रविवार, 3 अप्रैल 2011

हम तो सरे राह लिये बैठे हैं चिंगारी,जिसका जी चाहे चिरागों को जला ले जाए...





पता नहीं छत्तीसगढ़ में पत्रकारिता का कैसा दौर चल रहा है। अखबार मालिक तो सरकारी विज्ञापनों की लालच में फंसे हैं। पत्रकारिता से उनका कोई सरोकार नहीं रह गया है। दमदार पत्रकारों को अपने मतलब के लिए रखते हैं और युज एंड थ्रो की नीति बना रखे हैं।

विज्ञापन की बाढ़ ने अखबारों की बाढ़ ला दी है।राजधानी में पत्रकार कहलाने वालों कि संख्या में बेतहाशा इजाफा हुआ है और इसके साथ ही वसूली बाजों कि भी भरमार हो गई है। भ्रष्ट अधिकारी व मंत्री बेहिसाब भ्रष्टाचार कर पैसे बांट रहे हैं और वसूली बाजों की निकल पड़ी है।

यही वजह है कि अखबारों की बाढ़ तो आई ही है। इलेक्ट्रानिक मीडिया का आई डी लेकर घुमने वालों की संख्या भी बढ़ गई है।

वसूली बाजों की हिम्मत इतनी बढ़ गई है कि वे अपने मतलब के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं।

उनकी हिम्मत का इससे बड़ा उदाहरन और क्या होगा कि पिछले दिनों कुछ वसूली बाज वरिष्ठ पत्रकार आसिफ इकबाल के घर पहुंच गये और अपने साथ एक वर्दी वाले को भी ले जाकर तीन लाख रुपये की मांग कर बैठे।

आसिफ इकबाल जैसे वरिष्ठ पत्रकार जिन्होंने अपने जीवन में पत्रकारिता का नया आयाम रचा हो। शासन-प्रशासन में जिनकी तूती बोलती हो जिनके सामने आज भी हमारे जैसे जूनियर पत्रकार बैठेने की हिमाकत न कर सके। ऐसे पत्रकार से वसूली के लिए पहुंचना कई सवाल खड़े करता है।

आसिफ इकबाल पत्रकारिता जगत का ऐसा नाम है जिनके तेवर से 6 साल पहले तक के पत्रकार अच्छी तरह जानते हैं। उनके जैसे पत्रकारों की लेखनी और सोच की वजह से ही छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता का पूरा देश में नाम रहा है। अच्छे-अच्छे अखबार मालिक तक उनकी खुशामद करते रहे हैं और इस शहर में पदस्थ अधिकारी हो या नेता,उद्योगपति हो या समाजसेवी सभी उनके कम के कायल रहे हैं।

लेकिन इस घटना ने पत्रकारिता के वर्तमान स्थिति को रेखांकित कर दिया है। और यही हाल रहा तो ईमानदार पत्रकारों को अधिकारी या गलत काम करने वाले धमकाने लगेंगे और भ्रष्ट अधिकारियों के संरक्षन में वसूली बाज मजा करते रहेंगे।



और अंत में ...

राजधानी में पत्रकारों की बढ़ती मांग के बावजूद नेशनल लुक के बंद हो जाने के बाद भी कुछ पत्रकार काम पर नहीं लग पा रहे हैं। वजह को लेकर चर्चा सुननी हो तो ‘ प्रेस क्लब अच्छा स्थान है।

मंगलवार, 29 मार्च 2011

पॉलीथीन के खिलाफ

आज पूरा विश्व पालीथीन से होने वाले नुकसान से त्रस्त हैं और ऐसे ढेरों संगठन हैं जो पॉलीथीन के खिलाफ अभियान छेड़े हुए हैं लेकिन इसके बाद भी समस्या जस की तस बनी हुई है। छत्तीसगढ़ में तो इसके दुष्प्रभाव दिखने भी लगा है। खासकर शहरी क्षे˜त्र में इसके दुष्परिनाम से आम आदमी ˜त्रस्त हैं। सज़ई व्यवस्था का तो बुरा हाल है नालियां आए दिन जाम हो जाती है और नाली की गंदगी सड़को पर फ़ैल रहा है। इसका दूसरा परिनाम मवेशियों पर पड़ रहा है। खासकर दुधारू पशुओं को इससे बेहद नुकसान हो रहा है।

