शुक्रवार, 9 अप्रैल 2010

पहली लड़ाई में भारी पड़ी किरण


भाजपा को मुंह की खानी पड़ी...
यह तो आ बैल मुझे मार की कहावत को ही चरितार्थ करता है वरना नवनिर्वाचित पार्षदों की पहली सामान्य सभी की बैठक में भाजपा को मुंह की नहीं खानी पड़ती, वहीं अवैधानिक कृत्यों में साथ देने वाले निगम के अधिकारी अब अपनी चमड़ी बचाने में लग गए हैं।
राजधानी के नगर निगम में भाजपा ने अपना सभापति बिठाकर महापौर किरणमयी नायक की राह में कांटे बिछाने का संकेत पहले ही दे दिया था लेकिन भाजपाईयों ने सपने में भी नहीं सोचा था कि जिस महापौर को वे घेरने जा रही है उसके चक्कर में स्वयं घिर जाएंगे। निगम की पहली बैठक तीन दिन चली या दो दिन इसका फैसला तो बाद में होगा लेकिन बहुमत के बाद भी सत्तापक्ष को परेशान होना पड़ा। दूसरे दिन तो अभूतपूर्व हंगामा हुआ और पार्षदों को भी निगम एक्ट पढना पड़ गया। तीसरी बार पार्षद बने भाजपाई सुनील बांद्रे ने कहा कि दस साल में पहली बार उन्हें निगम एक्ट पड़ना पड़ा तो नेता प्रतिपक्ष सुभाष तिवारी ने महिला पार्षदों की आड़ लेकर महापौर को घेरने की कोशिश की नेता प्रतिपक्ष ने तो महापौर को कानूनबाज तक कह दिया।
भाजपा की ओर से सूर्यकांत राठौर, प्रफुल्ल विश्वकर्मा ने भी मोर्चा खोला जबकि कांग्रेस में प्रमोद दुबे, ज्ञानेश शर्मा ने भाजपाईयों की बखिया उधेड़ने में कोई कमी नहीं छोड़ी। निर्दलीय पार्षदों में दीनानाथ शर्मा, मृत्युंजय दुबे, पूर्णप्रकाश झा ने अपने तीखे तेवर दिखाये। मृत्युंजय ने तो निगम की घटना के लिए दोनों राजनैतिक दल भाजपा और कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराते हुए तीखी टिप्पणी की। महापौर के जब बोलने की बारी आई तो उन्होंने साफ कहा कि उन्हें कानूनबाज होने में गर्व है और वे इस बात के लिए सफल हुई हैं कि कल तक पार्टी या बहुमत के कारण बंद आंखों से समर्थन करने वालों को निगम में कानून पढ़ने पढ़े। जबकि उन्होंने नेता प्रतिपक्ष पर महिलाओं की आड़ लेने के लिए आड़े हाथों लिया। महिला पार्षदों ने भी
जमकर हिस्सा लिया

नगर निगम में इस बात बड़ी संख्या में महिला पार्षद जीत कर आई है। इनमें से पहली बार भाजपा से जीत कर आई श्रीमती मीनल चौबे ने निगम के हंगामे की जमकर आलोचना करते हुए कहा कि यहां राजनीति करने की बजाय शहर के विकास पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने अपने प्रभावशाली बातों से नए नेतृत्व उभरने का संकेत दिया। जबकि अन्य महिला पार्षदों ने भी कार्रवाई में जमकर हिस्सा लिया जो आने वाले दिनों में बेहतर नजारें के संकेत हैं।

