शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

करोड़ों दबाने वाले को पुलिस ने सिर्फ तीन लाख लेकर छोड़ दिया

कम्प्लेन नहीं थी इसलिए नहीं पकड़ने का बहाना
राजधानी में शासन-प्रशासन के नाक के नीचे एक व्यक्ति फर्जी फाईनेंस कम्पनी का कारोबार चलाकर फिर आम लोगों को करोड़ों रुपया हड़प कर निकल गया। पुलिस के आला अधिकारी की जानकारी में यह बात भी आ गई लेकिन उसे पकड़ने की बजाय उससे सिर्फ तीन-साढ़े तीन लाख रुपए लेकर छोड़ दिया गया। इस कंपनी के संचालक शिवकुमार शर्मा के पार्टनर मदनमोहन राये सेट्टी व उसके पुत्र तक को पुलिस गिरफ्तार करने से बच रही है।
शिवसेना प्रमुख धनंजय सिंह परिहार के होटल में डांस बार चलाने के एवज में डीडी नगर पुलिस का पैसा खाने का मामला अभी शांत भी नहीं हुआ है कि राजधानी के ही मौदहापारा थाने पर तीन-साढ़े तीन लाख रुपए लेकर नटवरलाल शिवकुमार शर्मा को छोड़ देने का मामला चर्चा में है। राजधानी में फर्जी फाइनेंस कंपनी चलाकर लोगों से ठगी करने का यह पहला मामला नहीं है लेकिन पुलिस द्वारा किस तरह से ऐसे अपराधों को बढ़ावा दिया जा रहा है और कैसे पकड़ में आए अपराधियों को पैसा लेकर छोड़ा जा रहा है यह पहली बार प्रकाश में आया है।
प्राप्त जानकारी के मुताबिक राजस्थान से आकर शिवकुमार शर्मा नामक एक व्यक्ति ने यहां रिटायर्ड शासकीय इंजीनियर मदनमोहन राये सेट्टी से संपर्क किया और फिर श्री सेट्टी के ऋषभ काम्प्लेक्स स्थित 210 नम्बर के कार्यालय में वैष्णव फायनेंस कंपनी का आफिस डाला। इसके बाद उसने वहां कुछ कर्मचारी रखे और आसानी से फाईनेंस कराने का यहां के प्रतिष्ठित माने जाने वाले दैनिकों में विज्ञापन प्रकाशित किया। बताया जाता है लगातार विज्ञापन प्रकाशित होने की वजह से लोगों ने फाईनेंस के लिए वैष्णव फाईनेंस से संपर्क किया जहां मदन मोहन सेट्टी के पुत्र व स्टाफ की लड़कियाें ने लोगों से फाइनेंस के एवज में एक निश्चित रकम जमा कराना शुरु कर दिया। यह खेल महीनेभर ही चला था कि यहां कार्यरत अनिमेष दुबे को इस कंपनी के कामकाज पर संदेह हुआ तो उन्होंने क्राईम स्क्वाड प्रभारी श्री साहू को इसकी मौखिक जानकारी दी।
बताया जाता है कि बुधवार को क्राईम स्क्वाड ने तत्काल इसकी जानकारी क्राईम एसपी अजात शत्रु और एडिशनल एसपी लाल उमेंद सिंह को दी और इनकी सलाह पर मौदहापारा थाना प्रभारी व स्टाफ के साथ ऋषभ काम्प्लेक्स स्थित दफ्तर में छापा मारा गया। जहां से शिवकुमार शर्मा को थाना बुलाया गया। इसके बाद क्राईम विभाग ने अपने को अलग कर लिया। पुलिस की इस कार्रवाई के बाद शिवकुमार शर्मा थाना पहुंचा और यही से लेन-देन का खेल शुरु हुआ। बताया जाता है कि यहां शिवकुमार ने पांच-पांच सौ के सात गड्डी आफिस से मंगाया और थोड़ी देर में उसे छोड़ दिया गया।
