मंगलवार, 12 जनवरी 2021

मी लार्ड... ये समर्पण ध्वनि है...!


 

किसान आंदोलन को लेकर जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने बीच का रास्ता निकालने की वकालत की वह हैरान कर देने वाला है। और कई तरह के सवाल भी खड़ा करने वाला है। आखिर सुप्रीम कोर्ट ने बीच का रास्ता निकालने की वकालत करने की बजाय आंदोलन को लेकर कोई बड़ा फैसला करने से क्यों हिचक रही है। सवाल यह नहीं है कि सरकार के रवैये को लेकर सुप्रीम कोर्ट भी जब नाराज है तो वह सीधे कानून को गलत क्यों नहीं कह देती और न ही सवाल आंदोलन में शामिल बूढ़े-बच्चों या महिलाओं का है।

सवालतो यही है कि आखिर सुप्रीम कोर्ट को किस बात का इंतजार है। क्या संविधान में मिले आम आदमी के अधिकारों की रक्षा नहीं की जानी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से महिलाओं और बच्चों की बात कही है, उससे सवाल यह उठता है कि सुप्रीम कोर्ट यह कैसे भूल सकती है कि किसानी के कार्य में घर का एक-एक सदस्यों का भागीदारी होती है, हल जोतने से लेकर कटाई में और खेत में खाना पहुंचाने की स्थिति में परिवार के बच्चे महिलाएं शरीक होती है।

सवाल यह नहीं है कि सरकार आंदोलन को खत्म करने के तरीके ढंूढ रही है जबकि सुप्रीम कोर्ट को इस सवाल को ध्यान में रखना चाहिए कि आखिर जो विपक्ष संसद में संशोधन की मांग कर रही थी उसे अनसुना कर चोर दरवाजे से कानून बनाने की कोशिश क्यों हुई फिर संसद में संशोधन से इंकार करने वाली सरकार आंदोलन के बाद संशोधन के लिए क्यों तैयार हो गई है।

यानी इस देश में बहुमत का दम्भ भरने वाली सरकार को आंदोलन से ही झुकाया जा सकता है।

ऐसे कितने ही सवाल है जो सुप्रीम कोर्ट को ही कटघरे में खड़ा कर रही है? आखिर सुप्रीम कोर्ट क्यों नहीं कह रही है कि कानून गलत है उसे लागू करने का तरीका गलत है। सवाल कई है, और यही हाल रहा तो सुप्रीम कोर्ट की विश्वसनियता पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगेगा।

यह समर्पण ध्वनि है

साफ दिख रहा है 

किसानों का दर्द

लेकिन सत्ता को इससे

क्या लेना देना

वर्तमान भूत और

भविष्य को कुचलने

की कोशिश का

एहसास उन्हें भी है

जो न्याय की वकालत करते है

लेकिन राजा के पीछे

खड़ी चतुरंगी सेना

को सत्ता से मोह है

और न्याय ठिठक सा गया है।

राजा के मन की बात

न समझ में आये

तब भी ताली बजानी पड़ती है

क्योंकि यह समर्पण ध्वनि है

दौर है, समर्पण ध्वनि है।

सोमवार, 11 जनवरी 2021

धर्म-राष्ट्रवाद और रंगभेद



आस्ट्रेलिया में क्रिकेट खेल रहे भारतीय खिलाडिय़ों को जिस रह से रंगभेदी टिप्पणी से दो चार होना पड़ा और उसके बाद जिस तरह की प्रतिक्रिया आई है यह सब सभ्य होने का दावा करने वाले समाज के लिए चिंता का विषय है। यूरोप अमेरिका सहित कई देशों में नस्ल को लेकर आज भी विवाद उतने ही गहरे है जितने एशियाई देशों में धर्म और जाति को लेकर विवाद है।

दरअसल कट्टरपंथियों की अपनी जमात है जिन्हें मानवता से ज्यादा खुद की चिंता होती है। और अपने को श्रेष्ठ कहलाने के फेर में ये लोग झूठ-अफवाह का सहारा लेकर नफरत के न केवल बीज बोते है बल्कि कुर्तकों के खाद पानी से उन्हें संचित करते रहते हैं।

पढ़े लिखे और सबसे सभ्य कहलाने का दावा करने वाले देशों में जिस रह से रंगभेद और धर्म को लेकर आये दिन तमाशा खड़ा कर प्रताडि़त करने का उपक्रम किया जाता है वह हैरान कर देने वाला है।

