भले ही ऊपरी तौर पर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी का दौरा ठीक-ठाक निपट गया हो लेकिन पार्टी के भीतर राष्ट्रीय अध्यक्ष की चेतावनी से प्रदेश के मुखिया डा. रमन सिंह व पीडब्ल्यूडी मंत्री बृजमोहन अग्रवाल की हालत खराब है। बताया जाता है कि जाते-जाते राष्ट्रीय अध्यक्ष ने दोनों ही नेताओं को सुधर जाने की चेतावनी दी है।
वैसे तो कार्यकर्ता सम्मेलन व सांसदों से मुलाकात के दौरान राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी के संबोधन को लेकर अलग-अलग अर्थ लगाए गए हैं। भाजपा सूत्रों के मुताबिक राष्ट्रीय अध्यक्ष ने सरकार के तमाम प्रयास के बाद भी यह समझ गए हैं कि छत्तीसगढ भाजपा में कहीं कुछ ठीक नहीं चल रहा है। रहा सहा कसर बृजमोहन अग्रवाल और राजेश मूणत के कार्यकर्ताओं के बीच चली खूनी संघर्ष ने पूरी कर दी है।
बताया जाता है कि कार्यकर्ता सम्मेलन के दौरान ही नीतिन गडकरी ने डा. रमन सिंह को चेतावनी दी है कि एक ही चेहरे को बार-बार दिखाने से वोट नहीं मिलते और न ही दो रुपए किलो चावल से ही वोट मिलते हैं। उन्होंने अपरोक्ष रुप से भ्रष्टाचार में लिप्त नेताओं पर भी कटाक्ष किया। सत्ता और संगठन की खामियां भी सामने आई है और उन्होंने सरकार द्वारा संगठन चलाने को लेकर भी नाराजगी व्यक्त की है। जबकि सांसदों की नाराजगी को लेकर भी वे गंभीर दिखे। भाजपा सूत्रों का कहना है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष ने जाते-जाते डॉ. रमन सिंह और बृजमोहन अग्रवाल को चेतावनी दी है कि वे पार्टी हित में सुधर जाएं। हालांकि यह सब पार्टी के एक सांसद ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कहा है लेकिन कहा जाता है कि मारपीट को लेकर भी गडकरी काफी नाराज थे।
http://midiaparmidiaa.blogspot.in/
रविवार, 19 सितंबर 2010
शुक्रवार, 17 सितंबर 2010
मत्स्य पालन के ठेकेदारी में अनुदान राशि हड़पने गणितबाजी
नए ठेकेदारों को हटाने शर्ते, सालों से घटिया सामग्री सप्लाई
सचिव से लेकर मंत्री तक कमीशनखोरी की चर्चा
वैसे तो छत्तीसगढ सरकार के मंत्रियों व सचिवों पर भ्रष्टाचार के आरोप नए नहीं है लेकिन मत्स्यपालन विभाग में गरीबों को नाव व जाल देने के नाम पर जिस तरह से विभाग के अधिकारियों की मदद से ठेकेदार रिंग बनाकर घटिया सामग्री सप्लाई कर रहे हैं वह अंयंत्र देखने को नहीं मिलेगा। ताजा मामला मुरैना से आए ठेकेदार को हटाने के कुचक्र का है और कहा जाता है कि करोड़ों रुपए के इस टेंडर को हासिल करने मंत्री से लेकर सचिव तक कमीशनखोरी हुई है।
जानकारी के अनुसार सरकार ने गरीब मछुआरों को जाल व नाव देने बड़ी राशि अनुदान में देती है और जब से यह योजना शुरु हुई है तब से तीन ठेकेदारों ने रिंग बनाकर काम लेना शुरु किया है। सूत्रों का दावा है कि इस काम में करोड़ों रुपए की हेराफेरी की जाती है और यह सब संचालक के मिलीभगत से होता है। बताया जाता है कि इस बार भी गरीबों को जाल बांटने के लिए शासन ने लंबी चौड़ी अनुदान राशि स्वीकृत की है। इसी के तहत सभी जिलों में मछुआरों को जाल वितरित करना है और इसके लिए मत्स्य पालन विभाग ने पिछले दिनों निविदा का प्रकाशन किया।
