शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

छत्तीसगढ़ में भयावह संकट


छत्तीसगढ़ में भयावह संकट 

 विकास की बलि चढ़ता 'मध्य भारत का फेफड़ा'

 रायगढ़ के पुरूँगा और पेलमा में 983 हेक्टेयर जंगल के डायवर्सन को Stage-1 मंजूरी के बाद उठते सवालक्या कोयले की भूख छत्तीसगढ़ के पर्यावरण, नदियों और वन्यजीवों को रेगिस्तान में तब्दील कर देगी?


एक तरफ छत्तीसगढ़ का हर अंचल—चाहे वह बस्तर हो, सरगुजा हो या मैदानी क्षेत्र—जल, जंगल और जमीन को बचाने की जमीनी लड़ाई लड़ रहा है। दूसरी तरफ, औद्योगिक घरानों को कोयला खदानें सौंपने के लिए प्रशासनिक अनुमतियों का सिलसिला बदस्तूर जारी है। हाल ही में केंद्र सरकार के केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की सलाहकार समिति ने रायगढ़ जिले की दो बड़ी कोयला परियोजनाओं—पुरूँगा और पेलमा—के लिए 983 हेक्टेयर से अधिक वन भूमि के डायवर्सन (Stage-1 क्लीयरेंस) को हरी झंडी दे दी है। इस फैसले ने राज्य के पर्यावरणविदों, स्थानीय ग्रामीणों और जनसंगठनों के बीच एक नए जन-आक्रोश को जन्म दे दिया है।

[धारा 1: पुरूँगा और पेलमाक्या है इस आवंटन का पूरा गणित?]

रायगढ़ जिले में जिन दो खदानों को लेकर घमासान मचा है, उनका ढांचा और आवंटन का इतिहास समझना बेहद जरूरी है:

 पुरूँगा कोयला खदान (छाल तहसील): यह मुख्य रूप से 621.33 हेक्टेयर में फैली एक भूमिगत (Underground) खदान परियोजना है। मार्च 2022 में अंबुजा सीमेंट के अधिग्रहण के बाद यह पूरा ढांचा अडानी समूह के नियंत्रण में आ गया और अब इसके लिए वन भूमि की प्राथमिक मंजूरी हासिल कर ली गई है।

 पेलमा कोयला खदान (तमनार तहसील): 365.10 हेक्टेयर क्षेत्र में फैली यह एक ओपन कास्ट (Open Cast) खदान है। ओपन कास्ट माइनिंग सीधे तौर पर ऊपरी जंगल, मिट्टी और जैव-विविधता का पूरी तरह सफाया कर देती है।

तमनार वही क्षेत्र है जहां पहले भी खदानों के अधिग्रहण और जनसुनवाइयों को लेकर भारी विरोध प्रदर्शन देखे गए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि कॉरपोरेट मुनाफे के आगे स्थानीय जनभावनाओं को लगातार दरकिनार किया जा रहा है।

[धारा 2: हसदेव और मध्य भारत की जैव-विविधता पर मंडराता संकट]

हसदेव आरण्य को अक्सर 'मध्य भारत का फेफड़ा' कहा जाता है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) की रिपोर्ट पहले ही आगाह कर चुकी है कि इस समृद्ध वन क्षेत्र में अत्यधिक खनन गतिविधियां मिनीमाता हसदेव बांगो बांध और हसदेव नदी के प्राकृतिक प्रवाह के लिए घातक साबित होंगी।

पहले से जारी खनन के कारण अब तक हजारों एकड़ घना जंगल नष्ट हो चुका है और लाखों पेड़ काटे जा चुके हैं। इस अंधाधुंध कटाई का सबसे घातक परिणाम यह है कि हाथियों का प्राकृतिक रहवास और पारंपरिक 'एलिफेंट कॉरिडोर' छिन्न-भिन्न हो चुका है। परिणामस्वरूप, उत्तरी छत्तीसगढ़ में मानव-हाथी संघर्ष रोजाना की दर्दनाक हकीकत बन चुका है—जहाँ आए दिन किसानों की फसलें तबाह हो रही हैं और जान-माल का भारी नुकसान हो रहा है।

[धारा 3: Stage-1 बनाम Stage-2: कागजी पेड़ और कड़वी हकीकत]

प्रशासनिक नियमों के मुताबिक, Stage-1 क्लीयरेंस मिलने के बाद कंपनियों को स्टेज-2 (अंतिम मंजूरी) के लिए भारी-भरकम राशि, क्षतिपूरक वनीकरण (Compensatory Afforestation) और अन्य पर्यावरणीय शर्तों को पूरा करना होता है।

लेकिन पर्यावरण कार्यकर्ताओं का कहना है कि कागजों पर नए जंगल उगाने का दावा करना और दशकों पुराने प्राकृतिक वनों को काटकर नष्ट कर देना कभी बराबर नहीं हो सकता। जिस रफ्तार से दुर्लभ प्रजाति के वनस्पति, पुरातात्विक धरोहरें और वन्यजीव अपने प्राकृतिक घर खो रहे हैं, उसकी भरपाई किसी भी 'कैम्पा फंड' या वित्तीय पेनल्टी से संभव नहीं है।

[निष्कर्ष & भविष्य का सवाल]

रायगढ़ और हसदेव के जंगलों में बजती कुल्हाड़ियाँ केवल पेड़ों को नहीं काट रही हैं, बल्कि छत्तीसगढ़ के भविष्य, नदियों के अस्तित्व और स्थानीय आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों पर भी चोट कर रही हैं। सवाल यह उठता है कि क्या ऊर्जा और कोयले की मांग को पूरा करने का एकमात्र रास्ता जंगलों का विनाश ही है? यदि विकास की यह नीति इसी तरह जारी रही, तो वह दिन दूर नहीं जब छत्तीसगढ़ का यह हरा-भरा अंचल महज एक औद्योगिक मरुस्थल बनकर रह जाएगा।

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