बुधवार, 8 सितंबर 2010

बिकी तो नहीं ठेके पर चला गया...

नवभारत के मालिकों में इन दिनों बंटवारे को लेकर मीडिया जगत में जबदस्त चर्चा है। कभी रायपुर संभाल रहे प्रफुल्ल माहेश्वरी का अब यहां से कोई लेना नहीं रहा तो चर्चा इस बात की है कि बंटवारे में मिले रायपुर नवभारत को समीर जी चलाना नहीं चाहते। जिंदल से जोगी तक खरीदने की चर्चा में अब यह चर्चा भी है कि रायपुर नवभारत ठेके पर चला गया है। ठेका कभी सूर्या में घपला करने वाले ने लिया है। मालिक को पैसे से मतलब है यह ठेकेदार सबको यही समझाकर विज्ञापन या नगद ले रहा है। सच्चाई तो समीर जी जाने। लेकिन जब बिल्डिंग की वैधता को लेकर ही तलवारें लटक रही हो तो बदनामी से काहे का डर वैसे भी एनबी प्लांटेशन के बाद भी क्या बिगड़ गया सरकार तो वैसे ही जेब में हैं।
भास्कर में भी बिहारी बाबू
इन दिनों भास्कर के बिहारी बाबू की जबरदस्त चर्चा है। डीजी बिहारी हैं तो डर काहे का की तर्ज पर जब तक गोली मारने की धमकी से यहां कई लोग परेशान हैं और जब मालिक की नीति ही फूट डालो राज करों की हो तो विवाद कैसा? फिर कब तक सिर्फ बातों का जमा खर्च है गोली चली भी नहीं है तो शिकायतों पर ध्यान देने की जरूरत भी नहीं है।
सौम्या की छलांग
जनसंपर्क में अधिकारी रहे मिश्रा जी की बिटिया ने अपने ताऊ के अखबार से छुट्टी ले ली है जब भास्कर जैसा बैनर हो और वेतन भी 60 हजार हो तो कौन पूछता है वैसे भी घर की मुर्गी दाल बराबर मानी जाती है और कभी ऊंच-नीच हो भी गया तो ताऊ-पापा तो हैं ही।
दिवाकर की पीड़ा
गजानन माधव मुक्तिबोध ने साहित्य व समाज को बहुत कुछ दिया लेकिन दिवाकर मुक्तिबोध की पीड़ा कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है। भास्कर से जनधारा तक का सफर भारी पड़ रहा है। युगधर्म में चंगु-मंगु ने संपादकीय छुड़वा दी थी तो जनधारा में चहेती बिटिया ने अपमानित किया अब जब काम करना है तो इतना तो सहना ही पड़ेगा। भले ही कल का देवेन्द्र बड़ा पद ले ले।
देवेन्द्र खुश हुआ
नौकरी के लिए अच्छा पत्रकार होना जरूरी नहीं है। न ही खबरें लिखना ही जरूरी है। अधिकारियों से सेटिंग हो तो मालिक भी खुश रहता है। इस रणनीति पर चलने वाले खुश रहते हैं। हरिभूमि छोडक़र जनधारा पहुंचे देवेन्द्र कर अब अखबार का प्रकाशक-मुद्रक हो गया है तो खुश तो होगा ही।
यशवंत भास्कर में
कभी हरिभूमि रायपुर से हरिभूमि बिलासपुर पहुंचे यशवंत गोहिल इन दिनों बिलासपुर भास्कर पहुंच गए हैं। उनका सफर भास्कर तक ही है यह कहना कठिन है लेकिन सफर को लेकर बिलासपुर में जबरदस्त चर्चा है।
प्राण चड्डा और एसएमएस
भास्कर में सलाहकार संपादक रहे प्राण चड्डा अब यहां से रिटायर्ड हो गए हैं। ढलहा बनिया हलाये कन्हिया की तर्ज पर इन दिनों उनकी सुबह एसएमएस भेजने से शुरु होती है और रात गुडनाईट के एसएमएस से खत्म होती है। उनके एसएमएस भी निराले हैं पत्रकार तो डरने लगे है कि कहीं एसएमएस डिलिट नहीं हुआ तो क्या होगा इसलिए तत्काल डिलिट करते हैं ताकि घरवालों से तो बच सकें।
राजीव पहुंचे पत्रिका
सांध्य दैनिक छत्तीसगढ़ में अपनी फोटोग्राफी का रंग दिखा चुका बिहारी बाबू राजीव अब पत्रिका में चले गए हैं। वैसे भी छत्तीसगढ़ में वे परेशान थे। वजह तो मालिक जाने।
मधु बीमार
जनधारा और अग्रदूत की पत्रकारिता में नाम कमा चुके मधुसूदन शर्मा की तबियत इन दिनों बेहद खराब है। उनके स्वास्थ्य लाभ की हम सब कामना करते है। उन्हें पैरालिसिस अटैक के चलते नागपुर अस्पताल में शिफ्ट किया गया है।
और अंत में...
शहर में भास्कर को मात देने के लिए आ रहे एक अखबार को जिस तरह का पत्रकार चाहिए वह मिल नहीं रहा है। या फिर पत्रकार ढूंढने वाले का चेहरा देख लोग भाग रहे हैं। यह सवाल इन दिनों मीडिया जगत में चर्चा में हैं।