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

10 करोड़ में पदोन्नति , पीडब्ल्यूडी में उन्नति


मंत्री पर भी आरोप , हाईकोर्ट में मामला
छत्तीसगढ़ में उच्चाधिकारियों व नेताओं की करतूत थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। सेवानिवृत्त आईएएस राघवन ने पदोन्नति सूची पर हंगामें पर भले ही कोई कार्रवाई नहीं हुई है लेकिन हाईकोर्ट ने पीडब्ल्यूडी में हुए पदोन्नति पर न केवल रोक लगा दी बल्कि 4 अधिकारियों का पदावतन भी कर दिया। सम्पूर्ण मामले में उच्च स्तर पर 10 करोड़ के लेन-देन की चर्चा है और पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल भी इन आरोपों से अछूते नहीं हैं।
मामले की शुरुआत को लेकर ही संदेह किया गया कि आखिर लोकसभा चुनाव के आचार संहिता लगने के चंद घंटे पहले ही डीपीसी कैसे हो गया। इस संदेह को अमलीजामा पहनाया गरियाबंद में पदस्थ इंजीनियर वर्मा ने। दरअसल प्रमोशन के असली हकदार वर्मा की बजाय शासन स्तर पर जब लेन-देन कर दूसरे इंजीनियर को इएनसी बनाने की चर्चा छिड़ी और आचार संहिता लगने के ठीक पहले डीपीसी को ऐसे बनाया गया जिससे आधा दर्जन से अधिक भ्रष्ट इंजीनियरों को पैसे के दम पर प्रमोशन दिया गया।
बताया जाता है कि इस मामले में अनुसूचित जाति के कोटे से जनवदे को ईएनसी बना दिया गया जबकि वे अनुसूचित जनजाति के कोटे के हैं। इस हेराफेरी की वजह 2.50 करोड़ के लेन-देन को बताया जा रहा है। मामला सिर्फ इतना ही नहीं है इस डीपीसी के अदला बदली में अग्रवाल, पिपरी सहित सेतु निगम के ऐसे अधिकारियों को पैसा लेकर लाभ दिया गया जिन पर भ्रष्टाचार के आरोपों में विभागीय जांच तक चल रही है। सात लोगों को आनन फानन में प्रमोशन की कहानी से लेन देन की नई कहानी बाहर आने लगी है।
बताया जाता है कि इस मामले में सर्वाधिक प्रभावित गरियाबंद में पदस्थ वर्मा हुए। ईएनसी की दौड़ से बाहर होने को लेकर वर्मा ने जब हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया तो सारे घपले खुब ब खुद बाहर आ गए और हाईकोर्ट के निर्देश के बाद सेतु निगम के चार उन अधिकारियों को पदवतन (डिमोशन) किया गया जिन पर पैसा लेकर प्रमोशन पाने का आरोप था।
बताया जाता है कि पीडब्ल्यूडी में यह नया खेल नहीं है जब सचिव या मंत्री स्तर पर लेन देन कर पदोन्नति दी गई हो। इसके पहले मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के बंटवारे के दौरान भी कई तरह का घालमेल हुआ है। ताजा मामला पिंकरी और शर्मा के बीच हुए स्थानांतरण का है जब इंजीनियर ने कार्यपालन अभियंता का पद पा लिया। बहरहाल हाईकोर्ट ने डीपीसी पर बेन लगा दिया है लेकिन मंत्री से सचिव स्तर पर हुए दस करोड़ के लेन की बेहद चर्चा है।

