में अपनी याचिका दायर की और वहां से फैसला दिया गया के परिणाम पूर्व वत रखा जाए , और सेशन कोर्ट के फैसले को कैंसिल कर दिया! 

लेकिन निकटतम प्रतिद्वंद्वी अपने आप में बहुत आश्वस्त था वह मामला सुप्रीम कोर्ट में ले गया वहां तीन जजों की पीठ श्री सूर्यकांत जी श्री दीपंकर दत्ता जी और श्री एन कोटेश्वर सिंह जी की पीठ ने फैसला दिया , और सारी ईवीएम मशीन कोर्ट में तलब की गई, सारी मशीनों को सुप्रीम कोर्ट में मंगाया गया और फिर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दियाकी अब इसकी पुनर्गणना रजिस्ट्रार कावेरी की निगरानी में होगी और उसकी पूरी तरह वीडियो ग्राफी की जाएगी! 

उसके बाद सभी उम्मीदवारों के प्रतिनिधि वहां बुलाए गए और पुनर गणना  संपन्न कीगई!

आश्चर्य की बात थी तो परिणाम बदल गया निकटतम उम्मीदवार मिलाप को 3767 वोटो की गिनती जो पांच मशीनों के अंदर की गई थी उसमें उसे 1051 वोट प्राप्त हुए और जिस उम्मीदवार को विजयी घोषित किया गया था कुलदीप सिंह उसे सिर्फ 1000 वोट मिले! 27 वोट से हारा हुआ बुधवार 51 वोटो से जीत गया!

सुप्रीम कोर्ट ने नए परिणाम को असली परिणाम बता कर मिलन कुमार को सरपंची दिलवा दी !

 अब विश्लेषकों का सवाल यही है कि यदि चुनाव अधिकारी ने गिनती सही की थी तो फिर परिणाम कैसे बदल गए? 

और अगर यह परिणाम बदल सकते हैं तो फिर ईवीएम हैकिंग से लेकर evm करप्ट होने की बात जो पब्लिक डोमेन में है उसमें कुछ तो सच्चाई है! 

या यह सारी कारास्तानी चुनाव अधिकारियों की थी जो शासन के इशारों पर काम कर कर जनादेश के अपहरण की कोशिश कर रहे थे !

कारण कुछ भी हो लेकिन पहली बार सबूत के साथ सुप्रीम कोर्ट के पटल पर evm संदेह के घेरे में है और ट्रस्ट डिफिसिट से जूझ रही भारतीय चुनाव व्यवस्था पर और चुनाव आयोग पर एक बार फिर सवालिया निशान लग गया है कि आखिर वह खेल तो करती ।(साभार)


बुधवार, 13 अगस्त 2025

अमित शाह की करारी हार…

 अमित शाह की करारी हार…


वोट चोरी को लेकर देश भर में मचे बवाल के बीच यदि मोदी के मंत्री किरन रिज़िज़ू का व्यवहार चुनाव आयोग की प्रवक्ता की तरह है तो गृह मंत्री की ऐसी करारी हार इससे पहले कभी नहीं हुई है और ये हार इसलिए मायने रखता है क्योंकि इन दिनों अमित शाह को उत्तराधिकारी के रूप में ज़ोर शोर से प्रमोट किया जा रहा था तो आने वाले दिनों में उपराष्ट्रपति का चुनाव भी है…

बात की शुरुआत प्रवक्ता से चुनाव आयोग ने विपक्षी दलों के 13 नेताओं को बुलाया था या 30 को, यह जानकारी चुनाव आयोग का प्रवक्ता या जनसंपर्क अधिकारी दे तो समझ में आता है। वैसे वहां गेट पर तैनात सुरक्षा गार्ड भी यह जानकारी दे सकता है।

लेकिन अब चूंकि चुनाव आयोग भी पूरी तरह सरकार का  ही हिस्सा बन चुका है, इसलिए उसकी ओर से हर जानकारी देने या उस पर लगने वाले आरोपों का जवाब देने का काम सरकार के मंत्री और सत्ताधारी पार्टी के प्रवक्ता करने लगे हैं..!

अब आ जाइए अमित शाह की हार पर…

कांस्टीट्यूशन क्लब दरअसल देश के चुनिंदा मेंबर ऑफ़ पार्लियामेंट की संस्था होती है जिसमें लोकसभा और राज्यसभा के सांसद सदस्य होते हैं साथ ही कुछ पूर्व लोकसभा सांसद जो पहले सांसद निवास में रहते थे उनके भी वोट शामिल होते हैं! 

