रविवार, 13 जनवरी 2013

सब तरफ है हाहाकार अपने में मस्त सरकार


अब तो सब तरफ लोग एक ही बात बोल रहे हैं कि छत्तीसगढ़ में सरकार नाम की चीज हीन ही है । लचर कानून व्यवस्था, बढ़ते अपराध,प्रशासनिक आतंकवाद ने यहां जिसकी लाठी उसकी भैस के कहावत को ही चरितार्थ किया है । पहले कोयला घोटाला, ने जहां छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय स्तर पर शर्मसार किया था अब आदिवासी मासूम ब"ाों के साथ बलात्कार की घटना से छत्तीसगढ़ एक बार फिर शर्मसार हुआ है । सरकार के द्वारा भ्रष्टाचारियों और अपराधियों को सीधे संरक्षण मिलने की वजह से अवांछनीय तत्तों के जहां हौसले बुलंद हुए हैं वहीं आम लोगों का जीना दूभर होता जा रहा है ।
छत्तीसगढ़ में अपने 9 साल पूरा कर चुकी रमन सरकार का पूरा ध्यान इन दिनों हैट्रिक की है लेकिन यह रास्ता आसान नहीं है । इसकी वजह सरकार की वह कार्यशैली है जिसकी वजह से न केवल छत्तीसगढ़ को देशभर में शर्मनाक स्थिति से गुजरना पड़ रहा है बल्कि आम लोग सरकार से त्रस्त हो गए है । सरकार की नीति भले ही तिकड़म बाजी से चुनाव जीतने की हो लेकिन वास्तविकता तो यहीं है कि रमन राज में जहां भ्रष्टाचारियों को खुले आम संरक्षण मिला है । आपराध में बडतेतरी हुई है । उद्योगों की करतूतों पर कार्रवाई की बजाय परदा डाला गया है वहीं चुनाव पूर्व जनता से किये वादे को पूरा करने में भी सरकार पूरी तरफ से असफल रही है । जिस साफ छवि और चावंल योजना के सहारे भाजपा ने पिछला चुनाव जीता था । इस बार इसी साफ छवि पर कोयले की कालिख साफ दिखने लगी है ।
सीएजी की रिपोर्ट में सरकार के हजारों करोड़ों के भ्रष्टाचार ही उजागर नहीं हुए है बल्कि इस बात का भी खुलासा हुआ है कि भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों परभी सरकार ने ठोस कार्रवाई नहीं की है ।
अब तो नौकरशाहों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि इस सरकार में जो सबसे Óयादा भ्रष्ट रहेगा उसे ही महत्वपूर्ण पद मिलेंगे । आर्थिक अपराध ब्यूरों ने जिस पैमाने पर भ्रष्ट अफसरों के मामले छापा मारकर सामने लाये हैं । उस मुकाबले में सरकार ने कार्रवाई नहीं की ।
बाबूलाल अग्रवाल का मामला हो या इंजीनियरों का मामला हो । स्वास्थ्य घोटाले का मामला हो या जंगल में व्याप्त भ्रष्टाचार का मामला हो । सरकार ने कभी भी कड़ी कार्रवाई नहीं की ।
सूत्रों का कहना हे कि रमन राज में अपराध बढऩे की एक बड़ी वजह अपराधियों के खिलाफ, भ्रष्टाचारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करना है । सरकार के इस रवैये की वजह से अपराधिक प्रवृति के लोगों में यचह भावना घर कर गई है कि कुछ भ कर लो कार्रवाई तो होनी नहीं है और पैसों के दम पर इस सरकार में कुछ भी किया जा सकता हे ।  तभी तो बाबूलाल हो या ब्लाक शिक्षा अधिकारी चाडंक सभी महत्वपूर्ण पदों पर हैं। लोगों के गर्भाशय निकालने वाले भी मजे में है तो आंख फोडऩे वालों पर भी कुछ नहीं किया गया । न मन्नू नत्थानी पकड़ा जायेगा न डॉ. बाडियां को पकडऩे की कोशिश ही होगी । राजकुमार नायडू जैसे आरोपियों को पुलिस पकडऩे में दस साल लगा देती है जबकि वह इस दौरान ड्यूटी करता रहा ।
ब्रदी जैसे मिलावट खोरों को बचाने ईमानदार अधिकारियों को प्रताडि़त किया जाता है तो आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाले मंत्री न पुलिस अधिकारी का भी कुछ नहीं बिगड़ता जबकि मृत्युपर्व लिखे पत्र में साफ वजह लिखी जाती है । जमीनों पर अवैध कब्जा, जंगल का जंगल साफ करने वाले उद्योगपतियों को बिजली-पानी और यहां तक कि टैक्सों में भी छूट दी जाती है जबकि गांव-गली में अवैध शराब बेचने वाले शराब माफियाओं के साथ गलबहियां की जाती है ।
ऐसे में अपराधिक तत्वों के हौसले बुलंद नहीं होंगे तो क्या होगा ।
चुनाव जीतने के लिए जारी घोषणा पत्र को संकल्प का नाम देने के बाद भी उसे पूरा नहीं किया जाता उपर से संकल्प याद दिलाने वाले किसानों व शिक्षा कर्मियों पर लाठियां भांजी गए तो हालात कहां पहुंच गए है आसानी से समझा जा सकता है ।
आदिवासी आश्रम में ब"िायों से बलात्कार के मामले में लीपा पोती होती है तब भी दिल्ली गैगरैप पर हल्ला मचाने वाली भाजपा खामोश रहती है ।
गरीब आदिवासी छात्राओं से सामूहिक गैंगरेप क े इस Óवंलतशील मामले ने पूरे देश को शर्मशार करते हुये सुर्खियाँ बटोर चुका आदिवासी बाहुल कांकेर जिले में इस घटना के विरोध में सामाजिक संगठन,छात्र-छात्राऐं सडकों पर उतरते हुये रमन सरकार के विरोध में मुखर होते नजर आने लगे है।

