शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

कट्टरपंथियों की जमात...


 

अमेरिका में ट्रम्प समर्थकों ने जिस तरह से हिंसक वारदात की है, उससे कई सवाल खड़े हो गये हैं। भारतीय परिपेक्ष्य में भी इसे सोचने समझने की जरूरत है क्योंकि भारत में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो ट्रम्प की सत्ता के समर्थक रहे हैं और आज भी उन्हें भारत का मित्र साबित करने में लगे रहते हैं।

दरअसल कट्टरपंथियों की सत्ता का पूरी दुनिया में यही हाल है। जहां लड़ाई श्रेष्ठता की हो वहां यह सब होना लाजिमी है। दूसरी विचारधारा को खत्म करने की मंशा ही सच से मुंह फेरना है।

हाल के वर्षों में जिस तरह से नफरत की राजनीति की शुरुआत हुई है उससे भारतीय जनमास को झिकझोर कर रख दिया है। सामाजिक ताना बाना पर भी इसका दुष्प्रभाव देखा जा रहा है। सत्ता के लिए नफरत की राजनीति कट्टरपंथियों का हथियार हैं और वे नफरत फैलाने के लिए जिस तरह से झूठ भ्रम और अफवाह फैलाते हैं उससे समाज में हिंसा बढ़ती है।

अमेरिका में जो कुछ हुआ वह अचानक नहीं हुआ क्योंकि लोकतंत्र में कट्टरता की उम्र लंबी नहीं होती। यह बात भारत के भी उन कट्टरपंथियों को समझ लेना चाहिए जो सत्ता के लिए झूठ अफवाह और भ्रम का सहारा लेने से पीछे नहीं हटते। इससे न केवल सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो रहा है बल्कि इसका असर आर्थिक स्थिति पर भी पड़ रहा है।

मैं  आज भी हैरान हो जाता हूं कि जो धर्म या समाज अपने को श्रेष्ठ साबित करने में कट्टर हैं उन धर्म और समाज की खुद की स्थिति शर्मनाक है। अनेक जातियों और फिरकों में बंटे लोग जब स्वयं की एका की बात करते हैं लेकिन मौका आने पर अपनी जाति को सर्वश्रेष्ठ बताने हिंसा पर उतारू हो जाते हैं।

ये लोग अपनी श्रेष्ठता साबित करने जिस तरह से दूसरे पक्ष के इतिहास को उधेड़ते हैं वे लोग भूल जाते हैं कि उनके अपने इतिहास में भी उससे दुष्ट लोगों की कमी नहीं है लेकिन सत्ता के लिए वे इस हद तक नीचे गिर जाते हैं कि उन्हें देश से कोई सरोकार नहीं होता।

ऐसे ही एक कट्टरपंथी ने एक दिन अचानक कह दिया कि वे मांसाहारी को हिन्दू नहीं मानते जबकि सच तो यह है कि उसके परिवार के लोगों में से कई मांसाहारी है। इसी तरह एक ब्राम्हण ने कह दिया कि मांस खाने वाले ब्राम्हण नहीं है लेकिन भारत में ऐसे कई प्रांतों के ब्राम्हण है जो मांस का भक्षण करते है।

कट्टरपंथियों की वजह से ही हिंसा बढ़ी है। खाप पंचायत से लेकर ऐसे कई उदाहरण और दंगे हैं जो कट्टरपंथियों की घृणा की पराकाष्ठा है।

इसलिए भारत को भी अमेरिका में हुई घटना को लेकर चिंतित होना चाहिए।

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

आह भरकर बद्दुआ...


 

कंपकपाती ठंड, सर्द हवा, रुक रुक कर होती बारिश में किसानों के हौसले को कौन सलाम करना नहीं चाहेगा! ये वही किसान है जिनके बेटे देश की रक्षा में सीमा में खड़े हैं तो तमाम आपदाओं में देश की अर्थव्यवस्था को संभाले हुए हैं। ये वही किसान है जो अमेरिका की दादागिरी के खिलाफ हरित क्रांति कर  देश को अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाते है तो सत्ता की रईसी को बरकरार रखने वाले कानून का भी मौन समर्थन करते है। आधुनिक तकनीकी को अपनाने कर्ज ले कर सरकार का गोदाम भरते हैं लेकिन इन्हें क्या हासिल हुआ?