इधर दूसरे दिन यानी गुरुवार को जब शिवकुमार दिनभर आफिस नहीं आया सके बसककककतो स्टाफ को संदेह हुआ वहीं शाम को पैसा जमा करने वालों के बीच फुसफुसाहट होने लगी कि कंपनी फर्जी है और बुलंद छत्तीसगढ़ के पत्रकार भी वहां पहुंच गए। तभी वहां मदनमोहन राये सेट्टी व उसके पुत्र ने यह कहते हुए आफिस बंद कर दी कि आफिस बंद होने का समय हो गया है जो भी पूछताछ करनी है कल कर लेना। इधर जब शिवकुमार शर्मा से उसके मोबाईल नम्बर 9754752682 में संपर्क किया गया तो उन्होंने भी अपने आप को सच्चा बताते हुए दूसरे दिन आफिस में मुलाकात करने की बात कही। चूंकि पूरा मामला संदेह से भरा था इसलिए जब यहां कार्यरत स्टाफ से चर्चा की गई तो पुलिस कार्रवाई और लेन-देन का मामला सामने आया।
इसके बाद जब दूसरे दिन शुक्रवार को आफिस नहीं खुला तो संदेह यकीन में बदलने लगा तब बुलंद छत्तीसगढ़ ने मदनमोहन राये सेट्टी के न्यूशांतिनगर स्टेट बैंक के पीछे स्थित निवास में संपर्क किया तो वहां फायनेंस कंपनी के कर्मचारी मिले और हमसे बताया गया कि बाप-बेटे अपने वकील के पास गए हैं। ताकि फायनेंस कंपनी के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई जा सके और दोपहर में मौदहापारा थाने में इनके द्वारा लिखित में शिकायत कर दी गई। इधर स्टाफ से बातचीत से पता चला कि कंपनी में मदनमोहन राये सेट्टी के पुत्र बैठते थे और पूरी लेन-देन वही करते थे। स्टाफ के लोगों ने शक जाहिर किया कि वे भी पार्टनर थे और अपने को बचाने पुलिस में शिकायत की गई है। इधर इस संबंध में जब मौदहापारा प्रभारी श्री टंडन से पूछताछ की गई तो उन्होंने कहा कि चूंकि किसी ने कम्प्लेन नहीं की थी इसलिए कार्रवाई नहीं की गई।
इधर कंपनी के पार्टनर सेट्टी से बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने कहा कि शिवकुमार उसके किरायेदार हैं और उनका पुत्र वहां नौकरी करता था जबकि उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि वे रोज क्या करने आफिस जाते थे। उन्होंने कहा कि वे एसपी को भी शिकायत कर चुके हैं और पैसे की उन्हें कोई जानकारी नहीं है। इधर पता चला है कि कंपनी ने करीब चार सौ लोगों को चूना लगाया है और उनसे करीब तीन करोड़ रुपए लेकर फरार हो गया है। इधर इस मामले में पुलिस की करतूत पर कर्मचारी दुखी है कि पहले से जानकारी देने के बाद भी शिवकुमार से पैसे खाकर छोड़ दिया गया जबकि सेट्टी बाप-बेटे भी इस साजिश में हिस्सेदार हैं जिनके खिलाफ पुलिस कार्रवाई नहीं कर रही है?
ढाई लाख रुपए कहां गए...
गुरुवार की शाम जब बुलंद के पत्रकार फायनेंस कम्पनी के दफ्तर पहुंचे तब वहां ढाई लाख रुपए जमा थे और कहा जाता है कि इस रुपए को मदनमोहन सेट्टी के पुत्र अपने साथ ले गए लेकिन जब इन्होंने पुलिस में इस फर्जीवाड़े की शिकायत की तब इस रुपए का जिक्र ही नहीं किया। जबकि आफिस की चाबी इन्हीं के पास है और ताला बंद इन्हीं लोगों ने किया है। इससे भी संदेह होता है कि पूरे मामले में सेट्टी बाप-बेटे शामिल रहे हैं?
बार डांस से महिना
तपन का आव भगत
छत्तीसगढ़ पुलिस की करतूत पहली बार उजागर नहीं हुआ है। यदि शिवसेना प्रमुख के होटल में एश करने पहुंचे भाजपाध्यक्ष के पुत्र की पिटाई नहीं होती तो डांस बार अब भी चलते रहता क्योंकि यहां से पुलिस को करीब एक लाख रुपए महिना जाता था। इसी तरह तपन सरकार गिरोह के आवभगत का मामला भी लोग भूले नहीं है और इस मामले में देवेन्द्र नगर का हीरो अभी भी बचा हुआ है। यह मामले राजधानी पुलिस की अपराधियों से गठजोड़ की कहानी के लिए काफी है।