शुक्रवार, 11 जनवरी 2013

रावण सा भाई ...


इन दिनों दिल्ली रेप कांड के बाद पूरे देश में महिलाओं पर अत्याचार को लेकर वैचारिक क्रंाति चल रही है । महिला अत्याचार के खिलाफ चल रहे इस जंग से हर कोई अपने को जोड़ रखा है । और सोशल साईट्स ने इस वैचारिक क्रांति को संबल प्रदान किया है । जितने लोग उतनी बातें । और इन बातों में पुलिस-नेता के अलावा समाज के उस वर्ग के प्रति भी आक्रोश साफ दिखाई दिया जो लोग थोड़ी सी झंझट से बचने दूसरे की सहायता करने से स्वयं को किनारे कर लेते हैं ।
 सवाल सिर्फ दामिनी का नहीं है । सवाल बढ़ते यौन अपराधों का है । सवाल पुलिस की चूक का नहीं है सवाल स्वयं की जिम्मेदारी का है । सड़क पर तडफ़ते लोगों को क्या सिर्फ इसलिए पुलिस के भरोसे छोड़ा जाना चाहिए कि पुलिसिया पूछताछ में झंझट बहुत है ।
क्या कानून सख्त कर देने से अपराध रूक जायेगा ? बल्कि कानून की सहायता करने से अपराध रूकेगा । एक गुण्डा पुरे मोहल्ले पर इसलिए भारी पड़ता है क्योंकि हम तब तक आवाज नहीं उठाते जब तक हमारे साथ गलत न हो । दूसरे पर हो रहे अत्याचार की अनदेखी की वजह से ही अपराध बढ़े है । और यही सच है ।
हर घटना के बाद या घटना के दौरान जनता मौजूद होती है और जनता अपनी जिम्मेदारी निभा ले तो अपराधियों के हौसले पस्त हो जायेंगे । ये ठीक है कि पुलिसिया करतूत भी अपराध बढऩे की बड़ी वजह है लेकिन हमने कब अपनी जिम्मेदारी निभाई है ? यह स्वयं लोगों को अपने आप से पूछना चाहिए ।
संघ प्रमुख मोहन भागवत हो या भाजपाई मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, राष्ट्रपति के बेटे अमिजीत हो या फिर कोई और हो । इस मामले में उनके विचार हैरान कर देने वाले है । मर्यादा की पाठ पढ़ाना, पहनावे पर फब्तियां कसना, समर्पण की बात करना या भारत-इंडिया की दुहाई देना सत्य से मुंह मोडऩा है । शायद कैलाश विजयवर्गीय को यह जानकारी नहीं होगी कि सीता ने यदि लक्ष्मण रेखा पार की थी तो उसकी वजह एक साधु की सहायता करना हयेय था और बलात्कार सिर्फ शहरों में नहीं होते गांवो में भी बदस्तुर जारी है ।
इसलिए घटना की निंदा करने या फिर समाज को इस अपराध से मुक्त करने के प्रयास की बजाय महिलाओं के प्रति अपनी मानसिकता को प्रकट करना कतई उचित नहीं है । आज देश में तेजी से बदलाव आया है । बढ़ती मंहगाई के इस दौर में बेहतर जीवन के लिए महिलाएं रात तक काम कर रही है ऐसे में पुलिस के अलावा समाज की भी जिम्मेदारी बढ़ गई है ।
महिलाओं के प्रति सोच भी बदलने लगी है । आज हर व्यक्ति अपनी बेटियों को बेहतर शिक्षा देना चाहते है और इसके लिए बड़े शहरों में भी भेज रहे है । तब भला भारत-इंडिया या लक्ष्मण रेखा जैसी बात कहां से आ गई ।
क्या समय के साथ मानसिकता बदलने की जरूरत नहीं है । क्या रेस्टरो या एकांत जगह पर एक युवक-युवती सिर्फ यौन ? संबंधों की वजह से ही मिलते है । इस तरह से चर्चा करने वालों को देखने वाले ऐसे कितने लोग है जो पहली बार में ही यह सोचते होंगे कि ये दोनों पढ़ाई, बिजनेस पर ही चर्चा कर रहे हैं ।
यह सच है कि मां-बहन, चाची,मौसी नानी-दादी के रिश्तों की बुनियाद संबंध पर ही आधारित है लेकिन बदलते दौर में बहुत कुछ बदला है और हमें जिस तरह से अपनी बेटियों को पढऩे या नौकरी करने की आजादी दी है अपनी मानसिकता को भी आजादी देनी होगी ।
यही वजह है कि अब तक जिस रावण का हर साल बुराई के प्रतिक के रूप में दहन किया जाता था आज उसी रावण में अ'छाई ढूंढी जाने लगी है । पर स्त्री के हरण का दाग भी कमजोर पडऩे लगा है । तभी तो सोशल साईट्स पर रावण जैसे भाई की बात होनी लगी है । एक ऐसा भाई जो अपनी बहन सुर्पनखा के लिए दुश्मन की पत्नी का तो हरण कर लेता है लेकिन उसे छूता भी नहीं है
क्या सचमुच महिलाओं पर हो रहे यौन उपीडऩ के बाद रावण जैसे भाई की जरूरत है ?