सरकार इसके बाद भी प्रतिबंध नहीं लगा रही है? सामाजिक संगठनों को जरुर इसकी चिंता है और वे अपने-अपने ढंग से इसके खिलाज़् अभियान चलाये हुए हैं ममता शर्मा के संगठन ने राजिमकुम्भ के दौरान इसके दुष्परिनाम को देखते हुए अपने संगठन के माध्यम से अभियान भी चलाया।

मैं मेरे एक ऐसे मित्र को जानता हूँ जो इस अभियान से जुड़े हुए हैं। आशुतोष मिश्र और उनकी पूरी फैमिली पालीथीन के विरोधी हैं और वे बाजार झोला लेकर ही जाते हैं। पालीथीन के खिलाफ उनके इस अभियान को साधू वाद ऐसे ही बहुत से लोग हैं जिन्होंने पालीथीन के खिलाफ उनका अभियान जारी रहेगा और वे स्व प्रेरना से इसके दुष्परिनाम के खिलाफ न केवल लड़ाई लड़ रहे हैं बल्कि लोगों में जागरन भी पैदा कर रहे हैं।

लेकिन सरकार में बैठे अफसर अपनी कमाई के चत्र में कोई ठोस योजना नहीं बना रहे हैं वे अपनी जेब भरने जन जागरन जैसी बातों का सहारा लेकर अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ रहे हैं और आने वाली पीढ़ी को एक नये झंझट में डाल रहे हैं।

पॉलीथीन के दुष्परिनाम से सभी वाकिफ हैं। बावजूद इसका उपयोग धडल्ले से हो रहा है। शायद इसकी वजह लोगों की जीवन शैली है जो केवल कानून और डंडे का भाषा समझती है। सरकार को भी अब फैसला लेना होगा। और इसके खिलाफ कड़े कानून बनाने होंगे। वरना पालीथीन से पट रहे धरती में पर्यावरन प्रदूषन विकराल रुप लेकर सुनामी जैसी त्रासदी को जन्म देगा और हम सभी हाथ मलते रह जायेंगे।

रविवार, 27 मार्च 2011

आदिवासियों पर अत्याचार,कहाँ है सरकार ?

दक्षिन बस्तर में अराजकता, आदिवासियों के तीन सौ घर फूंके गए, ग्रामीनो की बेरहमी से पिटाई, महिलाओं से बलात्कार , कलेक्टर-कमिश्नर रोके गए। यह हेड लाईन छत्तीसगढ़ के प्रमुख समाचारपत्रों की है जो छत्तीसगढ़ सरकार के क्रिया-कलापों को उजागर ही नहीं कराती बल्कि धुर नक्सली छेत्र में नारकिय जीवन जी रहे आदिवासियों की जिंदगी को भी रेखां-कित करती है और यह सब स्थिति लाने वाली कोई और नहीं छत्तीसगढ़ में बैठी भाजपा की वह सरकार है जिसके मुखिया डा. रमन सिंह की छवि को साफ सुथरा प्रचारित की जाती है। बस्तर के हालात -किस कदर बेकाबू हो गए है यह बताने डॉ. रमन सिंह के सात सालों के आकडें¸ ही काफी है।


डा. रमन सिंह के कुर्सी संभालने के बाद बस्तर के लगभग 500 ग्राम उजड़ गए और हजारों नहीं बल्कि लाखों की संख्या मे आदिवासी शरणार्थी शिविरों में जीवन जीने मजबूर है।

कभी अमेरीका के विकास को लेकर कहा जाता था की वहां लाखों की संख्या में रेड इंडियन (आदिवासियो) को काट डाला गया।

क्या बस्तर में आदिवासियों के साथ सरकार और उसके अफसर ऐसा ही कुछ नहीं कर रहे हैं? क्या तीन गांवों ताड़मटेला, तिमापुर और मोरपल्ली में तीन सौ घरों को फूंके जाने की घटना के बाद भी कोई यह कह सकेगा की वहां सब कुछ ठीक है और सरकार में बैठे अफसर आदिवासियों पर अत्याचार नहीं कर रहे हैं।

घटना के बाद मुख्यमंत्री के निर्देश पर प्रभावित छेत्र में जा रहे कलेक्टर-कमिश्नर को पुलिस सुरक्षा के नाम पर रोका जाना क्या अराजकता नहीं है।