बताया जाता है कि सालों से अपना मोनोपल्ली चलाने वाले भी निविदा के लिए पहुंचे लेकिन अचानक मुरैना की एक पार्टी के आगमन ने उनके होश तो उड़ाये ही वे निविदा प्रक्रिया में भाग नहीं लिए। हालांकि चर्चा इस बात की भी है कि निविदा प्रक्रिया से हटने मुरैना की पार्टी 5 लाख का ऑफर भी दिया गया। इसके बाद भी जब मुरैना वाले ने निविदा भरा तो ये लोग बगैर निविदा डाले लौट आए। दरअसल मनमाने कमीशनखोरी के चक्कर में बाजार दर से कई गुना यादा में जाल या नाव सप्लाई की जाती है ऐसे में किसी अनजान पार्टी की मौजूदगी से काम नहीं मिलने का स्पष्ट संकेत था।
बताया जाता है कि नियमानुसार निविदा प्रक्रिया में एक से यादा फर्म होनी चाहिए इसलिए मुरैना के फर्म के अलावा किसी ने जब हिस्सा नहीं लिया तो निविदा निरस्त हो गई। सूत्रों के मुताबिक पुन: निविदा निकाली गई लेकिन षड़यंत्रपूर्वक इसमें दो साल शासकीय सप्लाई सहित कुछ ऐसी शर्ते जोड़ दी गई जिससे मुरैना का फर्म हिस्सा न ले सके। इसकी जानकारी होने पर मुरैना के फर्म ने सचिव डी.एस. मिश्रा से शिकायत की तब दो साल की जगह एक साल शासकीय सप्लाई जोड़ दिया गया।
बताया जाता है कि पिछले सालों में नाव व जाल की सप्लाई में घटिया सामग्री का उपयोग होने से हितग्राही परेशान है और शिकायत करने वालों से कह दिया गया है कि मुफ्त में मिल रही सामग्री की शिकायत की गई तो अगली दफे यह भी नहीं मिलेगा इसलिए शिकायत करने से लोग डरते हैं। वैसे अब तक सलूजा मार्केटिंग रायपुर, फिशरमेन इटारसी और कुमार बनारस की फर्मे ही हिस्सा लेती रही है। इधर यह भी चर्चा है कि मार्केट दर से अधिक कीमत पर माल सप्लाई के एवज में सचिव से लेकर मंडी स्तर तक कमीशन पहुंचाई जाती है। इस मामले में विभागीय मंत्री चंद्रशेखर साहू से संपर्क की कोशिश की गई लेकिन उपलब्ध नहीं थे।
सचिव से लेकर मंत्री तक कमीशनखोरी की चर्चा
वैसे तो छत्तीसगढ सरकार के मंत्रियों व सचिवों पर भ्रष्टाचार के आरोप नए नहीं है लेकिन मत्स्यपालन विभाग में गरीबों को नाव व जाल देने के नाम पर जिस तरह से विभाग के अधिकारियों की मदद से ठेकेदार रिंग बनाकर घटिया सामग्री सप्लाई कर रहे हैं वह अंयंत्र देखने को नहीं मिलेगा। ताजा मामला मुरैना से आए ठेकेदार को हटाने के कुचक्र का है और कहा जाता है कि करोड़ों रुपए के इस टेंडर को हासिल करने मंत्री से लेकर सचिव तक कमीशनखोरी हुई है।
जानकारी के अनुसार सरकार ने गरीब मछुआरों को जाल व नाव देने बड़ी राशि अनुदान में देती है और जब से यह योजना शुरु हुई है तब से तीन ठेकेदारों ने रिंग बनाकर काम लेना शुरु किया है। सूत्रों का दावा है कि इस काम में करोड़ों रुपए की हेराफेरी की जाती है और यह सब संचालक के मिलीभगत से होता है। बताया जाता है कि इस बार भी गरीबों को जाल बांटने के लिए शासन ने लंबी चौड़ी अनुदान राशि स्वीकृत की है। इसी के तहत सभी जिलों में मछुआरों को जाल वितरित करना है और इसके लिए मत्स्य पालन विभाग ने पिछले दिनों निविदा का प्रकाशन किया।
बताया जाता है कि सालों से अपना मोनोपल्ली चलाने वाले भी निविदा के लिए पहुंचे लेकिन अचानक मुरैना की एक पार्टी के आगमन ने उनके होश तो उड़ाये ही वे निविदा प्रक्रिया में भाग नहीं लिए। हालांकि चर्चा इस बात की भी है कि निविदा प्रक्रिया से हटने मुरैना की पार्टी 5 लाख का ऑफर भी दिया गया। इसके बाद भी जब मुरैना वाले ने निविदा भरा तो ये लोग बगैर निविदा डाले लौट आए। दरअसल मनमाने कमीशनखोरी के चक्कर में बाजार दर से कई गुना यादा में जाल या नाव सप्लाई की जाती है ऐसे में किसी अनजान पार्टी की मौजूदगी से काम नहीं मिलने का स्पष्ट संकेत था।