शुक्रवार, 8 अक्टूबर 2010

अपराध से गठजोड़

छत्तीसगढ़ कभी शांत इलाका माना जाता था। तब यहां की पुलिस पर अपराधियों से गठजोड़ के आरोप नहीं लगते थे। कभी राजनैतिक दबाव में अपराधियों को छोड़ना पड़ जाए तो बात अलग थी लेकिन राय बनने के बाद जिस तरह से थानों की बोली लगने लगी है उसके बाद तो संगठित अपराध के क्षेत्र में ईजाफा हुआ है। एक तरफ थाने की भारी भरकम बोली और दूसरी ओर नक्सली जिले में पदस्थापना के खौफ ने यहां के कानून व्यवस्था की धाियां उड़ा दी है। अब राजधानी में ही पुलिस वाले अपराधियों से किस तरह से गलबट्टियां कर रहे हैं यह आम आदमी तक को मालूम हो गया है। हाल ही में शिव सेना प्रमुख धनंजय सिंह परिहार के होटल में हुई मारपीट के बाद तो स्पष्ट हो गया कि पुलिस किस तरह से राजधानी को अपराध का गढ़ बनाना चाहती है।
इस होटल में बगैर अनुमति के महिनों से डांस बार चल रहा था। शहर के हर व्यक्ति को मालूम था लेकिन पुलिस यह कहे कि उनकी जानकारी में नहीं थी तो यह कोई भरोसा नहीं करेगा। बल्कि यह डांस बार चलाने के एवज में जिस तरह से थाने से लेकर वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को पैसा दिया जाता था। इसके अलावा यहां आए दिन होने वाली मारपीट को निपटाने का काम भी पुलिस करते रही है। वह तो भाजपा अध्यक्ष प्रभाष झा के बेटे की करतूत थी जो मामला उपर तक जा पहुंचा और पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ गई वरना पुलिस तो पहले ही पैसे के बोझ में इस अनैतिक कार्य को प्रोत्साहन कर रही थी। ऐसा नहीं है कि इस तरह का संरक्षण पहली बार दिया गया है। कभी अन्नू-नब्बू का मामला शहर को मालूम है कि किस तरह से पुलिस उनके खिलाफ कार्रवाई करती थी। देवेन्द्र नगर के एक अर्धशासकीय कर्मी की दादागिरी को भी शहर देख रहा है जमीन से होटल और केबल से सुपारी देने के आरोप किसी से छिपा नहीं है। थानों में जब रिपोर्ट ही नहीं लिखी जाए तो ऐसे लोगों के हौसले तो बढ़ेंगे ही।
राजधानी बनने के बाद अपराध बढ़ा है। शांत माने जाने वाले इस क्षेत्र में जमीन से लेकर अन्य क्षेत्रों में वर्चस्व की लड़ाई बढ़ी है और इन्हें नेताओं से लेकर पुलिस वालों की ओर से खाद-पानी दिया जा रहा है। खुलेआम रंगदारी के किस्से भी आने लगे हैं। पैसों के बल पर और राजनैतिक संरक्षण ने जिस तरह से राजधानी के शांत फिजां में आग लगाने का काम किया है वह आगे जाकर गंभीर हो जाएंगे। सबसे यादा बोली लगने वाले थानों पर क्या किसी ने निगाह डाला है कि यहां दूसरे प्रदेश से आए अपराधी किस तरह से फल-फूल रहे है। वहां से फिर ये शहर की ओर कूच करते हैं और शहर के नामचीन कहलाते हैं। राजनैतिक संरक्षण हो या पुलिसिया गठजोड़ कम से कम खुलासे के बाद तो कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन बेशर्मी की हदें पार हो चुकी है अपना उल्लू सीधा करना हो तो मामूली सट्टे की खबर पर थानेदार निलंबित कर दिए जाते हैं लेकिन यदि पैसे फेंके जाए तो डांस बार और जानलेवा हमले के बाद भी थाने वाले बख्श दिए जाते हैं। छत्तीसगढ़ में चल रहे इस अंधेरगर्दी की हालत यह है कि जब पुलिस अधिकारी ही दागदार हो तो आम आदमी अपनी सुरक्षा की गुहार किससे करे।

बुधवार, 6 अक्टूबर 2010

विकास का मतलब सिर्फ अमीरों व शहरों को सुविधा...