बुधवार, 7 अप्रैल 2010

अपनी अवैध कालोनी के लिए भी खूब षड़यंत्र किया

घोटालेबाजों का जमाना महाधिवक्ता है सुराना-3
हाधिवक्ता की कुर्सी तक पहुंचे देवराज सुराना व उनके परिवार पर न केवल मंदिर व आदिवासियों की जमीन ही हड़पने का आरोप है बल्कि इन पर राय शासन के जल संसाधन विभाग को गुमराह करके नानेश बिल्डर्स द्वारा बनाई अवैध कालोनी को भी वैध करने की कोशिश का आरोप है।
दरअसल प्रदेश में भाजपा की सरकार आते ही इस परिवार ने जिस तरह से अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर अपने हितों के लिए अवैधानिक तरीकों का इस्तेमाल किया वह अंयंत्र देखने को नहीं मिलेगा। गोपिया पारा पुरानी बस्ती स्थित श्री हनुमान मंदिर की जमीन हो या फिर माना में आदिवासियों की जमीन हो सभी मामले में भाजपा शासन के अधिकारियों की भूमिका रही और कहीं न कहीं इस मामले में सरकार का भी प्रभाव रहा है अन्यथा आनन-फानन में सुराना परिवार के पक्ष में निर्णय नहीं लिए जाते।
ताजा मामला नानेश बिल्डर्स द्वारा बनाई गई कालोनी का है। दरअसल यह कालोनी नहर के पार बनाई गई थी और नहर में पुल बनाए बगैर इस कालोनी के मकान या जमीन नहीं बिकते इसलिए जमीन की अच्छी कीमत पाने सुराना परिवार द्वारा षड़यंत्र रचे जाने की कहानी है। बताया जाता है कि नहर काट कर पुलिया निर्माण के लि षड़यंत्र तो 2001 में ही रच ली गई जब देवराज सुराना के अध्यक्ष वाली देवलिला एजुकेशन सोसायटी ने कार्यपालन यंत्री जल प्रबंध संभाग-1 को एक आवेदन दिया कि उनकी सोसायटी शासन की हुडकों योजना के तहत बढ़ई और राजगिरों को रोजगारोन्मुखी शिक्षा देने के लिए ग्राम माना पहन-116 खसरा नंबर- 7191 जो कि नहर के पीछे होने से पहुंच मार्ग नहीं होने के कारण पुलिया निर्माण किए जाने की बात करते हुए देवलिला सोसायटी ने यह भी कहा कि वह पुलिया निर्माण का पूरा खर्च स्वयं वहन करेगी।
बताया जाता है कि जल संसाधन विभाग ने देवलिला एजुकेशन सोसायटी के इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया यहीं नहीं 19-10-2004 को हुडकों ने भी हाथ खड़े कर दिए। लेकिन तब तक भाजपा सत्ता में बैठ चुकी थी और देवराज सुराना का ही प्रभाव था कि जिस पुलिया निर्माण को जल संसाधन विभाग ने अस्वीकार कर दिया था उसी विभाग ने अचानक नियम विरुध्द नि:शुल्क नक्शा स्टीमेट बना कर पुलिया तक निर्माण कर दिया और कहा गया कि जनहित में यह सब किया गया यानी अवैध कालोनी को सुविधा दी गई। इधर जब 2009 में अवैध कालोनी का हल्ला हुआ तब रायपुर विकास प्राधिकरण की ओर से नानेश बिल्डर्स को अवैध विकास कार्य हटाने 18 मार्च 2009 को नोटिस दी गई जिसके विरुध्द निशेघाज्ञा प्राप्त करने नानेश बिल्डर्स ने मामला न्यायालय में पेश कर दिया है।

तब क्या करें ?

कल शाम से लिखने की बिल्कुल भी इक्छा नहीं हो रही थी जब भी लिखने बैठता नक्सली हमले में शहीद हुए जवानों की छाया सामने आ जाती थी
लेकिन लिखना भी है इसलिए लिख रहा हूँ आखिर यह सब क्यों हो रहा है सरकार कर क्या रही है संसद में हमले के बाद जब तत्कालीन पीएम अटल जी ने सिर्फ आर-पार का ऐलान किया था तब भी मै इतना व्यथित नहीं था
अब तो एक ही सवाल है --
जो सरकार निकम्मी है ,वह सरकार बदलनी है
लेकिन अब इसे भी राजनीती कहा जाता है तब क्या करें ?

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

अस्पताल है या कत्लखाना ?