मंगलवार, 7 सितंबर 2010

स्वागत में सरकार जनता को दुत्कार

दो दिन पूरी सरकार लगी रही चापलूसी में
0 5 शहीदों को फूल चढ़ाने कोई नहीं गया
0 जगह-जगह ट्रैफिक जाम
0 कुत्ते-बिल्ली की तरह लड़े मोहन-मूणत समर्थक
0 स्टेडियम के चारों ओर की दुकानें बंद
0 जूदेव न स्वयं दिखे न फोटो में ही
0 सरकारी गुण्डागर्दी खुले आम
0 जी-हुजूरी में कांग्रेसियों से भी आगे
0 करोड़ों रुपए फूंके गए
0 ननकी, चम्पू, अमर को भी रोका दिया गया
 भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी रायपुर क्या आए पूरी सरकार ही उसके ही हुजूरी में लग गई। व्यवस्था के नाम पर न केवल सरकारी गुण्डागर्दी का जमकर प्रदर्शन हुआ बल्कि जोर आजमाईश में प्रदेश के दो मंत्रियों बृजमोहन अग्रवाल और राजेश मूणत के समर्थकों ने सरेआम दईया-मईया करते एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए। जूदेव-साय जैसे वरिष्ठों की अनदेखी ही नहीं हुई स्वागत के चक्कर में बीजापुर में शहीद हुए पांच जवानों को फूल चढ़ाने तक की फुर्सत रमन सरकार के पास नहीं थी। नीतिन गडकरी के स्वागत में फूल बरसाने वाले रमन सरकार व उसके अधिकारियों ने पदों की गरिमा को तार-तार तो किया ही चापलूसी में कांग्रेसियों को भी पीछे छोड़ दिया।
आम आदमी तो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी के छत्तीसगढ़ के लिए उड़ान भरने वाले विमान में बैठने से पहले ही परेशान होने लगे थे। जगह-जगह बैरिकेट्स और सुरक्षा के नाम पर रोक-टोक का सिलसिला शुक्रवार को दिन निकलते ही शुरु हो गया था और पूरी सरकार नीतिन के स्वागत करने में इस हद तक मशगूल रही कि उन्हें आम आदमी की पीड़ा नहीं दिखलाई पड़ा। पहले दिन से ही जनता पर कहर बरपाने का जो सिलसिला शुरु हुआ वह तब ही खत्म हुआ जब शनिवार की रात नीतिन गडकरी रवाना हो गए।
नीतिन गडकरी के स्वागत में न केवल आम कार्यकर्ताओं में होड़ मची रही बल्कि मंत्रियों तक में तना-तनी का माहौल रहा। एक दूसरे के लिए बांहे खिंचने वाले प्रदेश स्तरीय नेताओं ने इतना संयम जरूर बरता कि केवल मुंह से ही काम चलाया। हाथ नहीं उठाया वरना तमाशा तो बन ही चुका था। एक तरफ सरकार स्वागत में कोई कमी नहीं उठा रखी थी तो दूसरी तरफ व्यवस्था में पूरा सरकारी तंत्र पलक बिछाये हुए था। राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ फोटो खिंचवाने की होड़ में कई बार धक्का-मुक्की व गाली गलौच भी हुई लेकिन हर बार मामला संभल गया।
शहीदों के लिए समय नहीं...
नीतिन गडकरी के स्वागत में लगी सरकार की संवेदनशीलता कहें या अपने आका को खुश करने की कवायद लेकिन शहीदों और राष्ट्रप्रेम की वकालत करने वाली भाजपा सरकार के पास इतना भी समय नहीं था कि वे बीजापुर में शहीद हुए 5 जवानों पर फूल माला ही चढ़ा दें। जवानों को श्रद्धांजलि देने न मुख्यमंत्री पहुंचे और न ही मंत्रिमंडल का कोई सदस्य ही पहुंचा।
मोहन-मूणत समर्थक भिड़े