सवाल यह नहीं है कि किसान आंदोलन को लेकर सरकार या उनसे जुड़े लोग बेबस क्यों है? बल्कि सवाल यह है कि आखिर किसानों ने जब कह दिया है कि तीनों कानून को वापस लिये बगैर वे घर नहीं लौटेंगे तब सरकार बैठक के नाम पर किसे बरगला रही है। और विज्ञान भवन की राजसी ठाठ का प्रदर्शन क्यों कर रही है।

विज्ञान भवन में जिस तरह से हर बैठक में लाखों रुपये खर्च किये जा रहे हैं वह किसका पैसा है? फाईव स्टार होटल से आने वाला खाना किसके लिये आ रहा है जबकि किसान तो अपना लंगर का खाना ही खा रहा है।

हमने पहले ही कहा है कि सत्ता अपनी रईसी बरकरार रखने के उपक्रम में किसान को बख्श दे और सरकार सच में किसानों का हित चाहती है तो समर्थन मूल्य के नीचे की खरीदी को गैर कानूनी बना दे। यदि किसान अपनी उपज समर्थन मूल्य पर बेचने लगे तो किसानों की हालत सुधर जायेगी। लेकिन सत्ता जानती है कि जिस दिन ऐसा हुआ तो उनकी रईसी खत्म हो जायेगी। उन्हें मिलने वाले वेतन भत्तों पर सवाल उठेगा और कार्पोरेट घराना तब सत्ता को नहीं पूछेगी।

हैरानी की बात तो यह है कि उत्पादन का नया इतिहास बनाने वाले किसान गरीब के गरीब है और कृषि उपकरण या इससे संबंधित खाद बीज या दूसरे प्रोडक्ट बनाने वाले रईस से महा रईस होते जा हैं। टैक्स से लेकर सब्सिडी का जो खेल सरकार खेल रही है उससे किसानों की बजाय पूंजीपतियों को ही फायदा होता है।

ऐसे में 8 जनवरी को होने वाली बैठक भी बेनतीजा रहे तो हैरानी नहीं होगी। क्योंकि सत्ता की अपनी चाल है तब दुष्यंत कुमार की गजल की चंद पंक्तियां याद आ जाती है-


भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ

आजकल दिल्ली में है जेर-ए-बहस ये मुद्दआ।


गिगिड़ाने का यहां कोई असर होता नहीं

पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बद्दुआ।


दोस्त, अपने मुल्क कि किस्मत पे रंजीदा न हो

उनके हाथों में है पिंजरा, उनके पिंजरे में सुआ।

बुधवार, 6 जनवरी 2021

दृढ़ निश्चय


 

रोज सुबह अब

सूर्योदय के पहले

नींद खुल जाती है

और कंपकपाती ठंड

में मुंह धोने

पानी को हाथ से

छूता हूं

तो याद आते हैं

अपने हक के लिये

दिल्ली बार्डर में

जुटे किसान

सर्द हवा और

बारिश में भीगते

गीले बिस्तर में

सोते किसान।

मैं जानता हूं कि

सरकार इतनी आसानी

से नहीं झूकने वाली

और मैं यह भी जानता हूं

कि अपने हक की

लड़ाई लडऩी पड़ती है

घर छोडऩा पड़ता है

इंतजार करते बच्चों

का मन मारना पड़ता है

गांव की सुंगध को

छोड़ शहर में

भटकना पड़ता है।

फिर यदि सत्ता

का अभिमान चरम पर हो

तो स्वाभिमान बचाने

की लड़ाई और भी

लम्बी होती है

आखिर गुरु गोविन्द

सिंह ने यूं ही नहीं

कहा था

कोई किसी को कुछ न देहै

जो ले है निजबल से लेहै।

पानी के छिंटे ने

जगा दिया और

मैं फिर चल पड़ता हूं

सुबह की सर्द हवा में

टहलने

आखिर दृढ़ निश्चक के

आगे ठंड भी हार

जाता है

सत्ता की क्या बिसात।

(किसान आंदोलन को समर्पित)

मंगलवार, 5 जनवरी 2021

बात कैसे बनेगी साहेब !