छत्तीसगढ़ में बैठी सरकार के लिए विकास के मायने सिर्फ और सिर्फ शहरों व अमीरों को सुविधा देना रह गया है। डॉ. रमन सिंह और उसकी पूरी सरकार भले ही विकास के दावे करते रहे लेकिन गांव वालों के लिए आज भी विकास दुरह सपना बस है।
क्या सरकार बता पाएगी कि इन 7 वर्षों में सड़क पर जितने खर्च किए है उसके मुकाबले किसानों के खेतों में पानी पहुंचाने की कितनी व्यवस्था हुई है। किसान इन दिनों सरकार की करतूतों को लेकर आंदोलित है। कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू छत्तीसगढ़ियां व किसान होते हुए भी कुछ नहीं कर रहे हैं वे कुछ करना भी चाहे तो कुर्सी का मोह उन्हें कुछ करने नहीं दे रहा है। छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए मौत का वारंट जारी करने का दावा करने वाले किसान नेता भी अपनी ढुलमुल नीति और स्वार्थ में लगे हैं। वे सरकार को किसान विरोधी तो बताते हैं लेकिन अपने को राजनैतिक उद्देश्य से दूर रखने भाजपा के खिलाफ कुछ भी करने से अपने को अलग करते हैं। सर्वत्र स्वार्थ ने इस नए नवेले छत्तीसगढ़ को विकास से दूर कर दिया है। पेड़ के नीचे विधानसभा लगाने का दावा करने वाले नेता अब नई राजधानी के निर्माण में अरबों रुपया खर्च कर रहे हैं। अधिकाधिक सुविधा जुटाने की कोशिश में लगे नौकरशाहों के साथ मिलकर शहरी विकास की ओर अधिक ध्यान दिया जा रहा है।
लगातार जोत की जमीन कम होते जा रही है। कभी राजधानी के नाम पर तो कभी शहर और कस्बों के नाम पर या तो उद्योगों के विस्तार के लिए खेती की जमीनें किसानों से छिनी जा रही है। कौड़ियों के मोल किसानों की जमीनों को उद्योगों को दिया जा रहा है और इसे ही विकास बताये जा रहे हैं। दरअसल सीधे-साधे छत्तीसगढ़ियों के साथ जिस तरह से सरकार खेल रही है वह अत्यंत दुर्भाग्यशाली है और नए नवेले राय के विकास को सालों पीछे ढकेलने वाली है।
हमने लगातार यह जानने की कोशिश की कि आखिर ग्रामीण विकास के लिए सरकार की नीति क्या है लेकिन जितने खर्च शहरों के विस्तार और सड़कों के विस्तार पर सरकार का ध्यान है उसके मुकाबले 2 फीसदी भी सरकार की रूचि नहीं हैं। छत्तीसगढ ग़ांवों का प्रदेश है यहां की एक बड़ी आबादी गांवों पर निर्भर है ऐसे में गांवों में सुविधा नहीं देने का क्या मतलब लगाना चाहिए। यदि सरकार का दावा विकास है तो क्या उनके पास इस सवाल का जवाब है कि सिर्फ सड़कें बना देने से गांवों का विकास हो जाता है बल्कि गांवों तक सड़क बनाने का मतलब शोषण के नए रास्ते खोलना है। पानी के अभाव में किसानी से त्रस्त किसानों को रुपयों का लालच देकर जमीन खरीदने की एक बड़ी साजिश तो नहीं है? ताकि अपने घर से बेघर हो सके।
किसानों से चुनाव पूर्व किए गए 270 रुपए बोनस का वादा निभाने की बात तो दूर नलकूप खनन पर प्रतिबंध लगा दिया गया ताकि बिजली न देना पडे। चांपा-जांजगीर जैसे सिंचित क्षेत्रों की जमीनें उद्योगों को बिजली बनाने कौड़ियों के मोल दी जा रही है। ऐसे में किसानों का आंदोलन कर रहे लोगों को जिला बदर की तैयारी करते प्रशासनिक अमले क्या प्रदेश को नई दिशा देना चाहते हैं यह तो सरकार को ही बताना होगा।