मंगलवार, 8 जनवरी 2013

टंगिया के बेट...


तहिया के एक ठन किस्सा हे। लकड़ी काटे बर जब टंगिया बनाए गीस त जंगल के रूख-राही मन ह डर के मारे बईठका करीन। जम्मो झन के एकेच गोठ रीहिस अब का होही। हमर जिनगी के का होही। जंगल ह कइसे बाचही। अऊ जंगल नई रही त ये दुनिया के का होही। जेखर बोले के पारी आय तउने ह टंगिया उपर अपन गुस्सा उतारय। अऊ टंगिया बनईया ल घलो पानी पी पी केे गारी देवय। टंगिया बनाय ल रोके के उदीम घलो सुना डरीन।
तब एक ठन डोकरा पेड़ ह जम्मों झन ल चुप कराके कहिन। जतका फिकर तुंहला हे वतका महु ल हे। मैं जानथव टंगिया ह जंगल के जंगल ल उजाड़ दिही। हमर मन के जिन्दगी ह खतरा म पड़ गे हे। मैं ह त अपन जिनगी जी डारेव फेर मोर एक बात ल गांठ बांध के रख लव के एं टंगिया ह हमर तब तक कुछु नई बिगाड़ सकय जब तक के हमरे बीच के कोनो ह ओखर बेट नई बनही। टंगिया के जेन दिन बेट बनंहु उही दिन तुंहर मुसिबत हो ही।  छत्तीसगढ़- छत्तीसगढ़ी अऊ छत्तीसगढिय़ा के बारा साल म जेन हाल होय हे ओखर असली वजह इही हे। परबुधिया मन ह टंगिया के बेट बन के अपने ल काटत हे अऊ मिठलबरा मन ह मजा करत हे। सरकार ह दिल्ली म जा के कतको इनाम पा लय लेकिन इहां चलत लूट खसोट ह सब ल दिखत हे। करीना कपुर ल नचाय खातिर करोड़ों रूपया फंू कत  हे लेकिन अस्पताल नई बनावत हे। उद्योग मन ल जमीन दे खातिर ख्ेाती ल बरबाद करत हे लेकिन शिक्षा के व्यवसाय बर उंखर तीर पइसा नई हे।
लोटा लेके अवइया मन ह रातो रात बंगला तान दिन सौ-दू-सौ एकड़ के किसान बन गीन, फेक्टरी खोल दिन अऊ मोटर गाड़ी म घूमत हे। शहर ल चकाचक करत हे अऊ गांव के गली ह आज ले पयडगरी ले नई उबर पाय हे।  ये सब काबर होवत हे। शहर म अपराध बाढ़ गे। कोन हे एखर जिम्मेदार। राज बनीस त सोचे रीहिन के अब तो छत्तीसगढिय़ा मन के भाग लहुटही, गांव-गांव म स्कूल अऊ अस्पताल खुलही। इहां के पढ़े लिखे लइका मन ल नौकरी मिलही। लेकिन बारा साल म बारा हाल होगे।
इहां के जंगल, खदान पानी तरीया नदिया गोठान सब ल बेचे के उदीम होय लागिस। एखर विरोध करईया मन उपर लाठी बरसत हे अऊ ए काम म टंगिया के बेट बने छत्तीसगढिय़ा मन ह सहयोग करत हे।  मिठलबरा मन के चक्कर म अतका मोहा गे हे के न त उनला कोईला पोताय चेहरा दिखत हे न बरबाद होवत खेती के जमीन दिखत हे। पद अऊ पईसा के लालच म आंखी तोप ले हे। न त उनला अपन पुरखा के बानी के सुरता हे अऊ न त उनला छत्तीसगढ़ महतारी के पीरा ले मतलब हे।  एक बात जम्मो झन कान खोल के अपन धियान म बईठा लेवय के माटी के काया माटी म मिल जथे लेकिन सुरता ओखरे करे जाथे जेन ह अपन माटी बर कुछु करथे। करनी के भरनी ल इही जनम म दिखथे। अऊ कईझन के दिखत घलो हे।