भारतीय खिलाडिय़ों के साथ यह व्यवहार पहली बार नहीं हुआ है पहले भी इस तरह की टिप्पणी से भारतीय खिलाड़ी अमानित होते रहे हैं और यह सबका अंत होते नहीं दिख रहा है।

यही हाल धार्मिक और जातिय श्रेष्ठता का हाल है। झूठ और अफवाह की चासनी में जिस तरह से नफरत परोसे जाते हैं वह मानवता को शर्मसार तो करता ही है, यह सोचने को भी मजबूर करता है कि सभ्यता की परिभाषा क्या होनी चाहिए।

भारत में राजनैतिक स्वार्थ के लिए आजादी के बाद से ही राष्ट्रवाद धर्म और जाति को श्रेष्ठ साबित करने के प्रयास में नफरत के जो बीज बोए गये उससे देश को न केवल आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा बल्कि एकता अखंडता को भी नष्ट करने की कोशिश हुई।

हाल ही में हुए दो आंदोलनों का जिक्र करना जरूरी है कि किस तरह से वर्तमान सत्ता और उससे जुड़े लोगों ने आंदोलन से जुड़े लोगों की राष्ट्रभक्ति पर सवाल उठाये। याद किजीए जब नागरिक बिल को लेकर शहर-दर-शहर शाहीन बाग बनने लगे तो इस आंदोलन में शामिल होने वालों को गद्दार, देशद्रोही और न जाने किस-किस तरह से गालियां दी गई। कोरोना के कारण आंदोलन समाप्त हो गया। लेकिन कट्टरपंथियों ने जिस तरह से शाहीन बाग के आंदोलनकारियों को गालियां दी वह हमारी राक्षसी प्रवृत्ति को ही उजागर करता है।

यही हाल किसान आंदोलन को लेकर हुआ। कट्टरपंथियों की जमात ने आंदोलनरत किसानों को गद्दार साबित करने जिस तरह से झूठ-प्रपंच का सहारा लिया वह शर्मसार कर देने वाला था। अपनी बात को सही साबित करने मुसलमानों के चेहरे बनाये गये, आईटीसेल ने किसान आंदोलन के दौरान नमाज पढ़ते मुसलमानों का वीडियो बनाकर यह बताने की कोशिश की कि कैसे मुसलमान किसान आंदोलन में शामिल है जबकि इस देश में मुसलमान भी बड़ी संख्या में किसान है।

हम यहां सत्ता के अहंकार को लेकर कुछ नहीं कहेंगे लेकिन सच यही है कट्टरपंथियों की जमात ने न केवल अपना नुकसान किया है बल्कि समाज और देश को भी शर्मसार करते रहे हैं।

दरअसल यह एक तरह का अपराध है जो मानवता का ही नहीं देश का दुश्मन है।

रविवार, 10 जनवरी 2021

इंतजार 26 जनवरी का...


 

किसान आंदोलन को लेकर सरकार के साथ अगली बैठक की तारीख भले ही 15 जनवरी बताई जा रही हो लेकिन सच तो यही है कि अब देश को उस 26 जनवरी का इंतजार करना चाहिए जिस दिन किसान राजपथ पर होंगे।

जिस तरह से 8 जनवरी की बैठक का नतीजा कुछ नहीं निकला और किसानों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने से इंकार कर दिया उससे एक बात तो साफ है कि किसान कृषि बिल को वापस लिये बिना मानने वाले नहीं है और न ही उन्हें न्यायालय पर भी वर्तमान दौर में भरोसा रह गया है या यह कहे कि न्यायालयीन व्यवस्था पर भी इस सरकार के रहते बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया है।

दरअसल झूठ और सिर्फ झूठ बोलकर सत्ता हासिल करने और नफरत की राजनीति के बीच जब देश का प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का ध्यान सरकार चलाने की बजाय पार्टी को जीताने में ज्यादा रूचि लेने लगे तो संवैधानिक संस्थाओं को राजनैतिक होने से कैसे रोका जा सकता है और न ही सत्ता को मनमर्जी करने से ही कोई रोक सकता है।

बीते 6 सालों में मोदी सत्ता ने देश की हालत को जिस तरह से बनाया है उसके बाद विरोध का मतलब तब और कुछ नहीं रह जाता जब वह चुनाव दर चुनाव जीत ही रहा है। ऐसे में 70 के दशक को याद करना होगा जब आंदोलनों ने तब के विरोध को दबाने आपातकाल का सहारा लेते हुए विरोधियों को जेलों में ढूंस दिया था। और तब विरोधियों ने चुनावी राजनीति का हिस्सा बन सत्ता को चुनौती दी थी। इसी तरह से आंदोलन की वजह को जब सत्ता ने गलत करार दिया था तब आम आदमी पार्टी का उदय हुआ था।

