रविवार, 19 जुलाई 2026

बस्तर पर भूमाफियाओं की नज़र

बस्तर पर भूमाफियाओं की नज़र 


 छत्तीसगढ़ का बस्तर अंचल, जो लंबे समय से नक्सली हिंसा और अशांति के लिए सुर्खियों में रहता था, अब एक नए किस्म के संकट से जूझ रहा है। अंदरूनी इलाकों से आ रही खबरें इस बात का साफ संकेत दे रही हैं कि बस्तर में नक्सलवाद के कमजोर पड़ते ही राजधानी रायपुर और बाहरी क्षेत्रों के रसूखदार भू-माफियाओं और उद्योगपतियों की नजर यहाँ के जल, जंगल और जमीन पर टिक गई है। बीजापुर के भैरमगढ़ और कोंडागांव से सामने आए दो बड़े मामलों ने प्रशासनिक मुस्तैदी और आदिवासी हितों के संरक्षण के दावों की पोल खोल कर रख दी है।

राहत शिविरों में थे ग्रामीण, पीछे से रायपुर के रसूखदारों के नाम हो गई जमीन

सबसे चौंकाने वाला और गंभीर मामला बीजापुर जिले के भैरमगढ़ ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले ग्राम बैलधर्मा और बड़पली का है। मिली जानकारी के अनुसार, यहाँ के स्थानीय आदिवासी ग्रामीण नक्सली प्रताड़ना और खौफ के कारण अपने मूल गांवों को छोड़कर सुरक्षा कैंपों (राहत शिविरों) में शरण लिए हुए थे। इसी मुफ़लिसी और बेबसी का फायदा उठाकर रायपुर के एक रसूखदार उद्योगपति परिवार द्वारा कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों के सहारे आदिवासियों की लगभग 120 एकड़ से अधिक निजी भूमि की रजिस्ट्री अपने नाम करा ली गई।

इस महाघोटाले का खुलासा तब हुआ जब राहत शिविरों में रह रहे कुछ ग्रामीण अपने बच्चों के जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र या जमीन के बंटवारे के सिलसिले में पटवारी के पास बी-वन, नक्शा और खसरा निकालने पहुंचे। सरकारी रिकॉर्ड देखते ही ग्रामीणों के पैरों तले जमीन खिसक गई, क्योंकि जिस पैतृक भूमि पर वे अपना हक समझ रहे थे, वह राजस्व रिकॉर्ड में रायपुर (कचना रोड, आनंदम वर्ल्ड सिटी) निवासी मीनू गोयनका और महेंद्र गोयनका के नाम पर दर्ज हो चुकी थी। इस संवेदनशील मामले के सामने आने के बाद बीजापुर से लेकर रायपुर तक हड़कंप मच गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने भी एक विशेष जांच दल का गठन कर प्रतिवेदन मांगा है। वहीं, दूसरी ओर इस मामले को उजागर करने वाले एक समाचार पत्र पर संबंधित पक्ष द्वारा 100 करोड़ रुपये का मानहानि का दावा ठोकने की बात भी सामने आ रही है।

कोंडागांव: बिना अनुमति के पहाड़ तोड़ रही 'रितेश अग्रवाल एंड कंपनी'

दूसरा मामला कोंडागांव जिले के चिखलपुरी बस स्टैंड के ठीक पीछे का है। बस्तर में इन दिनों चौतरफा चल रहे सड़क निर्माण कार्यों की आड़ में नियमों को ताक पर रखकर अवैध कमाई का बड़ा खेल चल रहा है। आरोप है कि मई 2025 में यहाँ 'रितेश अग्रवाल एंड कंपनी' द्वारा रातों-रात एक विशाल 'हॉट मिक्स प्लांट' स्थापित कर दिया गया।

हैरानी की बात यह है कि इस प्लांट की स्थापना के लिए न तो जिला प्रशासन से कोई वैध अनुमति ली गई और न ही पर्यावरण विभाग से एनओसी (अनापत्ति प्रमाण पत्र) ली गई। बिना किसी कानूनी औपचारिकता के इस प्लांट के जरिए बस्तर के जंगलों और पहाड़ों को बेतरतीब तरीके से तोड़ा जा रहा है और पत्थरों का अवैध उत्खनन धड़ल्ले से जारी है। स्थानीय स्तर पर कई शिकायतें होने के बावजूद प्रशासन मौन साधे हुए है, जिससे यह साफ अंदेशा होता है कि इन रसूखदार ठेकेदारों को किसी बड़े राजनीतिक दल या सत्ता का सीधा संरक्षण प्राप्त है। सूत्र बताते हैं कि बस्तर और सरगुजा संभाग में ऐसे दर्जन भर से ज्यादा अवैध प्लांट बिना किसी रोक-टोक के संचालित हो रहे हैं।

क्या बस्तर में दोहराया जाएगा 'रायपुर मॉडल'?

वरिष्ठ पत्रकारों और जानकारों का मानना है कि बस्तर में जो कुछ भी शुरू हुआ है, वह हुबहू राजधानी रायपुर के उस 'लैंड ग्रैबिंग मॉडल' की तरह है, जहां शंकर नगर, मौलश्री विहार और चारागाह की बेशकीमती सरकारी व काबिल काश्त जमीनों को रसूखदारों ने गुपचुप तरीके से अपने नाम करा लिया था। यदि समय रहते शासन और प्रशासन ने बस्तर में चल रहे इस फर्जीवाड़े और अवैध उत्खनन पर नकेल नहीं कसी, तो आने वाले दिनों में जल, जंगल और जमीन को लेकर आदिवासियों का असंतोष एक नए आंदोलन का रूप ले सकता है।

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