 



किसानों के साथ 8वें दौर की बैठक फिर बेनतीजा रहा। और फिर 9वें दौर की बैठक 8 जनवरी को होगी। किसान जब तीनों कानून को वापस लेने की मांग पूरी हुए बिना आंदोलन को समाप्त नहीं करने वाले हैं तब सरकार का अडियल रूख हैरान कर देने वाला है।

वैसे तो इस तीनों कानून को लेकर सरकार की नियत तब ही स्पष्ट हो गई थी जब सिे संसद में पास करने का जो तरीका अपनाया गया था, बगैर बहस और बगैर वोटिंग के यहां कानून कैसे पास हुआ यह किसी से छिपा नहीं है। भले ही कुछ लोग इसे चोर दरवाजा कहने पर आपत्ति उठाये लेकिन सच तो यही है कि इस कानून को लेकर सरकार की नीयत पहले ही दिन से खराब थी।

और खराब हो भी तो क्या फर्क पड़़ता है क्योंकि ये तीनों कानून सिर्फ और सिर्फ पूंजीपतियों के हितों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।

इसलिए आज जब विज्ञान भवन में सरकार के नुमाईदों और किसानों के बीच चर्चा के दौरान जब लंच का समय हुआ तो किसान अपने लंगर में मस्त थे और सत्ता के नुमाईदें फाईव स्टार होटल अशोका का खाना खा रहे थे। यकीन मानिये इस आठ दौर की बैठकों में सरकार का जितना खर्च हुआ है वह टिहरी बार्डर में धनारत या आंदोलनरत किसानों के एक दिन के भोजन से ज्यादा रुपये खर्च हुआ है। और ये पैसा किसका है। हमारा-तुम्हारा टैक्स का पैसा है।

स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना विज्ञान भवन का अपना इतिहास है लेकिन इससे सरकार को कोई सरोकार नहीं है वह तो आंदोलनरत किसान को थका देने की सोच के साथ बैठक पर बैठक यानी तारीख पर तारीख की घोषणा करते जा रही है लेकिन ुसे न किसानों के हितों की चिंता है न आंदोलनरत मरते-बिलखते किसानों की ही चिंता है। यदि उसकी चिंता में किसान होते तो कानून पास कराने का तरीका गलत नहीं होता और समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी होती।

जिन्हें ये तीनों कानून गलत लगते हैं उन्हें हम एक और जानकारी दें दे कि दुनिया के चावल उत्पादन करने वाले 103 देशों में भारत ऐसा देश है जो सबसे ज्यादा चावल एक्सपोर्ट करता है और यहां के उद्योगपति हो या सरकार सबसे ज्यादा पैसा कमाते हैं और आप हैरान होंगे कि जापान से लेकर कोरिया सहित ऐसे कितने ही देश हैं जहां प्रति किलो चावल तीन सौ रुपये प्रति किलो से ज्यादा कीमत पर बिकते हैं। यहां तक कि कनाडा में भी दो सौ रुपये किलो से अधिक कीमत है। और ऐसे में एमएसपी को कानून की गारंटी मिल जाएगी तो चावल एक्सपोर्ट करने वालों की कमाई कम हो जायेगी।

एक बात और हर बात में पाक को लेकर राजनीति करने वाले यह भी जान ले कि पाकिस्तान के किसानों की आर्थिक स्थिति भारत के किसानों की आर्थिक स्थिति से बेहतर है। इसलिए जो लोग कृषि रिफार्म के नाम से लाये गये इन तीनों कानून की वकालत कर रहे है वे जान ले कि जब तक एमएसपी को कानूनी गारंटी में नहीं लाया जायेगा तब तक किसानों की आय नहीं सुधरने वाली।

और हां, 8 जनवरी को भी बात बन जायेगी यह कभी नहीं सोचना? क्योंकि नियत में बरकक्त है और नियत में ही खोट हो तो सफलता मुश्किल है। बनेगी साहेब!