सोमवार, 7 जनवरी 2013

ये कैसी सूचना क्रांति का दौर है...


एक तरफ जब सूचना क्रांति के इस दौर में दुनिया भर की खबरे आसानी से मिल जाने का दावा किया जा रहा है वहीं दूसरी तरफ प्रिंट मीडिया के एडिशन के चक्कर में पड़ोसी जिले की खबरों से अनजान होने का खतरा बढ़ चुका है। जितना बड़ा अखबार उतना Óयादा एडिशन ने सूचना क्रांति के दावों की पोल खोल कर रख दी है।
छत्तीसगढ़ में स्थापित अखबारों को इससे कोई मतलब भी नहीं रह गया है नवभारत पत्रिका भास्कर हरि भूमि नई दुनिया जैसी अखबारों का राजधानी से प्रकाशन हो रहा है। कहने को ये छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक प्रसार वाले अखबारों का तमगा लिये बैठे हैं लेकिन एडिशन के चक्कर में खबरे सिमट कर रह गई है। रायपुर वालों को पड़ोसी जिले की खबरे ठीक से नहीं मिलती तो पड़ोसी जिले को राजधानी की खबरें ठीक से नहीं मिल पाती।
सूचना क्रांति के दौर में इस गड़बड़झाले से लोग हैरान है और वे अपने को ठगा सा महसूस कर रहे हैं तो आश्चर्य नहीं है।
अब तो पत्रकार वार्ता लेने वाले लोग भी पत्रकारों से निवेदन करते हैं कि उनकी खबर ऐसी जगह लगाये जिसे पूरे छत्तीसगढ़ भर के लोग पढ़ सके। एडिशन के इस चक्कर की वजह से अ'छी बातें भी लोगों तक नहीं पहुंच पा रही है लेकिन इससे मीडिया जगत को कोई लेना देना नहीं है।
हर जिले या ब्लॉक के लिए अलग एडिशन की वजह सिर्फ और सिर्फ  विज्ञापन की भूख होकर रह गई है। और इस वजह से पाठकों को पता नहीं चल पाता कि पड़ोसी जिले में सरकार की क्या करतूत है या लोगों के साथ न्याय-अन्याय कैसा हो रहा है।
छत्तीसगढ़ के मीडिया जगत में एडिशन के इस चक्कर ने ग्रामीण रिपोटिंग को भी ध्वस्त कर दिया है इसकी वजह से गांवों के विकास में सहायक योजनाएं भी दम तोडऩे लगी है।
एडिशन को लेकर भले ही अखबार वाले खुश हो लेकिन इससे होने वाले नुकसान की भरपाई मुश्किल है।
और अंत में...
इन दिनों राजनैतिक गलियारें में एक चर्चा जोरों पर है कि जो बादल गरजते हैं वे बरसते नहीं लेकिन जो गरजते हैं वे जल्दी सेट जरूर हो जाते है।

रविवार, 6 जनवरी 2013

किरण की करतब फिर फेल...