इसका पदेन अध्यक्ष लोकसभा अध्यक्ष होते हैं लेकिन सेक्रेटरी और अन्य सभी पदों पर चुनाव की परंपरा है! 

राजीव प्रताप रूडी जो बिहार छपरा से भाजपा के सांसद हैं पिछले 25 वर्षों से इस पद पर कार्यरत है! 

इस बार का चुनाव इस मायने में रोचक था, क्योंकि इस बार अमित शाह एंड पार्टी ने संजीव बालियान को राजीव प्रताप रूडी के खिलाफ खड़ा किया था! 

938 सदस्यों वाले इस क्लब में 788 तो वर्तमान लोकसभा राज्यसभा के सांसद थे तथा शेष वह लोग थे जो पूर्व में पार्लियामेंट के सदस्य थे पर अब सुदूर गांव में रहते हैं मतलब सदस्य नहीं होने की वजह से संसद भवन के परिसर छोड़कर चले गए! 

कल पूरे चुनाव में संजय बालियान को जीताने के लिए अमित शाह कैंप पूरी तरह सक्रिय नजर आया यहां तक किजेपी नड्डा जैसे लोग भी संजीव बालियान की मदद करते हुए देखे गए ! अमित शाह की हल्ला ब्रिगेड के सदस्य झारखंड के संसद सदस्य निशिकांत दुबे ने तो यहां तक घोषणा की की जीतेंगे संजीव बालियान हीं! 

788 सांसदों के इस समूह में 421सांसद एनडीए के हैं 43 सांसद न्यूट्रल है और 324 सांसद इंडिया के हैं! 

अगर पूरी तरह भाजपा समर्थित सांसद अमित शाह मोदी कैंप के कैंडिडेट संजीव बालियान के साथ नजर आते तो उनकी हार नामुमकिन थी!

लेकिन राजीव रूडी 102 वोटो से जीते! कल 680वोट गिरे जिन में 38 वोट डाक मत पत्र के थे , यह भी पूर्व सांसद और राज्यपाल वगैरा हैं जो अधिकांश भाजपा समर्थक थे! 

इंडिया गठबंधन के सभीसदस्य राजीव रुढी को सपोर्ट करते हुए नजर आए यहां तक की सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे जैसे वरिष्ठ नेता भी राजीव रूडी के लिए फ्लोर मैनेजमेंट करते  दिखे!

क्योंकि संसद अभी चल रही है इसलिए माना जाना चाहिए कि 644 वर्तमान सांसदों ने इसमें वोट किया और बाकी जो 38 डाक मत पत्र से वोट आए इस तरह कुल 682 मतदाताओं ने वोट डालें! 

सीधा सा गणित है 788 वर्तमान सांसदों में 421 भाजपा लीड गठबंधन के हैं और324इंडिया के हैं ,43 सांसद किसी गठबंधन के नहीं है!

 संजू बालियां को मात्र 290 वोट मिले और राजीव प्रताप को 392 वोट मिले इसमें 38 वोट डाक मत पत्र वाले भी शामिल थे यानी 354 वर्तमान सांसदों के वोट थे! एक आश्चर्य की बात और थी कि यह पूर्व 38 सांसद जिन्होंने डाक मत पत्रों से अपने मत भेजें वह सभी राजीव प्रताप रूडी को मिले!

मोदी शाह कैंप के खुले समर्थन के बावजूद इंडिया के सांसदों के सहयोग से राजीव रूडी की यह जीत क्या भाजपा के असंतोष की कहानी कह रहा है? 

आने वाले उपराष्ट्रपति चुनाव के संदर्भ में आंकड़ों की यह कारीगरी रोमांच पैदा कर रही है!

वैसे एक नॉरेटिव जाट बनाम राजपूत का भी है और अमित शाह ने संजीव बालियान को खड़ा किया था इसलिए बड़े राजपूत नेता योगी आदित्यनाथ राजनाथ सिंह जैसे नेताओं ने बिहार के राजपूत नेता राजीव प्रताप की जीत में बड़ी भूमिका अदा करी , इंडिया गठबंधन का सहयोग तो अपनी जगह था ही! 

क्या भारतीय जनता पार्टी में अमित शाह के खिलाफ भी एक बड़ा वर्ग असंतोष के मुहाने पर खड़ा है!(साभार)