वहां की खबर लेकर लौट रहे मीडिया कर्मियों के खिलाफ मामूली घटना को लेकर रिपोर्ट दर्ज करने से लेकर पुरुषों से मारपीट और महिलाओं से बलात्कार की गूंज के बाद भी क्या सरकार यही कहेगी क़ि छत्तीसगढ़ में अफसरों का राज नहीं है।

ऐसा नहीं है क़ि निरीह आदिवासियों पर पुलिस की गुंडागर्दी की छत्तीसगढ़ में पहली बार गूंज उठी है इसी सरकार में ऐसे कई बार पुलिस प्रताड़ना व फर्जी मुठभेड़ की आवाज उठते रही है पर क्या हुआ ?

सवाल और भी -कई हैं। जिसका जवाब भले ही सरकार न दे लेक़िन एक बात तय है क़ि आदिवासियों पर हुए अत्याचार पर काग्रेसियों की चुप्पी की सजा उन्हें भी मिलेगी। उपर वाला तो है ही।

सरकार इस घटना के बाद क्या करेगी?

नक्सली क़िसी दूसरे देश में नहीं आये हैं वे हमारे ही देश के हैं और हमारी ही व्यवस्था के सताये हुए हैं। भूख,बेरोजगारी, बीमारी और गरीबी के मारे हुए हैं वहां सड़कें नहीं हैं ऐसी जगह में रहने वाले लोग हथियार उठा रहे हैं। व्यवस्था के खिलाफ उस के खिलाफ जो उन्हें कुछ नहीं देता। उनसे सहानुभूति रखना गलत बात नहीं है। ब्यूरोक्रेसी में भी ऐसे लोग हैं जो उन पर सहानुभूति रखता है क्योंकि व्यवस्था से सताये लोगों पर सहानुभूति नहीं रखना भी बहुत बड़ा अपराध है।

रमन सरकार को छत्तीसगढ़ के विकास माडल को दोबारा नए सिरे से तय करना चाहिए वरना यह आग और भड़केगी। कल उड़ीसा के डी एम अगवा हुए हैं और उन्हें छुड़ाने नक्सलियों की मांगे माननी पड़ी। कल डी आई जी से लेकर मंत्री तक अगवा किये जा सकते हैं। उड़ीसा के बहाने सारे देश के मुख्यमंत्री को सोचना पड़ेगा की व्यवस्था नहीं बदली तो आप या आपके बच्चे उन लोगो के चंगुल में फंस जायेंगे जो भूख बीमारी और बुनियादी सुविधा पाने लड़ रहे हैं यह खतरे की घंटी है, इसलिए जो लोग सत्ता में बैठे हैं उन्हें चाहिए --की सुविधा सिर्फ शहरों तक न हो गांवो को भी सुविधा संपन्न बनायें। कम से कम पीने का साफ पानी, सिंचाई की सुविधा व स्वास्थ्य -शिक्षा के मॉडल नये सिरे से बनायें।

घटना पर किसने क्या कहा

डॉ. रमन सिंह (मुख्यमंत्री)-जाँच के लिए कह दिया है.

अजीत प्रमोद जोगी- यह घोर निंदनीय कृत्य है विधानसभा कमेटी की संयुक्त समिति से जांच होनी चाहिए।

स्वामी अग्निवेश (सामाजिक कार्यकर्ता )- पुलिस ज्यादती की न्यायिक जांच होनी चाहिए क्योंकि दंडाधिकारी जांच पर भरोसा नहीं। तभी लोग नक्सली बनते हैं!

विश्वरंजन (डीजीपी)- पुलिस व जिला प्रशासन दोनों सरकार की एजेंसी है अनबन नहीं। जांच कर रहे हैं।

श्रीनिवासलू (बस्तर कमिश्नर)- हमारा पहला मकसद प्रभावितों को राहत पहुंचाना है। गलतफहमी की वजह से रोका गया।

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

पत्रकारिता का नया अनुभव

 वैसे तो आदमी जीवन भर कुछ न कुछ सीखते रहता है। पत्रकारिता  में भी यही सब होता है। रोज नए तरह की  खबरों को  नए तरह से शब्दों  में पिरोना और कुछ न कुछ सीखना लगा रहता है।