फिर लुटोत्सव मनाने में लगी सरकार

मोहन की लीला निराली
छत्तीसगढ़ियों की है लाचारी
संस्कृति विभाग फिर दलाली खाने सक्रिय
 भटगांव उपचुनाव निपटते ही प्रदेश सरकार ने एक बार फिर लुटोत्सव बनाम रायोत्सव की तैयारी में करोड़ों रुपए फूंकने की योजना बना ली है। इसके लिए बाहर के कलाकारों को करोड़ों रुपए देने की योजना भी बना ली है और इस काम में प्रदेश के दमदार माने जाने वाले मंत्री बृजमोहन अग्रवाल के संस्कृति विभाग ने छत्तीसगढियां विरोधी रुख को एक बार फिर कायम रखते हुए जो तैयारी की है वह घोर आपत्तिजनक मानी जा रही है।
वैसे तो रायोत्सव के नाम पर लुटोत्सव मनाने की संस्कृति विभाग की परम्परा नई नहीं है। बाहर के बड़े कलाकारों को बुलाकर दलाली खाने में एक मंत्री की भाई की सक्रियता सदैव चर्चा में रही है। इस बार भी इस मंत्री भाई ने अभी से लाखों कमाने की रणनीति बना ली है और इसी के तहत इस लुटोत्सव को भव्य बनाने की तैयारी जोर-शोर से चल रही है। बताया जाता है कि पिछली बार तो एक बड़े कलाकार से दलाली को लेकर मंत्री भाई की न केवल इस कलाकार से बल्कि संस्कृति आयुक्त से भी ठन चुकी है और इस भाई को बर्दाश्त नहीं कर पाने वाले ने इस बार फिर एक होकर लुटोत्सव मनाने का निर्णय लिया है।
रायोत्सव में स्थानीय कलाकारों को जिस तरह से उपेक्षित किया जाता है उसे लेकर खूब हो-हल्ला मच चुका है और कई कलाकारों ने तो संस्कृति मंत्री पर छत्तीसगढ़ियां विरोधी होने का आरोप तक लगा चुके हैं। उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ में प्रतिभाओं की कमी नहीं है लेकिन इन प्रतिभाओं को जानबूझकर कम पारिश्रमिक दिया जाता है। जिन कवियों को प्रदेश के बाहर कार्यक्रम देने पर हजारों रुपए दिए जाते हैं उन्हें भी यहां पांच सौ हजार में निपटाने की कोशिश होती है जिसकी वजह से स्वाभिमानी कलाकार इस आयोजन से दूर रहते हैं। इस बार भी संस्कृति विभाग ने के.आर. रहमान से थीम सांग बनाने का निर्णय लिया है जबकि अमीर खान और अन्य बड़े स्टार कलाकारों को बुलाने की कोशिश हो रही है। इसके एवज में जमकर दलाली की कोशिश भी च रही है और इस बार यह तैयारी भी है कि झगड़े की बजाय दलाली बांट ली जाए क्योंकि पिछली बार झगड़े के चक्कर में मंत्रीजी की छिछालेदर हो चुकी है।
इधर छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने छत्तीसगढियों की उपेक्षा का आरोप अभी से मढ़ना शुरु कर दिया है। इन कलाकारों का कहना है कि एक तरफ यहां की प्रतिभाओं का राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर पर पूछ-परख बढ़ी है तथा रायोत्सव जैसे कार्यक्रम में बाहरी प्रदेश के कलाकारों को बुलाने का औचित्य नहीं है। इन कलाकारों ने कहा कि यदि रायोत्सव के लिए थीम सांग बनवाना ही था तो राय सरकार स्थानीय कलाकारों से कह सकती थी जिससे इस मिट्टी की खुशबू को दूर-दूर तक ले जायी जा सकती है। उन्होंने संस्कृति विभाग के इस रुख की आलोचना करते हुए कहा कि यह सब मंत्री के इशारे पर हो रहा है ताकि छत्तीसगढ़ियों की उपेक्षा कर उन्हें हतोत्साहित किया जा सके।
कलाकारों ही नहीं कई लोगों ने चर्चा में कहा कि रायोत्सव के कार्यक्रम में केवल स्थानीय कलाकारों के कार्यक्रमों का प्रदर्शन होना चाहिए ताकि हम अपनी कला का प्रदर्शन से देश-दुनिया का ध्यान आकृष्ठ कर सके। यदि रायोत्सव जैसे कार्यक्रम में दूसरे प्रदेश के कार्यक्रम किए जाएंगे तो हमारे कलाकारों को और कब मौका मिलेगा। बहरहाल संस्कृति विभाग और संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल पर रायोत्सव बनाम लुटोत्सव को लेकर जिस तरह से छत्तीसगढियों की उपेक्षा का आरोप लग रहा है उससे आने वाले दिनों में गंभीर परिणाम आ सकते हैं।