पैसे की लालच में जान ले ली
डॉक्टरों में भगवान का रूप देखकर अपने अजीजों का जीवन सौंपने वालों को अब समझ लेना चाहिए कि बड़े-बड़े भवनों में अस्पताल चलाने वाले रुपयों की लालच में किसी की जान तक ले सकते हैं। अस्पताल में आए मरीजों से रुपये कमाने की होड़ में लगे डाक्टर अब मरीजों को उचित सलाह देने की बजाय इस चिन्ता में यादा रहते हैं कि मरीज उनकी बजाय दूसरे अस्पताल में न चला जाए। शायद डाक्टर की ऐसी ही लापरवाही की वजह से ही सतीश को अपना बेटा खोना पड़ गया और अब वह अपने बेटे के ईलाज में लापरवाही बरतने का आरोप लगाकर डॉ. केदार अग्रवाल, डॉ. जवाहर अग्रवाल, डॉ. ओ.पी. सिंघानिया और डॉ. केडिया के खिलाफ जुर्म दर्ज करने की मांग को लेकर पुलिस व न्यायालय की शरण में भटक रहा है। पोस्टमार्टम में बच्चे की मौत की वजह जटील मारक आघात बताया गया है।
मामला 18 जनवरी 2010 का है जब कोटा निवासी सतीश ताण्डी के 14 वर्षीय पुत्र मुकेश को पसली के पास दर्द की वजह से अग्रसेन अस्पताल लाया गया। इसके बाद डॉ. केदार अग्रवाल की सलाह पर एक्स-रे और सोनोग्राफी कराया गया। रिपोर्ट देखकर डॉ. केदार अग्रवाल ने पेट में तिल्ली फटने की जानकारी देकर तत्काल आपरेशन कराने की सलाह देते हुए 25 हजार रुपए खर्च बताया। दूसरे दिन सतीश द्वारा 20 हजार रुपए जमा कराया तब बताया गया कि पूरा खर्च करीब 45 हजार रुपये बताते हुए शाम को आपरेशन किया गया।
दूसरे दिन सतीश ने 20 हजार रुपए फिर जमा किया। इसके बाद बच्चे की तबियत बिगड़ने लगी तो डॉ. केदार अग्रवाल ने मरीज मुकेश को लाईफवर्थ अस्पताल के लिए रिफर कर दिया और 22 जनवरी को 11 बजे लाईफ वर्थ में शिफ्ट किया गया। रात में बच्चे के पेट में असहनीय दर्द से जब बच्चे के परिजनों ने हल्ला मचाना शुरु किया तो डाक्टरों की अनुपस्थिति में नर्स द्वारा बच्चे को दवा व इंजेक्शन दिया गया। बच्चे की तबियत बिगड़ते देख परिजनों ने पुन: डॉ. केदार अग्रवाल से संपर्क किया तो उन्होंने डॉ. ओ.पी. सिंघानिया से चर्चा की और फिर ओ.पी. सिंघानिया लाईफवर्थ में राउण्ड में आए और जानकारी दी कि बच्चे के फेफड़े में पानी भर गया और आईसीयू में भर्ती कर दिया गया और अचानक 26 जनवरी को बच्चे को जनरल वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया जबकि बच्चे की तबियत में कोई खास सुधार नहीं देखा जा रहा था।
इसके बाद 27 जनवरी को डॉ. जवाहर अग्रवाल ने सतीश को फीस के लिए न केवल डांटा बल्कि राजेश मूणत मंत्री के पास तत्काल सहायता उपलब्ध कराने कहा। तब सतीश भागा-भागा राजेश मूणत के पास गया वहां बताया गया कि 20 हजार सहायता राशि स्वीकृत हो गई है और लाईफवर्थ के नाम पर चेक जारी कर दिया जाएगा। इस सूचना के बाद सतीश ने लाईफवर्थ में अपना गरीबी रेखा वाला स्मार्ट कार्ड जमा करा दिया। इसके बाद 5 फरवरी को मुकेश को अचानक छुट्टी दे गई और 6 फरवरी को बच्चे की तबियत फिर यादा बिगड़ने पर डॉक्टरों के पास दौड़ लगाई तो लाईफवर्थ में पुन: बच्चे को भर्ती कर दिया गया। 8 फरवरी को डॉ. ओ.पी. सिंघानिया ने रात्रि 8 बजे बताया कि आपरेशन की गलती की वजह से अतड़ी चिपक गई है और पुन: आपरेशन करना होगा। इसके बाद राउण्ड में आए डॉ. केडिया ने भी आपरेशन की बात कही।
26 फरवरी को बच्चे का दुबारा ऑपरेशन किया गया लेकिन इसकी जानकारी डाक्टरों ने बच्चे के परिजनों को देने की जरूरत नहीं समझी और इसके बाद भी बच्चे के तबियत में कोई सुधार नहीं हुआ बल्कि मामला बिगड़ता गया और 3 मार्च को बच्चे की मौत हो गई। मामला सिर्फ इतना ही नहीं है सतीश के मुताबिक बच्चे के मौत की खबर छुपाई गई और फीस का तीस हजार रुपए जमा करने दबाव बनाया गया और जब बच्चे के परिजनों ने हंगामा किया तब पुलिस की मौजूदगी में डॉ. अम्बेडकर अस्पताल में पोस्टमार्टम कराया गया तब पता चला कि बच्चे की मौत की वजह पेट में जटील मारक आघात के कारण मौत हुई है।
आश्चर्य का विषय तो यह है कि इस मामले में न तो बच्चों के विशेषज्ञ डाक्टर को ही बुलाया गया और न ही मरीज के परिजनों को ही उचित सलाह दी गई। इधर सतीश तांडी का कहना है कि मरीज भाग न जाए इसलिए ईलाज न होने के बावजूद फीस के चक्कर में रोका गया। सतीश का यह भी आरोप है कि हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. केदार ने ही पहला आपरेशन किया। इधर इस संबंध में जब अग्रसेन अस्पताल व लाईफवर्थ से संपर्क की कोशिश की गई तो वे उपलब्ध नहीं थे। बार-बार संपर्क की कोशिश बेकार रही। वहीं सतीश ताण्डी ने पूरे घटनाक्रम की शिकायत पुलिस से की है और कार्रवाई नहीं होने पर न्यायालय जाने की बात कही है। राजधानी के बड़े अस्पतालों में चल रहे इस तरह के खेल की आम लोगों में जबरर्दस्त चर्चा है।