बताया जाता है कि नियमानुसार निविदा प्रक्रिया में एक से यादा फर्म होनी चाहिए इसलिए मुरैना के फर्म के अलावा किसी ने जब हिस्सा नहीं लिया तो निविदा निरस्त हो गई। सूत्रों के मुताबिक पुन: निविदा निकाली गई लेकिन षड़यंत्रपूर्वक इसमें दो साल शासकीय सप्लाई सहित कुछ ऐसी शर्ते जोड़ दी गई जिससे मुरैना का फर्म हिस्सा न ले सके। इसकी जानकारी होने पर मुरैना के फर्म ने सचिव डी.एस. मिश्रा से शिकायत की तब दो साल की जगह एक साल शासकीय सप्लाई जोड़ दिया गया।
बताया जाता है कि पिछले सालों में नाव व जाल की सप्लाई में घटिया सामग्री का उपयोग होने से हितग्राही परेशान है और शिकायत करने वालों से कह दिया गया है कि मुफ्त में मिल रही सामग्री की शिकायत की गई तो अगली दफे यह भी नहीं मिलेगा इसलिए शिकायत करने से लोग डरते हैं। वैसे अब तक सलूजा मार्केटिंग रायपुर, फिशरमेन इटारसी और कुमार बनारस की फर्मे ही हिस्सा लेती रही है। इधर यह भी चर्चा है कि मार्केट दर से अधिक कीमत पर माल सप्लाई के एवज में सचिव से लेकर मंडी स्तर तक कमीशन पहुंचाई जाती है। इस मामले में विभागीय मंत्री चंद्रशेखर साहू से संपर्क की कोशिश की गई लेकिन उपलब्ध नहीं थे।
गुरुवार, 16 सितंबर 2010
पर्यटन में मोहन समर्थकों पर कहर
देर से ही सही पर्यटन विभाग में घोटालेबाजों और विवादास्पद अधिकारी-कर्मचारियों पर कार्रवाई होनी शुरु हो गई है। पर्यटन मंडल को करोडों रुपए चूना लगने के बाद अधिकारियों की नींद खुली है और कहा जाता है कि पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के दबाव के बाद भी एमजी श्रीवास्तव, अजय श्रीवास्तव सहित आधा आधा दर्जन लोगों के खिलाफ कार्रवाई हुई है।
उल्लेखनीय है कि पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के कार्यकाल में पर्यटन मंडल में जबरदस्त घपलेबाजी का खेल खेला गया। रोप वे कानून के नाम पर बगैर नाम पता के किसी को दो करोड़ दे दिया गया तो मोटल निर्माण, बाउंड्री निर्माण और घास लगाने के ठेके में करोड़ों रुपए का व्यारा-न्यारा हुआ है। यही नहीं प्रचार-प्रसार और विज्ञापन के नाम पर भी पर्यटन में जबरदस्त घोटाले हुए हैं। बहुचर्चित स्टेशनरी घोटाले में तो आरोपी अफसर संजय सिंह पर रिकवरी निकालने के अलावा कोई कार्रवाई करने की बजाय उन्हें परिवहन जैसे कमाऊ विभाग में भेज दिया गया।
इसी तरह भौमिक, एमजी श्रीवास्तव और अजय श्रीवास्तव को पर्यटन मंत्री का खास होने की वजह से अब तक बचाए जाने की चर्चा रही है। सूत्रों की माने तो एमजी श्रीवास्तव नामक अधिकारी पर कई गंभीर आरोप भी लगे। चरित्र के अलावा धन कमाने जैसे चर्चे पर्यटन मंडल में आए दिन चलते रहे हैं। लेकिन उच्च स्तरीय दबाव के चलते कार्रवाई को टाला जाता रहा है।