वैसे तो प्रदेश के दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल और नगरीय प्रशासन मंत्री राजेश मूणत के बीच लड़ाई जग जाहिर है। गडकरी का स्वागत करने में मची होड़ में वीआईपी रोड पर दोनों मंत्रियों के समर्थक भिड़ गए। पूरा सडक़ जाम हो गया। खुले आम दईया-मईया और लाठी डंडे से हमला शुरु हो गया आधा दर्जन अस्पताल पहुंच गए। अब पुलिस को देखिए इतना होने के बाद भी वह रिपोर्ट का इंतजार कर रही है यदि रिपोर्ट नहीं लिखवाई गई तो क्या 151 के तहत कार्रवाई नहीं हो सकती। इस लड़ाई में पहली बार मूणत समर्थक भारी पड़े और दमदार मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के वे समर्थक पिटे गए जो जमीन या गुण्डागर्दी कर पैसे के बल पर राजनीति कर रहे हैं।
स्टेडियम की सुरक्षा
दूसरे दिन यानी शनिवार को सुभाष स्टेडियम में होने वाले कार्यकर्ता सम्मेलन के लिए जबरदस्त इंतजाम किए गए। सरकारी गुण्डागर्दी जमकर हुई। सुरक्षा के नाम पर आसपास की दुकानें बंद करा दी गई। एक महिला की मटकी की दुकान में तोडफ़ोड़ की गई वह व्यवथित होकर बद्दुआ देते घूम रही थी लेकिन बेचारी पुलिस को तो सरकार का कहना मानना ही है। स्टापर लगाकर सडक़ बंद करने से लोग हलकान थे। जबकि पहले दिन सौदान सिंह के निज सचिव की करतूत जनता देख चुकी थी।
जूदेव कहां गये...
कहने को तो मूंछ के एवज में दिलीप सिंह जूदेव ने डा. रमन सिंह को मुख्यमंत्री बनवाया है। कोरग्रुप के सदस्य और बिलासपुर के सांसद दिलीप सिंह जूदेव की दुश्मनी राष्ट्रीय अध्यक्ष से है या रमन सिंह से यह अंदर की बात है लेकिन पूरे कार्यक्रम और प्रचार तंत्र में जूदेव का न होना चर्चा का विषय रहा है और आने वाले दिनों में इसे लेकर बवाल मचे तो अचरज भी नहीं होना चाहिए।
मंत्रियों को चून-चून कर
अपमानित किया गया...
हम ही हैं कि तर्ज पर चले गडकरी के पूरे कार्यक्रम में केवल डा. रमन सिंह और बृजमोहन अग्रवाल की ही तूती बोल रही थी। मानों छत्तीसगढ़ भाजपा में इनके अलावा किसी की अवकात नहीं है। पैर तुड़वाने वाले सांसद नंदकुमार साय भले अपनी उपेक्षा को खुलकर न कहे लेकिन आम कार्यकर्ताओं में इसे लेकर जमकर चर्चा रही। कार्यकर्ताओं में यह भी चर्चा रही कि सर्वाधिक अपमान ननकीराम कंवर, अमर अग्रवाल और चंद्रशेखर साहू का जानबूझकर किया गया। कार्यक्रम में उपेक्षित रहे इन तीनों मंत्रियों को तो गडकरी के विदाई के दौरान भी एयरपोर्ट पर रोका गया। लेकिन वे अपने अपमान पर कुछ बोलने की स्थिति में भी नहीं दिखे।
कांग्रेसियों को भी पीछे छोड़ा
राष्ट्रीय अध्यक्ष के स्वागत में करोड़ों रुपए फूंकने वाले लोगों ने सपने में नहीं सोचा था कि पार्टी अध्यक्ष के स्वागत में इस तरह से जीभ लपलपाई जाएगी। आम कार्यकर्ता के अध्यक्ष बनने की नसिहत देने वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी के स्वागत में जिस तरह से फूल बरसाए गए, स्तुति गान हुआ वह चापलूसी करने वाले कांग्रेसियों को भी शर्मशार करने वाला बताया जा रहा है। पूरी सरकार जिस तरह से दो दिन नीतिन गडकरी के स्वागत सत्कार में लगी रही वैसा तो अटल-अडवानी के साथ भी नहीं हुआ।