किसानों के साथ 8वें दौर की बैठक फिर बेनतीजा रहा। और फिर 9वें दौर की बैठक 8 जनवरी को होगी। किसान जब तीनों कानून को वापस लेने की मांग पूरी हुए बिना आंदोलन को समाप्त नहीं करने वाले हैं तब सरकार का अडियल रूख हैरान कर देने वाला है।

वैसे तो इस तीनों कानून को लेकर सरकार की नियत तब ही स्पष्ट हो गई थी जब सिे संसद में पास करने का जो तरीका अपनाया गया था, बगैर बहस और बगैर वोटिंग के यहां कानून कैसे पास हुआ यह किसी से छिपा नहीं है। भले ही कुछ लोग इसे चोर दरवाजा कहने पर आपत्ति उठाये लेकिन सच तो यही है कि इस कानून को लेकर सरकार की नीयत पहले ही दिन से खराब थी।

और खराब हो भी तो क्या फर्क पड़़ता है क्योंकि ये तीनों कानून सिर्फ और सिर्फ पूंजीपतियों के हितों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।

इसलिए आज जब विज्ञान भवन में सरकार के नुमाईदों और किसानों के बीच चर्चा के दौरान जब लंच का समय हुआ तो किसान अपने लंगर में मस्त थे और सत्ता के नुमाईदें फाईव स्टार होटल अशोका का खाना खा रहे थे। यकीन मानिये इस आठ दौर की बैठकों में सरकार का जितना खर्च हुआ है वह टिहरी बार्डर में धनारत या आंदोलनरत किसानों के एक दिन के भोजन से ज्यादा रुपये खर्च हुआ है। और ये पैसा किसका है। हमारा-तुम्हारा टैक्स का पैसा है।

स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना विज्ञान भवन का अपना इतिहास है लेकिन इससे सरकार को कोई सरोकार नहीं है वह तो आंदोलनरत किसान को थका देने की सोच के साथ बैठक पर बैठक यानी तारीख पर तारीख की घोषणा करते जा रही है लेकिन ुसे न किसानों के हितों की चिंता है न आंदोलनरत मरते-बिलखते किसानों की ही चिंता है। यदि उसकी चिंता में किसान होते तो कानून पास कराने का तरीका गलत नहीं होता और समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी होती।

जिन्हें ये तीनों कानून गलत लगते हैं उन्हें हम एक और जानकारी दें दे कि दुनिया के चावल उत्पादन करने वाले 103 देशों में भारत ऐसा देश है जो सबसे ज्यादा चावल एक्सपोर्ट करता है और यहां के उद्योगपति हो या सरकार सबसे ज्यादा पैसा कमाते हैं और आप हैरान होंगे कि जापान से लेकर कोरिया सहित ऐसे कितने ही देश हैं जहां प्रति किलो चावल तीन सौ रुपये प्रति किलो से ज्यादा कीमत पर बिकते हैं। यहां तक कि कनाडा में भी दो सौ रुपये किलो से अधिक कीमत है। और ऐसे में एमएसपी को कानून की गारंटी मिल जाएगी तो चावल एक्सपोर्ट करने वालों की कमाई कम हो जायेगी।

एक बात और हर बात में पाक को लेकर राजनीति करने वाले यह भी जान ले कि पाकिस्तान के किसानों की आर्थिक स्थिति भारत के किसानों की आर्थिक स्थिति से बेहतर है। इसलिए जो लोग कृषि रिफार्म के नाम से लाये गये इन तीनों कानून की वकालत कर रहे है वे जान ले कि जब तक एमएसपी को कानूनी गारंटी में नहीं लाया जायेगा तब तक किसानों की आय नहीं सुधरने वाली।

और हां, 8 जनवरी को भी बात बन जायेगी यह कभी नहीं सोचना? क्योंकि नियत में बरकक्त है और नियत में ही खोट हो तो सफलता मुश्किल है।

सोमवार, 4 जनवरी 2021

मरते किसान का दम !


 

लगता है आन्दोलनरत किसानों के साहस की परीक्षा ईश्वर भी लेने लगा है तभी तो सर्द ठंड के बीच बारिश का हमला हुआ है। बार्डर पर तीन और किसान मर गये और यह मौत का सिलसिला शतक तक पहुंच जाये तो उन लोगों को कोई फर्क नहीं पडऩे वाला है जो सत्ता की मस्ती में डूबे हुए हैं, जो नफरत की राजनीति में सराबोर जहर उगल रहे हैं जिनके लिए सियासत सिर्फ पेशा हो और हर पेशा सिर्फ अपना मुनाफा देखती है और यही मुनाफा ही उनकी इमानदारी है।

