बुधवार, 18 अप्रैल 2012

गांवों में राज ...

गांवों में राज ...
छत्तीसगढ़ के गांवों की दशा बदतर हैं। सरकार हर साल की तरह इस साल भी 'ग्राम सुराजÓ में निकल पड़ी हैं। बकौल मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह 'खामियों से मिलता हैं बेहतर रास्ताÓ ही ग्राम सुराज अभियान की वजह हैं।
लेकिन छत्तीसगढ़ में इस अभियान के औचित्य पर ही सवाल उठने लगे हैं। विज्ञापन के रुप में करोड़ो खर्र्च करने के बाद क्या गांवों की दशा सुधर जायेगी।  दरअसल सरकार की सोच छत्तीसगढ़ के  विकास की है ही नहीं हैं। वरना पिछले सात साल के शासन में एक तो ऐसी योजना होती जिससे गांव में सुराज दिखता। हद तो यह है कि सरकार गांव वालों को लोकतंत्र के मायने ही नहीं समझा पाई हैं। शिकायतों के पुलिन्दों को विभागो में भेज देना और इसे निराकरण बताकर राजनैतिक लाभ लेना ही ग्राम सुराज का एकमात्र उद्देश्य रह गया हैं।
वास्तव में सरकारे चाहती है कि छत्तीसगढ़ का विकास  हो तो उसे गांववालों के विकास के लिए एक ऐसी योजना बनानी चाहिए जिससे हर व्यक्ति को स्वास्थ्य शिक्षा और पानी उपलब्ध हो जाये। आजादी के 7 दशक बाद जब ये तीन चीजे ही गांव वालों को मयस्सर नहीं हो पाया हैं। तब भला गांव में सुराज कैसे आ पायेगा।
हम बार-बार कह चूके है कि ग्राम सुराज हमें सरकारी नौटंकी से ज्यादा कुछ नजर नहीं आता। हो सकता है हमारी इस बात से बहुत से लोग इत्तेफाक नहीं रखते हो लेकिन ग्राम सुराज का खेल सालों से चल रहा है सरकार कितने गांवों में मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करा पाई हैं। वास्तव में सरकार इस अभियान के जरिये पटवारियों व पुलिस वालों पर नकेल कसने की ढिंढोरा भर पिटती हैं। ताकि गांव वाले पानी-चिकित्सा और शिक्षा की तरफ ध्यान ही न दें। ग्राम सुराज में आने वाले आवेदनों को देख के लगता है कि लोगों को ग्राम सुराज का मतलब भी सड़क स्कुल और पटवारी-पुलिस की शिकायत ही समझाया गया हैं।
वास्तव में ग्राम सुराज का मतलब छोटे कर्मचारियों को बदनाम करना या प्रताडि़त ही रह गया हैं जबकी इतने सालों के ग्राम सुराज के बाद सरकार को ऐसी योजना बनानी चाहिए थी कि हर ब्लाक मुख्यालय में सर्वसुविधायुक्त अस्पताल हो जाए, उच्च शिक्षा के पर्याप्त साधन हो और गांव-गांव में पीने का साफ पानी उपलब्ध हो जाए।
सरकार किसी की भी हो किसी ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया कि आखिर गांव वालों को शहर की तरह सुविधा कैसे दी जाए। न ही गांव वालों के प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतिनिधियों ने ही इस ओर सोचा। जीतते ही राजधानी में घर पा लेने के बाद चुनाव जीतना ही उद्देश्य रह गया है। ग्राम सुराज को लेकर मुख्यमंत्री की इस बेहतर रास्ते सिर्फ डायलॉक न बने बल्कि गांव वालों को बेहतर सुविधा मिले। तभी गांव में सुराज आयेगी।

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

कथनी और करनी...


