शनिवार, 12 सितंबर 2026

धुएँ में छत्तीसगढ़, रोशनी में उत्तराखंड: कॉरपोरेट और सियासत के बीच पिसती जल-जंगल-ज़मीन

 धुएँ में छत्तीसगढ़, रोशनी में उत्तराखंड: कॉरपोरेट और सियासत के बीच पिसती जल-जंगल-ज़मीन



 रायगढ़ के गारे पेलमा से लेकर हसदेव तक, छत्तीसगढ़ के संसाधनों पर दूसरे राज्यों और निजी घरानों का कब्ज़ा।

 उत्तराखंड सरकार का अडानी पावर के साथ 25 साल का बिजली समझौता और छत्तीसगढ़ की ज़मीन पर नए पावर प्लांट का संकट [03:06, 04:16]।

 पेसा कानून और फर्जी ग्राम सभाओं के साए में उखड़ते गाँव और भड़कता जन-आक्रोश [05:08, 05:28]।

1. कहानी का प्रवेश: एक राज्य, जो दूसरों का घर रोशन करता है और खुद धुएँ में खो जाता है

राजस्थान पावर, महाराष्ट्र पावर और अब उत्तराखंड पावर [00:12]। नाम अलग-अलग राज्यों के हैं, लेकिन इन सबके पीछे का ताना-बाना एक ही है—छत्तीसगढ़ का समृद्ध कोयला, रायगढ़ और हसदेव के जंगल, और उत्खनन का ठेका निजी कॉरपोरेट घरानों के हाथ में [00:29, 02:50]।

विकास की इस अंधी दौड़ में छत्तीसगढ़ के हिस्से सिर्फ तीन चीज़ें आ रही हैं—प्रदूषण, गंभीर बीमारियां और विस्थापन [00:54, 04:27]। स्थानीय ग्रामीण सड़कों पर हैं, जल-जंगल-ज़मीन बचाने के लिए नारे गूँज रहे हैं, लेकिन शासन-प्रशासन के कान पर जूँ तक नहीं रेंग रही [01:08, 01:18]।

2. पुष्कर सिंह धामी कैबिनेट का निर्णय और छत्तीसगढ़ का संकट

ताज़ा मामला उत्तराखंड सरकार से जुड़ा है [02:15]। उत्तराखंड को रायगढ़ के गारे पेलमा सेक्टर 4/1 का कोल ब्लॉक आवंटित किया गया [02:50, 03:42]। लेकिन असली पेच यहाँ फँसता है—उत्तराखंड के पास न तो कोयला खनन का अनुभव है और न ही वहाँ पावर प्लांट लगाने की भौगोलिक स्थितियाँ [03:56]।

परिणाम स्वरूप, उत्तराखंड सरकार ने अडानी पावर के साथ 1320 मेगावाट बिजली आपूर्ति के लिए 25 साल का लंबा करार करने का प्रस्ताव पास किया है [03:06, 03:42]। यानी ज़मीन छत्तीसगढ़ की, कोयला छत्तीसगढ़ का, राखड़ और धुआँ छत्तीसगढ़ झेलेगा, और मुनाफे का गणित कहीं और लिखा जाएगा [04:16, 04:47, 05:56]।

3. पेसा कानून की धज्जियाँ और फर्जी ग्राम सभाओं का साया

छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाकों में पेसा (PESA) कानून लागू है, जिसके तहत किसी भी परियोजना के लिए ग्राम सभा की वैधानिक सहमति अनिवार्य है [05:08]।

लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि हसदेव से लेकर तमनार और मैदानी क्षेत्रों तक प्रशासनिक दबाव और कथित फर्जी ग्राम सभाओं के ज़रिए सहमतियाँ तैयार कर ली जाती हैं [05:28, 05:46]। ग्रामीणों के प्रतिरोध को पुलिस बल के प्रयोग और गिरफ्तारियों के दम पर दबाने की कोशिश की जाती है, जैसा कि हाल ही में तमनार और अन्य क्षेत्रों में देखा गया है

कब तक शांत रहेगा छत्तीसगढ़?

जब मुनाफे का केंद्र कॉरपोरेट घराने और बाहरी राज्य होंगे और स्थानीय नागरिकों को विस्थापन और प्रदूषण की आग में झोंक दिया जाएगा, तो असंतोष की ज्वाला भड़कना स्वाभाविक है [00:54, 07:08]। शांत छत्तीसगढ़ में जिस तेज़ी से जन-आंदोलन का दायरा बढ़ रहा है, वह केंद्र और राज्य सत्ता दोनों के लिए एक बड़ी चेतावनी है

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