नगर निगम के पार्षद उपचुनाव में कांगे्रस हार गई। बैजनाथ पारा में कांगे्रस पहली बार नहीं हारी है लेकिन यहां से भाजपा पहली बार जीती है और वह भी तब जब निगम में कांगे्रस का कब्जा है। पार्षद जैसे चुनाव में हार जीत भले ही राजनैतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण न हो लेकिन कांग्रेसी महापौर किरण मयी नायक के लिए यह महत्वपूर्ण था क्योंकि टिकिट से लेकर सारी रणनीति में उनकी प्रत्यक्ष भागीदारी रही है। और इस हार की वजह उनकी रणनीति को मानी जाय तो गलत नहीं होगा।
वैसे भी किरणमयी नायक जिस दिन से महापौर बनी है निगम में कई तरह के इतिहास रचे गए है। उनके कार्यकाल में बÓाट प्रस्ताव तक गिर गया वह भी कांगेे्रस के ही पार्षद की बगावत की वजह से गिरा था। इसके बाद स्टेज में उनके रौद्र रूप को लेकर भी नागरिक हैरान थे। और अब उपचुनाव में मिली हार ने उनकी कार्यशैली पर फिर से सवाल खड़ा कर दिया है।
यह अलग बात है कि भाजपा के दिग्गज मंत्रियों ने यहां पानी की तरह पैसा खर्च किया लेकिन हार की सिर्फ यही एक वजह बताना सच से दूर भागना होगा।
निगम के बजट प्रस्ताव गिर जाने के बाद भी संगठन ने जिस तरह से उपचुनाव में उन पर भरोसा किया था। अब नये सिरे से इस पर सोचने की Óारूरत पड़ सकती है।
वैसे भी शहर का विकास कांगे्रस और भाजपा की राजनीति में उलझ कर रह गई है। बड़ी योजनाएं तो शुरू नही हो पा रही है। रोजमर्रा के कार्य तक ठीक से नही हो रहे है। बजबजाती नालियां, धूल भरी सड़क और भयावह म'छर से लोग परेशान हैै।
और पार्षदों का काम तो जैसे तैसे पैसा कमाने का रह गया है। खासकार पार्षद पतियों की दखलंदाजी चरम पर है। Óयादातर काम पार्षदपति ही कर रहे है। यहां तक कि जोन कार्यालय से लेकर मुख्यालय तक पार्षद पतियों का ही दखल है। अब तो निगम के कर्मचारी भी इन पार्षद पतियों से तंग आ चुके है और वे पार्षद पतियों के हरकतों पर चुहल बाजी करते नहीं थकते।
एक निगम कर्मचारी ने बताया कि सफाई ठेकेदार को एक पार्षद पति ने किस तरह हर माह पैसा देने का फरमान सुना दिया तो एक पार्षद पति ने अपने  रिश्तेदार को ठेका दिलाने अधिकारियों से कैसे भीड़ गया था। यह अलग बात है कि उसे बाद में अपने पार्टी के आकाओं को सफाई तक देनी पड़ी थी।
निगम में सिर्फ साफ सफाई का ही मामला नहीं है अब राजस्व वसूली में भी खेल होने लगा है। कई पार्षद तो राजस्व वसूली में हस्तक्षेप करने लगे है और टैक्स कम  करवाने में लगे हैं। जबकि टैक्स को लेकर निगम कर्मचारी भी अपनी चला रहे है।
सीनेट्री इंस्पेक्टरों का काम तो सिर्फ  दस्तखत करना ही रह गया है। कुछ की तो सुबह होटलों में ही बीत जाती है। पार्षद उपचुनाव के साथ ही निगम कर्मचारी महासंघ का भी चुनाव हुआ और अरूण दुबे और सुरेन्द्र दुबे फिर काबिज हो गये। अरूण दुबे के साथ सुभाष सोहाने के नाम की चर्चा भी एक बार गर्म है। आखिर कमिश्नर साराभाई वाली घटना को लोग कैसे भूल सकते  है।
वैसे भी अरूण दुबे की Óाुझारू शैली किसी से छिपी नहीं है। उनके तेवर से भी सभी  परीचित है। ऐसे में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से उनकी कितनी जमेगी देखना है।

मुंदी आंख से...

उपचुनाव में भाजपा की जीत से उत्साहित पार्षद दल ने महापौर से इस्तीफे की मांग कर डाली लेकिन यह मांग कुछ को भारी पड़ गई और चर्चा है कि उपर से इसके लिए फटकार भी लगाई गई। फटकार की वजह अब भी ढूंढा जा रहा है।

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

अब भी नहीं सुधर रही पुलिस ...