सत्ता में आने के पहले नैतिकता की सारी बातें धरी की धरी रह जाती हैं। न पार्टी विद डिफरेंस रहता हैं। और न ही चाल चेहरा ऐर चरित्र ही दिखता हैं। राजनैतिक सुचिता तो कुड़ेदान में चला जाता हैं। और जनता का भ्रम फिर भी बना हुआ हैं।
भारतीय राजनीतिक का यह चेहरा है। हो सकता है कि बहुत लोग मुझसे इत्तेफाक नहीं रखते होंगे लेकिन राजनेताओं का पतन जिस तेजी से हूआ हैं, उसके बाद आम  आदमी के पास यह यज्ञ प्रश्न है कि इस देश का क्या होगा। बड़े-बड़े महात्मा सैनिक शासन की दुहाई देने लगे हैं। तो कोई अंगे्रजी राज को बेहतर बताते नहीं थक रहे हैं।
इन सब विषम परिस्थितियों के बावजूद हम बतादे कि लोकतांत्रिक व्ययस्था से अच्छी कोई और व्यवस्था नहीं हैं। यह बात और है कि इसमें सुधार गुंजाईस हैं। छत्तीसगढ़ में चौतरफा लूट खसोट में सरकार का कोई जवाब नहीं है लेकिन क्या कांगे्रस की खामोशी पर टिप्पणी नहीं हो रही है। लेकिन तीसरी पार्टी का विकल्प भी खुलने लगा हैं। जोर आजमाईश के बीच कांगे्रस ने तेवर कड़े कर लिए है और सत्ता छिने जाने का डर भाजपा में भी दिखने लगा हैं।
पिछले 7-8सालों के भाजपाई शासन में कुछ अच्छे निर्णय हुए हैं लेकिन इन निर्णयों पर कोयले की कालिख पूतने लगी है। आदिवासियों और हरिजनों का आह भी दिखने लगा है। बस्तर की समस्या सुलझाने। में सरकार पूरी तरह असफल रही हैं। यहां गांव के गांव उजड़ गये और आदिवासी दोनो तरफ से मारे जा रहे हैं। मैदाली इलाको में धंधेबाजों ने माफिया राज चला रखा हैं। जिसका फायदा कांगे्रस केो मिलते दिख रहा हैं।
ग्राम सुराज की नौटंकी फिर शुरु हो रही हैं। हम ऐसे किसी भी आंदोलन के खिलाफ हैं जिसमें पैसे पानी की तरह बहाकर  राजनैतिक लाभ लेने की सरकारी कोशिश हो रही हों।
दरअसल ग्राम सुराज जनता तक पहुंचने का सशक्त माध्यम बताया जाता हैं। वास्तव में जब-जब दर्शन जैसे कार्यक्र म हो रहा हो तब ग्राम सुराज का कोई मतलब नहीं रह जाता। ग्राम सुराज के औचित्य पर तो उसी दिन प्रश्न लग चूका था। जब यहा मिलने वाली शिकायतों के निराकरण का मतलब संबंधित विभाग तक पहुंचा देना बस रह गया।
क्या सरकार के पास इस बात का जवाब है कि छत्तीसगढ़ में निर्माण के बाद आप आदमी को उसकी मुलभूत सुविधाएं ठीक ढंग से क्यों नहीं पहुचाई गई। विकास के नाम पर केवल शंहरों का विकास की कोशिश हुई। जब राजधानी जैसे जगह पर सरकारी स्कूलों को हाल बहतर हो, पीने के पानी के लिए रतजगा करना पड़े और सरकारी अस्पताल का हाल बहतर हो तब वह किस तरह दावा करता हैं कि विकास हुआ हैं।
दरअसल विकास के मायने बदल गयेे हैं। सड़क,स्कुल भवन व पंचायत भवन को विकास मतलब मुलभूत सुविधाएं उपलब्ध  कराना होता हैं। वह छत्तीसगढ़ मे कहीं नहीं दिखता। बल्कि भ्रष्टाचार से लबरेज अधिकारियों की सलाह पर काम हो रहे हैं जिन्हें हर हाल में राजधानी या शहरों में रहना हैं।                                    

सोमवार, 16 अप्रैल 2012

ग्राम सुराज का सच...