वैसे मैंने पत्रकारिता को कभी भी जीविकोपार्जन का  साधन नहीं माना और न ही खबरों को  रोकने की  ही कोशिश  की  लेकिन शायद अब पत्रकारिता का  ढंग बदल चुका  है। यही वजह है की कभी भी दिक्कते  भी आ जाती है यह उन सभी लोगों के  साथ आती है जो पत्रकारिता को  दिल से लगाकर चलते हैं।

ताजा मामला रामकृष्ण  के  भरोसे केयर करने वाले इस अस्पताल का  है जहां विज्ञापन देने के  नाम पर बुलाया जाता है। जहां पहुंचने पर विज्ञापन की  वजाय इस अस्पताल के खिलाफ  छपने वाली खबरों पर इस तरह चर्चा की  जाती है जैसे खबर ही गलत हो। डा€टर की  बजाय उनकी  पत्नी का  व्यवहार अपमानजनक  तो था ही उनकी  भाव भंगिमा भी अपमानजनक  रही। रोकर अपनी बातें रखी गई इस दौरान वहां मौजूद एक  बुजुर्ग द्वारा मानहानि की  धमकी  भी दी गई।

वैसे तो मुझे मुंह फट कहा  जाता है लेकिन  एक  महिला को  रोते हुए चिल्लाना और अपनी मेहनत का  बखान करना सचमुच मुझेस्तब्ध कर  देने वाला था। कभी नहीं डरने का  दावा करने वाला मैं इस अचानक  आये परिस्थिति से डर भी गया। पूरी घटना  के  दौरान ठाकुरराम साहू जेसे वरिष्ठ पत्रकार  भी साथ में थे।

महिला का  विलाप और एक  तरह से दुव्र्यवहार व धमकी  ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया की मुझसे गलती कहां हो गई। विज्ञापन के  बहाने बुलाकर इस तरह का  दुव्र्यवहार कीतना उचित था यह तो पाठक  ही तय  रेंगे।

जबकी - खबर गलत थी तो वे सीधे मुझसे शलीन शब्दों  में बात कर सकते थे या मानहानि का दावा भी ठोंक सकते  थे।

मैंने उस महिला को  यह भी समझाने की  कोशिश की  मैं गलत नहीं हूँ मेरे पास जो सबूत थे और मृतक के  पिता का  कथन इलाज में खर्च की  गई और आपके  द्वारा लौटाई गई राशि ही खबर का  प्रमुख  आधार है पर वह तो सुनने को  तैयार ही नहीं थी।

इस घटना के   बाद डा€टर साहब आए। स्वभावतः वे शांत स्वभाव के  है और उनमें  शालीनता भी है उद्बहोंने अपना पक्ष रखते हुए कहा की  खबर छपने से पहले बात कर लेनी थी इस खबर से मेरे अस्पताल का  प्रचार ही हुआ है और मैं चेक  से पेमेंट करके फंसता थोड़ी न। लेकिन  संजीवनी योजना से  दो लाख 45 हजार मिले यदि नहीं मिले तो इतनी राशि क्यों  दी गई और मृतक के  पिता का कथन ऐसा क्यों  है, का  कोई जवाब नहीं रहा।

पत्रकारिता करते  इतने वर्षों में मेरा यह पहला अनुभव था। अपनी तरह का  अनोखा क्योकि  मुझ पर इस दौरान कई तरह के  आरोप भी लगाये गए  जबकि  मैं खबरें लिखता हूँ। सबूतों के  आधार पर। यदि मैं नहीं लिखता तो अखबार मालिक - दूसरों से लिखवा सकता हैं यह बात भी मैने समझाने --की --ोशिश की  पर वे सुनने -को  तैयार नहीं थे।

इस घटना  से मैं बेहद उद्देलित रहा और सोचने लगा की  सभी सबूतों के  बाद भी -कितना जरूरी है सभी पक्षों से चर्चा करना? मेरी गलती कहां थी? और €या विज्ञापन  का  मतलब खबरों से समझौता करना है।