यह तो कुत्ते की दुम को बारह साल पोंगली में रखने के बाद भी सीधी नहीं होने वाली कहावत को ही चरितार्थ करती है वरना छत्तीसगढ़ पुलिस का रवैया पीढि़तों को लेकर इतना नकारात्मक नहीं होता । जुआं सट्टा अवैध शराब बेचने वालों के अलावा अपराधियों से गठजोड़ में छत्तीसगढ़ पुलिस इतनी मशगुल हो गई है कि उनका मन बलात्कार जैसे मामले की पीढि़तों को देखकर भी नहीं पिघलता तभी तो गौरेला के टीआई सी एन सिंह ने बलात्कार की शिकार महिला को थाने से भगा दिया । पीडि़त महिला की शिकायत पुलिस कप्तान रतन लाल डांगी से की गई तब कहीं जाकर न केवल रिपोर्ट लिखी गई बल्कि टी आई सी एन  सिंह को निलंबित किया गया ।
पिछले हफ्ते जहां पूरा देश दामिनी के लिए न्याय मांग रहा था वहीं छत्तीसगढ़ की पुलिस बलात्कारियों के प्रति नरम रवैया रखे हुए थे । गौरेला की इस घटना के अलावा पिछले हफ्ते छत्तीसगढ् में आधा दर्जन से अधिक बलात्कार की वारदात हुई और प्राय: इन सभी मामलों में थाने का रवैया दुर्भाग्य पूर्ण रहा  । भानुप्रतापुर में तो महिला से सामूहिक बलात्कार के मामले में पुलिस ने तब कार्रवाई की जब मीडिया ने हल्ला मचाया । ईलाज के लिए उस मलिा को राजधानी से दूर इसलिए भी रखा कि कोई नई मुसिबत खड़ी न हो जाए । रातो रात जुर्म दर्ज कर आरोपियों को गिरफ्तार किया गया । लेकिन मजाल है कि इस मामले में कप्तान साहब कुछ कहते । इसलिए कुछ नहीं कर पाये क्योंकि थाना प्रभारी उपर तक पहुंच रखता है ।
पुलिस जानती है कि उनकी वर्दी के रौब के आगे सब डरते है और यदि मामले पर Óयादा हल्ला मचा तो भी तो कुछ दिन बाद सब शांत हो जायेगा ।
पुलिस जानती है कि उनके प्रति लोगों में बेह्द गुस्सा है लेकिन उन्हें उनकी परवाह भी नहीं है क्योंकि गुण्डागर्दी का लाइसेंस तो उन्ही के पास है और जब तक नेताओं व मंत्रियों के पैसों की भूख रहेगी उन्हें अ'छी जगह पोस्टिंग से कोई नहीं रोक सकता ।
तभी तो राजधानी में ऐसे ऐसे वर्दी वाले थाने में बैठे हैं जिनकी गलतियां उन्हें नौकरी में रखने के लायक नहीं है । पंडरी मोवा थना प्रभारी की शिकायत क्या कम है या लोहा कारोबारी पंकज की रिपोर्ट नहीं लिखने वाले का क्या हुआ ।
तभी तो लोगों का गुस्सा फट पड़ता है और यदि कोई पुलिसिया अत्याचार पर आवाज उठाये तो पुलिस उसकी पिटाई से भी  परहेज नहीं करती तभी तो पिछले दिनों राजधानी के शास्त्री चौक जैसे व्यस्ततम चौक में वर्दी वालों ने भाजपा नेता के रिश्तेदार की सरे आम पिटाई की लेकिन उपर से दबाव आया तो विभागीय जांच के निर्देश दे दिये गये । भाजपा के सांसद रमेश बैस के भतीजे ओंकार बैस की भी पुलिस वालों ने पिटाई की लेकिन मामला सांसद के भतीजे का था इसलिए मारने वाला पुलिस कर्मी को निलंबित कर दिया यानी आम आदमी की पिटाई पर यहां कुछ नहीं होना है ।
ुपुलिस अपनी मर्जी की मालिक है वह जो चाहे कम है तभी तो पंडरी कपड़ा मार्केट में तवेरा की लूट होती है और पुलिस चोरी का जुर्म दर्ज करती है मजाक है राजधानी के दो-दो मंत्री पुलिस से पूछने की हिम्मत कर सके कि ऐसा कैसे हो गया वे तो तभी बोलते है जब उनके परिजानों पर पुलिस का गुस्सा निकलता है ।
लोग गुस्से में है । लेकिन उनका गुस्सा कभी नहीं निकलता । वर्दी वाले का खौफ केवल शरीफों पर ही चलता है तभी तो अंबिकापुर में पुलिस कर्मी पर जानलेवा हमला होता है और हमलावर को पकडऩे जब पुलिस आरोपी के घर पहुंचती है तो वहां एक सब इस्पेंक्टर को कालर पकड़कर बंधक बना लिया जाता है और सीएसपी को दल बल के साथ जाना पड़ता है । और अपराधी पुलिस से डरे भी क्यों ? पैसा लेकर गलबहियां करने में पुलिस को भी मजा आता है ।
चलते चलते ...
अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पाने व ठेकेदार के दबाव से निपटने पुलिस ने नया फार्मूला निकाला है । आलंपिक संघ के अध्यक्ष और महासचिव यानी रमन सिंह और बल्देव भाटिया के संबंधो को खूब प्रचारित करों लोग सीधे मुख्यमंत्री पर ही उंगली उठायेंगे ।