बताया जाता है कि आईएफएस तपेश झा ने जब यहां कार्यभार संभाला तो उसके होश उड़ गए और उन्होंने बगैर किसी दबाव के भौमिक को सबसे पहले चलता किया फिर एमजी श्रीवास्तव को भी मंत्रालय भिजवा दिया। इसके बाद दुग्ध संघ से पुलिस होते पर्यटन मंडल पहुंचे अजय श्रीवास्तव को निलंबित किया गया। बताया जाता है कि बृजमोहन अग्रवाल के इस करीबी अजय श्रीवास्तव दुग्ध संघ में बाबू रहा है और बृजमोहन अग्रवाल उन्हें अपने विभागों में ले जाते रहे हैं। सिमगा कांड उछलने के बाद भी और उनके संविलियन गलत ढंग से किए जाने को लेकर भी अजय श्रीवास्तव पर किसी ने कार्रवाई की हिमाकत नहीं की थी।
यह अलग बात है कि तपेश झा के मोहन समर्थकों के खिलाफ की गई कार्रवाई से कुछ गलत भी हुआ है और कुछ एक को प्रमोशन मिल गया है लेकिन मोहन समर्थकों पर गिरी गाज को लेकर कई तरह की चर्चा है। बताया जाता है कि इस मामले से बृजमोहन अग्रवाल काफी रुष्ट भी है लेकिन वे अपने समर्थकों को यह आश्वस्त करने में सफल रहे हैं कि भटगांव चुनाव के बाद कुछ हो सकता है। बहरहाल बृजमोहन अग्रवाल के दम पर उचकने वाले दूसरे विभाग के अफसरों के लिए भी इसे चेतावनी के रुप में देखा जा रहा है और इसकी शहर में जबरदस्त चर्चा है।
उल्लेखनीय है कि पर्यटन मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के कार्यकाल में पर्यटन मंडल में जबरदस्त घपलेबाजी का खेल खेला गया। रोप वे कानून के नाम पर बगैर नाम पता के किसी को दो करोड़ दे दिया गया तो मोटल निर्माण, बाउंड्री निर्माण और घास लगाने के ठेके में करोड़ों रुपए का व्यारा-न्यारा हुआ है। यही नहीं प्रचार-प्रसार और विज्ञापन के नाम पर भी पर्यटन में जबरदस्त घोटाले हुए हैं। बहुचर्चित स्टेशनरी घोटाले में तो आरोपी अफसर संजय सिंह पर रिकवरी निकालने के अलावा कोई कार्रवाई करने की बजाय उन्हें परिवहन जैसे कमाऊ विभाग में भेज दिया गया।
इसी तरह भौमिक, एमजी श्रीवास्तव और अजय श्रीवास्तव को पर्यटन मंत्री का खास होने की वजह से अब तक बचाए जाने की चर्चा रही है। सूत्रों की माने तो एमजी श्रीवास्तव नामक अधिकारी पर कई गंभीर आरोप भी लगे। चरित्र के अलावा धन कमाने जैसे चर्चे पर्यटन मंडल में आए दिन चलते रहे हैं। लेकिन उच्च स्तरीय दबाव के चलते कार्रवाई को टाला जाता रहा है।
बताया जाता है कि आईएफएस तपेश झा ने जब यहां कार्यभार संभाला तो उसके होश उड़ गए और उन्होंने बगैर किसी दबाव के भौमिक को सबसे पहले चलता किया फिर एमजी श्रीवास्तव को भी मंत्रालय भिजवा दिया। इसके बाद दुग्ध संघ से पुलिस होते पर्यटन मंडल पहुंचे अजय श्रीवास्तव को निलंबित किया गया। बताया जाता है कि बृजमोहन अग्रवाल के इस करीबी अजय श्रीवास्तव दुग्ध संघ में बाबू रहा है और बृजमोहन अग्रवाल उन्हें अपने विभागों में ले जाते रहे हैं। सिमगा कांड उछलने के बाद भी और उनके संविलियन गलत ढंग से किए जाने को लेकर भी अजय श्रीवास्तव पर किसी ने कार्रवाई की हिमाकत नहीं की थी।
यह अलग बात है कि तपेश झा के मोहन समर्थकों के खिलाफ की गई कार्रवाई से कुछ गलत भी हुआ है और कुछ एक को प्रमोशन मिल गया है लेकिन मोहन समर्थकों पर गिरी गाज को लेकर कई तरह की चर्चा है। बताया जाता है कि इस मामले से बृजमोहन अग्रवाल काफी रुष्ट भी है लेकिन वे अपने समर्थकों को यह आश्वस्त करने में सफल रहे हैं कि भटगांव चुनाव के बाद कुछ हो सकता है। बहरहाल बृजमोहन अग्रवाल के दम पर उचकने वाले दूसरे विभाग के अफसरों के लिए भी इसे चेतावनी के रुप में देखा जा रहा है और इसकी शहर में जबरदस्त चर्चा है।
नवभारत का दबाव या सूचना कानून की अनदेखी...