रविवार, 4 अप्रैल 2010

साल में अंदर 20 करोड़ ,पक्ष-विपक्ष का गठजोड़

कहने तो तो छत्तीसगढ़ के विधायक समाजसेवा कर रहे हैं लेकिन वास्तव में इनकी रूचि ऐन-केन प्रकारेण पैसे कमाने की है यही वजह है कि वेतन भत्ते बढाने के मामले में सभी विधायक एक हो जाते हैं और महंगाई से त्रस्त आम आदमी का मामला हाशिये पर चला जाता है। छत्तीसगढ़ के लोगों की गाढ़ी कमाई का 20 करोड़ रुपया हर साल सीधे इन्हीं मंत्रियों व विधायकों की जेब में जाता है।
वास्तव में राजनीति अब व्यवसाय का रूप ले चुकी है। सिध्दांतों की बात करने वाले राजनैतिक दल के नेता पैसा कमाने का कोई मौका नहीं छोड़ना चाहते। इसलिए पैसा लेकर सवाल करने का सवाल लगाकर पैसा लेकर गायब होने की परम्परा ने लोकतंत्र के मंदिर को अपवित्र करना शुरू कर दिया है। जनसेवा के नाम पर राजनीति की वकालत करने वाले छत्तीसगढ़ के किसी विधायक ने यह नहीं कहा कि सेवा वे मुफ्त में करेंगे बल्कि अपनी तनख्वाह और भत्ता बढ़ाने गलबट्टियां करने लगते हैं।
छत्तीसगढ़ में बजट सत्र में सरकार ने महंगाई का हवाला देकर जिस पैमाने पर विधायकों के वेतन भत्ते में बढ़ोत्तरी की है वह जनसेवा के नाम पर कलंक है। इस बड़े हुए वेतन भत्ते का हिसाब लगाया जाए तो अब हर विधायक 46 हजार रुपए महिना पायेंगे। आश्चर्य का विषय तो यह है कि आम लोगें की महंगाई की तकलीफ पर आंसू बहाने वाले किसी भी विधायक ने न तो इस विधेयक का विरोध ही किया और न ही किसी ने मुफ्त में जनसेवा करने की बात ही कही। ऐसे में आसानी से समझा जा सकता है कि राजनीति का वास्तविक उद्देश्य क्या होता जा रहा है। छत्तीसगढ नया राय है और वहां विकास करने की जरूरत है। सरकारी धन का बंदरबांट कर विकास में रोड़ा अटकाया गया तो राय निर्माण की वजह पर सवाल उठेंगे। भ्रष्टाचार तो चरम पर है ही सरकारी अधिकारी अपनी सुविधा के लिए बजट का एक बड़ा हिस्सा चुरा लेते है ऐसे में जनप्रतिनिधि भी सरकारी धन का बंदरबांट करे तो स्थिति विकराल हो सकती है। इसलिए अब आम लोगों को सोचना होगा कि उसे कैसा नेता चाहिए।