गुरुवार, 3 जनवरी 2013

न वादा न काम सिर्फ हुए बदनाम


खदानों की बंदर बांट, खेती की जमीनों की बरबादी, सरकारी खजानों को अरबों-खरबों का नुकसान, भयावह अपराध और शर्मनाक भ्रष्टाचार की वजह से छत्तीसगढ़ की बदनामी राष्ट्रीय स्तर पर हुई । राजनीति और सत्ता के लिए वादे तो किये गये लेकिन न तो शिक्षा कर्मियों से किये वादे पूरे हुए न ही किसानों से किये वादे ही पूरे हुए । आदिवासी वर्ग पुलिसिया बर्बरता से उद्वेलित है तो सतनामी समाज आरक्षण कम होने से आन्दोलित है । मंत्री परिवारों की ढाट-बाट जहां आम छत्तीसगढिय़ों के दिलों को छलती करने लगा है तो शराब ठेकेदार की मुख्यमंत्री से सीधे नजदीकी ने गांवों की शांति छिन ली है । सत्ता के दुस्पयोग को लेकर छत्तीसगढ़ के लिए 2012 हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज हो गया है कहा जाय तो अतिशंयोक्ति नहीं होगी ।
छत्तीसगढ़ में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर भले ही भाजपा व कांग्रेस ने राजनीति शुरू कर दी हो लेकिन इस राजनीति के घनचक्कर में सभी वर्ग अपने को ठगा महसूस कर रहे हैं । घोटाले-भ्रष्टाचार और कालिख से पूते चेहरे सत्ता के दुरूपयोग की जो कहानी कह रहे है वह किसी के लिए भी शर्मसार कर देने वाला है । 
छवि पर ही धब्बा ...
          पिछला चुनाव भाजपा ने डॉ. रमन सिंह की साफ छवि की वजह से जीता था और  इस बार इसी साफ छवि पर एक नहीं कई बार धब्बे लगे हैं । रतनजोत घोटाले या ओपन एक्सेस घोटाले को लोग भूल भी जाये लेकिन कोयले खदान की कालिख से छत्तीसगढ़ की बदनामी राष्ट्रीय स्तर पर हुई है न तो इस संचेती बंधु की वजह से हुई बदनामी भूलने लायक है और न ही राजसी तामझाम वाली पार्टी ही लोग भूल सकते है । लोग न तो सलमान के झटके भूलने वाले है और न ही करीना के ठुमके पर किये गए करोड़ों रूपये ही भूलने वाले हैं ।
प्रदेश के मुख्य के पास उर्जा और खनिज जैसे महत्वपूर्ण विभाग हैं और दोनों ही विभागों में जिस तरह से भ्रष्टाचार के किस्से सामने आये है वह सरकार के लिए आगामी दिनों में मुसिबत बढ़ाने वाली हो सकती है ।
सरपल्स स्टेट का दावा बिजली की बड़ती कीमतों के आगे दम तोडऩे लगी है । लगातार बढ़ रही बिजली की कीमत ने आम आदमी का जीना दूभर कर दिया है । उपर से आम आदमी को छूट देने की बजाय उद्योगों को जिस तरह से छूट दी गई वह व्यथित करने वाला  
 है ।
रतन जोत के नाम पर जिस तरह से करोड़ों फूंके गए वह भी अपने आप में एक इतिहास है । प्रचार-प्रसार में ही आरबों फूंके गए ।
ओपन एक्सेस घोटाला को लेकर तो सरकार के जिंदल प्रेस जगजाहिर हो गया जबकि हर गांव में बिजली पहुंचने का वादा पूरा होता कहीं नहीं दिख रहा है ।
ऊर्जा विभाग में ऊर्जासचिव अमन सिंह की नियुक्ति ही विवादास्पद है और यहां के अफसर शाही के किस्से तो दिल्ली तक सुनाई देते है ।
खनिज में तो बंदरबांट का जो खेल हुआ उसकी बदनामी राष्ट्रीय स्तर पर हुई । संचेती बंधुओं को कोल ब्लाक आबंटन में जिस तरह से नियम कानून की अनदेखी की गई वह सत्ता के दुरूपयोग का ऐसा मामला है जिसकी कालिख पूछते नही पूछ रही है । सरकार का संचेती प्रेम इस कदर है कि उससे संचेती बंधु को 49 फीसदी शेयर के बाद भी एम डी बना दिया है ।
खदानों की बंरबांट की कहानी यही खतम नहीं होती । पुस्य स्टील से लेकर न जाने कितने लोगों को खदानें दे दी गई जो नियम कानून के खिलाफ है । सरकार ने आवेदन कर्ताओं के आवेदन का परिक्षण तक नहीं किया ।
खेती की बरबादी और उद्योग प्रेम
विकास के नाम पर जिस तरह से खेती की जमीनों को बरबाद किया गया इसके दुस्परिणाम आने वाली पीढ़ी को भुगतना पड़ेगा ।
सरकार का उद्योग प्रेम इस कदर रहा कि उसने उद्योगों को जमीन दिलाने नियम-कायदे को ताक पर रखा । झूठे जन शिविर लगाये गए और जमीन नहीं देने वाली किसानों की पुलिसिया पिटाई तक हुई । औद्योगिक दादागिरी का यह आलम रहा कि खुद पार्टी के सांसदों को औद्योगिक आतंकवाद जैसे नारे बुलंद करने पड़े ।
नई राजधानी के नाम पर भ्रष्टाचार की नदिया बहाई गई और जबरिया जमीन अधिग्रहण के अलावा राÓयोत्सव के नाम पर खड़ी फसल तक में बुलडोजर चलाये गए ।
बालको चिमनी मामला हो या अन्य औद्योगिक दादागिरी सरकार साफ तौर पर इनके आगे नतमस्तक होते नजर आई ।