छत्तीसगढ में किस तरह से सूचना के अधिकार कानून की धाियां उड़ाई जा रही है। बड़े लोगों के दबाव अफसरों पर किस कदर हावी है और नियम कानून की धाियां खुले आम उड़ाई जा रही है।
ताता मामला नवभारत के जमीन आबंटन से जुड़ा है। बताया जाता है कि नियमानुसार पट्टा मिलने के बाद ही निर्माण किया जा सकता है लेकिन नवभारत ने सिर्फ अग्रिम आधिपत्य पर न केवल भवन बना लिया बल्कि पट्टे की शर्तों का उल्लंघन करते हुए भवन के एक हिस्से को किराए से भी दे दिया। जानकारी के अनुसार 85-86 में नवभारत को पट्टा देने का निर्णय लिया गया था। लेकिन उसने सालों बितने के बाद भी करोड़ों रुपए नहीं पटाए। निगम से लेकर नजूल के अफसर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और नवभारत ने अपने पहुंच के चलते भवन तक बना दिया।
दुखद स्थिति तो यह है कि इस दौरान नजूल से लेकर निगम ने सैकड़ों दफे अवैध निर्माण के खिलाफ अभियान चलाया लेकिन नवभारत पर किसी की नजर नहीं गई। जबकि आम लोगों तक में नवभारत के इस करतूत की चर्चा होती रही। नवभारत का दबाव किस कदर हावी है यह सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के जवाब से जाना जा सकता है। इस संबंध में जब हमें पता चला कि नवभारत के मामले में प्रशासनिक रुप से जबरदस्त घपलेबाजी चल रही है और अभी भी नवभारत को पट्टा नहीं मिला है तब इसके लिए सूचना के अधिकार के तहत आवेदन लगाया गया।
सूत्रों के मुताबिक इस आवेदन से नजूल से लेकर शासन स्तर पर हड़कम्प मच गया और इस कानून के तहत सीधी-सीधी जानकारी देने की बजाय सूचना अधिकारी ने एक लाईन में यह जवाब दे दिया कि यह मामला सचिव राजस्व एवं आपदा प्रबंधक विभाग के पास मंत्रालय रायपुर में है। बताया जाता है कि सूचना के अधिकार कानून के तहत आम लोगों को जानकारी नहीं देने या फिर घुमाफिराकर जवाब देने का यह इकलौता मामला नहीं है अब तक दर्जनों के खिलाफ सिर्फ जुमाने की ही कार्रवाई की गई है। जबकि पूरे प्रदेश में इस कानून की जमकर धाियां उड़ाई जा रही है। बताया जाता है कि जब भी किसी रसूखवाले के संबंध में जानकारी मांगी जाती है लीपापोती का खेल खेला जाता है। हमारे भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक नवभारत के मामले में भी इसी तरह का खेल खेला गया है और अवैधानिक कृत्य के खिलाफ कार्रवाई की बजाय सरकार के स्तर पर लीपापोती की जा रही है।
ताता मामला नवभारत के जमीन आबंटन से जुड़ा है। बताया जाता है कि नियमानुसार पट्टा मिलने के बाद ही निर्माण किया जा सकता है लेकिन नवभारत ने सिर्फ अग्रिम आधिपत्य पर न केवल भवन बना लिया बल्कि पट्टे की शर्तों का उल्लंघन करते हुए भवन के एक हिस्से को किराए से भी दे दिया। जानकारी के अनुसार 85-86 में नवभारत को पट्टा देने का निर्णय लिया गया था। लेकिन उसने सालों बितने के बाद भी करोड़ों रुपए नहीं पटाए। निगम से लेकर नजूल के अफसर हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे और नवभारत ने अपने पहुंच के चलते भवन तक बना दिया।
दुखद स्थिति तो यह है कि इस दौरान नजूल से लेकर निगम ने सैकड़ों दफे अवैध निर्माण के खिलाफ अभियान चलाया लेकिन नवभारत पर किसी की नजर नहीं गई। जबकि आम लोगों तक में नवभारत के इस करतूत की चर्चा होती रही। नवभारत का दबाव किस कदर हावी है यह सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी के जवाब से जाना जा सकता है। इस संबंध में जब हमें पता चला कि नवभारत के मामले में प्रशासनिक रुप से जबरदस्त घपलेबाजी चल रही है और अभी भी नवभारत को पट्टा नहीं मिला है तब इसके लिए सूचना के अधिकार के तहत आवेदन लगाया गया।
सूत्रों के मुताबिक इस आवेदन से नजूल से लेकर शासन स्तर पर हड़कम्प मच गया और इस कानून के तहत सीधी-सीधी जानकारी देने की बजाय सूचना अधिकारी ने एक लाईन में यह जवाब दे दिया कि यह मामला सचिव राजस्व एवं आपदा प्रबंधक विभाग के पास मंत्रालय रायपुर में है। बताया जाता है कि सूचना के अधिकार कानून के तहत आम लोगों को जानकारी नहीं देने या फिर घुमाफिराकर जवाब देने का यह इकलौता मामला नहीं है अब तक दर्जनों के खिलाफ सिर्फ जुमाने की ही कार्रवाई की गई है। जबकि पूरे प्रदेश में इस कानून की जमकर धाियां उड़ाई जा रही है। बताया जाता है कि जब भी किसी रसूखवाले के संबंध में जानकारी मांगी जाती है लीपापोती का खेल खेला जाता है। हमारे भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक नवभारत के मामले में भी इसी तरह का खेल खेला गया है और अवैधानिक कृत्य के खिलाफ कार्रवाई की बजाय सरकार के स्तर पर लीपापोती की जा रही है।
बुधवार, 15 सितंबर 2010
47 के आंकड़े नहीं बढ़े तो...