हर साल की तरह इस साल भी रमन सरकार का ग्राम सुराज शुरू हो रहा है, करोड़ो रूपए फूंके जाएंगे, गांव-गांव में जाने की नौटंकी होगी और गांव वाले दमाशाबीन स्वयं को ठका सा महसूस करेंगे। लेकिन इस बार का अभियान थोड़ा अलग है, कांग्रेस वादा निभाने दबाव बनाएंगी तो सरकार कोयले की कालिख पोछने के अलावा अदिवासियों की पिटाई व हरिजनों के आरक्षण में कटौती की काट भी देखेगी।
पिछले साल की अभियान का कटु अनुभव रहा है अधिकारियों को कई जगह बंधक बनाए गए थे और इस बार कांग्रेस भी वादा निभाओं नारे के साथ कूद गई है। तब अभियान कैसे पूरा होगा, कहना कठिन है।
हर तरफ से गले तक भ्रष्टाचार में डूबी सरकार का यह अभियान तब चुनौतिपूर्ण हो जाता है जब सरकार के मुखिया डॉ रमन सिंह पर कोयले की कालिख पूती हो। सर्व आदिवासी समाज के पिटाई का मामला गर्म है जब सतनामी समाज भी बाह मोड़े खड़ा हो तब अधिकारियों के लिए गांव से चुपचाप लौट आना एक सुखद बात होगी।
वैसे हम इसी जगह पर कई बार यह बात कह चुके है कि ग्राम सुराज नौटंकी के अलावा कुछ और नहीं है। अधिकारियों के लिए पिकनिक और सैर करने का जरिया बन चुके इस अभियान से हमे तो नहीं लगता कि सरकार को भले ही राजनीतिक फायदा मिले, आम जनता का कुछ भला नहीं होने वाला है।
सालों से लंबित लोगों की दो-चार मांगें मान लेने और पटवारी, गुरूजी पर निलंबन की गाज गिराने वालों को सफलता कहने वालों को राजधानी में बैठे भ्रष्टाचार के मगरमच्छो की तरफ भी एक बार देख लेना चाहिए। मनोज डे से बाबूलाल अग्रवाल और न जाने कितने भ्रष्ट लोग मलाईदार पदों पर बैठे है। अपने करतूतो से बदनाम करने वाले संविदा में नौकरी कर रहे है। उनकी तरफ देखकर ही कोई निर्णय लिया जाना चाहिए।
सीएजी के रिपोर्ट ने सरकार के सच का जो खाल खिचा है। उसके बाद भी सरकार ग्राम सुराज के नाम पर संगीनों के साये में अपना राजनीतिक फायदा देख रही है तो इसे हम दिवालिया ही कहेंगे।