पता नहीं बेटा


पता नहीं बेटा
बेटा - कांग्रेस में इकबाल अहमद रिजवी इन दिनों बेहद नाराज है?
पिताजी - हां बेटा! उन्होंने पार्टी फोरम में चुनावी गफलत को जोर शोर से उठाया भी है।
बेटा - तो कुछ लोग पार्टी फोरम के बाहर जाकर निंदा करने लगे? क्या ऐसे लोगों पर पार्टी कार्रवाई करेगी ?
पिताजी - पता नहीं बेटा।
------------
बेटा - भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के स्वागत की तैयारी जबरदस्त चल रही है।
पिताजी - हां बेटा! गडकरी जी पहली बार छत्तीसगढ़ आ रहे है।
बेटा - तो क्या उन्हें खुश करने की रणनीति का यह सरकारी नुस्खा है?
पिताजी - पता नहीं बेटा।

पटवारी ने जालसाजी कर महिला की जमीन हड़पी

 नई राजधानी क्षेत्र के ग्राम पलौद में पटवारी हल्का नंबर 69/21 राजस्व निरीक्षक मंडल मंदिर हसौद तह. आरंग जिला रायपुर में श्रीमती सावित्री जौजे ज्ञानचंद निवासी शारदा चौक, जोरापारा रायपुर द्वारा वर्ष 2005 में खरीदी गई कृषि भूमि खसरा नं. 9 रकबा 0.30 हेक्टेयर का नामांतरण पटवारी अभिलेख में हो जाने के पश्चात तात्कालीन पटवारी घनश्याम चनद्राकर ने लेनदेन कर श्रीमती सावित्री का नाम काटकर अन्य व्यक्ति का नाम दर्ज कर दिया है, तथा तात्कालीन तहसीलदार आरंग सुश्री सिल्ली थामस को धोखा में रखकर अन्य व्यक्ति का नाम दर्ज करवा दिया है तथा भूमि का रकबा बढ़ाकर 0.68 हेक्टेयर कर दिया है। जबकि श्रीमती सावित्री भूमि खरीदी दिनांक से आज तक भूमि पर कास्त काबिज है। यही नहीं वर्तमान पटवारी अजय उपाध्याय के पास पहुंची तो पटवारी ने उसकी ऋण पुस्तिका को फेंक दिया तथा कहा कि तुम्हारी कोई भूमि ग्राम पलौद में पटवारी अभिलेख में दर्ज नहीं है। बाद में पटवारी ने श्रीमती सावित्री से भूमि पर पुन: नाम दर्ज करने के लिए 50000 रू. की मांग की। श्रीमती सावित्री ने सूचना का अधिकार के अंतर्गत अपनी भूमि का अभिलेख प्राप्त कर उक्त प्राधिकरण में आपत्ति प्रस्तुत की तथा थाना मंदिर हसौद में दोनों पटवारियों एवं अन्य व्यक्ति के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवाई। यहां तक कि पटवारी अजय उपाध्याय ने कलेक्टर के रिकार्ड रूम से ग्राम पलौद के सभी अभिलेखों को प्राप्त करके अपने पास रख लिया है तथा सूचना के अधिकार के अंतर्गत श्रीमती सावित्री को पटवारी ने गलत री नंबरिंग सूची प्रदान कर दी है। अत: कलेक्टर इस संबंध में जांच कर ऐसे पटवारियों को तत्काल निलंबित कर सेवामुक्त करें एवं ऐसे कार्यों की पुनरावृत्ति पर रोक लगावें। यह जानकारी श्रीमती सावित्री ने बुलंद छत्तीसगढ़ को दी।