छत्तीसगढ में जब विधानसभा का चुनाव हुआ था तब भाजपा ने 50 सीट जीतकर सत्ता में वापसी की थी। डॉ. रमन सिंह की बढ़ाई में कसीदे गढ़े गए और इसके बाद वैशालीनगर में हुए उपचुनाव में भाजपा को 50 से 49 में ला पटका। जिस चावल योजना से वह सत्ता में आने की बात कह रही थई वही योजना वैशालीनगर में फेल हो गया। चावल योजना से त्रस्त मध्यम वर्ग ने वैशालीनगर में भाजपा को उखाड़ फेंका। हालांकि इसके पीछे बिहारियों के खिलाफ किए गए विष वमन भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया।
भाजपा के दो विधायकों के असमायिक निधन ने उन्हें 49 से 47 में ला पटका है। फिलहाल तो भटगांव में ही उपचुनाव है। कहने को तो भाजपा यहां से स्व. त्रिपाठी की पत्नी रजनी त्रिपाठी को उतारकर सहानुभूति वोट लेने के फेर में हैं। जबकि कांग्रेस की राजनीति पहल और उनके विरोधियों के बीच जा टिकी है। भटगांव विधानसभा क्षेत्र कई मामले में वैशालीनगर की तरह समानता रखता है। भटगांव भी नई सीट है और यहां भी सरोज पाण्डेय की तरह स्व. त्रिपाठी जी लम्बे अंतराल से जीत दर्ज की थी। यहां भी कांग्रेस की अंदरुनी राजनीति वैशालीनगर की तरह अस्त-व्यस्त रही और इसका फायदा मुख्य चुनाव में भाजपा को मिला।
वैशालीनगर की तरह यहां भी बिहारी वोटरों की संख्या महत्वपूर्ण है ऐसे में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के बयान की यहां चर्चा हुई तो भाजपा को बिहारी वोटरों के कोपभाजन का शिकार होना पड़ सकता है। सबसे महत्वपूर्ण भूमिका तो सरकार की चावल योजना का है। इस योजना से मध्यम वर्ग त्रस्त है। मध्यम वर्ग का मानना है कि इस योजना की वजह से मजदूरों के भाव बढ़ गए हैं। खेती किसानी से लेकर घरेलु काम में दिक्कतें आ रही हैं जबकि एक बड़ा वर्ग महंगाई की प्रमुख वजह चांवल योजना को मानता है। ऐसे में मध्यम वर्ग की नाराजगी का असर वैशालीनगर की तरह हुआ तो भाजपा यहां भी मुसीबत में फंस सकती है।
इसके अलावा सरकार की शराब नीति से महिलाओं में जबरदस्त आक्रोश है। गांव-गांव में शराब ने आम लोगों की शांति भंग कर दी है। वैशालीनगर चुनाव ें यह मुद्दा कारगर रहा है और महिलाओं के बड़े वर्ग द्वारा भाजपा से नाराजगी की चर्चा है इसके अलावा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी के दौरे के दौरान आदिवासियों की उपेक्षा भी भटगांव चुनाव में असर डाल सकती है। हालांकि भाजपा अपने 47 के अंक से आगे जाने की हरसंभव कोशिश में है क्योंकि यह अंक सरकार के लिए कभी भी मुसिबत खड़ी कर सकता है इसलिए स्व. त्रिपाठी की पत्नी रजनी त्रिपाठी को टिकिट देकर वह सहानुभूति वोट तो अर्जित करना चाहती ही है बृजमोहन अग्रवाल जैसे दमदार मंत्री को प्रभारी बनाकर साम-दाम-दंड भेद की नीति भी अख्तियार करना चाहती है। ज्ञात हो कि बृजमोहन अग्रवाल की छवि पैसे फेंकने के अलावा जोड़-तोड़ में माहिर की है।