कहना मुश्किल है कि सरकार तीनों कानून को वापस ले लेगी क्योंकि कृषि की अर्थव्यवस्था पर पिछले कई सालों से सत्ता की नजर लगी हुई है। जब सारे उद्योग धंधे गर्त में जाते जा रहे हैं, बड़े-बड़े उद्योगपति दिवालिया हो रहे हैं, बैंक दिवालिया हो रहा है, रिजर्व बैंक का रिजर्व फंड भी नहीं बच रहा है, सत्ता को अपनी रईसी बरकरार रखने सार्वजनिक उपक्रमों को बेचना पड़ रहा है, रेल-हवाई जहाज से लेकर वेलफेयर के सारे साधनों को निजी क्षेत्रों को सौंपे जा रहे हैं तो फिर सरकार इस देश की सबसे मजबूत अर्थव्यवस्था कृषि को कैसे छोड़ सकती है।

देश के हर क्षेत्रों की बिगड़ती स्थिति के बाद भी इस देश की अर्थव्यवस्था को केवल कृषि क्षेत्र ही संभाल कर रखी है और यह बात सत्ता से ज्यादा उद्योगपतियों को मालूम है इसलिए कान्टेक्ट फार्मिंग की अवधारणा से ही किसानों की जमीन हड़पी जा सकती है ऐसे में सरकार क्यों भला तीनों कानून को वापस लेगी।

लोकतंत्र का सबसे बड़ा दुर्गण यही है कि सत्ता में जो भी दल बैठता है उसकी रूचि अपनी पार्टी को मजबूत करना प्रथम ध्येयय होता है इसलिए यदि किसान चंदा नहीं देते तो जमीन उन्हें सौंपी जायेगी जो चंदा देते हैं।

जिन लोगों को किसानों को आयकर की छूट को लेकर गलतफहमी है वे अपनी गलत फहमी दूर कर लें क्योंकि आयकर में छूट की सीमा 5 लाख रुपये तक की है और कितने किसान हैं जो पांच लाख से ऊपर सालाना कमाई करते हैं इसलिए वे जान ले कि किसानी में आयकर की छूट का फायदा भी वही उद्योगपति और व्यापारी उठाते हैं और यह छूट का कानून भी उन्हीं के लिए बना है।

हमने इसी जगह पर पहले ही लिखा है कि ये तीनों कानून किसानों से ज्यादा उद्योगपतियों, पूंजीपतियों के लिए बना है क्योंकि भंडारण करने की स्थिति में किसान होते तो वे अपनी उपज बेचने समर्थन मूल्य के मोहताज नहीं होते। भंडारण केवल व्यापारी करेगा। इसलिए आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन केवल जमाखोरी और कालाबाजारी करने वालों के लिए बनाया गया है और जिन लोगों को लगता है कि किसान गलत रुप से आंदोलन कर रहे हैं तो वे समझ ले हर संकट में इस देश को सिर्फ और सिर्फ किसानों ने बचाया है।

रविवार, 3 जनवरी 2021

सौगन्ध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं बिकने दूंगा!

सौगन्ध मुझे इस मिट्टी की मैं देश नहीं बिकने दूंगा!

याद है यह किसने कहा था! जी हां सभी को याद है। नरेन्द्र मोदी ने 25 मार्च 2014 को जब यह बात कही थी तो भाजपा सहित उसके सारे आनुवांशिक संगठन के लोग झूम उठे थे। लेकिन आज जैसे ही यह लाईन देश नहीं बिकने दूंगा जेहन में आता है तो जेहन में यह भी आता है कि कैसे पिछले 6 बरसों में इस देश की 23 सार्वजनिक कंपनियां एक-एक करके बिकते चली गई और यह संयोग ही है कि इन बिकने वाली कंपनियों के नाम भारत, हिन्दुस्तान, भारतीय या इंडिया नाम से जानी पहचानी जाती थी, भारतीय कोल, कोल इंडिया, भारतीय संचार निगम, भारतीय पेट्रोलियम, एयर इंडिया किस तरह से बेचने की स्थिति में आई है और इसे खरीद कौन रहा है। बिकने के इस दौर में भारतीय रेल भी कतार में है जिनके 151 रेल और 109 मार्ग बिक चुका है। 

अब कुछ लोग कह सकते हैं कि निजीकरण का मतलब बेच देना क्यों कह रहे हो लेकिन भारत की आजादी के बाद से यह तय हुआ था कि सरकार की जिम्मेदारी इस देश के नागरिकों के प्रति है ऐसे में एक-एक कर सबका निजीकरण करने का मतलब सहज ही लगाया जा सकता है। सरकार का मतलब क्या है यदि सब कुछ निजी हाथों में सौंप दिया जाए।

