सोमवार, 14 सितंबर 2026

सत्ता की देहरी पर संघर्ष: 'मोदी की गारंटी' और वादों के चक्रव्यूह में उलझा छत्तीसगढ़

 सत्ता की देहरी पर संघर्ष: 'मोदी की गारंटी' और वादों के चक्रव्यूह में उलझा छत्तीसगढ़


विशेष रिपोर्ट | राजनीतिक एवं प्रशासनिक विश्लेषण

छत्तीसगढ़ की शांत फिज़ाओं में एक बार फिर प्रशासनिक असंतोष की बड़ी सुगबुगाहट तेज हो गई है। एक ओर जहां सरकार 'मोदी की गारंटी' के तहत अपने चुनावी संकल्पों को पूरा करने का दावा कर रही है, वहीं दूसरी ओर प्रदेश के लाखों अनियमित, संविदा, दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी और पेंशनर्स अब आर-पार के मूड में आ चुके हैं।

इंद्रावती भवन (नया रायपुर) के समक्ष कर्मचारियों द्वारा 11 सितंबर 2026 को भोजन अवकाश के दौरान किया गया सांकेतिक प्रदर्शन [00:49] केवल एक दिन का विरोध नहीं था, बल्कि यह उस आगामी राजनीतिक तूफ़ान का संकेत है, जो आने वाले समय में विष्णुदेव साय सरकार के प्रशासनिक ढांचे और राजनीतिक स्थिरता की परीक्षा ले सकता है।

चुनावी वादे बनाम ज़मीनी हकीकत: गले की फांस बनती 'गारंटी'?

राजनीति की गतिशीलता भी विचित्र होती है। विधानसभा चुनावों के दौरान जब तत्कालीन सरकार के खिलाफ असंतोष पनप रहा था, तब भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेताओं ने कर्मचारियों के पंडालों में जाकर उन्हें भरोसा दिलाया था कि सत्ता में आते ही उनकी समस्याओं का स्थाई समाधान किया जाएगा [02:10]। संकल्प पत्र में शामिल 'मोदी की गारंटी' के तहत अनियमित कर्मचारियों के नियमितीकरण, छंटनी रोकने और आउटसोर्सिंग व्यवस्था पर अंकुश लगाने का वादा किया गया था [05:03]।

लेकिन आज, सरकार के कार्यकाल को ढाई साल बीत जाने के बाद भी, जब नीतियां धरातल पर उतरती नहीं दिख रही हैं, तो यही वादे सरकार के लिए प्रशासनिक और राजनीतिक दबाव का मुख्य कारण बनते जा रहे हैं [06:15]।

कर्मचारियों की मुख्य 5-सूत्रीय मांगें

छत्तीसगढ़ प्रगतिशील अनियमित कर्मचारी फेडरेशन और सहयोगी संगठनों के प्रमुख नेतृत्व (जैसे गोपाल प्रसाद साहू एवं करण सिंह अटेरिया) के आह्वान पर उठाई गई प्रमुख मांगें केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि कर्मचारियों की जीविका से सीधे जुड़ी हैं [05:43]:

1. नियमितीकरण एवं बहाली: संविदा/अनियमित कर्मचारियों का संपूर्ण नियमितीकरण, छंटनी पर तुरंत प्रतिबंध और पूर्व में निकाले गए कर्मचारियों की ससम्मान बहाली [06:33]।

2. आउटसोर्सिंग और ठेका प्रथा पर रोक: विभिन्न सरकारी विभागों, विशेषकर स्वास्थ्य और नगरीय निकायों में जारी आउटसोर्सिंग व ठेका व्यवस्था को समाप्त कर सीधी भर्ती प्रक्रिया को प्राथमिकता [06:52]।

3. लंबित डीए (DA) एरियर्स का भुगतान: केंद्र के समान जनवरी 2026 से लंबित महंगाई भत्ता तथा 86 महीनों के लंबित एरियर्स का तुरंत निपटारा [06:06]।

4. पुरानी पेंशन (OPS) कैशलेस स्वास्थ्य सुविधा: नगरीय निकायों व अन्य विभागों में ओल्ड पेंशन स्कीम लागू करना तथा कर्मचारियों व पेंशनर्स के लिए ₹5 लाख तक की कैशलेस इलाज सुविधा सुनिश्चित करना [07:01]।

5. न्यूनतम वेतन पूर्णकालीन दर्जा: न्यूनतम वेतन पाने वाले एवं अंशकालिक कर्मचारियों को पूर्णकालीन कर्मचारी का दर्जा देना [06:44]।

बहुकोणीय असंतोष: शिक्षा से लेकर कृषि तक फैलाव

यह प्रशासनिक गतिरोध केवल अनियमित कर्मचारियों तक सीमित नहीं है। राज्य के भीतर सामाजिक और शैक्षणिक असंतोष के कई अन्य मोर्चे भी खुले हुए हैं [08:40]:

 शिक्षा क्षेत्र में तनातनी: बीएड/डीएड अभ्यर्थियों का लंबे समय से चला आ रहा आंदोलन [08:44], नेट-पीएचडी धारकों की भर्ती प्रक्रिया में तेजी लाने की मांग, और अतिथि शिक्षकों व स्कूली बच्चों के प्रदर्शन राज्य के शिक्षा बजट और मानव संसाधन प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

 बजट का गणित: राष्ट्रीय स्तर पर शिक्षा पर खर्च के मामले में छत्तीसगढ़ का 16वें-17वें स्थान पर आना [09:40] यह दर्शाता है कि इंफ्रास्ट्रक्चर और स्थायी भर्तियों के बीच प्राथमिकताओं को संतुलित करने की तत्काल आवश्यकता है।

 प्रमुख कल्याणकारी योजनाओं पर सवाल:

 धान खरीदी: ₹3100 प्रति क्विंटल धान खरीदी का वादा तो पूरा हुआ, लेकिन रकबा और खसरा गिरदावरी के प्रशासनिक नियमों के कारण वास्तविक किसानों को होने वाली व्यावहारिक जटिलताओं पर चर्चा गरम है [10:31]।

 महतारी वंदन योजना: योजना की शुरुआत के बाद नए विवाहित जोड़ों या पात्र महिलाओं के नाम न जुड़ पाने और पोर्टल के अपडेट न होने से सामाजिक स्तर पर नई मांगें जन्म ले रही हैं [10:40]।

निष्कर्ष: संवाद ही समाधान का रास्ता

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में कर्मचारियों और जनता का विश्वास ही शासन की सबसे बड़ी ताकत होती है। महज सांकेतिक हड़ताल को सिर्फ एक विरोध प्रदर्शन मानकर अनदेखा करना प्रशासनिक दृष्टिकोण से जोखिम भरा हो सकता है।

यदि साय सरकार समय रहते इन कर्मचारी संगठनों और विभिन्न वर्गों के साथ सीधे संवाद की मेज पर बैठकर कोई ठोस नीतिगत रास्ता नहीं निकालती है, तो आने वाले समय में यह असंतोष एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है। देखना यह होगा कि सरकार 'मोदी की गारंटी' को प्रशासनिक अमलीजामा पहनाने के लिए क्या कड़े और दूरदर्शी कदम उठाती है

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