सोमवार, 6 सितंबर 2010

कैसी सरकार, कैसा न्याय

कैसी सरकार, कैसा न्याय
डॉ. आदिले को क्यों बचा रही है सरकार...
 सब कुछ आईने की तरह साफ है इसके बावजूद डॉ. आदिले पर सरकार कार्रवाई नहीं कर रही है। यह आश्चर्यजनक ही नहीं दुखद है। क्या आप लोगों ने ऐसे सरकार की कल्पना की थी या छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार अपराधियों की मददगार है। स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल भी खामोश है क्यों?
वैसे तो छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह को ‘ढीला परसन’ का तमगा दिया गया है। बेलगाम अधिकारियों की काली करतूत से बेपरवाह छत्तीसगढ़ सरकार के मंत्री अपनी जेब गरम करने में लगे हैं। यही वजह है कि नियमों को ताक में रखकर अपनी बिटिया को मेडिकल कालेज में दाखिला करने वाले डॉ. आदिले के खिलाफ सरकार कार्रवाई करने से हिचक रही है।
डॉ. आदिले पर सिर्फ यही एक आरोप नहीं है इन दिनों वे सहायक प्राध्यापकों की भर्ती में किये गये अनियमितता की वजह से निलंबित है।
क्या ऐसे लोगों को स्वास्थ्य जैसे गंभीर विभागों में रखा जाना चाहिए। एक गलती को भूल कहा जाता है लेकिन जिस तरह के कारनामें इस सरकार के चलते स्वास्थ्य विभाग में हुए है वे सीधे आप लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ है बावजूद सरकार की इस ओर गंभीर नहीं होना भ्रष्टाचार में शामिल होने के संकेत देते हैं।
बताया जाता है कि आल इंडिया मेडिकल बोर्ड ने भी रिपोर्ट दे दी है कि डॉ. आदिले ने गलत ढंग से अपनी बेटी को जगदलपुर मेडिकल कालेज में प्रवेश कराया है अब मुख्यमंत्री निवास में पदस्थ किसी गुप्ता के रिश्तेदार को भी गलत ढंग से मेडिकल में प्रवेश का मामला चर्चा में है। कहा जाता है कि चूंकि इस मामले में मुख्यमंत्री निवास के आला अधिकारी भी कटघरे में है इसलिए डॉ. आदिले के खिलाफ कार्रवाई से सरकार बच रही है।
बहरहाल इस मामले को लेकर स्वास्थ्य मंत्री अमर अग्रवाल की भी थू-थू होने लगी है और यही हाल रहा तो भाजपा की छवि पर भी इसका बुरा असर पड़ेगा।

रविवार, 5 सितंबर 2010

बाबूलाल के बाद नारायण सिंह की बारी...

चोर-चोर मौसेरे भाई...
 आईएएस अधिकारी बाबूलाल अग्रवाल की बहाली की सुर्खियां अभी शांत भी नहीं हो पाई है कि मालिक मकबूजा कांड के आरोपी नारायण सिंह को पदोन्नति देने पूरा रमन सरकार आमदा है। क्या छत्तीसगढ़ भ्रष्ट अधिकारियों की शरण स्थली है?
छत्तीसगढ़ में अफसरों का शासन है या डॉ. रमन सिंह का। यह सवाल अब गली मोहल्ले में गूंजने लगा है। आयकर विभाग के छापे के बाद जिस आनन फानन में बाबूलाल अग्रवाल को सरकार ने बहाल किया था। उसके चर्चे अभी थमें ही नहीं है कि इन दिनों एक और आईएएस अफसर नारायण सिंह चर्चा में है।
इस बार चर्चा की वजह नारायण सिंह को पदोन्नति देने की है। यह वही नारायण सिंह है जिन पर बस्तर में कलेक्टर-कमिश्नर रहते गरीब आदिवासियों की कीमती लकडिय़ों को माफियाओं के साथ सांठ-गांठ करने का आरोप पाया गया था। तब इस चर्चित वन कटाई में नारायण सिंह की संलिप्तता के चलते उनके खिलाफ कार्रवाई भी हुई थी। 93-94 की इस चॢचत मालिक-मकबूजा कांड में नारायण सिंह पर तब सिर्फ तीन वेतनवृद्धि रोकने की कार्रवाई हुई थी।
आश्चर्य का विषय तो यह है कि जून 2010 के बाद से रमन सरकार की ओर से नारायण सिंह को पदोन्नति देने लगातार पत्र व्यवहार किया जाने लगा और पिछले दिनों मुख्य सचिव पी.जाय ओम्मेन की विभागीय पदोन्नति समिति ने नारायण सिंह को पदोन्नति भी दे दी।
अब मामला मंत्रिमंडल के पास है और जिस तरह से सरकार अधिकारियों के हाथों खेल रही है उससे आश्चर्य नहीं कि रमन मंत्रिमंडल भी नारायण सिंह को प्रमुख सचिव के पद पर पदोन्नति को हरी झंडी दे दे।
बहरहाल बाबूलाल अग्रवाल के बाद नारायण सिंह इन दिनों चर्चा में है और आम लोगों में इसकी तीखी प्रतिक्रिया है। ऐसे में सरकार को इस पर फैसला लेना भारी पड़ सकता है।