रविवार, 15 अप्रैल 2012

निर्मल दरबार हो या दिव्य दरबार सब जगह है पैसों का चमत्कार


 यह तो चमत्कार को नमस्कार करने वाली कहावत को ही चरितार्थ करता हैं। वरना आम लोग न निर्मल दरबार के झासे में आते न दिव्य दरबार के कथित चमत्कार पर आस्था रखते। इन दरबारों में पैसो का खेल इतने सहज ढंग से होने लगा है कि स्वयं के लूटे जाने का संदेह भी नहीं होता और ठगे जाने पर यह सोचकर व्यक्ति खामोश हो जाता है कि उनकी किस्मत ही फूटी है, वरना दरबार से कई लोगों को फायदा हुआ है।
छत्तीसगढ़ की राजधानी में इन दिनों पंडोखर सरकार के दिव्य दरबार की चर्चा जोरों पर है। कागज के लिखा पढ़ी के इस खेल में नाम से लेकर मोबाईल नंबर और समस्या से लेकर उसके निजात का समाधान  दिव्य दरबार में होने का दावा किया जा रहा  है। 'बकौल पंडोखर सरकार बड़े-बड़े संस्थाओं और बादशाहों के दरबार काल के गाल में समा गए। क्योंकि वे व्यक्ति थे। व्यक्ति द्वारा अर्जित भौतिक संपदाओं का अस्तित्व सीमित होता है। लेकिन शक्ति का प्र्रभाव असीम न सर्वकालिन होता है। लगभग इसी तरह की बात इंदिरा गांधी के जमाने में धीरेन्द्र्र ब्रम्हचारी और चंद्रशेखर वीपी सिंह के जमाने में चंद्र्रास्वामी भी करते रहे है। इसके बाद आशाराम बापू से लेकर निर्मल बाबा के दरबार लगे और ये सभी इस किस लिए चर्चित हुए ये किसी से छिपा नहीं है। सत्ता के नजदीक जाकर चर्चित होना और पैसा कमाना इन दिनों बाबाओं का संगल बनकर रह गया है। निर्मल बाबा के चमत्कार ने तो इन दिनों पूरे देश में तहलका मचा कर रख दिया है। ठीक वैसा ही तहलका इन दिनों छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में पंडोखर सरकार गुरूशरण महाराज ने मचा कर रख दिया है। बजरंग बली के आर्शीवाद से लबरेज गुरूशरण महाराज दावा करते है कि स्वास्थ समाज के निर्माण में लगे है और उन्हें सब कुछ पहले से निकले कागज में मिल जाता है। दरबार में पीडि़त व्यक्ति के कागज उठाते ही महाराज उनका नाम से लेकर समस्या तक हीं नहीं जानते बल्कि इन समस्या की मुक्ति का भी उपाय बताते है। उपाय में वे उन्हें अपने निवास स्थान किसी न किसी अमवस्या को बुलाते है। शादी  ब्याह में विलंब से लेकर बच्चा नहीं होने में फिर स्वास्थ्य ठीक करने से लेकर घर की समस्याओं से मुक्ति तक का दावा गुरूशरण महाराज करते नहीं थकते। बस पीडि़त को उनके कहे अनुसार दान धर्म करना है। दूसरे बाबाओं से स्वयं को अलग रखते हुए गुरूशरण महाराज कहते है कि आस्था के साथ खिलवाड़ करने वालों को इसका दुष्परिणाम भुगतना ही होगा। हमारे बेहद भरोसेमंद सूत्रों का कहना है कि गुरूशरण महाराज के दिव्य दरबार में जिस तरह का खेल चलता है वह लोगों को प्रभावित करने की रणनीति का हिस्सा है और गुरूशरण महाराज के यहां भी पैसों का बोल बाला है। यह अलग बात है कि  उनके पैसा लेने का तरीका अलग है, चूंकि उनके आने-जाने रहने-ठहरने की एवज में एक निश्चित रकम ली जाती है। यहीं नहीं दरबार में प्रवेश भले ही नि:शुल्क हो लेकिन पीडि़त उनकी बातों में आकर पंडोखर का दरवाजा तो खटखटा ही लेते है।  दूसरे बाबाओं को स्वयं को अलग रखने के बावजूद एक चीज तो तय है कि यहां भी पैसा बोलता है।
पैसा लिया जाता है तरीका भले ही अलग-अलग हो, विशिष्टों का विशेष ख्याल रखा ही जाता है। बहरहाल चमत्कार को नमस्कार की तर्ज पर इन दिनों राजधानी में निर्मल बाबा के बदनामी के बाद भी अपना खेल खेलने में गुरूशरण महाराज सफल हो रहे हैं।

निजी स्कूलो की दादागिरी...