भटगांव चुनाव में सरकारी अंधेरगर्दी के किस्से तो अभी से सुनाई पड़ने लगे है। लोगों को बरगलाने सरकारी प्रयास की शुरुआत 6 सितम्बर से पहले भी दिखाई देने लगा था। पूरी सरकार झोंकी गई तो आम लोगों को क्या दिक्कतें होती है यह नीतिन गडकरी के दौरे में राजधानी के लोगों ने नजदीक से देखा है।
भाजपा के दो विधायकों के असमायिक निधन ने उन्हें 49 से 47 में ला पटका है। फिलहाल तो भटगांव में ही उपचुनाव है। कहने को तो भाजपा यहां से स्व. त्रिपाठी की पत्नी रजनी त्रिपाठी को उतारकर सहानुभूति वोट लेने के फेर में हैं। जबकि कांग्रेस की राजनीति पहल और उनके विरोधियों के बीच जा टिकी है। भटगांव विधानसभा क्षेत्र कई मामले में वैशालीनगर की तरह समानता रखता है। भटगांव भी नई सीट है और यहां भी सरोज पाण्डेय की तरह स्व. त्रिपाठी जी लम्बे अंतराल से जीत दर्ज की थी। यहां भी कांग्रेस की अंदरुनी राजनीति वैशालीनगर की तरह अस्त-व्यस्त रही और इसका फायदा मुख्य चुनाव में भाजपा को मिला।
वैशालीनगर की तरह यहां भी बिहारी वोटरों की संख्या महत्वपूर्ण है ऐसे में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के बयान की यहां चर्चा हुई तो भाजपा को बिहारी वोटरों के कोपभाजन का शिकार होना पड़ सकता है। सबसे महत्वपूर्ण भूमिका तो सरकार की चावल योजना का है। इस योजना से मध्यम वर्ग त्रस्त है। मध्यम वर्ग का मानना है कि इस योजना की वजह से मजदूरों के भाव बढ़ गए हैं। खेती किसानी से लेकर घरेलु काम में दिक्कतें आ रही हैं जबकि एक बड़ा वर्ग महंगाई की प्रमुख वजह चांवल योजना को मानता है। ऐसे में मध्यम वर्ग की नाराजगी का असर वैशालीनगर की तरह हुआ तो भाजपा यहां भी मुसीबत में फंस सकती है।
इसके अलावा सरकार की शराब नीति से महिलाओं में जबरदस्त आक्रोश है। गांव-गांव में शराब ने आम लोगों की शांति भंग कर दी है। वैशालीनगर चुनाव ें यह मुद्दा कारगर रहा है और महिलाओं के बड़े वर्ग द्वारा भाजपा से नाराजगी की चर्चा है इसके अलावा भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतिन गडकरी के दौरे के दौरान आदिवासियों की उपेक्षा भी भटगांव चुनाव में असर डाल सकती है। हालांकि भाजपा अपने 47 के अंक से आगे जाने की हरसंभव कोशिश में है क्योंकि यह अंक सरकार के लिए कभी भी मुसिबत खड़ी कर सकता है इसलिए स्व. त्रिपाठी की पत्नी रजनी त्रिपाठी को टिकिट देकर वह सहानुभूति वोट तो अर्जित करना चाहती ही है बृजमोहन अग्रवाल जैसे दमदार मंत्री को प्रभारी बनाकर साम-दाम-दंड भेद की नीति भी अख्तियार करना चाहती है। ज्ञात हो कि बृजमोहन अग्रवाल की छवि पैसे फेंकने के अलावा जोड़-तोड़ में माहिर की है।
भटगांव चुनाव में सरकारी अंधेरगर्दी के किस्से तो अभी से सुनाई पड़ने लगे है। लोगों को बरगलाने सरकारी प्रयास की शुरुआत 6 सितम्बर से पहले भी दिखाई देने लगा था। पूरी सरकार झोंकी गई तो आम लोगों को क्या दिक्कतें होती है यह नीतिन गडकरी के दौरे में राजधानी के लोगों ने नजदीक से देखा है।
मंगलवार, 14 सितंबर 2010
घर तो छोड़िये, भगवान को भी नहीं छोड़ा...