सोमवार, 4 अक्टूबर 2010

जोगी का बयान भारी पड़ा कांग्रेस को...

भटगांव में भाजपा का कब्जा बरकरार
 भटगांव विधानसभा के उपचुनाव में प्रदेश के प्रथम मुख्यमंत्री अजीत जोगी का बड़बोलापन कांग्रेस प्रत्याशी के लिए भारी पड़ा बताया जाता है कि श्री जोगी के 2010 में सरकार बनाने के दावा वाले बयान की वजह से कांग्रेस को करारी शिकस्त मिली।
भटगांव विधानसभा के उपचुनाव में वैसे तो भाजपा ने रजनी त्रिपाठी को उतारकर पहले ही सहानुभूति वोट की तैयारी कर ली थी लेकिन कांग्रेस में एकजुटता के चलते भाजपा खेमे में बैचेनी छा गई थी। हालांकि भाजपा के चुनाव प्रभारी ने अपने कांग्रेसी समर्थकों के सहारे जीत हासिल करने में कोई कसर बाकी नहीं रखा था और कांग्रेसी भीतरघात के चक्कर में लगे रहे। इसी बीच अजीत जोगी का सरकार बनाने का दावा संबंधी बयान ने रही सकी कसर भी पूरी कर ली और टक्कर दे रही कांग्रेस इस बयान के बाद कोसो पीछे चली गई।
जोगी के इस बयान की कांग्रेसियों में जबरदस्त चर्चा रही और कहा जाता है कि यह बयान भीतरघात से भी खतरनाक साबित हुआ। जबकि इस बयान की तुलना कांग्रेस नेता राजेन्द्र तिवारी के उस बयान से की जाने लगी थी जिसमें श्री तिवारी ने अटल बिहारी वाजपेयी के पिता का नाम पूछ लिया था और धनेन्द्र साहू को खड़ाउ बताया था। बहरहाल श्रीमती रजनी त्रिपाठी की जीत से जहां रमन सिंह मजबूत हुए हैं वहीं कांग्रेसी खेमें में मायूसी बढ़ गई है।

फैसला जो नहीं हो सका...!