  
 निजी स्कूलों की मनमानी पर सरकार कुछ नहीं करने वाली हैं। ऐसा नही हैं की सरकार कुछ नहीं कर सकती। चाहे तो सरकार सब कुछ कर सकती हैं।  लेकिन सरकार की मर्जी हैं। आखिर उनकी जेब कौंन भरेगा हल्ला मचाओगे तो सरकार बयान दे देगी की मनमानी नहीं चलने दी जाायेगी। बस।
छत्तीसगढ़ की राजधानी ही नहीं पूरे छत्तीसगढ़ में  निजी स्कूलों की दादागिरी किसी से छिपी नहीं हैं। दो-चार कमरों में लगने वाले स्कूलों का भी सरकार कुछ नहीं बिगाड़ पाती। मनमानी या दादागिरी और  इसे गुण्डा गर्दी भी कहा जा सकता हैं। लेकिन यह सरकार को नहीं दिखता।
इस साल फिर कुछ पालक निजी स्कूलों की इस गुण्डागर्दी के खिलाफ सामने आये हैं लेकिन यह डरा सकने वाला नहीं दिखता। साल दर साल पालकों की जेब से अधिक से अधिक पैसे निकाले जाने की उनकी तरकीब के आगे आम आदमी मजबूर इसलिए हैं क्योंकि सरकार स्कूल में पढ़ाई का माध्यम अंगे्रजी रखा ही नहीं हैं, स्कूलों में टीचरों की कमी हैं।
यही वजह हैं कि निजी स्कूलों की गुण्दागर्दी किसी चौराहों पर लूटपाट करने वाले या हफ्ता वसूलने वालों जैसे स्थिति में पहुंच गई हैं। क्या सरकार को यह नहीं मालूम हैं कि हर साल फीस में बढ़ोतरी के अलावा भवन मरम्मत से लेकर निर्माण के लिए भी पैसे वसूले जाते हैं। हर साल किताबें बदल दी जाती हैं और ये किताबें वही मिलती हैं जो दूकानदार स्कूलों को कमीशन देते हैं। ड्रेस भी अमूमन तय दुकानों से खरीदना पड़ता हैं जुता,चप्पल ,टाई, मोजा तक तय दुकानों से ही खरीदना पड़ता है और इन दुकानों से एक मोटी रकम कमीशन के रुप में स्कूलों में पहुंचती हैं। यह सब सरकार नहीं देख रही है ऐसा नहीं हैं। सरकार में बैठे लोंगो के बच्चे भी इन्हीं स्कूलों में पढ़ रहे हैं। लेकिन पैसे की भूख ने उनकी जमीर को इन निजी स्कूल वालों के पास गिरवी रख छोड़ा हैं। सालों से इसकी शिकायतें होती रहती हैं। सत्ता किसी की भी हो इस पर बंदिश नहीं लगा पाया। और अपना पेट काटकर अच्छी शिक्षा की चाह रखने वाले मां-बाप दुखी हैं। उनके पास वक्त भी नहीं है कि वे इसके खिलाफ खड़े हो सके निजी स्कूलों की दादागिरी ने उन्हें हालात से समझौता करने को मजबूर कर दिया हैं। सरकार निजी स्कूलों को इसी शर्त पर मान्यता देती है कि वे लाभ हानि से परे शिक्षा देंगे लेकिन कितने निजी स्कूल इस सिद्धांत पर चल रहे है और क्या सरकार को यह दिखाई नहीं दे रहा है कि किस तरह इस राज्य को शिक्षा माफिया ने जकड़ रखा हैं।
इस बार हल्ला मचा तो कमेटी गठित कर दी गई लेकिन कमेटी क्या इसे रोक पायेगी।
             

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

अंधेरगर्दी पर जीत...