सवाल का  जवाब ढूंढ रहा हूँ उम्मीद  है आप भी सुझाव देंगे।

सोमवार, 21 फ़रवरी 2011

सच शराब का , झुठ सरकार का

 नगर निगम और नगर पालिका के चुनाव में जिस तरह से कुर्सी पाने शराब की गंगा बहाई गई वह कुर्मा डय पूर्ण तो  रहा हो उससे भी ज्यादा दुर्भाग्य और दुखद बात प्रशासन की भूमिका रही। शर्मिंन्दगी की सारी हदें तो तब पार हो गई जब प्रशासन यह दावा करता है कि कहीं शराब नही बंटी। प्रशासन की इस बयानी की पोल तो बीरगांव चुनाव में बंटी शराब पीकर अलखराम वर्मा नामक 32 साल का युवक मर गया। प्रशासन ने शराब दुकानें बंद करवा दी थी लेकिन यह युवक युक्त की शराब पीकर मर गया। प्रत्यक्षदर्शियों की माने तो वह तीन दिन से शराब पी रहा था। उसे शराब नेता लोग दे रहे थें ताकि अपने लिए वोट खरीद सके।
    इसके बाद भी प्रशासन की बेशर्मी नहीं गई है उसका दावा आज भी है कि चुनाव में शराब नहीं बांटी गई। सिर्फ शिकायत पर ही कार्यवाही करने की बात है तो हमें कुछ नही करना है लेकिन शायद ही ऐसा कोई चुनाव नहीं है जिसमें इस तरह क हथकंडे नहीं अपनाये जाते है और प्रशासन उन्ही पर कार्यवाही करती है जिसपर हल्ला होता है या फिर शिकायत। यहंा आकर उनके मुखबिर भी फेल हो जाते है और शराब से मौत का सिलसिला चलते रहता है।
    वे लोग भी खुलकर विरोध नहीं करते जो शराब नही पीते क्योंकि उन्हे दुसरों की जान की कोई परवाह नही है। जिस दौर से छत्तीसगढ़ गुजर रहा है और लोग गलत की तरफ से आंखें बंद कर समाज सेवा के माध्यम से अपनी लकीर बहाने में लगे है वे शायद यह भूल गए है कि इस अंधेरगर्दी की आंच कभी न कभी उन तक भी पहुंचेगी तब उनके लिए भी गलत का विरोध करने वाले खड़े नहीं होगें।
    पिछले सालों में दुर्घटना से मौत के आंकड़ो पर नजर डाले तो इन सबके पीछे कहीं न कहीं शराब ही कारण नजर आयेगें। लेकिन सरकार को तो सिर्फ और सिर्फ राजस्व की चिंता है ताकि अपने ऐशो-आराम की सुविधा में किसी तरह की कटौती न हो पाये।
    शराब से घर टुट जाते है गांव और मोहल्ले की शांति भंग हो रही है और अपराध भी बह रहे है। क्या इतनी सी बात सरकार को नहीं मालूम है या वह लोगों को नशे में डूबोकर कुर्सी पर बना रहना चाहती है।
    अधिसंख्य वर्ग या गरीब वर्ग को मुफत की बंटरबोर कर नशे में रखने की सियासत ने इस शांत छत्तीसगढ़ को अशांत कर दिया है। गांव हो या शहर अवैध शराब की गंगा बहाई जा रही है और शराब माफियाओं के इशारे पर शासन प्रशासन नाच रहा है क्या ऐसे ही छत्तीसगढ़ की कल्पना की गई थी।
    अब भी वक्त है छत्तीसगढ़ के हितचिंतकों के लिए कि वे सचेत हो जाए वरना आने वाले दिनों में छत्तीसगढ़ को बिहार या यूपी बनने से रोकना मुश्किल हो जायेगा। आप लोगों का दिन ढलते ही लौट पाने की चिंता में मां-बाप का खुन सूख जायेगा।
    शराब बेचने की सरकारी मजबूरी सिर्फ बहाना है। ऐसे में मौत के सिलसिले रोकने आम लोगों को इसके खिलाफ जमकर खड़ा होना होगा। वरना सरकारी अंधेरगर्दी पर पछताने के अलावा कुछ न बचेगा।

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

रंगगेलियां मनाने वाले जीएम की छुट्टी

एक   अंग्रेजी अखबार के  जीएम जब गायत्री  नगर में रंगरेलिया मनाते पकडाया  तब -किसी  ने नहीं सोचा था कि मीडिया का  स्तर इस तरह से गिर जाएगा। दरअसल डांस क्लास चलाने वाली को अपना फोटो  छपवाने का  शौक कि  यह परिणिति  रही। इस मामले का  खुलासा जब वेदांत  भूमि डाट --काम में हुआ तो नागपुर में बैठे मालिक  नींद से जागे और  जीएम कि  नौकरी  गई। अब लोगों कि  नजर इसके  हिंदी संसकरण छपने वाले रंगा-बिल्ला पर है क्योंकि ब्लाक्मेलिंग से लेकर  शराब-शबाब के ये दोनों भी शौकिन है.

बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

दूसरे गांधी की अब जरूरत है।

पूरा देश मंहगाई और भ्रष्टाचार की चपेट में है मंहगाई की असली वजह भ्रष्टाचार है। अनाप -शनाप पैसे कमाने वालों की वजह से ही जरूरत की चीजों के दाम बढ़ रहे हैं। कांग्रेस से लेकर तमाम राजनेतिक दल भ्रष्टाचार और मंहगाई के खिलाफ बोल रहे है। यहां तक कि न्यायालय ने भी भ्रष्टाचार पर चिंता जाहिर की है लेकिन न तो भ्रष्टाचार ही रूक रहा है।

आम आदमी भी भ्रष्टाचार के खिलाफ बोलने के सिवाय कुछ नही कर पा रहा है। ऐसे में अब एक गांधी जी की जरूरत है जो भ्रष्टाचार और मंहगाई के खिलाफ अपना सब कुछ छोड़कर सड़क पर सिर्फ एक लाठी लेकर निकल पड़े। भ्रष्टाचारियो के खिलाफ सामाजिक बहिस्कार जैसे आंदोलन खड़े हो और ऐसे लोगों की संपत्ति राजपत्र करने का कानून बनाने सरकार को मजबूर करे।

गांधी जी की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि मंहगाई के खिलाफ आंदोलन हो। क्या ऐसे व्यक्ति की अब जरूरत नही है जो पूरे देश के लोग एक आव्हान पर हफ्ता भर तक सब्जी खाना बंद कर दे। क्या इससे मंहगाई नही रूक जायेगी। या एक समय ही सब्जी खाने का प्रभावशील आव्हान किया जा सके।

दरअसल मंहगाई का विरोध की बजाय सरकार के विरोध वह भी राजनीतिक स्वार्थ के लिए किये जा रहे है इससे न तो मंहगाई कम हो रही है और न ही आप लोगों की पीड़ा। अनाप शनाप ढंग से पैसे कमाने वाले लोगों ने अनाप शनाप ढंग से खरीददारी कर मंहगाई बढ़ा दी है और सरकार से लेकर विपत्ति दल केवल हल्ला मचा रहे है क्योंकि उन्हें जनता से वोट चाहिए। यदि वोट की मजबूरी नहीं होती तो ये लोग कभी हल्ला ही नही मचाते।

क्या राजनैतिक दलों ने चुनाव में जीतने वाले को टिकिट देने की शर्त रखकर राजनैतिक दलों ने भ्रष्ट आचरण को बढ़ावा नही दिया है। सत्ता की भूख और सत्ता पाने अनाप शनाप कमाई अपराधियों को संरक्षण देने का खामियाजा आज पुरे देश को मंहगाई के रूप में भुगतना पड़ रहा है।

छत्तीसगढ़ तो लुटेरों के लिए पनाहगार होते जा रहा है। भ्रष्टाचार चरम पर है और सरकार ऐसे लोंगों पर कार्यवाही करने की बजाय उसे बचा रही है। आम आदमी में शराब का जहर खोला जा रहा है। महयपवर्ग चावल योजना से त्रस्त है और पूरा प्रदेश आजक की स्थिति पर पहूंच गया है।

क्या अब भी आप लोगों में से किसी की ईच्छा नही है कि वह इस अराजक के खिलाफ गांधी जी बनकर खड़ा हो सके। विदेशी वस्त्रों की होली जलाने की तर्ज पर सब्जी न खाने की घोषणा करें। भ्रष्टाचारियों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करें।

पंडित सुन्दरलाल शर्मा, खूब चंद बघेल, शहीद वीर नारायण सिंह की धरती एक बार फिर लहुलुहान है और एक बार फिर गांधी जी कि जरूरत है तो आइये इस आंदोलन को सफल बनायें।