 60 साल पुराने राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर एक ऐसा फैसला आया जिसकी उम्मीद कतई नहीं की गई थी। लेकिन जिस तरह से आजादी के लिए बंटवारा स्वीकार किया गया उसी तरह अमन के लिए भी बंटवारा स्वीकार किया गया। तथ्य अब भी चिख रहे हैं। गवाहों के मुंह पर ताला जड़ दिया गया और तीनों पक्षकारों को विवादित जमीन बांट दी गई।
आम तौर पर जमीन विवाद पर जब भी फैसला हुआ है तब जमीन एक पक्ष को ही गया है। भाई बंटवारे को छोड़ दें तो यह फैसला न्यायालयीन इतिहास में नई ईबादत के साथ पढ़ी जाएगी। हालांकि अब भी दो पक्ष इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी लगाने आतुर हैं और नैसर्गिक न्याय तार-तार होता दिख रहा है। दरअसल राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का जिस तरह से भाजपा ने राजनैतिक फायदे के लिए इसका इस्तेमाल किया उसके बाद तो इस विवाद को लेकर आम लोगों में चिढ़ सी हो गई थी। सभी चाहते थे जैसा भी हो, जो भी हो इसका निपटारा हो जाए। जज की कुर्सी पर बैठे तीनों लोग भी आम लोगों की भावना को समझ रहे थे और देश हित की जिम्मेदारी भी उन पर यादा हावी रही तभी तो ऐसा फैसला आया जो वास्तव में न्याय की नई ईबादत के रुप में हमेशा पढ़ी जाएगी।
ऐसा नहीं है कि सिर्फ बंटवारे का निर्णय हुआ है। दो मजहबों में बढ रही दूरियों को भी कम करने का इस निर्णय ने हिन्दुस्तान को एक मजबूत राष्ट्र के रुप में स्थापित करने की चेष्टा भी की है। मेरी इस बात से कई लोग असहमत भी हो सकते हैं लेकिन जब भी ऐसे विवाद हो उसे तूल देने की बजाय सरकार को आगे बढ़कर फैसले लेने चाहिए। मुगल सल्तनत और अंग्रेजों की गुलामी ने इस देश को कई हिस्सों में बांट दिया है। धर्म-जाति की लड़ाईयों ने भले ही कुछ राजनैतिक दलों को लाभ पहुंचाया हो लेकिन यह सब तत्कालीन रहा है। दूरगामी तो सिर्फ नुकसान ही हुआ है।
धर्म और जाति के झगड़ों से अब भी रोज लोग मर रहे हैं और सिर्फ लोग नहीं मरते हैं परिवार समाज और राष्ट्र मरता है। यही हुआ है। इस लड़ाई के जिम्मेदार वे नेता है जिन पर देश में सुकून-अमन कायम करने की जिम्मेदारी है। अयोध्या से इस देश को या भाजपा को या सुन्नी बोर्ड को क्या मिला यह तो वही जाने लेकिन इस झगड़े ने क्या खोया यह सबके सामने हैं। इलाहाबाद के लखनऊ बेंच का फैसला नि:संदेह स्वागत योग्य है और इस फैसले के परिपेक्ष्य में धर्म को लेकर विवादित सभी जमीनें मामले खत्म कर देने चाहिए और जो लोग इस फैसले को नहीं मानते उस विवादित जगह को सरकार को अधिग्रहण कर स्कूल-अस्पताल बना देना चाहिए।
ये दो स्थल ऐसे हैं जहां हर धर्म के लोग एक साथ बैठते हैं अपनी तकलीफें बांटते हैं। ताकि फिर कोई भाजपा या सुन्नी बोर्ड इस देश के लोगों को मरवाने की कोशिश न करे। अयोध्या का फैसला राम-रहिम की मर्जी से हुआ है वे भी चाहते हैं कि धर्म की लड़ाई बंद हो जाए और इसलिए देश के दूसरे हिस्सों का विवाद भी ऐसा ही सुलझ जाए क्योंकि बगैर उनकी मर्जी का पत्ता भी नहीं खड़कता।

दिशा कॉलेज को बचाने का मतलब...

बच्चों से भरी बस पलटी, कई बस कंडम
पिछले दिनों जेल रोड में दिशा कॉलेज की बस पलट गई। हालांकि इस घटना से सवार छात्रों को यादा चोटें नहीं आई लेकिन प्रशासन ने इस मामले के रफा-दफा में जिस तरह की तेजी दिखाई है वह कई संदेहों को जन्म देता है।

घटना की वजह बस का पट्टा टूट जाना है। ऐसे में कॉलेज प्रबंधन के खिलाफ कार्रवाई की बजाय बस चालक के खिलाफ ही मामूली धारा लगा दी गई। वास्तव में इस मामले में बस चालक से यादा दोषी कॉलेज प्रबंधक है क्योंकि बस पलटने की वजह बस का कंडम होना है। हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों के मुताबिक दिशा कॉलेज की कई बसें बेहद पुरानी है और रंग रोगन कर इसे चलाया जा रहा है। लगता है प्रशासन को किसी बड़ी घटना का इंतजार है।