इसका मतलब क्या वर्तमान में भी इसी तरह के हालात बनने लगे हैं। आप भले ही इससे सहमत न हो लेकिन सच तो यही है कि जिस तरह से किसान आंदोलन को लेकर सरकार ने अडिय़ल रूख अख्तियार किया है उसके बाद जय किसान- टैक्टर निशान के हालात बनते जा रहे हैं।

जिन लोगों को अब भी लगता है कि किसान आंदोलन गलत है वे जान ले कि पिछले 6 साल में सत्ता ने देश का वह हाल कर दिया है कि उसके लिए कृषि बिल को वापस लेने का मतलब आर्थिक बदहाली की ओर एक कदम और बढ़ाना रह गया है। कृषि बिल वापस होता है तो सत्ता की रईसी पर असर पड़ेगा और नहीं लेती है तो किसान मर जायेंगे।

आखिर इस हालात के लिए जिम्मेदार कौन है। ऐसे में यदि जिन लोगों को लगता है कि 15 जनवरी को सब कुछ ठीक हो जायेगा उन्हें 15 नहीं 26 जनवरी का इंतजार करना चाहिए क्योंकि किसानों ने यदि यह सब तय कर लिया है और सत्ता अड़ी हुई है तो जो कुछ 26 जनवरी को होगा वह इस देश के इतिहास में दर्ज होने वाला है।

शुक्रवार, 8 जनवरी 2021

कट्टरपंथियों की जमात...


 

अमेरिका में ट्रम्प समर्थकों ने जिस तरह से हिंसक वारदात की है, उससे कई सवाल खड़े हो गये हैं। भारतीय परिपेक्ष्य में भी इसे सोचने समझने की जरूरत है क्योंकि भारत में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो ट्रम्प की सत्ता के समर्थक रहे हैं और आज भी उन्हें भारत का मित्र साबित करने में लगे रहते हैं।

दरअसल कट्टरपंथियों की सत्ता का पूरी दुनिया में यही हाल है। जहां लड़ाई श्रेष्ठता की हो वहां यह सब होना लाजिमी है। दूसरी विचारधारा को खत्म करने की मंशा ही सच से मुंह फेरना है।

हाल के वर्षों में जिस तरह से नफरत की राजनीति की शुरुआत हुई है उससे भारतीय जनमास को झिकझोर कर रख दिया है। सामाजिक ताना बाना पर भी इसका दुष्प्रभाव देखा जा रहा है। सत्ता के लिए नफरत की राजनीति कट्टरपंथियों का हथियार हैं और वे नफरत फैलाने के लिए जिस तरह से झूठ भ्रम और अफवाह फैलाते हैं उससे समाज में हिंसा बढ़ती है।

अमेरिका में जो कुछ हुआ वह अचानक नहीं हुआ क्योंकि लोकतंत्र में कट्टरता की उम्र लंबी नहीं होती। यह बात भारत के भी उन कट्टरपंथियों को समझ लेना चाहिए जो सत्ता के लिए झूठ अफवाह और भ्रम का सहारा लेने से पीछे नहीं हटते। इससे न केवल सामाजिक ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो रहा है बल्कि इसका असर आर्थिक स्थिति पर भी पड़ रहा है।

मैं  आज भी हैरान हो जाता हूं कि जो धर्म या समाज अपने को श्रेष्ठ साबित करने में कट्टर हैं उन धर्म और समाज की खुद की स्थिति शर्मनाक है। अनेक जातियों और फिरकों में बंटे लोग जब स्वयं की एका की बात करते हैं लेकिन मौका आने पर अपनी जाति को सर्वश्रेष्ठ बताने हिंसा पर उतारू हो जाते हैं।

ये लोग अपनी श्रेष्ठता साबित करने जिस तरह से दूसरे पक्ष के इतिहास को उधेड़ते हैं वे लोग भूल जाते हैं कि उनके अपने इतिहास में भी उससे दुष्ट लोगों की कमी नहीं है लेकिन सत्ता के लिए वे इस हद तक नीचे गिर जाते हैं कि उन्हें देश से कोई सरोकार नहीं होता।

