सुशासन की पोल तो मोदी सरकार ने ही खोल दी
शिक्षा में पिछड़ता राज्य, बुजुर्गों के खिलाफ बढ़ता अपराध और बेबस किसान—सरकारी आंकड़ों और एनसीआरबी (NCRB) की रिपोर्ट ने खोली 'डबल इंजन' सरकार के दावों की पोल।
दावों के शोर में गुम होती ज़मीनी हकीकत
छत्तीसगढ़ में सरकारें बदलती हैं, सत्ता के चेहरे बदलते हैं और मंचों से विकास के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। छत्तीसगढ़ को समृद्ध और अपराध-मुक्त बनाने के वादे हर चुनाव का मुख्य आकर्षण होते हैं। लेकिन जब आंकड़े बोलने लगते हैं, तो राजनीति के बड़े-बड़े दावे ताश के पत्तों की तरह ढह जाते हैं।
हाल ही में आई राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की रिपोर्ट और केंद्रीय मंत्रालयों के आंकड़ों ने छत्तीसगढ़ की वर्तमान कानून-व्यवस्था, सामाजिक सुरक्षा और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिक्षा का गिरता स्तर हो, बुजुर्गों की असुरक्षा या फिर अन्नदाता का संकट—ये रिपोर्ट बयां करती हैं कि प्रदेश किस मोड़ पर खड़ा है।
१. शिक्षा का गिरता स्तर: भविष्य के साथ खिलवाड़?
किसी भी राज्य की प्रगति का सबसे बड़ा मापदंड उसकी शिक्षा व्यवस्था होती है। लेकिन छत्तीसगढ़ के संदर्भ में आंकड़े चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं।
निचले पायदान पर राज्य: केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, शिक्षा के प्रदर्शन के मामले में छत्तीसगढ़ देश के राज्यों में नीचे से तीसरे नंबर पर है।
शिक्षकों और बुनियादी ढांचे की कमी: राज्य के ग्रामीण और सुदूर अंचलों में स्कूलों की जर्जर हालत, शिक्षकों की भारी कमी और प्रशासनिक अनदेखी के कारण बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो रहा है। जब राज्य का शिक्षा मॉडल देश में सबसे निचले स्तर पर होगा, तो हम किस 'गढ़बो छत्तीसगढ़' की बात कर रहे हैं?"
२. बुजुर्गों पर बढ़ता अत्याचार: देश में पहले स्थान पर छत्तीसगढ़
सामाजिक सुरक्षा और अपराध नियंत्रण के मोर्चे पर छत्तीसगढ़ की स्थिति और भी भयावह नजर आती है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, वरिष्ठ नागरिकों (बुजुर्गों) के खिलाफ होने वाले अपराधों में छत्तीसगढ़ पूरे देश में नंबर-1 पर पहुँच गया है।
वर्ष-दर-वर्ष बढ़ते अपराध के आंकड़े:
वर्ष 2021: 1,408 मामले
वर्ष 2022: 1,632 मामले
वर्ष 2023: 1,798 मामले
ये आंकड़े साबित करते हैं कि पिछले तीन वर्षों में बुजुर्गों के खिलाफ अपराध में लगातार बढ़ोतरी हुई है।
अपराध का स्वरूप और न्याय में देरी:
राज्य में बुजुर्गों को निशाना बनाकर की जाने वाली हत्या, मारपीट, साइबर ठगी, संपत्ति हड़पने और अकेले पाकर लूटपाट की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। इसके साथ ही न्याय की सुस्त प्रक्रिया के कारण अदालतों में लंबित मामलों का अंबार लग रहा है, जिससे अपराधियों के हौसले बुलंद हैं।
३. अन्नदाता पर संकट: धान खरीद के दावों के बीच आत्महत्या की त्रासदी
छत्तीसगढ़ को 'धान का कटोरा' कहा जाता है। सरकारें अक्सर रिकॉर्ड धान खरीदी और किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं का ढिंढोरा पीटती हैं। लेकिन सवाल यह है कि यदि किसान खुशहाल है, तो फिर वह मौत को गले क्यों लगा रहा है?
एनसीआरबी के चौंकाने वाले आंकड़े (2023):
देशभर में किसान आत्महत्याएं: 4,690
छत्तीसगढ़ में किसान आत्महत्याएं: 468 (414 पुरुष और 54 महिला किसान)
महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे बड़े राज्यों के बाद छत्तीसगढ़ में यह संख्या बेहद डरावनी है। यदि जनसंख्या और क्षेत्रफल के अनुपात में देखा जाए, तो स्थिति बेहद गंभीर है।
आखिर क्यों मजबूर है किसान?
1. खाद और बीज का संकट: समय पर डीएपी (DAP), यूरिया और सही गुणवत्ता के बीज न मिलना।
2. कालाबाजारी और बिचौलिए: खाद और कीटनाशकों की कमी का फायदा उठाकर व्यापारी किसानों का शोषण कर रहे हैं।
3. सिंचाई और कर्ज का बोझ: समय पर सिंचाई सुविधाएं न मिलना और फसल बीमा की राशि मिलने में देरी होना।
केवल समर्थन मूल्य बढ़ा देने या प्रति एकड़ बोनस का दावा करने से किसान का संकट खत्म नहीं होता; जब तक उसे सही समय पर कृषि संसाधन नहीं मिलेंगे, वह आर्थिक मानसिक तनाव से मुक्त नहीं हो सकता।
निष्कर्ष: अब बहानेबाजी नहीं, ठोस कदम उठाने की जरूरत
यह डेटा किसी राजनीतिक दल या विपक्ष का तैयार किया हुआ नहीं है, बल्कि यह भारत सरकार के अपने संस्थानों (NCRB और शिक्षा मंत्रालय) की आधिकारिक रिपोर्ट है।
छत्तीसगढ़ की 'डबल इंजन' सरकार को अब केवल अपनी पीठ थपथपाने और खोखले दावे करने के बजाय इन आंकड़ों को गंभीरता से लेना होगा। यदि बुजुर्ग अपने ही घर में सुरक्षित नहीं हैं, किसान खेतों में आत्महत्या करने पर मजबूर है और बच्चे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से वंचित हैं, तो यह प्रशासनिक तंत्र की विफलता को दर्शाता है। समय आ गया है कि सरकार जुमलेबाजी से बाहर निकलकर ज़मीनी स्तर पर काम करे, ताकि छत्तीसगढ़ सच मायने में एक खुशहाल राज्य बन सके।

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