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

घर के जोगी जोगड़ा , आन गांव के सिध्द

संवाद में भारी अव्यवस्था
सरकार और जनता के बीच सेतु का काम करने वाले जनसंपर्क और संवाद में इन दिनों भारी अव्यवस्था है। विभाग के पदाधिकारियों द्वारा पैसे खाकर दूसरे प्रांत के कर्मियों को नियमित करने और छत्तीसगढ़ के कर्मचारियों को नौकरी से निकाले जाने का मामला गरमाने लगा है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार छत्तीसगढ़ संवाद के द्वारा शासन के नियमों को ताक में रख कर छत्तीसगढ़ के बाहर के ऐसे लोग जिनके पास संबंधित पद की शैक्षणिक योग्यताएं और रोजगार पंजीयन नहीं हैं उन्हें नियमित करने की कोशिशें लंबे समय से की जा रही है। समानता का संवैधानिक अधिकार छीने जाने के खिलाफ बोलने वाले कापी राईटर मोहन मिश्रा को सात साल बाद नौकरी से निकाल दिया गया है ताकि सुखदेव राम को लाखों रुपए कमीशन लाकर देने वाले छत्तीसगढ़ के बाहर के कर्मचारियों को नियमित करने में कोई बाधा नहीं आए।
करीबन तीन पहले छत्तीसगढ़ मूल के कर्मचारियों की संविदा अवधि तीन-तीन महीने और छत्तीसगढ़ के बाहर के ऐसे कर्मचारियों जिन्हें काम नहीं आने के कारण नौकरी से निकाले जाने का प्रस्ताव था उनसे पैसे लेकर उनके काम को सर्वश्रेष्ठ बताकर तीन-तीन साल के लिए संविदा अवधि बढ़ा दी गई थी। यहां के कापी राईटर मोहन मिश्रा ने इस अत्याचार के खिलाफ छत्तीसगढ क़े कर्मचारियों को खड़े करने की कोशिश की थी जिसके बाद छत्तीसगढ संवाद के अध्यक्ष डा. रमन सिंह के आदेश से छत्तीसगढ़ के कर्मचारियों की संविदा (तीन-तीन महीने संविदा वाले) एक-एक साल के लिए बढ़ाई गई। नियमित पदों पर भर्ती के लिए नए सिरे से भर्ती प्रक्रिया अपनानी पड़ती है विज्ञापन निकालकर आवेदन आमंत्रित करके लिखित परीक्षा और इंटरव्यू किए जाने का नियम है। उक्त नियम का पालन करते तो उन्हें कमीशन की कमाई देने वाले छत्तीसगढ़ के बाहर के कर्मचारी सव्यसांचीकर, शरदचंद्र पात्र, किशोर गनोदवाले, के.एम. ललिता वापस संवाद में नजर नहीं आएंगे। दिनांक 19-1-2005 को अध्यक्ष छत्तीसगढ़ संवाद डॉ. रमन सिंह के समक्ष आठ कर्मचारियों द्वारा प्रस्तुत आवेदन उल्लेख किया गया था कि छत्तीसगढ़ के बाहर के पांच लोगों सव्यसांचीकर (बंगाल), शरदचंद्र पात्र (उड़ीसा), किशोर गनोदवाले (महाराष्ट्र), के.एम. ललिता और जमीनल चौहान (राजस्थान) की संविदा अवधि तीन-तीन साल के लिए बढ़ा दी गई है। छत्तीसगढ़ के रहवासी मोहन मिश्रा, गोकुल ध्रुव, हेमंत मांजरे, अंजुरानी गोंडाने, सनत कुमार क्षत्री, चंद्रशेखर साहू, द्रोण कुमार कौशल और नीला ध्रुव की संविदा अवधि मात्र तीन-तीन महीने बढ़ाई गई है। उक्त आठ कर्मचारियों ने भी तीन-तीन साल संविदा बढ़ाने की मांग डॉ. सिंह से की थी लेकिन 1-1 साल के लिए उनकी संविदा बढ़ाई गई।