मंत्री ही नहीं मुख्यमंत्री के पीए से भी सेटिंग...

दंतेवाड़ा शिक्षा अधिकारी का कारनामा...
 मूल सेवा कही नहीं हो तब भी कोई व्यक्ति जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर कैसे बना रह सकता है यह डॉ. एच.आर. शर्मा से सीखा जा सकता है? कहा जाता है कि सेटिंग में माहिर डॉ.शर्मा की विभागीय मंत्री बृजमोहन अग्रवाल ही नहीं विक्रम सिसोदिया से भी जबरदस्त सेटिंग है और इसी वजह से वह पद पर बना हुआ है।
दमदार माने जाने वाले मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के विभागों में जिस दमदारी से भ्रष्टाचार हो रहा है और भ्रष्टाचारियों को संरक्षण मिल रहा है वह दांतों तले ऊंगली दबाने जैसा है। पीडब्ल्यूडी से लेकर पर्यटन और शिक्षा विभाग में भी जिस तरह से दागदार और विवादास्पद व्यक्तियों को प्रमुख पदों पर बिठाया गया है वह शासन की मंशा को भी स्पष्ट करता है।
कवर्धा में मामूली असिस्टेंट प्रोफेसर रहे डॉ. हरे राम शर्मा ने जिस षडय़ंत्र के तहत दंतेवाड़ा शिक्षा अधिकारी के साथ साथ जिला समन्वयक परियोजना अधिकारी का अतिरिक्त प्रभार लिया है वह अच्छे अच्छों का होश उड़ाने के लिए काफी है। बताया जाता है कि हाईकोर्ट द्वारा डॉ. शर्मा का संविलियन रद्द करने के बाद वे किसी भी विभाग में मूल सेवा में नहीं है लेकिन शासन स्तर पर उन्हें संविदा नियुक्ति दी गई। संविदा नियुक्ति किस आधार पर और जिस तरह से आनन-फानन में दी गई उसकी अलग ही कहानी है और कहा जाता है कि उच्च स्तर पर हुई सेटिंग से ही यह संभव हुआ है।
हमारे भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक संविलियन के लिए डॉ. शर्मा ने कवर्धा क्षेत्र के कांग्रेस विधायक के अलावा भाजपा की महिला सांसद का भी सहारा लिया था लेकिन मामला हाईकोर्ट जा पहुंचा और हाईकोर्ट ने उनके संविलियन को रद्द कर दिया। ऐसे में उन्होंने नौकरी से पृथक करने की बजाय उन्हें संविदा नियुक्ति देकर जिला शिक्षा अधिकारी के पद पर किस उद्देश्य से बिठाया गया यह आसानी से समझा जा सकता है।
हालांकि शिक्षा विभाग में विवादास्पद लोगों को महत्वपूर्ण पद पर बिठाना नया नहीं है। बृजमोहन अग्रवाल के शिक्षामंत्री बनते ही तवारिस मैडम की बहाली हुई तो मैडल आर. बाम्बरा को जिला शिक्षा अधिकारी से नवाजा गया। लेकिन ये दोनों शिक्षा विभाग की सेवा में हैं लेकिन डॉ. एच.आर. शर्मा तो शिक्षा विभाग की सेवा में ही नहीं है और ऐसे में उन्हें दंतेवाड़ा की जिम्मेदारी देने की जांच हुई तो सीएम हाऊस पर भी विवाद के छींटे उड़ेंगे।
बहरहाल डॉ. एच.आर.शर्मा के क्रियाकलापों को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं कहा जाता हैकि नक्सलियों की आड़ लेकर यहां बड़े पैमाने पर खपलेबाजी हो रही है खासकर परियोजना समन्वयक में तो भ्रष्टाचार के जबरदस्त चर्चे हैं।