अपनी करनी छुपाने सरकारी विज्ञापन के मार्फत खजाना लुटाने की कोशिश में छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राय में अखबार की बाढ़ आ गई है। बड़े प्रतिष्ठित माने जाने वाले अखबार बिरादरी की आमद ने पत्रकारों का भाव तो बढ़ाया ही है आम लोगों को परेशान कर दिया है। सुबह से शाम तक घूम रह सर्वे टीम ने घरों का चैन छिन लिया है। कभी अखबार की स्कीम समझाई जाती है तो कभी दरवाजों पर विज्ञापन बोर्ड लगाने पहुंच जाते हैं। अब अखबार वालों से पंगा कौन लें सो अखबार वाले मनमानी पर उतर आए है। धर नहीं हुआ अखबार का प्रचार तंत्र हो गया है। घरों में घर मालिक का बोर्ड लगा हो या न लगा हो अखबारों का विज्ञापन बोर्ड जरूर लग गया है। इसके एवज में मुफ्त में अखबार भी नहीं दिया जा रहा है। हालांकि कुछ कालोनी में विज्ञापन के एवज में अखबार मांगने की सुगबुगाहट हैं।
घरों को तो छोड़िए दैनिक भास्कर ने तो अपने प्रचार के लिए मंदिरों को भी नहीं बख्शा है। राजधानी रायपुर के तो प्राय: सभी मंदिरों में उनके विज्ञापन बोर्ड लगे है। दो-पांच सौ रुपए खर्च करने में ऐसा प्रचार कहां मिलेगा। वहीं कोई कंपनी बोर्ड लगा देती तो हिन्दुओं के कथित रक्षक पिल पड़ते लेकिन अखबार वालों के इस कारनामे पर किसी का मुंह नहीं खुलता। मंदिर वाले भी क्या करें। समझ सब रहे हैं लेकिन अखबारी दादागिरी के खिलाफ बोलने की हिम्मत किसमे हैं।
पत्रिका का भास्कर पर प्रहार
अभी नेशनल लुक के वार से दैनिक भास्कर संभल भी नहीं पाया था कि पत्रिका ने हमला बोल दिया नेशनल लुक ने संपादकीय विभाग पर हमला किया था तो पत्रिका ने मैनेजमेंट की बजा दी। भास्कर में सरकारी विज्ञापन की देखरेख करने वाले प्रकाश सौरे पत्रिका में स्टेट हेड हो गए है जबकि सरकुलेशन संभालने वाले सुरेन्द्र मिश्रा और गोविन्द ठाकरे को भी पत्रिका ने तोड़ लिया है।
चंदू का इलेक्ट्रानिक मीडिया प्रेम
स्मार्ट कहलाने वाले चंद्रप्रकाश जैन ने किन परिस्थितियों में नवभारत छोड़ नईदुनिया की राह पकड़ी थी यह तो वही जाने लेकिन लगता है उन्हें भी अब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का ग्लैमर भाने लगा है तभी तो वे जी-24 वाईन कर गए। अब चर्चा तो कई तरह की है चर्चा का क्या कहें।
अजय सक्सेना पत्रिका में
कार्टून बनाते-बनाते कार्टून की हालत में पहुंच चुके अजय सक्सेना का अपने फिल्ड में कोई जवाब नहीं है। लेकिन वेतन जहां यादा होगा वहीं काम करेंगे के तर्ज पर अब वे पत्रिका पहुंच गए हैं।
राजेश सोनकर हरिभूमि में
फोटोग्राफी अच्छी है पर स्थापित होने की चाह में लगे राजेश सोनकर हरिभूमि पहुंच गए हैं। देर आए दुरुस्त आए की तर्ज पर
शशांक देशबंधु पहुंचे
युगबोध प्रकाशन की पत्रकारिता से हाइवे में संपादक बनने वाले शशांक शर्मा अब देशबंधु पहुंच गए हैं। यह अलग बात है कि उनके देशबंधु पहुंचने से कई लोगों को दिक्कतें शुरु हो गई है।
और अंत में...
नवभारत को ठेके पर लेने का दावा करने वाले रंगा-बिल्ला अब उस एडवरटाईजर्स को ढूंढ रहे हैं जिन्होंने ठेके पर लेने की खबर को लीक कर प्रचारित किया है। बेचारा स्वयं को बचाने सफाई देते घूम रहा है।
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