हमने पहले भी कहा था कि हम निजीकरण के विरोधी नहीं है लेकिन सवाल अब भी वही है कि आखिर हम सरकार इसलिए चुनते है कि हमारी मूलभूत जरूरतों की पूर्ति कम कीमत पर हो! आसानी से हो। लेकिन बीते 6 बरसों में जिस तरह से सत्ता ने आम लोगों के हितों की अनदेखी करते हुए मनमाने फैसले लिये हैं उससे देश का ताना-बाना छिन्न भिन्न होने लगा है। और कई बार तो ऐसा लगने लगा है कि इस देश का लोकतंत्र निजी हाथों में चला गया है।

आर्थिक हालात तो बदत्तर हुए है भूखमरी में भी हम दुनिया में सबसे उपर आ गये हैं। बेरोजगारी दर बदतर स्थिति में है और जीडीपी का हाल किसी से छिपा नहीं है। राज्य सरकारों को उनके जीएसटी का हिस्सा समय पर नहीं मिल पा रहा है। ऐसे में देश के सामने जो संकट खड़ा होने लगा है वह इस देश के लिए गंभीर चिंता का विषय है। चिंता का विषय तो किसान आंदोलन भी बनता जा रहा है, जिस तरह से किसान आंदोलन खिंचता चला जा रहा है और देशभर के दूसरे राज्यों से किसान जिस तरह से आंदोलन में शरीक होते जा रहे है वह आम जन के लिए बेचैन कर देने वाला है।

सर्द रात में परिवार सहित आंदोलित किसान कहीं कहीं आक्रोशित भी हो रहे हैं और यह शांतिपूर्ण प्रदर्शन को मोदी सत्ता की जिद और भड़काने का काम कर रही है ऐसे में भले ही सत्ता इसे गलत बता रही हो, आंदोलन के खिलाफ भ्रामक प्रचार कर रही हो लेकिन मोदी सत्ता के निजीकरण का लोभ वह कैसे छुपा पायेगी। जिसके हित के लिए कानून बनाने की बात कही जा रही हो वही इसके खिलाफ हो तो कानून सही कैसे हो सकता है।

बहरहाल सत्ता की निजीकरण के लोभ और एक-एक कर बिकते सरकारी उपक्रम ने 'ये देश नहीं बिकने दूंगाÓ वाली बात को एक बार फिर जेहन में लगा दिया। जेहन में तो यह भी है कि बिजनेस मेरे खून में है।

 

शुक्रवार, 1 जनवरी 2021

नववर्ष का रंग!


वर्तमान में तय किये

जा रहे हैं जो रंग

बचपन में समझे अर्थों

से भिन्न है क्यों रंग

चाहता रहा फिजा में

बिखर जाये हर रंग

लेकिन बवाल के डर से

सिमट रहे हैं रंग

समय बदल रहा

रंगों की परिभाषा

और हम बेबस देख

रहे हैं आशा-निराशा

कोई कहता है ये नववर्ष

हमारा नहीं है

कोई कहता है ये रंग

तुम्हारा नहीं है

रंगों के इस दिगभ्रमित

जंाल में

रंगों को ही धूमिल

कर दिया है

और सतरंगी इन्द्रधनुष

की सत्यता पर

कोई नहीं बोलता

सबको चिंता है अपने

रंग को चटख करने की

गाढ़ा होता रंग

गहरा काला होता जा

रहा है

पर सत्ता के

लिए जरूरी है

रंगों का गहरा और काला

होना

खुद के रंग को चटखाने

की कोशिश में

बदरंग होते रंगों की

ओर किसका ध्यान है

जीवन में रंग आते

जाते रहेंगे

पर रंगों का जीवन

में ठहरना उचित नहीं।

किसी एक रंग का गुलाम

होना खुद को मारना है।

हर रंग को जो पकडऩे

की कोशिश करता है

वही जीवन ही नहीं

समाज में रंग भरता है

जो रंग भटकाने

निकल पड़े है

वह नफरत की दीवार

खड़ी करता है

और फिर आदमी

हो जाता है गुलाम

इसलिए मुझे सभी रंग

पसंद है

क्योंकि मैंने देश की

आजादी से जोड़

रखा है रंगों को।