विधानसभा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक ने जिन कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया था वे लोग इस अन्याय के खिलाफ कानूनी लड़ाई जीत गये। हाईकोट ने विधानसभा अध्यक्ष श्री कौशिक के इस निर्णय को निरस्त कर इन कर्मचारियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि बर्र्खास्तगी किसी कर्मचारी के विरूद्ध कड़ी सजा है और वे लोग काम पर लौट आए थे तब उन्हें बर्खास्त करना उचित नहीं है।  न्यायालय के इस फैसले ने राज्य सरकार के लिए एक लाईन खींच दी है कि वे किसी के साथ इतना अन्याय न करे कि उसे कानून की सहायता लेनी पड़े। दरसल 29 अप्रैल 2011 में विधानसभा के कर्मचारियों ने विधानसभा के सचिव देवेन्द्र वर्मा के नादिरशाही और अपनी मांगो को लेकर हड़ताल पर चले गए थे। यह किसी से नहीं छिपा है कि देवेन्द्र वर्मा किस तरह से सचिव बने है। मध्यप्र्रदेश आबंटन के बाद भी वे छत्तीसगढ़ में किस तरह से जमे हुए है और उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपो की भी कमी नहीं  है। सरकार का उन्हें पूरी तरह संरक्षण प्राप्त है और इसी के चलते देवेन्द्र वर्मा की दादागिरी चरम पर है। उनके कृत्यों से न केवल विपक्ष बल्कि सत्ता पक्ष के विधायक भी परेशान है और कर्मचारियों को अपनी जूती की नोंक पर रखने का दावा शहर की चौराहों में चर्चा का विषय है। सहनशक्ति बर्दास्त के बाहर होने की वजह से ही यहां के कर्मचारियों ने आंदोलन शुरू किया लेकिन इस आंदोलन को कूचल दिया गया। सरकार ने इस आंदोलन को कूचलने एस्मा कानून का सहारा लिया जबकि तब न तो विधानसभा का सत्र चल रहा था और न ही कोई विपदा आ पड़ी थी। लेकिन देवेन्द्र वर्मा के करतूतो को उजागर करते इस आंदोलन को समाप्त करने एस्मा लगाया गया।  एस्मा के खौफ के आगे कर्मचारी नतमस्तक होकर काम पर लौंट गए चूंकि इन कर्मचारियों ने देवेन्द्र वर्मा से पंगा लिया इसलिए काम पर लौटने के बावजूद भी इन्हें नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। इस अन्याय को लेकर कर्मचारी ने विपक्ष से लेकर सत्ता पक्ष के मंत्री, मुख्यमंत्री तक गए लेकिन उनकी इसलिए नहीं सुनी गई क्योंकि इन लोगों ने देवेन्द्र वर्मा के खिलाफ मोर्चा खोला था। और कम कहीं सुनवाई नहीं हुई तब न्याय मंदिर का दरवाजा खटखटाया गया जहां देर ही सहीं अंधेर नहीं है और कर्मचारियों के पक्ष पर फैसला आया।  अब देखना यह है कि इस फैसले पर देवेन्द्र वर्मा की क्या प्रतिक्रिया होती है। क्या अन्याय के खिलाफ लडऩे वालों को कूचलने का कोई और रास्ता अख्तियार किया जाता  है।
 

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

...का दमन!


 क्या अब भी भाजपा हाईकमान को नहीं दिखता कि छत्तीसगढ़ भाजपा में सत्ता के अन्यायपूर्ण निर्णय से निष्ठावान भाजपाई सहमें हुए है। वे खुश नही हैं। अनुशासन के डंडे से आखिर  कब तक हकाला जायेगा और सत्ता के लिए संगठन को सबको लेकर चलना होगा।
कोयला कि कालिख के बीच दो दिन चली भाजपाई चिंतन के बाद यही निष्कर्ष निकलकर बाहर आया कि सत्ता की दमदारी और हाईकमान  के संरक्षण ने प्रदेश भाजपा की एकता को तार -तार कर दिया हैं। दो दिन की बैठक को लेकर किसी में उत्साह ही नही था और इस बार भी उसी की चली जिसकी वजह से पर्चा फेंके जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने बैैठक को लेकर खुद स्वीकार किया कि बैठक में मौजुद 40 फीसदी लोग आपस में बाते कर रहे हैं। 30 फीसदी सो रहे हैं और 10-15 फीसदी को मतलब ही नही हैं यानी 10-15 फीसदी वे लोग हैं जो सरकार के मलाईदार पदों पर बैठे हैं या जिन्हें सत्ता से सुख की प्राप्ती हो रही हैं।
   मुख्यमंत्री डॉ. सिंह के इस कथनी के बाद तो प्रदेश भााजपा की स्थिति खुद ब खुद स्पष्ट हो गई हैं। कांगे्रस की बढ़ती सक्रियता और भ्रष्टाचार के आरोपों से बुरी तरह घिरी सरकार की बेचैनी जैसे-तैसे इस संकट से निपटने की हैं। यही वजह है की  बैठक में उन लोगों को बोलने तक नहीं दिया गया जिनसे थोड़ा भी खतरा था। पार्टी मंच से बात रखने  की वकालत करने वालों ने भी रमेश बैस, करूणा शुक्ला ,दिलीप सिंह जुदेव से जहमत नही उठाई