ऐसे ही एक कट्टरपंथी ने एक दिन अचानक कह दिया कि वे मांसाहारी को हिन्दू नहीं मानते जबकि सच तो यह है कि उसके परिवार के लोगों में से कई मांसाहारी है। इसी तरह एक ब्राम्हण ने कह दिया कि मांस खाने वाले ब्राम्हण नहीं है लेकिन भारत में ऐसे कई प्रांतों के ब्राम्हण है जो मांस का भक्षण करते है।

कट्टरपंथियों की वजह से ही हिंसा बढ़ी है। खाप पंचायत से लेकर ऐसे कई उदाहरण और दंगे हैं जो कट्टरपंथियों की घृणा की पराकाष्ठा है।

इसलिए भारत को भी अमेरिका में हुई घटना को लेकर चिंतित होना चाहिए।

गुरुवार, 7 जनवरी 2021

आह भरकर बद्दुआ...


 

कंपकपाती ठंड, सर्द हवा, रुक रुक कर होती बारिश में किसानों के हौसले को कौन सलाम करना नहीं चाहेगा! ये वही किसान है जिनके बेटे देश की रक्षा में सीमा में खड़े हैं तो तमाम आपदाओं में देश की अर्थव्यवस्था को संभाले हुए हैं। ये वही किसान है जो अमेरिका की दादागिरी के खिलाफ हरित क्रांति कर  देश को अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाते है तो सत्ता की रईसी को बरकरार रखने वाले कानून का भी मौन समर्थन करते है। आधुनिक तकनीकी को अपनाने कर्ज ले कर सरकार का गोदाम भरते हैं लेकिन इन्हें क्या हासिल हुआ?

सवाल यह नहीं है कि किसान आंदोलन को लेकर सरकार या उनसे जुड़े लोग बेबस क्यों है? बल्कि सवाल यह है कि आखिर किसानों ने जब कह दिया है कि तीनों कानून को वापस लिये बगैर वे घर नहीं लौटेंगे तब सरकार बैठक के नाम पर किसे बरगला रही है। और विज्ञान भवन की राजसी ठाठ का प्रदर्शन क्यों कर रही है।

विज्ञान भवन में जिस तरह से हर बैठक में लाखों रुपये खर्च किये जा रहे हैं वह किसका पैसा है? फाईव स्टार होटल से आने वाला खाना किसके लिये आ रहा है जबकि किसान तो अपना लंगर का खाना ही खा रहा है।

हमने पहले ही कहा है कि सत्ता अपनी रईसी बरकरार रखने के उपक्रम में किसान को बख्श दे और सरकार सच में किसानों का हित चाहती है तो समर्थन मूल्य के नीचे की खरीदी को गैर कानूनी बना दे। यदि किसान अपनी उपज समर्थन मूल्य पर बेचने लगे तो किसानों की हालत सुधर जायेगी। लेकिन सत्ता जानती है कि जिस दिन ऐसा हुआ तो उनकी रईसी खत्म हो जायेगी। उन्हें मिलने वाले वेतन भत्तों पर सवाल उठेगा और कार्पोरेट घराना तब सत्ता को नहीं पूछेगी।

हैरानी की बात तो यह है कि उत्पादन का नया इतिहास बनाने वाले किसान गरीब के गरीब है और कृषि उपकरण या इससे संबंधित खाद बीज या दूसरे प्रोडक्ट बनाने वाले रईस से महा रईस होते जा हैं। टैक्स से लेकर सब्सिडी का जो खेल सरकार खेल रही है उससे किसानों की बजाय पूंजीपतियों को ही फायदा होता है।

ऐसे में 8 जनवरी को होने वाली बैठक भी बेनतीजा रहे तो हैरानी नहीं होगी। क्योंकि सत्ता की अपनी चाल है तब दुष्यंत कुमार की गजल की चंद पंक्तियां याद आ जाती है-


भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ

आजकल दिल्ली में है जेर-ए-बहस ये मुद्दआ।


गिगिड़ाने का यहां कोई असर होता नहीं

पेट भरकर गालियां दो, आह भरकर बद्दुआ।


दोस्त, अपने मुल्क कि किस्मत पे रंजीदा न हो

उनके हाथों में है पिंजरा, उनके पिंजरे में सुआ।

बुधवार, 6 जनवरी 2021

दृढ़ निश्चय


 