बताया जाता है कि बाहर के जिन पांच कर्मचारियों की संविदा कर्मचारियों की संविदा 3-3 साल बढ़ाई गई पहले उन्हें काम नहीं आने के कारण नौकरी से निकाले जाने का प्रस्ताव सुखदेवराम के वरिष्ठ अधिकारी ने रखा था लेकिन रातों-रात उनका काम सर्वश्रेष्ठ हो गया और संवाद के बोर्ड के सदस्यों को बिना जानकारी के ही इस बात से सहमत होना बताया गया। सुखदेवराम के इस कुकर्म को पुष्ट करने वाली बात यह भी है कि उक्त पांच कर्मचारियों में दो ऐसे हैं जो फाईलों को चढ़ाने उतारने के काम करते थे। बाकी के तीन लोग बड़े पदों से हैं इससे यह साबित होता है कि छोटे पद पर काम करने वाले अच्छे से काम करने वाले नहीं हो सकते हैं। छत्तीसगढ़ संवाद के कार्यालय आदेश के अनुसार दिनांक 4 अक्टूबर 2001 को भर्ती किए गए सभी संविदा कर्मियों को भर्ती के समय आरक्षण नियमों का पालन नहीं किए जाने के कारण दिनांक 16 सितंबर 2002 को (दिनांक एक अक्टूबर 2002 के संविदा अनुबंध की शर्त क्रमांक 18 का हवाला देते हुए) सेवामुक्त कर दिया गया था। इसके बाद दो पदों को छोड़कर बाकी के लिए विज्ञापन निकाला (सभी पदों के लिए निकाला जाना था)। प्रकाशन विशेषज्ञ और लेखाधिकारी पदों का विज्ञापन भी निकाला जाना था, क्योंकि इन पदों पर काम करने वालों सव्यसांचीकर और शरदचन्द्र पात्र को अन्य कर्मचारियों के साथ ही 19 सितम्बर 2002 को सेवामुक्त कर दिया गया था। दोबारा भर्ती में उक्त कर्मचारी (अनिवार्य शैक्षणिक योग्यता नहीं होने के कारण) वापस नहीं आ सकते थे। इसलिए सव्यसांचीकर और शरदचन्द्र पात्र से रिश्वत लिया और बिना भर्ती प्रक्रिया के दिनांक 12 अक्टूबर 2002 से संविदा नियुक्ति बढ़ा दी। बाकी कर्मचारियों को विज्ञापित पदों के लिए फिर से आवेदन करके भर्ती प्रक्रिया से गुजरना पड़ा जिससे कुछ कर्मचारी वापस संवाद में नियुक्त नहीं हो पाए। अनिवार्य योग्यता नहीं होने और फर्जी अनुभव प्रमाण पत्रों की जानकारी होने पर सी.के. खेताम तत्कालीन मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने सुखदेवराम को उक्त कर्मचारियों के प्रमाण पत्रों की जांच पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय से कराने के लिए निर्देश किया था। लेकिन सुखदेवराम ने ऐसा नहीं किया क्योंकि वे उक्त कर्मचारियों से रिश्वत खा चुके थे। प्रकाशन विशेषज्ञ पद पर भर्ती के लिए निकाले गए विज्ञापन की छायाप्रति के अनुसार संबंधित पद के लिए प्रिंटिंग टेक्नालाजी में डिग्री या डिप्लोमा अनिवार्य है। सुखदेवराम द्वारा इस पद पर पदस्थ किए गए बंगाल निवासी सव्यसांचीकरण द्वारा प्रस्तुत आवेदन में प्रिंटिंग टेक्नालॉजी में कोई योग्यता हासिल करने का उल्लेख नहीं है। रोजगार पंजीयन भी प्रमाण के साथ संलग्न नहीं है। मतलब पढ़ाई ऐसे फर्जी विश्वविद्यालय से की गई थी उसका रोजगार कार्यालय में पंजीयन नहीं हो सकता था। अनुभव प्रमाण पत्र की छायाप्रति संलग्न है, जिस संस्था ने अनुभव प्रमाण पत्र बनाया है। उसे खुद को बने ही करीब 3 साल हुए थे। दरअसल इसमें भी एक सौदा हुआ था जिसके अनुसार यहां नियुक्ति के बाद उक्त संस्था को अनैतिक रुप से लाभ पहुंचाने के लिए सव्यसांची द्वारा अब तक शासन को लाखों का चूना लगाया जा रहा है।
बताया जा रहा है कि आज उक्त अनुभव प्रमाण पत्र देने वाली संस्था युगबोध प्रकाशन को भ्रष्ट तरीकों से लाभ पहुंचाया जा रहा है। फर्जी तरीके से नौकरी कर रहे उक्त कर्मचारियों के साथ मिलकर सुखदेवराम द्वारा संवाद से होने वाले कामों में क्वांटिटी और क्वालिटी की हेराफेरी करके और न जाने कितने तरीकों से शासन को लाखों-करोड़ों का चूना रोज लगाया जा रहा है।