 इस दो दिन की बैठक औचित्य क्या था यह जुदेव के इस बयान से पता चलता है कि वे सो रहे थे। सबकुछ अपनी मर्जी से चलानी हैं तो फिर यह नौटंकी किसके लिए? यह एक ऐसा सवाल है जो भाजपा में फिर से तूफान खड़ा कर सकता हैं।
   केवल कमल मुख्यमंत्री या कांग्रेसियों से दूरी बनाकर चलने की कहानी से अब कार्यकर्ता उत्साहित नही होने वाले हैं। क्योकि आम कार्यकर्ता  यह समझ चुका हैं पर्चे की एक-एक बात सच हैं और सत्ता में ईमानदारों की भागीदारी   इस कॉकस के रहते नही होने वाली हैं।
रमेश बैस की पट्टा वाली टिप्पणी और दिलीप सिंह के बैठक में सोने की गुंज के बाद भी हाईकमान को लगता है कि छत्तीसगढ़ में सरकार  ठीक ठाक चल रही है तो हमें कुछ नही कहना हैं।  
                             
 क्या अब भी भाजपा हाईकमान को नहीं दिखता कि छत्तीसगढ़ भाजपा में सत्ता के अन्यायपूर्ण निर्णय से निष्ठावान भाजपाई सहमें हुए है। वे खुश नही हैं। अनुशासन के डंडे से आखिर  कब तक हकाला जायेगा और सत्ता के लिए संगठन को सबको लेकर चलना होगा।
कोयला कि कालिख के बीच दो दिन चली भाजपाई चिंतन के बाद यही निष्कर्ष निकलकर बाहर आया कि सत्ता की दमदारी और हाईकमान  के संरक्षण ने प्रदेश भाजपा की एकता को तार -तार कर दिया हैं। दो दिन की बैठक को लेकर किसी में उत्साह ही नही था और इस बार भी उसी की चली जिसकी वजह से पर्चा फेंके जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने बैैठक को लेकर खुद स्वीकार किया कि बैठक में मौजुद 40 फीसदी लोग आपस में बाते कर रहे हैं। 30 फीसदी सो रहे हैं और 10-15 फीसदी को मतलब ही नही हैं यानी 10-15 फीसदी वे लोग हैं जो सरकार के मलाईदार पदों पर बैठे हैं या जिन्हें सत्ता से सुख की प्राप्ती हो रही हैं।
   मुख्यमंत्री डॉ. सिंह के इस कथनी के बाद तो प्रदेश भााजपा की स्थिति खुद ब खुद स्पष्ट हो गई हैं। कांगे्रस की बढ़ती सक्रियता और भ्रष्टाचार के आरोपों से बुरी तरह घिरी सरकार की बेचैनी जैसे-तैसे इस संकट से निपटने की हैं। यही वजह है की  बैठक में उन लोगों को बोलने तक नहीं दिया गया जिनसे थोड़ा भी खतरा था। पार्टी मंच से बात रखने  की वकालत करने वालों ने भी रमेश बैस, करूणा शुक्ला ,दिलीप सिंह जुदेव से जहमत नही उठाई
  ...का दमन!
 इस दो दिन की बैठक औचित्य क्या था यह जुदेव के इस बयान से पता चलता है कि वे सो रहे थे। सबकुछ अपनी मर्जी से चलानी हैं तो फिर यह नौटंकी किसके लिए? यह एक ऐसा सवाल है जो भाजपा में फिर से तूफान खड़ा कर सकता हैं।
   केवल कमल मुख्यमंत्री या कांग्रेसियों से दूरी बनाकर चलने की कहानी से अब कार्यकर्ता उत्साहित नही होने वाले हैं। क्योकि आम कार्यकर्ता  यह समझ चुका हैं पर्चे की एक-एक बात सच हैं और सत्ता में ईमानदारों की भागीदारी   इस कॉकस के रहते नही होने वाली हैं।
रमेश बैस की पट्टा वाली टिप्पणी और दिलीप सिंह के बैठक में सोने की गुंज के बाद भी हाईकमान को लगता है कि छत्तीसगढ़ में सरकार  ठीक ठाक चल रही है तो हमें कुछ नही कहना हैं।