रोज सुबह अब

सूर्योदय के पहले

नींद खुल जाती है

और कंपकपाती ठंड

में मुंह धोने

पानी को हाथ से

छूता हूं

तो याद आते हैं

अपने हक के लिये

दिल्ली बार्डर में

जुटे किसान

सर्द हवा और

बारिश में भीगते

गीले बिस्तर में

सोते किसान।

मैं जानता हूं कि

सरकार इतनी आसानी

से नहीं झूकने वाली

और मैं यह भी जानता हूं

कि अपने हक की

लड़ाई लडऩी पड़ती है

घर छोडऩा पड़ता है

इंतजार करते बच्चों

का मन मारना पड़ता है

गांव की सुंगध को

छोड़ शहर में

भटकना पड़ता है।

फिर यदि सत्ता

का अभिमान चरम पर हो

तो स्वाभिमान बचाने

की लड़ाई और भी

लम्बी होती है

आखिर गुरु गोविन्द

सिंह ने यूं ही नहीं

कहा था

कोई किसी को कुछ न देहै

जो ले है निजबल से लेहै।

पानी के छिंटे ने

जगा दिया और

मैं फिर चल पड़ता हूं

सुबह की सर्द हवा में

टहलने

आखिर दृढ़ निश्चक के

आगे ठंड भी हार

जाता है

सत्ता की क्या बिसात।

(किसान आंदोलन को समर्पित)

मंगलवार, 5 जनवरी 2021

बात कैसे बनेगी साहेब !

 



किसानों के साथ 8वें दौर की बैठक फिर बेनतीजा रहा। और फिर 9वें दौर की बैठक 8 जनवरी को होगी। किसान जब तीनों कानून को वापस लेने की मांग पूरी हुए बिना आंदोलन को समाप्त नहीं करने वाले हैं तब सरकार का अडियल रूख हैरान कर देने वाला है।

वैसे तो इस तीनों कानून को लेकर सरकार की नियत तब ही स्पष्ट हो गई थी जब सिे संसद में पास करने का जो तरीका अपनाया गया था, बगैर बहस और बगैर वोटिंग के यहां कानून कैसे पास हुआ यह किसी से छिपा नहीं है। भले ही कुछ लोग इसे चोर दरवाजा कहने पर आपत्ति उठाये लेकिन सच तो यही है कि इस कानून को लेकर सरकार की नीयत पहले ही दिन से खराब थी।

और खराब हो भी तो क्या फर्क पड़़ता है क्योंकि ये तीनों कानून सिर्फ और सिर्फ पूंजीपतियों के हितों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।

इसलिए आज जब विज्ञान भवन में सरकार के नुमाईदों और किसानों के बीच चर्चा के दौरान जब लंच का समय हुआ तो किसान अपने लंगर में मस्त थे और सत्ता के नुमाईदें फाईव स्टार होटल अशोका का खाना खा रहे थे। यकीन मानिये इस आठ दौर की बैठकों में सरकार का जितना खर्च हुआ है वह टिहरी बार्डर में धनारत या आंदोलनरत किसानों के एक दिन के भोजन से ज्यादा रुपये खर्च हुआ है। और ये पैसा किसका है। हमारा-तुम्हारा टैक्स का पैसा है।

स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना विज्ञान भवन का अपना इतिहास है लेकिन इससे सरकार को कोई सरोकार नहीं है वह तो आंदोलनरत किसान को थका देने की सोच के साथ बैठक पर बैठक यानी तारीख पर तारीख की घोषणा करते जा रही है लेकिन ुसे न किसानों के हितों की चिंता है न आंदोलनरत मरते-बिलखते किसानों की ही चिंता है। यदि उसकी चिंता में किसान होते तो कानून पास कराने का तरीका गलत नहीं होता और समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी होती।

जिन्हें ये तीनों कानून गलत लगते हैं उन्हें हम एक और जानकारी दें दे कि दुनिया के चावल उत्पादन करने वाले 103 देशों में भारत ऐसा देश है जो सबसे ज्यादा चावल एक्सपोर्ट करता है और यहां के उद्योगपति हो या सरकार सबसे ज्यादा पैसा कमाते हैं और आप हैरान होंगे कि जापान से लेकर कोरिया सहित ऐसे कितने ही देश हैं जहां प्रति किलो चावल तीन सौ रुपये प्रति किलो से ज्यादा कीमत पर बिकते हैं। यहां तक कि कनाडा में भी दो सौ रुपये किलो से अधिक कीमत है। और ऐसे में एमएसपी को कानून की गारंटी मिल जाएगी तो चावल एक्सपोर्ट करने वालों की कमाई कम हो जायेगी।

एक बात और हर बात में पाक को लेकर राजनीति करने वाले यह भी जान ले कि पाकिस्तान के किसानों की आर्थिक स्थिति भारत के किसानों की आर्थिक स्थिति से बेहतर है। इसलिए जो लोग कृषि रिफार्म के नाम से लाये गये इन तीनों कानून की वकालत कर रहे है वे जान ले कि जब तक एमएसपी को कानूनी गारंटी में नहीं लाया जायेगा तब तक किसानों की आय नहीं सुधरने वाली।

और हां, 8 जनवरी को भी बात बन जायेगी यह कभी नहीं सोचना? क्योंकि नियत में बरकक्त है और नियत में ही खोट हो तो सफलता मुश्किल है। बनेगी साहेब!