दमदार मंत्री की दमदारी...
ेप्रदेश के दमदार मंत्री माने जाने वाले बृजमोहन अग्रवाल की दमदारी के किस्से अब दिल्ली तक गुुजने लगे है । उखड़ती सड़कें दरकतीं पूल अपने आप में भ्रष्टाचार की कहानी बयां कर रही है ।
परिवार वालों के सत्ता में गुसपैठ की चर्चा तो दिल्ली तक गुंजने लगी है । संस्कृति विभाग हो या पयर्टन विभाग हर जगह भ्रष्टाचार की नदिया बहाई गई । बगैर नाम पते के रोप वे बनाने लाखों रूपये देने का मामला हो या विदेश से काम के एवज में पैसा मांगने के आरोप ने सरकार के लिए मुसिबत बड़ा दी । सरकार के लिए शर्मिन्दगी की बात तो 26/11 के जश्र का आयोजन भी रहा ।
जिसकी चर्चा अब भ्ीा चौक चौराहों पर सुनी जा सकती है ।
अफसरशाही, दलाल-निकम्मपा प्रशासनिक आतंकवाद
रमन सरकार के कार्यकाल में अफसरों की मेहरबानी और उनकी दादागिरी के किस्से यहां तक जा पहुंचे हैं कि दीलिप सिंह जुदेव को प्रशासनिक आतंक वाद की बात कहनी पडी तो गृहमंत्री ननकी राम कंवर को एसपी को निकम्मा और कलेक्टर को दलाल कहना पड़ा ।
अफसरों ने सरकार की उसी योजना में रूचि ली जिसमें उनका हित सधता दिखा ।
गुटबाजी के चलते कई बार सचिवों के झगड़े सामने आये तो डीजीपी स्तर के कई अधिकारी रिटायर्ड मेंट के पहले हटाये गये । मंत्रियों से टकराव चरम पर रहा और पार्टी से टकराव चरम पर रहा और पार्टी के विधायक से लकर कार्यकर्ता भी अफसरशाही से त्रस्त नजर आये ।
संकल्प तोड़ा गया ...
रमन सरकार के लिए भाजपा ने चुनावी घोषणा पत्र जारी करते हुए हिन्दुत्व की खूब दुहाई देते हुए कहा था कि वे जनता से वादा नहीं संकल्प कर रहे हैं लेकिन आज भी ऐसे दर्जनों संकल्प है जिससे सरकार दूर भाग रही है इनमें से कई संकल्प तो तब लिये गये थे जब मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिह स्वयं भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष थे ।
शिक्षाकर्मियों का संविलियन इसके से प्रमुख संकल्प रहा है । आम शिक्षा कर्मी आन्दोलित है और उनके आन्दोलन की सÓाा ब"ाों से लेकर आम आदमी तक को भुगतना पड़ रहा है । जब शिक्षा कर्मियों का संविलियन ही नहीं करना था तब ऐसे वादे किये ही क्यों गये ।
इसी तरह का मामला प्रदेश भर के लिपिकों का है । सरकार ने तिवारी कमेटी की अनुशंसा को लागु नहीं कर रही है और जब अनुशंसा लागु नहीं करना थ तो कमेटी क्यों बनाई गई ।
प्रदेश भर के किसानों को 270 रूपये बोनस का संकल्प भी सरकार ने पूरा नहीं किया उल्टा इस मामले में केन्द्र की सरकार से राजनीति की जाने लगी ।
युवाओं को बेरोजगारी भत्ता के नाम पर छला गया । तो नौकरी के दरवाजे भी ठीक ढंग से नहीं खोले गये ।