किसानों के साथ 8वें दौर की बैठक फिर बेनतीजा रहा। और फिर 9वें दौर की बैठक 8 जनवरी को होगी। किसान जब तीनों कानून को वापस लेने की मांग पूरी हुए बिना आंदोलन को समाप्त नहीं करने वाले हैं तब सरकार का अडियल रूख हैरान कर देने वाला है।

वैसे तो इस तीनों कानून को लेकर सरकार की नियत तब ही स्पष्ट हो गई थी जब सिे संसद में पास करने का जो तरीका अपनाया गया था, बगैर बहस और बगैर वोटिंग के यहां कानून कैसे पास हुआ यह किसी से छिपा नहीं है। भले ही कुछ लोग इसे चोर दरवाजा कहने पर आपत्ति उठाये लेकिन सच तो यही है कि इस कानून को लेकर सरकार की नीयत पहले ही दिन से खराब थी।

और खराब हो भी तो क्या फर्क पड़़ता है क्योंकि ये तीनों कानून सिर्फ और सिर्फ पूंजीपतियों के हितों को ध्यान में रखकर तैयार की गई है।

इसलिए आज जब विज्ञान भवन में सरकार के नुमाईदों और किसानों के बीच चर्चा के दौरान जब लंच का समय हुआ तो किसान अपने लंगर में मस्त थे और सत्ता के नुमाईदें फाईव स्टार होटल अशोका का खाना खा रहे थे। यकीन मानिये इस आठ दौर की बैठकों में सरकार का जितना खर्च हुआ है वह टिहरी बार्डर में धनारत या आंदोलनरत किसानों के एक दिन के भोजन से ज्यादा रुपये खर्च हुआ है। और ये पैसा किसका है। हमारा-तुम्हारा टैक्स का पैसा है।

स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना विज्ञान भवन का अपना इतिहास है लेकिन इससे सरकार को कोई सरोकार नहीं है वह तो आंदोलनरत किसान को थका देने की सोच के साथ बैठक पर बैठक यानी तारीख पर तारीख की घोषणा करते जा रही है लेकिन ुसे न किसानों के हितों की चिंता है न आंदोलनरत मरते-बिलखते किसानों की ही चिंता है। यदि उसकी चिंता में किसान होते तो कानून पास कराने का तरीका गलत नहीं होता और समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी होती।

जिन्हें ये तीनों कानून गलत लगते हैं उन्हें हम एक और जानकारी दें दे कि दुनिया के चावल उत्पादन करने वाले 103 देशों में भारत ऐसा देश है जो सबसे ज्यादा चावल एक्सपोर्ट करता है और यहां के उद्योगपति हो या सरकार सबसे ज्यादा पैसा कमाते हैं और आप हैरान होंगे कि जापान से लेकर कोरिया सहित ऐसे कितने ही देश हैं जहां प्रति किलो चावल तीन सौ रुपये प्रति किलो से ज्यादा कीमत पर बिकते हैं। यहां तक कि कनाडा में भी दो सौ रुपये किलो से अधिक कीमत है। और ऐसे में एमएसपी को कानून की गारंटी मिल जाएगी तो चावल एक्सपोर्ट करने वालों की कमाई कम हो जायेगी।

एक बात और हर बात में पाक को लेकर राजनीति करने वाले यह भी जान ले कि पाकिस्तान के किसानों की आर्थिक स्थिति भारत के किसानों की आर्थिक स्थिति से बेहतर है। इसलिए जो लोग कृषि रिफार्म के नाम से लाये गये इन तीनों कानून की वकालत कर रहे है वे जान ले कि जब तक एमएसपी को कानूनी गारंटी में नहीं लाया जायेगा तब तक किसानों की आय नहीं सुधरने वाली।

और हां, 8 जनवरी को भी बात बन जायेगी यह कभी नहीं सोचना? क्योंकि नियत में बरकक्त है और नियत में ही खोट हो तो सफलता मुश्किल है।